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संगीत:ग्रामोफोन से भारत की पहली मुलाक़ात /पूनम खरे

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जनवरी 16, 2014 | गुरुवार, जनवरी 16, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 जनवरी-2014 


चित्रांकन:निशा मिश्रा,दिल्ली 
सन् 1877 में फ़ोनोग्राफ का आविष्कार हुआ। फ़ोनोग्राफ यानि वह मशीन जिस पर आवाज़ रिकॉर्ड की जा सकती थी और पुनः सुनी जा सकती थी। थॉमस अल्वा एडीसन के इस नए आविष्कार के साथ ही आकाशवाणी जैसी पौराणिक परिकल्पनाएँ साकार हो उठीं और प्रगति के पथ पर अग्रसर हमारी यह दुनिया, और एक कदम आगे बढ़ गई। सन् 1877 से 1887 के मध्य, फ़ोनोग्राफ, विश्व में हर जगह पहुँच चुका था। हज़ारों नौजवान, एडीसन के फ़ोनोग्राफ के प्रति आकर्षित थे। इन्ही में से एक थे- एमिली बरलाइनर। 

मूल रूप से हैनोवर, जर्मनी के थे। उस समय वे वॉशिंग्टन में एक क्लर्क के रूप में काम कर रहे थे। बरलाइनर, वैज्ञानिक अभिरुचि के मालिक थे और अपना खाली समय वैज्ञानिक प्रयोगों में व्यतीत  करते थे। वे फ़ोनोग्राफ के सिलिन्डर के स्थान पर फ्लैट डिस्क का  प्रयोग कर, उसे और बेहतर बनाना चाहते थे। यहाँ इस बात का ज़िक्र करना उचित होगा कि एडीसन के फ़ोनोग्राफ़ में वैक्स आधारित, सिलिन्डर-रिकॉर्ड्स का इस्तेमाल किया जाता था। 

फ्रेड  विलियम गैसबर्ग
बरलाइनर द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयोगों में से एक महत्वपूर्ण प्रयोग के साक्षी थे -एफ. डब्ल्यू. गैसबर्ग यानि फ्रेड  विलियम गैसबर्ग, जो कालान्तर  में विश्व प्रसिद्ध ग्रामोफोन कंपनी में बरलाइनर के साझेदार बने और कंपनी के लिए रिकार्डिंग विशेषज्ञ के रूप में काम करते रहे। अपने इस नए आविष्कार को बाज़ार में लाने और उसके प्रचार के लिए उन्होंने सम्मिलित प्रयास किए। अधिक विकसित, बेहतर मशीनों के लिए उन्होंने फ़ायनेंसर, रिकॉर्डिंग- कलाकार और इन सब से बढ़ कर मास्टर डिस्क की अपरिमित नक़लें बनाने का आसान तरीका ढ़ूढ़ा। फ़ोनोग्राफ़ अब ग्रामोफ़ोन के रूप में, नई व्यवसायिक ऊँचाइयाँ छूने को तैयार था। कोई प्रतिस्पर्धी आविष्कारक बाज़ार पर कब्ज़ा कर ले, इससे 

पहले बरलाइनर ने अपने एजेंट डब्ल्यू. बी. अवेन कोलंदन भेजा, जिसके साथ ही साथ, सन् 1898 में, गैसबर्ग भी रिकॉर्डिंग  के लिए लंदन पहुँचे और लंदन में इस टीम द्वारा ग्रामोफोन कंपनी की स्थापना की गई। इसी दौरान अपने भतीजे, जोसेफ बरलाइनर के सहयोग से बरलाइनर ने, हैनोवर, जर्मनी में रेकॉर्ड प्रेसिंग प्लांट  की स्थापना की। यह वह स्थान था जहाँ, ग्रामोफोन कंपनी द्वारा रिकॉर्ड किए गए, वैक्स- मास्टर (रिकार्डिंग की मूल प्रति जो वैक्स की बनी होती थी ) की प्रतियाँ तैयार की जाती थीं।    
                                             
बरलाइनर
एफ.डब्ल्यू. गैसबर्ग द्वारा लंदन में रिकॉर्डिंग का कार्य आरंभ किया गया। यह रिकॉर्डिंग-अभियान वहीं नहीं रुका बल्कि एक श्रृंखला के रूप में विश्व के विभिन्न देशों  में पहुँचा। व्यवसाय की संभावनाओं को देखते हुए जिन देशों का चुनाव किया गया उनमें भारत भी शामिल था। यहाँ इस बात का उल्लेख प्रासंगिक होगा कि लंदन के रिकॉर्डिंग  अभियान के   दौरान   कुछ  भारतीय आवाज़ें भी रिकॉर्ड की गईं थीं। ये 7श् एकतरफा (वन- साइडेड) डिस्क थीं, जो सन् 1899 में तैयार की गईं। कैप्टन भोलानाथ, डॉ. हरनामदास एवं अहमद ने विभिन्न भाषाओं में गीत तथा कवितापाठनुमा रिकॉर्डिंग  करवाईं। ये लगभग 44 रिकॉर्ड थे, जिनमें से अब एक भी उपलब्ध नहीं है। 

सन् 1901 में ग्रामोफोन कंपनी ने जे. डब्ल्यू. हॉड को कलकत्ता भेजा और वहॉ कंपनी की कार्यालयीन-शाखा स्थापित की। भारत में अपने प्रथम रिकॉर्डिंग अभियान को मूर्तरूप देने, सन् 1902 में गैसबर्ग कलकत्ता पहुँचे।हॉड ने कुछ संगीत कलाकारों की व्यवस्था कर रखी थी। इसके लिए स्थानीय थिएटर  से संबद्ध  अमरेन्द्र नाथ दत्त और जमशेदजी फ्रामजी मदन की मदद ली गई थी।क्योंकि पश्चिम से आए हुए गैसबर्ग और उनकी टीम भारतीय संगीत और उसकी विधाओं से अनजान थे, इसलिए भारतीय गीत संगीत के रूप में उनके सामने जो कुछ लाया गया, उन्होंने स्वीकार कर लिया। इनमें भारतीय शास्त्रीय संगीत से ले कर बंगाली नाटकों के संवादों तक सब कुछ था। 

गैसबर्ग ने शनिवार, 8 नवंबर, 1902 को प्रायोगिक तौर पर रिकॉर्डिंग की, जिस में क्लासिक थिएटर की सौशी मुखी और फानी बाला ने भाग लिया। उन्होंने लोकप्रिय नाटकों जैसे श्रीकृष्ण, प्रमोदरंजन, अलीबाबा आदि के संगीतांश गाए। गैसबर्ग संतुष्ट नहीं थे। उनके अनुसार, इनकी आवाज़ों की दशा अत्यंत दयनीय थी। गैसबर्ग नहीं जानते थे कि हिन्दुस्तान का वास्तविक संगीत क्या है, किन्तु वे इतना जान पा रहे थे कि वे उस चीज़ की तलाश में कतई नहीं हैं जो हिन्दुस्तानी संगीत के नाम पर अब तक उनके सामने आई है। उन्हें उस संगीत की तलाश थी, जो स्तरीय हो, साथ ही लोगों द्वारा इतना पसंद किया जाए कि ग्रामोफोन कंपनी ज़बरदस्त व्यवसायिक सफलता के साथ भारत के बाज़ार में अपने पैर जमा सके। 

ग्रामोफोन
अंततः उन्होंने कलकत्ता के कुछ गणमान्य नागरिकों एवं अधिकारियों का सहयोग लिया और अगले कुछ दिनों में उनके साथ, कलकत्ता के तमाम थिएटरों, सेठों एवं ज़मीदारों के निवास स्थानों पर होने वाली संगीत महफिलों और उन सभी स्थानों को छान डाला जहाँ अच्छे संगीत की संभावना हो सकती थी। किन्तु गैसबर्ग को  निराशा ही हाथ लगी।  इसी दौरान उन्हें कलकत्ता के एक नामी सेठ की कोठी पर आयोजित समारोह में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ। यह एक शानदार समारोह था, और उच्चवर्गीय, नामी गिरामी लोगों की उपस्थिति से महिमामंडित था। गैसबर्ग कोठी के सुसज्जित छज्जे से माहौल का जायज़ा ले रहे थे, कि यकायक माहौल में गहमागहमी बढ़ गई। चार घोड़ों की एक विक्टोरियन बग्घी दरवाज़े पर आ खड़ी हुई थी। सलीके से पहनी हुई रेशमी साड़ी और बेशकीमती ज़ेवरात। आत्म विश्वास से भरी हुई एक सुंदर महिला बग्घी से उतर कर मंच पर जा बैठी। अब तक बातचीत और ठहाकों से गूंज रही महफिल में एक ख़ुशनुमा खामोशी छा गई। सभी अपना स्थान ले चुके थे। उस महिला ने मंच से सबका अभिवादन किया। महफिल में विदेशी मेहमानों को देख कर वह उनकी ओर मुखातिब हुई और कहा- गुड ईवनिंग जेंटेलमैन। संगतकारों ने साज़ मिलाए और गायन आरंभ हो गया। माहौल में आए सकारात्मक बदलाव, कलाकार का तहज़ीब भरा रवैया, महफिल में उपस्थित लोगों का ध्यानपूर्वक गायन सुनना और उस पर कलाकार की मीठी आवाज़। गैसबर्ग लगातार महसूस कर रहे थे कि बात कुछ अलग है। 

गौहर जान 
कार्यक्रम के दौरान अपने स्थान से उठ कर ज़रा टहलने की मंशा से, गैसबर्ग, छज्जे के बाहरी छोर की ओर आ गए। यहाँ उन्होंने जो देखा वह अविस्मरणीय था। कोठी के आसपास तमाम लोग जमा थे और संगीत सुन रहे थे, उतने ही ध्यान और खामोशी से जितना कि कोठी के अंदर बैठे लोग। ये वे आम लोग थे जो अंदर गायन प्रस्तुत कर रही बड़ी कलाकार का कार्यक्रम आयोजित करवाने का सामर्थ्य नहीं रखते थे और ना ही महलों और कोठियों में होने वाली बड़े लोगों की महफिलों में शिरकत करने की क्षमता। किन्तु उसे सुनने के लिए उतने  ही उत्सुक थे, जितना अंदर बैठे लोग। गैसबर्ग को यह समझने में देर ना लगी कि वे सही व्यक्ति तक पहुँच चुके हैं। ये गौहरजान थीं। कलकत्ता की कोयल और हिन्दुस्तान की जानी मानी गायिका, एक कार्यक्रम के लिए जिनका पारिश्रमिक तीन हज़ार से पाँच हज़ार रूपए होता था।  कार्यक्रम के पश्चात् गैसबर्ग ने गौहर जान से रिकॉर्डिंग  हेतु आग्रह किया और वे मान गईं। गैसबर्ग की तलाश पूरी हुई।

11 नवंबर सन 1902, कलकत्ता के एक होटेल के दो कमरों में एक अस्थाई रिकॉर्डिंग  स्टूडियो सेट किया गया था। गैसबर्ग और उनके सहायक उस लम्हे का इंतज़ार कर रहे थे, जो व्यवसायिक रिकॉर्डिंग  के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज़ होने वाला था।लगभग 9 बजे सुबह, गौहर जान ने अपने संगतकारों और रिश्तेदारों के साथ स्टूडियो में प्रवेश किया। वे बहुमूल्य आभूषणों और रेशमी साड़ी में सुसज्जित थीं। गौहर जान, उनके लिए तैयार किए गए मंच पर बैठ गईं।संगतकारों ने साज़ मिलाए और गौहर जान गाने के लिए तैयार थीं। गैसबर्ग ने उन्हें तकनीकी हिदायतें दीं- हॉर्न पर जितना ज़ोर से हो सके उतना ज़ोर से गाएँ, गाने के ठीक बाद अपना नाम उद्घोषित करें और इन दोनों कामों के लिए कुल तीन मिनट  का समय लें।गौहर जान ने गैसबर्ग से यह नहीे कहा कि जिस विधा को प्रस्तुत करने के लिए उन्हें तीन मिनट  का समय दिया जा रहा है, वह हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विधाओं में से है, जिसे गाने के लिए मिनट  नहीं घंटे चाहिए, उन्होंने गैसबर्ग से कहा - शैल वी बिगिन।

पूनम खरे
संगीत विषय की विद्यार्थी हैं 
भोपाल, मध्यप्रदेश के 
शासकीय महाविद्यालय में 
संगीत विषय की सहायक प्राध्यापक हैं
शोधपरक लेख और स्वयंरचित बंदिशें 
'संगीत', 'हाथरस' सहित कई पत्र-पत्रिकाओं 
में प्रकाशित होती रहती हैं।
ई-मेल :poonam_khre@yahoo.co.in
यह गौहर जान का आत्मविश्वास था। उन्होंने नई तकनीक को अत्यंत कौशल और सहजता से अपना लिया।गैसबर्ग ने रिकॉर्डिंग के लिए की गई व्यवस्था और उपकरणों की स्वयं जाँच की और एक मोटा वैक्स मास्टर, टर्न टेबल पर रखा। टर्न टेबल, 78 चक्कर प्रति मिनट  की गति से घूम रहा था। एक बड़ा रिकॉर्डिंग हॉर्न कमरे की दीवार पर लगाया गया था, जिसके चौड़े सिरे पर गौहर जान को गाना था। हॉर्न का दूसरा सिरा दीवार के दूसरी ओर लगे डायफ्राम से जुड़ा था और डायफ्राम एक नीडिल से जुड़ा था। यह नीडिल, ग्रूव्स काटने के लिए 78 चक्कर प्रति मिनट  की गति से घूम रहे वैक्स मास्टर पर रख दी गई।समाप्त किया और जैसा कि गैसबर्ग ने निर्देशित किया था, अपने नाम की उद्घोषणा की- माई नेम इज़ गौहर जान।

इस वाक्यांश को भी रिकॉर्ड किया गया ताकि हैनोवर, जर्मनी के इंजीनियर जिन्हें मूल रिकॉर्ड की नकलें बनानी थीं, कलाकार के नाम के लेबेल बनाने में कोई त्रुटि न करें।तीन मिनट  के इस रिकॉर्डिंग  सत्र के लिए गौहर जान को 3,000 रुपए का पारिश्रमिक प्रदानकिया गया इस प्रकार भारत की पहली व्यवसायिकग्रामोफोन रिकॉर्डिंग सम्पन्न हुई। यह रिकॉर्डिंग भारत में होने वाली पहली रिकॉर्डिंग थी साथ ही यह भारतीय संगीत की भी पहली ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग थी। गौहर जान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की इस पहली व्यवसायिक ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग को अपनी आवाज़ देकर भारतभूमि पर इतिहास रचा और भारतीय संगीत के एक नए युग की शुरूआत की।
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