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आलेख:परम्परागत जनमाध्यम: एक अवलोकन / डॉ. दिग्विजय सिंह राठौड़

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जनवरी 16, 2014 | गुरुवार, जनवरी 16, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 दिसंबर-2013 


चित्रांकन:निशा मिश्रा,दिल्ली 
सृष्टि के प्रारम्भ से जब से मानव की उत्पत्ति हुई तब से उसने अपनी इच्छाओं, संवेगों-भावनाओं एवं आवश्यकताओं को मूर्त रूप प्रदान करने हेतु हाव-भावों का प्रयोग किया जो कालान्तर में भाषा के रूप में विकसित हुई। भाषा ने ही मानव के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को संभव बनाया। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके लिए बिना किसी संचार के जीवित रहना असंभव है। हम परिवार, समाज एवं समूह में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। इसमें ही स्थिति और आवश्यकतानुसार परस्पर संचार करते रहते हैं। जिस प्रकार हमारी आवश्यकताएं असीमित है उसी प्रकार से संचार के उद्देश्य भी असीमित है। मानव अपने प्रारम्भिक काल से ही अपने विचारों को अन्य क्षेत्र और स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहा है। विचारों, सूचनाओं, भावनाओं के निरन्तर अभिव्यक्ति से ही हमारे समग्र जीवन मूल्यों और संस्कृति की संरचना होती है। सूचना की भूख एवं संचार से जनसंचार के असीमित संदेश प्रवाह के कारण दूसरों तक संदेश पहुंचाने के अनेक आधुनिक साधनों का विकास मानव ने कर लिया है।

21वीं सदी में जनमाध्यमों का क्षितिज अपने देश में एवं अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में बहुत बढ़ गया है।समाज का हर वर्ग बच्चे, महिला, नौजवान एवं वृद्ध जनमाध्यमों से जुड़े हुए हैं। पहले कभी भी इतनी सूचना, इतनी आसानी से, इतने क्षेत्रों में, इतने कम समय में, इतने लोगों तक उपलब्ध नहीं थी। जनमाध्यमों के द्वारा सूचना की पहुंच, प्रभाव, दायरा और विविधता में अद्भुत वृद्धि हुई है।आधुनिक जनसंचार माध्यमों के पूर्व हमारे समाज में परम्परागत संचार माध्यम जैसे लोकनृत्य, लोक कथाओं, लोक गीत का लंबे समय तक प्रयोग होता रहा है। तेजी से बदलते परिवेश के बावजूद भी परम्परागत लोक माध्यमों की अपनी एक अलग छवि व पहचान है। आज भी समाज में खास कर गांवों में जागरूकता के लिए बड़े स्तर पर इसका उपयोग हो रहा है।

हमारे देश में पिछले कई वर्षो में मीडिया ने काफी विकास किया है। यह प्रसार अखबारों, टीवी, रेडियो के पाठक व दर्शक एवं स्रोताओं की संख्या में भारी वृद्धि के  रूप में दिखाई दे रहा है। गांवों में जन माध्यमों के संपर्क में आने से उससे प्रभावित होने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। ऐसी स्थिति में जनमाध्यमों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। जनमाध्यम मनोरंजन करने के साथ ही गांवों की मूलभूत आवश्यकताओं एव समस्याओं को उजागर कर ग्रामीण उत्थान और ग्रामवासियों के जीवन स्तर को ऊचा उठाने में योगदान दे रहे हैं।परम्परागत जनमाध्यम:परिवर्तन के दौर मे हम में कई बदलाव हुए हमने कई नई वस्तुओं, रीति रिवाज़ों  और संस्कारों को ग्रहण भी किया है। इसके साथ ही जो जीवन-रस हजारों वर्ष पूर्व विद्यमान था वह आज भी ज्यों का त्यों है, उसमें निहित गन्ध, स्वाद और जीवन्त बनाये रखने वाली शक्ति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारी परम्परा इस भू-भाग के कण-कण में बसी हुई है और हमारी संस्कृति की यह न टूटने वाली श्रृंखला है यह हमारी ‘परम्परा’ है। परम्परा का अर्थ है (अटूट प्रवाह)।

कश्मीर से कन्या कुमारी तक फैले भू-भाग पर विकसित कर रहा मानव समाज भारतीय लोक है। भारतीय लोकजीवन समाज दीर्घायु इतिहास की देन है। जो कुछ हमने विचार किया, अनुभव किया उसका प्रकट रूप हमारा लोक जीवन है। लोक राष्ट्र की अमूल्य निधि है। हमारी कृषक, अर्थशास्त्र, ज्ञान, साहित्य, कला, नृत्य, संगीत, कथा-वार्ताएं सब कुछ भारतीय लोक से जुड़ी हुई है।

परम्परागत संचार माध्यम वे माध्यम होते है जो ग्राम्य समाज की परम्परा से प्राप्त हुए है यह माध्यम सूचना एवं संदेश के साथ ही मनोरंजन के साधन भी है। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता, निरक्षरता बुनियादी सुविधाओं की कमी और विभिन्न आधुनिक जनसंचार के साधनों के नहीं पहंुच के कारण वे लोक माध्यम जो परम्परागत लोक कलाएं जैसे भजन, कीर्तन, रामलीला, रासलीला, नौटंकी, कठपुतली आदि सदियों से हमारी संस्कृति में रचे बसे हैं।परम्परागत जनमाध्यमों के प्रभाव को बखूबी समझते हुए सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार के लिए इसका सहारा लिया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पल्स पोलियो अभियान, एड्स के प्रति जागरूकता, सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान, राष्ट्रीय स्वास्थ्य साक्षरता मिशन, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार, मतदान आदि के प्रति जागरूकता लिए बड़े पैमाने पर सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों द्वारा परम्परागत लोक माध्यमों का सहारा लिया जाता है।

परम्परागत संचार भारत में ग्रामीण संचार व्यवस्था के मूल में है। लोक भावनाओं की यदि सर्वाधिक सशक्त अभिव्यक्ति संभव है तो वह परम्परागत संचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा ही हो सकती है। लोकगीत जैसे कजरी, बिरहा, चैती, निर्गुण आदि लोकनृत्य जैसे भागड़ा, भरतनाट्यम, गरबा आदि। लोकवाद्य जैसे शहनाई, सितार, तबला आदि, लोक सम्मेलन जैसे मेला, हाट, बाजार, उत्सव आदि। लोककलाएं जैसे चित्रकारी, कसीदाकारी आदि एवं लोकनाट्य जैसे रामलीला, रासलीला आदि सभी परम्परागत संचार के वाहक हैं।परम्परागत जनसंचार माध्यम ग्रामीणों के करीब होने के कारण लोक संचार माध्यम भी कहे जाते हैं। यह माध्यम ग्रामीणों की रोजमर्रा जीवनशैली से मेल खाते हैं। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि कोई व्याकरण या साहित्य न होने के बाद भी इनका विकास मौखिक या क्रियागत स्रोतों के माध्यम से होता रहता है।

परम्परागत माध्यमों के द्वारा मूल्यों और विचारों का एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक हस्तान्तरण हुआ है।आधुनिक माध्यम के बहुमुखी विकास के बावजूद भी हमारी लोक संस्कृति में रचे बसे परम्परागत माध्यमों के प्रभाव में कमी नहीं हुई है। आधुनिक जनमाध्यमों ने परम्परागत माध्यमों को स्थायीत्व देने में भी अपना योगदान दिया है।

शिला लेख-परम्परागत संचार माध्यमों में शिला लेख बहुत ही सशक्त माध्यम के रूप में उभरकर सामने आया। शिलालेख का निर्माण भाषा के विकास के पश्चात् हुआ। शिला लेखों से अभिव्यक्ति को स्थायित्व मिला। इतिहास में यह वर्णन मिला है कि अशोक ने अपनी प्रजा को सूचनाएं एवं दिशा-निर्देश प्रदान करने हेतु शिलालेखों का बड़े स्तर पर प्रयोग किया था।सम्राट अशोक ने भारत के विभिन्न स्थानों पर प्रचलित विभिन्न भाषाओं में शिलालेख खुदवाये थे।चित्र -चित्रों के माध्यम से मानव की अभिव्यक्ति प्राचीन काल से ही रही है। भाषा के विकास के पूर्व ही मनुष्य अपनी भावनाओं को उकेरना प्रारम्भ कर दिया था जो कि आज भी उपस्थित है।सूचनाओं को संरक्षित करने का प्रथम प्रयास चित्रों से माध्यम से ही हुआ था। पाषाणकालीन युग के गुफाओं में अंकित गुफा चित्र इसके प्रमाण है। इन गुफा में चित्रों से उस समय के मानव के जीवन का दर्शन किया जा सकता है। भारतीय चित्रकला का इतिहास शिला-चित्रों से शुरू होकर आधुनिक युग में कम्प्यूटर चित्रों तक का है। मोहनजोदड़ों, हड़प्पा, चन्हूदड़ों तथा लोथल आदि स्थानों पर खुदाई में प्राप्त हुई वस्तुओं पर अंकित चित्रों से भारतीय चित्रकला की प्राचीनता का बोध होता है।

लोक नृत्य-लोक नृत्य मानव जीवन से परम्परागत रूप से जुड़ा हुआ है। लोगों के मनोरंजन के सशक्त माध्यमों में लोक नृत्य का स्थान सदैव सर्वोपरि रहा है।लोकनृत्य समय और दूरी, मनुष्य और प्रकृति की अभिव्यक्ति का माध्यम है। यह अज्ञात काल से अनवरत चला आ रहा है। लोक नृत्य कई पीढ़ियों से समाज में अपनी पहचान बनाये हुए है और संचार के प्रभावी माध्यम के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।लोकनृत्य उल्लासपूर्ण भावाभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मानव के जीवन में जब खुशी के क्षण आते है तो अकेले अथवा समूह में प्राकृतिक रूप से पैर थिरकने लगते हैं। यह खुशी के क्षण विभिन्न अवसरों की पारम्परिक मान्यताओं से जुड़कर उसे नृत्य का रूप दे देते हैं। आज भी विभिन्न अवसरों पर नृत्यों का आयोजन किया जाता है। लोक नृत्य में अलग-अलग जातियों की संस्कृति झलकती है।

मूर्ति-भारत की मूर्तिकला भारतीय सभ्यता के इतिहास के पन्नों में बहुत पहले से जुड़ी हुई है। मूर्तिकला आरम्भ से ही यथार्थ रूप लिए हुए है जिसमें संवेदनाओं को चित्रित किया गया है। मूर्तिकला का विस्तार समय और तकनीकी के साथ-साथ हुआ। हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा ने मूर्तिकला को भारत में विकसित होने में बहुत भूमिका निभाई है।मूर्ति निर्माण के लिए विशेष प्रकार के कलाकार होते हैं। मिट्टी, पत्थर, धातु या लकड़ी द्वारा मूर्ति का निर्माण करते हैं और अभिष्ट आकार में रख देते हैं।भारतीय मूर्तिकला को पूरे विश्व में प्रसिद्धि प्राप्त है। विभिन्न कालों के दौरान अलग-अलग शैलियों का विकास हुआ। अन्य देशों में मूर्तिकला का विस्तार हुआ।

श्रव्य परम्परागत संचार माध्यमों में मनुष्य अपने कानों द्वारा संचार करता है। इन माध्यमों में लोक गीत, लोक कथा, कहानी आदि सम्मिलित हैं। हमारी लोक परम्परा में श्रव्य परम्परागत संचार माध्यम की महती भूमिका रही है। एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक ज्ञान का संचार भी सुनकर ही हुआ।लोक गीत-भारत में शुभ अवसरों, उत्सवों पर गीत गाने व नृत्य की अत्यन्त प्राचीन परम्परा है। इस देश में हर बोली का अपना लोक गीत है जो लोक में ही समाहित है।लोक गीतों के माध्यम से आम आदमी अपना उल्लास और कसक व्यक्त करता है। समस्त रसों से भरे हुए यह गीत सैकड़ों वर्षों से परम्परागत रूप से इतने बस गए है कि इनकी उत्पत्ति का पता ही नहीं चल पाता है।यह माना जाता है कि लोकगीत कामगारों के स्वरों से फूटा होगा। लोकगीतों में मिठास होती है। विभिन्न त्योहारों, शादी-विवाह, पुत्र प्राप्ति, आदि अवसरों पर लोकगीत गाए जाते हैं। गाँवों में लोकगीत हर क्षण गाए और गुनगुनाए जाते रहे हैं।

लोकगीत लोक के गीत होते हैं। यह किसी एक व्यक्ति के नहीं सम्पूर्ण समाज के होते हैं। लोक में प्रचलित, लोक द्वारा रचित एवं लोक के लिए रचित गीतों को लोक गीत की संज्ञा दी गई है। इसका रचनाकार अपने व्यक्तित्व को लोक में ही समर्पित कर देता है। ‘लोक गीत मानव हृदय की वह नैसर्गिक अभिव्यक्ति है जिसमें भाव, भाषा और छन्द की नियमितता से मुक्त होकर स्वछन्द रूप से निःसृत होने लगते हैं।’हमारे समाज में लोक गीतों की एक लंबी परम्परा है। कुछ लोकगीत बार-बार प्रयोग होने के कारण आज भी विद्यमान है और कुछ सदा के लिए लुप्त हो गए हैं। सामाजिक चेतना व व्यवहार के परिवर्तन के साथ लोक गीतों में समय-समय पर परिवर्तन होता गया। लोक गीत हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। लोक गीतों के सहारे न जाने कितने उजड़े एवं उदास मनों को जीवन मिला है। 

गाँव के श्रमिकों से लोक गीतों का अत्यन्त मधुर सम्बन्ध है। यहाँ के श्रमिक हल चलाते हुए, बीज बोते समय, फसल की बुआई-कटाई आदि के समय लोक गीतों को गाते हैं। इन गीतों से उनका मनोरंजन भी होता है और ऊर्जा का संचार भी।जन्म संस्कार के समय सोहर गाने की परम्परा बहुत ही पुरानी है। जब पुत्र पैदा होता है तो गाँवों में आस-पड़ोस की महिलाएं जुट जाती हैं और खूब मन से सोहर का गान करती हैं।लोक गीतों का लोगों पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है यह लोक गीत जादू-सा असर डालते हैं। लोक गीतों की आवाज कान में गूंजते ही नई शक्ति मिल जाती है।फागुन माह के प्रारम्भ होते ही फगुआ, चैताल, बेलवइया गीतों का मौसम आ जाता है। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले इन गीतों से मौसम का अनुभव होने लगता है। चैत मास में चैता का गायन होता है। जौनपुर में चैत मास के प्रारम्भ होते ही परम्परागत रूप से लोक गायकों के एकत्रित होने की परम्परा चली आ रही है। बक्शा ब्लाक के चुरावनपुर गांव में यह लोक कलाकार एकत्रित होते हैं और चैता के साथ-साथ विभिन्न लोक गीतों से मनोरंजित कर देते हैं।

वादन-संगीत शब्द के तीन विभिन्न पक्ष गायन, वादन और नृत्य है। इसमें वादन बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसकी गायन व नृत्य के साथ ही साथ स्वतंत्र रूप में भी पहचान बनी हुई है। भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी से निकली ध्वनि अपने आप में सब कुछ बया कर देती थी। गोपियां-गोपी, पशु-पक्षी, नदियाँ, बादल सब कृष्ण में लीन हो जाते थे। वाद्ययंत्रों से मन की बात अभिव्यक्ति करने की परम्परा वैदिक काल से ही चली आ रही है।नृत्य हो या गीत सभी वाद्य यंत्रों के बिना पूर्ण नहीं हो पाते। वाद्य यंत्र गीत एवं नृत्य को जीवंत कर देते हैं। लोक संगीत में मुख्य रूप से ढोल, नगाड़ा, युंग, तुरही, एकतार, झांस आदि प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में सभी प्रकार के कुल 500 वाद्य यंत्र है। गुजरात के लोकनृत्य गरबा में नृत्य छोटी-छोटी डंड़ियों को लेकर किया जाता है। इसके कारण इसका नाम भी ‘डंडिया’ पड़ गया।गाँवों में सूचना देने के लिए ढोलकी ढोल पीट-पीट कर दी जाती थी। लोगों को यह पता चल जाता था कि राजा के तरफ से कोई सूचना भेजी गई है। युद्ध के प्रारंभ होने से पूर्व रणभेरी, दुंदुभि, शंख एवं तुरही जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता था।

सबसे प्राचीन वाद्य डमरू को माना गया। यह भगवान शिव का वाद्य है। जब शब्द नहीं तो भगवान शिव के इसी डमरू से निकली ध्वनियों का वर्णन किया गया। संसार की समस्त भाषाओं का जन्म इसी से माना जाता है।लोक कथा-लोक कथाएं परम्परागत रूप से समाज में आज भी विशेष महत्व है। यह लोक जीवन का अभिन्न अंग मानी जाती है। आज भी घर की बूढ़ी दादी और नानी इन कथाओं को अगली पीढ़ी को सुनाकर जीवित रखे हुए हैं। व्रत, तीज-त्योहार या किसी पूजा के समय चली आ रही कहानियों को सुनाया जाता है। यह सब लोक कथा ही है। इन लोक कथाओं में पौराणिक प्रसंगों से लेकर उपदेशपरक तथा मनोरंजक कथानक होता है। यह लोक कथाएं हमें पहले हुए चमत्कारों से लेकर रोचक घटनाओं को पुनः स्मृति कराती है। लोक कथाओं में क्षेत्र के नैतिक तत्व समाहित होते हैं।लोक कथाएं प्राचीन काल से मनोरंजन का माध्यम रही है। मनोरंजन मनुष्य के लिए बहुत ही आवश्यक है। लोक कथाकार इसका प्रस्तुतीकरण बड़े मनोरंजक ढंग से करते रहें। यह समाज के प्रबुद्ध वर्ग जैसे धर्मवेत्ता, समाज सुधारक, पथ-प्रदर्शक और साहित्यकारों के लिए भी रोचक होता था।लोक कथाएं शादी-विवाह, कथा-कीर्तन एवं तीर्थ-यात्रियों के माध्यम से स्वीकार होती रही एवं उस पर स्थानीयता का आवरण चढ़ गया।प्राचीन समय में लोक कथा सुनने के लिए बहुत बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता था, जिसमें विभिन्न क्षेत्र से लोक जुटता था। कथाकार को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।

लोक गाथा - संसार का सभी भाग लोक गाथाओं से भरा पड़ा है। लोक गाथाएं मनुष्य के आदिम साहित्य का रूप है। लोक गाथाओं का उदय सामूहिक नृत्यों-गीतों के साथ पौराणिक घटनाओं या देवी-देवताओं के चमत्कारों के जुड़कर कहने के कारण हुआ।लोक गाथाओं के रचनाकार अज्ञात हैं। इसमें संगीत एवं नृत्य का साहचर्य पाया जाता है एवं स्थानीयता का प्रभाव दिखता है। लोक गाथाएं मौखिक परम्परा के कारण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचती रही है।लोक गाथाओं को लोग बड़े प्रेम से कहते और सुनते हैं। यह मुख्य रूप से कथापरक गीत होते हैं। इसमें कहानी गीत के माध्यम से आगे बढ़ती है। लोक गाथाओं का आकार लोकगीतों की तुलना में बड़ा होता है।

दृश्य-श्रव्य परम्परागत माध्यम वे माध्यम होते हैं, जिनसे संदेश प्राप्त करने के लिए दर्शक को अपने आँख एवं कान दोनों का ही प्रयोग करना पड़ता है। इसलिए यह अन्य माध्यमों की तुलना में ज्यादा प्रभावी माने जाते हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यमों में नुक्कड़ नाटक, नौटंकी, रामलीला, कृष्णलीला, कठपुतली आदि है।नाटक - नाटक का विकास नृत्य से हुआ है। नृत्य का भाव व विचार का विस्तार होने के पश्चात् वह नाट्यरूपों में परिवर्तित हो गया। नाटक आम जनमानस के लिए परम्परागत रूप से मनोरंजन एवं जागरूक करने का माध्यम रहा है। हिन्दी प्रदेशों में लोक नाट्य का विकास 15वीं शताब्दी के बाद हुआ है।विभिन्न प्रदेशों के अपनी संस्कृति की झलक लिए हुए अलग-अलग लोक नाटक है। उत्तर प्रदेश में नौटंकी, बंगाल में जाला, मध्य प्रदेश में मंच, कर्नाटक में यक्षगण, तमिलनाडु में थेरूकुढ़, महाराष्ट्र में तमाशा, गुजरात में भवई मुख्य रूप से परम्परागत नाटक है।

नाटक का समाज में बहुत महत्व रहा है। इसको देखने के लिए लोग एकत्रित होते है और विशेष प्रकार के प्रशिक्षित कलाकारों द्वारा यह प्रस्तुत किया जाता है।भारत में सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्यरत गीत-नाटक प्रभाग देश के विभिन्न भागों में परम्परागत माध्यमों से जागरूकता उत्पन्न करने का काम कर रहा है। इसका मुख्यालय दिल्ली में है। प्रभाग द्वारा नाटक, नृत्य-नाटिका, कठपुतली, लोक गायन, लोक एवं जनजातीय नाटकों, ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रमों जैसी विविध मंचन कलाओं का प्रयोग किया जाता है।प्रभाग द्वारा खासकर ग्रामीण इलाकों में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसमें मंचन किए जाने वाले नाटकों में मंनोरंजन के साथ ही साथ किसी विशेष विषय के संबंध में जागरूकता उत्पन्न की जाती है।नुक्कड़ नाटक -नुक्कड़ नाटक प्रायः आम बोल चाल की भाषा में होते हैं। यह आम जनता के लिए महज मनोरंजन न होकर उसमें जीवन की वास्तविकता को प्रदर्शित करते हैं। जिसके कारण दर्शकों में आत्मसम्मान पैदा होता है।नुक्कड़ नाटक नाम से स्पष्ट है कि ऐसा नाटक जो कि नुक्कड़ पर प्रदर्शित किया जाता है अर्थात् यह आम जन के बीच में जाकर संदेश पहँुचाने का माध्यम है। इसमें नाटककार आम जनता को बाँधे रहता है और प्रभावी ढ़ंग से अपनी बात दर्शक तक पहँुचाता है।शहरों में लोगों को जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटकों के प्रयोग का प्रचलन बढ़ा है।लोगों को साक्षर करने के लिये भारत ज्ञान-विज्ञान समिति ने 1990 ई0 में जत्थों का निर्माण किया। इन जत्थों ने विशेषकर नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से साक्षरता अभियान चलाकर अपार सफलता अर्जित की। इन जत्थों ने नुक्कड़ नाटक एवं अन्य स्थानीय कलाओं के माध्यम से साक्षरता की प्रेरणा जागृत करने के साथ-साथ राष्ट्रीय संगठन की भूमिका तैयार की।

रामलीला एवं कृष्णलीला :लीला आम जनमानस में कथाख्यानों की प्रदर्शनधर्मी कला है, जिसके साथ अनुरंजनमय शिक्षण का संप्रेषण किया जाता है।रामलीला दशहरे के समय विभिन्न क्षेत्रों में वर्षो से आयोजित की जाती रही है। इसमें राम की लीलाओं का मंचन किया जाता है। उत्तर प्रदेश में शहर से लेकर गाँवों में रामलीला बड़े उत्साह के साथ आयोजित किए जाते हैं। यह परम्परा कई सदियों से चली आ रही है। यह राम के कृत्यों के वर्णन के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों के प्रति लोगों को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। वाराणसी की रामलीला बहुत ही प्रचलित है। यहाँ सर्वाधिक मण्डलियाँ रामलीला का आयोजन करती हैं। इसमें रामनगर, चित्रकूट एवं अस्सी की लीलाएँ अधिक प्रसिद्ध है।रामलीला लगभग एक माह तक चलने वाला शृंखला नाटक है। रामलीला में लोक नाट्य शैलियों एवं लोक मंच का प्रयोग किया जाता है। रामलीलाओं का आयोजन सड़क, अहाते या खुले मैदान में किया जाता है।रामलीलाओं में जिस प्रकार भगवान राम के कर्मो का गुणगान किया जाता है, उसी प्रकार कृष्ण लीला में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन का चित्रण किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े भक्ति व श्रद्धा के भाव से लोग इसको देखते हैं। उत्तर प्रदेश में ब्रज क्षेत्र में कृष्णलीला का बड़े स्तर पर आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही देश के विभिन्न भागों से लोग इसको देखने के लिए आते हैं।

कठपुतली :भारत के राजस्थान प्रदेश की कठपुतली कला बहुत ही पुरानी और समृद्ध मानी जाती है। इसका निर्माण व प्रदर्शन भाट जाति के लोग करते आ रहे हैं। भाट जाति नटबाजी तथा नाटक के लिए भी प्रसिद्ध है। यह माना जाता है कि ब्रह्म से नट की उत्पत्ति हुई और उन्होंने काठ से नाट नाम से काष्ठपुतली आधारित नाट्यों की शुरूआत की। कठपुतलियाँ होती तो निर्जीव है लेकिन उसका प्रदर्शन ऐसा होता है जैसे कोई सजीव कलाकार प्रस्तुति कर रहा हो।देश के कई हिस्सों में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के प्रचार-प्रसार एवं ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए कठपुतली शो का आयोजन पंचायती राज विभाग द्वारा किया जाता है। चुनावों के समय कठपुतली द्वारा मतदाताओं को जागरूक करने के उदाहरण भी मिले हैं। है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण सेवा संस्थान (पीजीएसएस) द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में संचार के लिए कठपुतली का प्रयोग किया गया। इस संस्था के कठपुतली दल गाँवों में जाकर परिवार का बड़ा आकार, कम उम्र में विवाह, नशाखोरी, स्त्री, बालिका शिक्षा की अत्यन्त निम्न दर को ध्यान में रखकर अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। कठपुतली के माध्यम से मनोरंजन के साथ ऐसी शिक्षा दी जाती है कि वह मुद्दे के प्रति जागरूक हो जाते हैं। इस तरह देश के अन्य क्षेत्रों में भी सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा कठपुतली का प्रयोग किया जा रहा है।नाबार्ड द्वारा भी ग्रामीणों के लिए वित्तीय साक्षरता पर मनोरंजनपूर्ण जानकारियां देने के लिए राष्ट्रीय रंगमंच लखनऊ के माध्यम से उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में कठपुतली नृत्य नाटिका का आयोजन किया जाता है।     
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45- www.bbc.com.uk.
डॉ दिग्विजय सिंह राठौड़
सहायक प्रोफ़ेसर,मॉस-कम्युनिकेशन
वीबीएस पूर्वांचल विश्वविद्यालय,जौनपुर

संपर्क बी-1,पन्नालाल कॉलोनी,
आजमगढ़,मो-09415840877
ई-मेल digvijayhoney@gmail.com
पूरा परिचय यहाँ
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