समीक्षा:मृत्युंजय प्रभाकर की समकालीन रंगकर्म का आईना /धर्मेन्द्र प्रताप सिंह,दिल्ली - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

समीक्षा:मृत्युंजय प्रभाकर की समकालीन रंगकर्म का आईना /धर्मेन्द्र प्रताप सिंह,दिल्ली

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 मार्च-2014 



चित्रांकन
वरिष्ठ कवि और चित्रकार विजेंद्र जी
 
हिंदी आलोचना जगत की मुख्यधारा में नाटक और रंगमंच संबंधित आलोचना के अभाव की बात प्रायः की जाती रही है और इसमें कोई दो राय नहीं कि कविता एवं गद्य की अन्य विधाओं का प्रभुत्व आलोचना साहित्य में हमेशा से बना रहा है. लेकिन हाल ही में प्रकाशित मृत्युंजय प्रभाकर की पुस्तक ‘समकालीन रंगकर्म’ ने  हिंदी नाट्य आलोचना के इस अभाव की पूर्ति की है.मृत्युंजय प्रभाकर एक सक्रिय रंगकर्मी होने के साथ-साथ एक सचेत रंग अध्येता भी हैं और दिल्ली में रहकर अपने नाट्य समूह ‘सहर’ के माध्यम से रंगमंचीय गतिविधियों से निरंतर जुड़े हुए हैं. आलोच्य पुस्तक समकालीन भारतीय रंगमच से संबंधित उनकी व्यवस्थित व्यावहारिक समझ को दर्शाती है. नाट्य लेखन से लेकर प्रस्तुति प्रक्रिया तक प्रत्यक्ष रूप से जुड़े होने के कारण उनके विचार रंगकर्म की दुनिया के आतंरिक सत्य के उद्घाटन के रूप में व्यक्त हुए हैं. समकालीन रंगमंचीय हलचलों को अपने में समेटे होने के कारण यह पुस्तक रंगकर्म के क्षेत्र में हो रहे बदलावों की स्पष्ट छाप को अंकित करती है.

‘समकालीन रंगकर्म’ भारतीय रंगमंच एवं उसके भीतर दिल्ली हिंदी रंगमंच की स्थिति को समझने की एक कोशिश है. अलग-अलग समय में लिखे गए इसके सोलहों आलेखों के द्वारा एक ओर भारतीय रंगमंच की वैविध्यमयी स्वरूप की झलक मिलती है तो दूसरी ओर दिल्ली हिंदी रंगमंच की असंगत स्थितियों से हम सभी परिचित होते हैं. इसके आलेखों को तीन श्रेणियों में रखकर देखा जा सकता है. आरंभ के कुछ लेख जहां वैचारिक और सिद्धांतपरक हैं तो आख़िरी के कुछ लेखों में लोकवृत की चिंताओं को शामिल किया गया है जबकि मध्य के अधिकांश लेख दिल्ली के हिंदी रंगमंच, विशेषकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय औरभारत रंग महोत्सव, से संबंधित आलोचनात्मक आलेख एवं इनसे संबंधित कुछ रिपोर्ट हैं.  

 
समकालीन रंगकर्म,
               लेखक-मृत्युंजय प्रभाकर,
               प्रकाशन – इंक लिट,
            मूल्य – 200 रू
समकालीन हिंदी रंगकर्म को समझने का एक प्रमुख दस्तावेज़ ‘समकालीन रंगकर्म’ हो सकता है. ‘समकालीनता की खोज’ शीर्षक प्रथम लेख में रंगमंच और समकालीनता के अनिवार्य अंतर्संबंधों को उद्घाटित करते हुए लेखक लिखता है कि समकालीनता किसी भी नाटक या रंगमंच का विशिष्ट गुण है और समकालीन होने में ही नाटक और रंगमंच की सार्थक परिणति मानी जानी चाहिए. भारतीय रंगकर्म की समकालीनता उसकी सामुदायिक चेतना, परंपरा से प्रेम और उसकी अनेक स्थानीय पहचानों (शैलियों और तत्वों) से विनिर्मित होता है. पहले पारसी रंगमंच और फिर इसके विकल्प के रूप में विकसित हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि, बांग्ला में दीनबंधु मित्र आदि एवं मराठी में विष्णुदास भावे आदि की रंगचेतना में समकालीनता की उपस्थित ही उन्हें कालजयी बनाती है.

‘रंगमंच का समाजशास्त्र’ लेख में ‘रंगमच’ और ‘समाजशास्त्र’ जैसे दो भिन्न अनुशासनों के अध्यन के लिए निर्धारित ‘अंतरानुशासनिक अध्यन पद्धति’ की बौद्धिकता में न पड़कर लेखक रंगकर्म में सक्रिय लोगों की सामाजिकता पर बात करते हुए उनके रंग जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों को उठाता है. रंगकर्म के लिए यह ज्यादा सार्थक प्रश्न है क्योंकि रंगकर्म के विषय-वस्तु और स्वरूप निर्धारण में वही लोग प्रभावी भूमिका निभाते हैं जो इसके भीतर सक्रिय होते हैं. तमाम उत्तराधुनिक विमर्शों और सिद्धांतों की बाढ़ आ जाने के बावजूद भी रंगकर्म के क्षेत्र में महिलाओं और दलितों की स्थिति का प्रश्न लेख की सार्थकता को बढ़ाता है. छोटे शहरों और कस्बों के गैर पेशेवर युवा रंगकर्मी सदैव ही भारतीय रंगकर्म की जान रहे हैं और नित नए-नए प्रयोगों के द्वारा इसे नई ऊर्जा से सरावोर करते रहे हैं लेकिन उनके संरक्षण के संदर्भ में सरकारी या अन्य किसी भी प्रकार की उदासीनता निश्चित रूप से भारतीय रंगकर्म की ऊर्जा को निर्मूल करने जैसा ही है. ‘रंगमंच और युवा’ लेख की मूल चिंता इसी संदर्भ में है.

‘महिला निर्देशकों की भूमिका’ शीर्षक लेख में आज़ादी के बाद से लेकर अभी तक सक्रिय रहीं लगभग सभी प्रमुख महिला निर्देशकों के कार्यों की पड़ताल यद्यपि संक्षिप्त रूप से की गयी है लेकिन इनमें से प्रत्येक का कार्य अपनी विशिष्टता के साथ भारतीय रंगकर्म को समृद्ध करता है. पहली पीढ़ी की शीला भाटिया, शांता गांधी, मोनिका मिश्र या प्रतिभा अग्रवाल रही हों अथवा दूसरी पीढ़ी की अमाल अल्लाना, अनुराधा कपूर, त्रिपुरारी शर्मा, उषा गांगुली, नीलम मान सिंह या कीर्ति जैन हों या आज की नई पीढ़ी में सक्रिय अनेक महिला निर्देशक, इन सभी ने अपनी विशिष्ट रंग भाषा, रंग शैली और विषय-वस्तु के साथ भारतीय रंगमंच में जोरदार दस्तक दी और अपने प्रयोगों द्वारा भारतीय रंगकर्म को उसकी परंपरा से जोड़ते हुए लगातार समृद्ध करने का ही कार्य किया है.

नुक्कड़ नाटक अपने मूल प्रकृति में प्रतिपक्ष का नाट्य रूप है लेकिन पूंजीवाद के इस संक्रमणकालीन दौर में इस विधा का लक्ष्य थोड़ा भटक गया सा लगता है. आज सरकारी, गैर-सरकारी एवं निजी समूहों द्वारा भी जन भावना को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए नुक्कड़ नाटक कराये जा रहे हैं. ऐसे में यह विधा एक साज़िश विशेष का शिकार होती जा रही है जो कि ‘प्रतिरोध का रंगमंच : नुक्कड़ नाटक’ लेख की चिंता का मूल विषय है. लेकिन यह सुखद है कि इन संकटों के बावजूद भी नुक्कड़ नाटक की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है बल्कि बढ़ती ही जा रही है. आज हर स्कूल और कॉलेज के अपने नुक्कड़ नाट्य दल हैं और इनके प्रदर्शनों की संख्या मंचीय नाटकों की संख्या से कई गुना ज्यादा भी हैं. ऐसे में अनेक बदलावों के साथ नुक्कड़ नाट्य आंदोलनों की धार आज पहले की अपेक्षा अधिक तेज ही हुई है, यह लेख इस बात का संतोष पैदा करता है.
‘भाषायी मीडिया, संस्कृति और संकट’ लेख मीडिया के भीतर के बदलते वर्ग चरित्र का गंभीर विश्लेषण है. मुख्यधारा का मीडिया आज पूंजी के बढ़ते दबाव आगे घुटने टेक चुका है. लेकिन जब मीडिया में ऐसे लोग थे जो साहित्य और संस्कृति प्रेमी थे और पूंजी या अन्य कोई बाहरी दबाव उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते थे तो साहित्य, संस्कृति और उससे जुड़ी घटनाओं, खबरों और कार्यक्रमों का मीडिया में बाहुल्य होता था. लेकिन जैसे-जैसे संपादकों का स्थान मालिकों ने लिया, साहित्य और संस्कृति प्रेमियों की जगह पूंजी एवं लाभ प्रेमी तथा सेवा भाव की जगह करियर लोलुप लोगों का मीडिया में आगमन होने लगा वैसे-वैसे मीडिया का स्वरूप लगातार विकृत होता चला गया, भाषा बिगड़ती गई और एक गहरा सांस्कृतिक संकट छाने लगा. यह लेख इस संकट के कारणों के साथ भविष्य के गंभीर परिणामों की ओर भी संकेत करता है.

निर्माता-निर्देशक
                  मृत्युंजय प्रभाकर
दिल्ली देश की अब न केवल राजनीतिक राजधानी भर रह गई है बल्कि सांस्कृतिक राजधानी के रूप में भी इसने अपनी व्यापक पहचान बना ली है. नाटक और रंगमंच जैसी अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियां दिल्ली के कुछ ख़ास तबके के लोगों के जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग बनती जा रही हैं. पिछले लगभग एक दशक से यहां का मध्यवर्ग नाटकों को मनोरंजन के प्रमुख साधन के तौर पर स्वीकार करने लगा है. इससे निश्चित रूप से दर्शकों की संख्या में अपार वृद्धि हुई है. नाटक के दर्शकों का पुनः उसकी ओर आना रंगकर्म के लिए ज्यादा बड़ी बात है लेकिन दिल्ली हिंदी रंगमंच की यह बड़ी उपलब्धि कैसे उसकी सीमा भी बनती जा रही है, ‘रंगमंच का दिल्ली दरबार’ लेख दिल्ली हिंदी रंगमंच पर व्याप्त ऐसे ही अनेक संकटों को हमारे सामने प्रस्तुत करता है. दिल्ली रंग दरबार का पूरी तरह महोत्सवों, ग्रांटों और प्रोजेक्टों पर आश्रित होना, शौकिया रंगकर्म का उचित संरक्षण न होना, एक ख़ास किस्म के दर्शक वर्ग को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुतियों के विषय-वस्तु एवं शैली तय करना, नवीन रंग प्रयोगों के नाम पर डिज़ायन आधारित तड़क-भड़क वाले एवं तकनीक आश्रित रंगकर्म को बढ़ावा देना, व्यावसायिकता का बोलबाला, सभागारों के संकट के साथ पेशेवर रंगकर्म का न होना भी आदि ऐसी ही अनेक समस्याएं हैं जिनसे दिल्ली हिंदी रंगमंच को अभी लंबी मुठभेड़ कर विजय प्राप्त करनी है. लेकिन इन तमाम सीमाओं के बावजूद दिल्ली का रंगकर्म आज अपनी ख़ास पहचान बनाने की ओर अग्रसर है. दिल्ली के युवा निर्देशकों के साथ स्कूल और कॉलेज स्तर पर सक्रिय विभिन्न गैर-पेशेवर रंगकर्मियों की सक्रियता को लेखक दिल्ली हिंदी रंगमंच की बड़ी संभावना के तौर पर देखता है.

दिल्ली समेत समस्त भारत में रंग गतिविधियां आजकल बहुत जोरों से बढ़ने लगीं हैं. सरकारी, अर्धसरकारी और व्यापारिक जगत के सहयोग से अनेक जगहों पर रंग महोत्सवों की बाढ़ आ गयी सी लगती है. ऐसे में कुछ नए-पुराने अभिनेताओं, निर्देशकों, नाट्य समूहों या रंगकर्मियों को अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर भी मिल रहे हैं. लेकिन आज की इन बदली हुई स्थितियों पर थोड़ा ठहर कर गौर करें तो भीतर की कुछ और ही सच्चाईयां खुलकर हमारे सामने आती हैं. ‘रंग महोत्सव के निहितार्थ’ शीर्षक आलेख में लेखक रंगमंच की भीतरी दुनिया की इन्हीं स्याह सच्चाईयों से पर्दा उठाता है. रंग महोत्सवों की अधिकता ने दर्शकों के सामने बेहतर प्रस्तुति देखने के विकल्प जरूर उपस्थित किये हैं लेकिन ज्यादातर रंगकर्मी आज भी इन सुअवसरों का लाभ नहीं पा रहे हैं. कारण कि अधिकांश ग्रांट, प्रोजेक्ट या सहायता राशी उन्हीं संगठनों, रंगकर्मियों या निर्देशकों को प्राप्त हो पाती हैं जो सत्ता के समीकरण में फिट बैठते हैं. वस्तुतः इन रंग महोत्सव के द्वारा भारतीय रंगकर्म में हासिये या परिधि पर उपस्थित रंगकर्मियों केंद्र में लाकर, उनकी रंग पहचान को बना और बढ़ा कर पुनः से भारतीय रंगकर्म को उसके मूल से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है. लेकिन दिल्ली के मुख्यधारा के रंगमंच में इन स्थितियों को लेकर खास किस्म का एक दुराग्रह और अभिजात्यता व्याप्त है जिसे सत्ता, शासन एवं पूंजी वाले लोग अपना संरक्षण भी देते आ रहे हैं. ऐसे में इन अर्थहीन महोत्सवों की आवश्यकता पर लेखक का प्रश्न एक नई सार्थक बहस को जन्म देता है.

‘हिंदी रंगकर्म, रंग महोत्सव और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ आलेख में लेखक सर्वप्रथम हिंदी रंगकर्म की दशा-दिशा पर अपनी चिंता प्रकट करते हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और उसकी महत्त्वपूर्ण रंग गतिविधि भारतीय रंग महोत्सव में हिंदी रंगकर्म की स्थिति को आकड़ों के माध्यम से विस्तार से दर्शाता है. हिंदी रंगमंच से प्रतिभाओं का सिनेमा या अन्य माध्यमों की ओर पलायन एवं हिंदी समाज में रंगकर्मियों की पहचान का संकट भी हिंदी रंगकर्म के लिए गंभीर चिंता का विषय है. ऐसे में लेखक का यह सवाल उचित ही लगता है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की भूमिका क्या केवल एक नाट्य प्रशिक्षण संस्थान के तौर पर ही होनी चाहिए या इसके आगे भी ? जाहिर है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को इसके आगे की अपनी भूमिका निभाते हुए नाट्य प्रशिक्षण संस्थान की सीमित भूमिका एवं काम-काज के अभिजात्य तौर-तरीके से बाहर निकलकर हिंदी रंगमंच का एक नया मुहावरा गढ़ना चाहिए.

‘रंग महोत्सव और मल्टीमीडिया’, ‘रंग महोत्सव : शेष प्रश्न’, ‘रंग महोत्सव : अभिनेता की भूमिका’ एवं ‘रंग महोत्सव : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’, ये चारों आलेख क्रमशः बारहवें, तेरहवें, चौदहवें और पंद्रहवें भारतीय रंग महोत्सव की आलोचनात्मक रिपोर्ट हैं जिनमें प्रमुख रूप से भारतीय रंग महोत्सव के संदर्भ में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की रंग गतिविधियों की वैचारिक और तथ्यात्मक पड़ताल है. इन महोत्सवों में प्रस्तुत हुए नाटकों के साथ-साथ उनके चयन की पूरी प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए लेखक रंग महोत्सवों में नाटकों के चयन के आधार के एक नए मानदंड की मांग भी करता है. स्थानीयता की छाप भारतीय रंगकर्म की वैविध्यमयी छवि को प्रस्तुत करता है लेकिन हाल के दिनों के इन रंग महोत्सवों में न्यू मीडिया के प्रयोग से रंगकर्म में आ रही एकरसता भी हिंदी रंगमंच की चिंता का एक प्रमुख कारण है. वस्तुतः मल्टीमिडिया के अधिक प्रयोग से रंगकर्म के स्वरूप और शैली में परिवर्तन तो आया ही है लेकिन इससे अभिनेता या अन्य रंगकर्मियों के स्पेस का जो संकट गहराने लगा है, लेखक उसे रंगकर्म की एक बड़ी चुनौती के तौर पर ग्रहण करता है. रंगकर्म मूलतः एक जनतांत्रिक विधा है जिसके द्वारा रंगकर्मी अपनी और आम जन की आवाज़ को जन समूहों तक पहुंचाता है. यद्यपि रंगमंच पर अनेक प्रकार की सामंती शक्तियां समय-समय पर हावी होने की कोशिश करती रही हैं लेकिन हमेशा ही रंगकर्म इन दबावों के बीच से निकलकर निखरे हुए रूप में हमारे सामने आया है. लेखक के अनुसार रंगमंच की यह सबसे बड़ी शक्ति है.

पुस्तक के आख़िरी की तीनों आलेखों ‘भोजपुरी लोकजीवन का संवाद : भिखारी ठाकुर’, ‘भिखारी ठाकुर और मध्यकालीन भक्ति आंदोलन’ एवं ‘विदापत-विदेसिया नाच क्यों?’ में लेखक ने नाटकों की लोकधारा से संबंधित अपनी चिंता प्रकट की है. इन तीनों आलेखों के केंद्र में भिखारी ठाकुर ही हैं और लेखक ने उनके रचनाकर्म से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है. इसमें कोई दो राय नहीं कि भोजपुरी समाज ने पलायन का लंबा दंश झेला है और उसी की सांस्कृतिक प्रतिक्रिया स्वरूप ‘बिदेसिया’ नाट्य रूप का जन्म हुआ. पहला आलेख पलायन को उसकी पूरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ व्याख्यायित करते हुए यह स्थापित करता है कि पलायन का प्रमुख कारण भले ही आर्थिक समस्या रही हो लेकिन अंततः पलायन एक सांस्कृतिक परिघटना के रूप में हमारे सामने आता है और जिससे भोजपुरी समाज को गहरा पारिवारिक एवं भावनात्मक आघात पहुंचता है. भिखारी ठाकुर जिस समय रचनात्मक रूप से सक्रिय हो रहे थे ऐसी ही अनेक असंगतियां भोजपुरी समाज को खाए जा रही थीं. अपने समय की इन्हीं समस्याओं से लड़ते हुए भिखारी ठाकुर अपने रचनात्मक संसार का निर्माण करते हैं जिसमें पलायन से संबंधित अनेक मार्मिक दृश्य आते रहते हैं. भोजपुरी समाज और साहित्य में भिखारी ठाकुर की प्रतिष्ठा को बढ़ाता हुआ यह लेख उनके आलोचकों के आरोपों का भी प्रति उत्तर देता है कि उनके समस्त साहित्य में अपने समय और समाज की धड़कन अपनी पूरी गति के साथ जीवंत रूप में मौज़ूद है. भोजपुरी भाषा एवं संस्कृति के सभी लक्षणों को अपनी रचनाओं उकेरने करने के कारण ही भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज के प्रतिनिधि रचनाकार बन सके.


धर्मेन्द्र प्रताप सिंह
मूलतः उत्तर प्रदेश के 
बस्ती जिले के निवासी हैं.
दिल्ली विश्वविद्यालय के 
हिंदू कॉलेज से हिंदी विषय में 
स्नातक और परास्नातक के बाद 
वर्त्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के
हिंदी विभाग से
दिल्ली हिंदी रंगमंच की 
अवधारण और विकास की समस्याएं 
विषय पर शोधरत हैं.साथ ही पर 
यु.टी..’ (युनिवर्सिटी टीचिंग असिस्टेंट
के रूप में कार्यरत।
समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में 
लेखन के साथ ब्लॉग लेखन में रूचि।
मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के बढ़ते प्रभाव ने संस्कृत नाटकों की परंपरा को क्षीण कर लोक नाटकों की एक नई परंपरा का सृजन किया और सगुण भक्तिकाव्य के समय में अनेक नाट्य रूप हमारे सामने आए. लेखक भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ को पूर्व की इसी सामाजिक-सांकृतिक बदलाव की उपज मानता है. अपने समय में प्रचलित लोक नाट्य रूपों – रासलीला, रामलीला, जात्रा, धोबिया नाच, नेटुआ नाच, लौंडा नाच आदि के साथ संस्कृत नाट्य परंपरा से भी कुछ -कुछ ग्रहण करते हुए भिखारी ठाकुर अपनी ख़ास प्रदर्शन शैली का निर्माण करते हैं जिसे उनके लोकप्रिय नाटक ‘बिदेसिया’ में सहज ही देखा जा सकता है. अतः भक्तिकालीन लोकनाट्य धारा की परंपरा के प्रमुख रचनाकार के रूप में भिखारी ठाकुर को स्वीकार करना तर्कसंगत है.

समकालीन समय में ‘विदापत नाच’ और ‘बिदेसिया’ के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लेखक परंपरा से संबंधित अपनी तार्किक स्थापना से पुस्तक की समाप्ति करता है कि यद्यपि मृत परंपरा को ढोना उचित नहीं है लेकिन बिना परंपरा का समाज भी उचित नहीं होता है. परंपरा से ही समाज और समाज से ही परंपरा बनाती है और ये लोक नाट्य रूप हमारी विकासशील परंपरा के ही उत्पाद और पहचान हैं और ऐसे में इनका संरक्षण आवश्यक है क्योंकि परंपरा से विमुख पश्चिम का हाल किसी से छिपा नहीं रहा है.

  मृत्युंजय प्रभाकर की सर्वाधिक उपलब्धि इस तथ्य में है कि उन्होंने न केवल हिंदी रंगकर्म के क्षेत्र में बल्कि लगभग संपूर्ण भारतीय रंगकर्म के भीतर व्याप्त अनेक असंगतियों पर प्रश्न मिश्रित करारे प्रहार करते हुए रंगमंच की भीतरी दुनिया के निहितार्थों को उजागर करने का साहस किया है. अनेक सवाल पाठकों के समक्ष उठाकर उनका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं तो साथ ही महत्त्व के अनेक पहलुओं की तरफ संकेत भर करके छोड़ देते हैं कि पाठक इन शेष प्रश्नों से जूझे  समकालीन रंगमंच को आईना दिखाती हुई उनकी यह पुस्तक समकालीन नाट्य आलोचना के क्षेत्र में एक ईमानदार और सार्थक कोशिश मानी जानी चाहिए जो प्रशस्ति गायन की जगह रंगमंच के विसंगतियों को उजागर करती है और इसी क्रम में वह कुछ सवाल भी उठाती है. यह सवाल एक इनसाइडर के सवाल हैं इसलिये वैद्य हैं.Print Friendly and PDF

9 टिप्‍पणियां:

  1. पुस्तक पढी नहीं पर जानता हूं प्रभाकरजी ऊर्जावान और सक्रिय रंगकर्मी हैं। आपने बड़ी गहन और विशद समीक्षा की है पुस्तक की । प्रभाकरजी रंगकर्मी के साथ-साथ नाट्य विधा के गंभीर अध्येता भी हैं। दिल्ली के समकालीन रंगमंच से वे अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं इसीलिए वे हकीकत और फसाने को अच्छी तरह समझ एवं समझा सके हैं। रंगकर्म हमेशा से ही दबाव में रहकर भी अपनी उपस्थिति और प्रासंगिकता दर्ज कराता रहा है लेकिन वर्तमान दौर में दबाव कई रूपों में और कई गुणा बढ गया है। समय,धन और
    मनोरंजन के सहज सुलभ माध्यमों ने इसके सामने चुनौतियों के पहाड़ खड़े कर दिए हैं।
    लोकानुरंजन का पारंपरिक माध्यम लोक नाटक विलुप्त होता जा रहा है। इस पुस्तक के माध्यम से वे दिल्ली रंगमंच की वास्तविक स्थिति और पहचान कराने में सफल रहे हैं । उन्हें और धर्मेन्द्रजी को भी बधाई और शुभकामनाएं ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. 'अपनी माटी' और इस पुस्तक समीक्षा, दोनों को समय देने के लिए आभार. आशा है आगे भी आपकी टिप्पणियां हमारा उत्साहवर्धन करेंगी.

      हटाएं
  2. धर्मेन्द्र जी लेखनी बहुत सशक्त है
    पुस्तक की समीक्षा सराहनीय है
    पढ़ने के लिए उत्सुकता जगाने मे सक्षम है
    हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. समीक्षा पढ़ने और टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद मैडम!
      'अपनी माटी' को आप जैसे सजग पाठकों की जरूरत है.
      'अपनी माटी' और मैं आपकी शुभकामनाओं के आभारी रहेंगे.

      हटाएं
  3. बेहद उन्नत और मुकम्मल है यह पुस्तक-समीक्षा. उन्नत इस मायने में कि 'समकालीन रंगकर्म' के प्रति गहरा आकर्षण पैदा करती है; और मुकम्मल इसलिए क्योंकि प्रत्येक अध्याय का हवाला देते हुए पुस्तक की तासीर को साझा करने की कोशिश की गई है. बड़े ही करीने से यह समीक्षा बताती है कि रंगमंच से नाता रखने वालों के लिए 'समकालीन रंगकर्म' न केवल एक पुस्तक बल्कि जरूरत है; शायद नेपथ्य का मंचन. इस समीक्षा के माध्यम से एक बुनियादी महत्व की पुस्तक से मुलाकात हुई. लेखक (मृत्युंजय) ने जिन बिंदुओं को विस्तार देकर 'समकालीन रंगकर्म' को पुस्तक का कलेवर दिया है और जिस स्फूर्तिदायक व संतुलित शैली में समीक्षक (धर्मेन्द्र) ने हमसे तार्रुफ कराया है वह काबिल-ए-तारीफ है. शेष पुस्तक पढ़ने के बाद..........

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अभिषेक!
      आपकी टिप्पणी देखी.
      अच्छा लगा कि आपने 'अपनी माटी' और मेरे लिए समय निकाला.
      और इसी बहाने मैं आपकी लेखनी के पैनेपन से भी परिचित हुआ.
      इस विश्वास के लिए 'अपनी माटी' और मेरी ओर से आपका ह्रदय से आभार!

      हटाएं
  4. धर्मेन्द्र भाई ने अच्छे और बेहतर कमेन्ट पाए हैं.वे रचना कर्म में वैसे भी बहुत संजीदा तरीके से पूरा गाम्भीर्य बरतते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. माणिक भाई! आपकी उपस्थिति भी आवश्यक थी. प्रेरणादायी है. आभार.

      हटाएं
  5. जिस समीक्षा की आवश्यकता वर्तमान युग को है, धर्मेन्द्र जी ने उसे प्रस्तुत किया. और मैं स्वयं इससे लाभान्वित भी हूँ, भविष्य में भी उम्मीद रहेगी, फिलहाल अभी के लिए बधाई. शेष फिर ... साभार - नवनीत

    उत्तर देंहटाएं

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here