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तकनीकी आलेख:फ़ोनोग्राफ़:-आवाज़ की दुनिया का क्रांतिकारी आविष्कार / पूनम खरे(भोपाल)

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, मार्च 15, 2014 | शनिवार, मार्च 15, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                मार्च -2014 

चित्रांकन
वरिष्ठ कवि और चित्रकार विजेंद्र जी
 
न्यूयार्क शहर से करीब 25 मील दूर स्थित मेनलो पार्क में सर्वप्रथम ध्वनि अंकित एवं पुनरुत्पादित की गई। यह घटना है सन् 1877 की। नवंबर का महीना था जब मेनलो पाक में दक्ष तकनीशियन जॉन क्रूज़े और चार्ल्स बैचलर,  फैक्ट्री के मालिक थॉमस अल्वा एडिसन  द्वारा तैयार किए गए डिज़ायन के आधार पर एक नवीन उपकरण बनाने में व्यस्त थे। पीतल और लोहे से बनी इस मशीन के दो विशिष्ट आकर्षण थे- एक बड़ा हॉर्न और एक रिमार्क - दिस शुड टॉक। उनके सहकर्मी जब उन्हे इस पर काम करते देखते तो, इन्ही दो बातों को ले कर, उन पर हँसते थे।

फ़ोनोग्राफ़ के 

साथ थॉमस अल्वा एडिसन
मशीन तैयार होने पर एडिसन फैक्टी पहुँचे। अपने तकनीशियनों का काम देख कर वे काफी प्रसन्न थे। एडिसन ने एक टिन पत्रक गोलीय सतह के चारों ओर कस कर लपेट दिया और हॉर्न के साथ जुड़ी हुई डायमंड सुई इस सिलिन्डर के एक सिरे पर रख दी। इसके बाद वे सिलिन्डर को घुमाने के लिए सिलिन्डर के दाँई ओर स्थित हत्थे को, एक समान गति से घुमाने लगे। यह जाँचने के बाद कि डायमंड सुई, टिन पत्रक पर समान रूप से ग्रूव्स काट रही है, वे हॉर्न पर ज़ोर से चिल्लाए-  

मैरी हैड अ लिटिल लैम्ब, इट्स फ्लीस वॉज़ व्हाइट एज़ स्नो
      एण्ड एवरीव्हेयर दैट मैरी वैन्ट, द लैम्ब वॉज़ श्योर टु गो...

साँसें रुकी हुई थीं। एडिसन यह देख कर प्रफुल्लित हो उठे कि उनके चिल्लाने से, एक फुट लम्बे सिलिन्डर पर लिपटे टिन पत्रक पर ज़िग-ज़ैग ग्रूव्स कट गए। अब उन्होंने स्टाइलस को बदला, सुई उठा कर पुनः आरंभिक स्थान पर रख दी और पूर्वानुसार सिलिन्डर घुमाने लगे। जैसे ही सुई ज़िग-ज़ैग ग्रूव्स से गुज़रने लगी, धीमी किन्तु स्पष्ट आवाज़ सुनाई दी-

        मैरी हैड अ लिटिल लैम्ब, इट्स फ्लीस वॉज़ व्हाइट एज़ स्नो
      एण्ड एवरीव्हेयर दैट मैरी वैन्ट, द लैम्ब वॉज़ श्योर टु गो...

मेनलो पार्क स्थित

एडिसन की कार्यशाला
प्रयोगशाला में उपस्थित लोग स्तब्ध रह गए। यह ठीक वही आवाज़ थी जो एक मिनट पहले एडिसन द्वारा उच्चारित की गई थी। स्वयं एडिसन को भी यकीन नहीं हो रहा था। आविष्कार प्रथम प्रयोग में ही सफल हो चुका था। ध्वनि के अंकन और पुनरुत्पादन को जाँचने के लिए, अत्यंत जोश और उत्साह के साथ, प्रयोग बार बार दोहराया गया और हर बार सफल रहा। यह था एडिसन का फ़ोनोग्राफ़, जिसने आवाज़ की दुनिया में एक क्रांतिकारी युग का सूत्रपात किया।6 दिसम्बर सन् 1877 को एडिसन ने न्यूयार्क स्थित पेटेंट कार्यालय में फ़ोनोग्राफ़ के पेटेंट के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। 22 दिसम्बर, सन् 1877 को एडिसन ने साइंटिफिक अमेरिकन के कार्यालय में अपने इस नए आविष्कार का प्रदर्शन किया। इस जरनल के माध्यम से समस्त विश्व को फ़ोनोग्राफ़ के विषय में जानकारी मिली। एडिसन ने एक बार फिर स्वयं को मेनलो पार्क का जादूगर सिद्ध कर दिया, जैसा कि वे मीडियाकर्मियों के मध्य कहलाते थे। 

19 जून, सन् 1878 को एडिसन को फ़ोनोग्राफ़ का पेटेंट मिल गया। एडिसन  द्वारा आविष्कृत  फ़ोनोग्राफ,  अगले दस वर्षों तक अपने मूल रूप  में ही रहा। इस दौरान यह दार्शनिक रुचि का केंद्र बना रहा साथ ही ध्वनि-कंपन के प्रभावों पर लिखी गईं पाठ्यपुस्तकों में इसका विवरण शामिल हुआ।सन् 1887 में फ़ोनोग्राम पर नए नज़रिए और ऊर्जा के साथ पुनः कार्य आरंभ हुआ और उसे तकनीकी रूप से विकसित कर, कमर्शियल यंत्र बनाने की दिशा में प्रयास किया गया। एडिसन ने सिलिन्डर को घुमाने के लिए अपने मॉडल में बैटरी से चलने वाली मोटर लगाई।

सिलिन्डर तथा 
फ़ोनोग्राफ़ दर्शाता हुआ, 

एक विज्ञापन (1903) 

इसी दौरान हेस्टर बेल एवं चार्ल्स टेन्टर ने एडिसन के टिन पत्रक फ़ोनोग्राफ में कुछ सुधार किए जो काफी कारगर साबित हुए। टिन के पतरे पर रिकॉर्डिंग एक आरंभिक विचार था। इसे मोम जैसे पदार्थ से बने हुए सिलिन्डर से बदल दिया गया। इस सिलिन्डर पर, ध्वनि के अंकन हेतु की जाने वाली कटिंग  के लिए, छैनी के आकार की बारीक सुई का उपयोग किया जाता था। यह सिलिन्डर, फ़ोनोग्राफ़ से पृथक किया जा सकता था और कभी भी वापस लगा कर ध्वनि का पुनरुत्पादन किया जा सकता था, साथ ही इसकी बाहरी सतह को छील कर ध्वनि के अंकन के लिए पुनः प्रयोग में लाया जा सकता था, जैसे कि एक स्लेट, जिस पर बार बार लिखा और मिटाया जा सकता है। मोम से बने इस सिलिन्डर की दीवारों की मोटाई 1/4‘‘ से भी कम थी, फिर भी उसे बार बार इस्तेमाल किया जा सकता था क्योंकि रिकॉर्ड ग्रूव्स की अधिकतम गहराई 1‘‘ के हज़ारवें हिस्से से ज़रा ही ज़्यादा होती है। रिकॉर्डों की नक़लें तैयार करने की तकनीक का विकास भी अब तक आरंभ हो चुका था और काफी हद तक सफल था। व्यवसायिक नज़रिए से देखा जाए तो यह एक बड़ी उपलब्धि थी। दूसरी उपलब्धि यह थी कि फ़ोनोग्राफ में इस्तेमाल की जाने वाली सुईयाँ नीलमणि से बनने लगीं। इस प्रकार वे कहीं अधिक टिकाऊ हो गईं जिससे ध्वनि के अंकन तथा पुनरुत्पादन की गुणवत्ता के स्तर में सुधार हुआ।

 एडिसन की ध्वनि पुनरुत्पादक मशीन
इन सारे प्रयासों ने फ़ोनोग्राफ को संदेश और पत्र संग्रहीत करने के लिए अधिक उपयुक्त बना दिया और फ़ोनोग्राफ़ वैज्ञानिक खिलौने से एक सफल औद्योगिक उपकरण के रूप में परिष्कृत हो सका। 1880 के दशक के अंत तक फ़ोनोग्राफ तथा उसके रिकॉर्ड परिपूर्णता के इस स्तर तक पहुँच चुके थे कि अब एडिसन इनके व्यवसायिक उत्पादन हेतु कदम उठा सकते थे। एडिसन ने इस हेतु कंपनी आरंभ की- नैशनल फ़ोनोग्राफ कंपनी। इस समय तक किसी ने नहीं सोचा था कि इस मशीन में मनोरंजन की एक बड़ी औद्योगिक क्षमता निहित है। सन् 1878 में, अपने आविष्कार के एक वर्ष बाद ही, फ़ोनोग्राफ भारत आया। दिसम्बर, सन् 1878 के आसपास कलकत्ता में इसे प्रदर्शित किया गया। 


एडिसन के सिलिन्डर रिकॉर्ड
सन् 1895 में, भारत में, एच.एम.वी. के सर्वाधिक पुराने डीलर महाराज लाल एण्ड कम्पनी की आधारशिला रखी गई। ये उस समय सिलिन्डर रिकॉर्ड का व्यापार कर रहे थे। ये रिकॉर्ड महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली चूड़ियों की तरह दिखाई देते थे और आम नागरिक उन्हें बैंगल कहते थे। इनमें संग्रहीत ध्वनि बैंगल की आवाज़ कही जाती थी। कलकत्ता के जानेमाने उद्योगपति एच. बोस ने एच. बोस रिकॉर्ड्स (जो बाद में पैठे-एच. बोस रिकॉर्ड्स के नाम से जाना गया) के बैनर तले, सिलिन्डर रिकॉर्ड के इस नवीन व्यापार में कदम रखा। एच. बोस रिकॉर्ड्स के सन् 1906 के केटलॉग में रवीन्द्र नाथ टैगोर की कई रिकॉर्डिंग उल्लिखित हैं। इनमें से सभी विलुप्त हो चुकी हैं, सिवा एक बंदे मातरम... के।दुनिया भर में हज़ारों सि़लिन्डर व्यक्तिगत और व्यवसायिक रूप से रिकॉर्ड हुए। यद्यपि अब कोई सिलिन्डर तथा फ़ोनोग्राफ चालू हालत में नहीं मिलते, तथापि कुछ टूटे-फूटे अथवा अत्याधिक प्रयोग के कारण बिगड़ चुके सिलिन्डर तथा फ़ोनोग्राफ, संग्रहालयों के शो केसों में सजे मिल जाते हैं। 



पूनम खरे
संगीत विषय की विद्यार्थी हैं 
भोपाल, मध्यप्रदेश के 
शासकीय महाविद्यालय में 
संगीत विषय की सहायक प्राध्यापक हैं
शोधपरक लेख और स्वयंरचित बंदिशें 
'संगीत', 'हाथरस' सहित कई पत्र-पत्रिकाओं 
में प्रकाशित होती रहती हैं।
ई-मेल :poonam_khre@yahoo.co.in

संदर्भ:-
1- Frank L. Dyer and Thymes C. Martin/ Edison: His Life and Inventions, 1910
3- Amitabh Ghosh/ The Record News- TRN- 1999
4- Suresh Chandvankar/ Indian Gramophone Records/The first 100 years
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