संपादकीय:साहित्य का रोड शो - अपनी माटी

साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण / UGC CARE Listed / PEER REVIEWED / REFEREED JOURNAL ( ISSN 2322-0724 Apni Maati ) apnimaati.com@gmail.com

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मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

संपादकीय:साहित्य का रोड शो

           साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            
'अपनी माटी' 
(ISSN 2322-0724 Apni Maati
इस अप्रैल-2014 अंक से दूसरे वर्ष में प्रवेश


चित्रांकन:रोहित रूसिया,छिन्दवाड़ा
वैसे तो ख़ाकसार की कलम किसी भी 'वाद'-'विवाद' के पहलू में बैठकर न तो रुसवा हुई है न सुर्खरू हुई है। पर पानी जब-जब सर से ऊपर हो जाता है तो कलम के दिल में भी कभी-कभी ख़याल आता है कि ज़िंदगी किसी की नर्म ज़ुल्फ़ों की छाँव में गुज़र होती तो उसका भी पसीना गुलाब हो सकता था । मगर  ये हो न सका और अब ये आलम है कि साहित्य  की ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ 'दक्षिण'-'वाम' विराज रही हैं और अपनी कलम न दक्षिण न वाम न यथार्थ न आदर्श है और 'हम किसी के न हुए कोई हमारा न हुआ' गाते-गाते दिन काट रही है।      

पर देख दिनन को फेर साधो जयकारा गूंजा है सड़क पर।सारे राजे-महाराजे, रानियाँ-महारानियाँ, नवाब-बेगमें, बेटा-बेटी, बहू-दामाद, चोर-उचक्के, संत-महंत, पीर-फ़कीर, मुल्ला-पंडित, चाकर-चमचे, अफ़सर-बाबू , खाऊ-बिकाऊ, टायर्ड-रिटायर्ड, फ़िल्मी-इल्मी, कवि-कवियित्री, खिलाड़ी-अनाड़ी, दाढ़ी-बेदाढ़ी, किन्नर-किंकर , ढोंगपति-उद्योगपति और न जाने कौन- कौन जी !  लगे हुए हैं रोड नापने।
                     
मज़ा तो ख़ुदा कसम गज़ब का आ रिया है।  कैसे-कैसे निशाने हैं और कैसे-कैसे निशानची।  जूते-चप्पल, अंडे- टमाटर सब के दिन फिर गए है। और लेखकों की दिलरुबा दिल्ली वाली नीली-काली स्याही के तो क्या कहने ! किसी का भाल चूमे है किसी के गाल चूमे है। मतलब न्यूज़ चैनेल पर अपना थोबड़ा न दिखने का जो दुःख हर लेखक को होता है ( दिल्ली वाले तथाकथितों को छोड़कर ) वो सारा का सारा दर्द अब कम हो चला है। अपन नहीं दिखे समाचारों की दुकान पर तो कोई गम नहीं; अपनी स्याही तो छायी हुई है। मुझे तो पूरा यकीन है कि स्याही फेंकने का विचार मूल रूप से किसी असफल लेखक का ही होगा। वैसे तो असफल लेखक समीक्षक, आलोचक या संपादक बनता है पर आर्थिक उदारवाद के इस दौर में जब आलोचक-समीक्षक केवल रुदाली बनकर दिन काट रहे हैं और संपादक मालिकों के हरम में मुंह लगी कनीज़ से ज़ियादा कुछ नहीं हैं तब बदमाश बुद्धि नए विकल्प तलाश रही है तो इसमें बुराई भी क्या है। 

तो बात इतनी सी  है कि स्याही रोड शो का हिस्सा बन चुकी है और साहित्यकार तेल देख रहे हैं और तेल की धार देख रहे हैं। इधर नतीजे आये और ऊधर साहित्यकार घोषणा कर देंगे कि वे दक्षिण हैं या वाम हैं या फिर आम हैं। तो स्याही और साहित्यकार तो अपनी भूमिका तय कर चुके हैं बस अब शेष बचता है इस उत्पादन प्रक्रिया का अनावश्यक परिणाम जिसे बोलचाल की भाषा में साहित्य कहा जाता है। तो हुकम अपन ने तय कर लिया है कि अपन साहित्य को भी रोड शो का हिस्सा बनाएंगे। पूछो क्यों ??

बताते हैं ज़रा सब्र रखो। एक तो तकनीकी तरक्की के कारण सब्र की कब्र खुद चुकी है और लोग भारत में भी ऐसी उम्मीद पालने लगे हैं कि हर काम फटाफट होगा। पर हर काम फटाफट होगा तो अपन महान राष्ट्र के वासी कैसे कहलाएंगे ये किसी ने नहीं सोचा !! अरे हुज़ूर ये कभी मत भूलना कि अपने को महान राष्ट्र के वासी कहलाना भर है राष्ट्र को महान बनाने पे ध्यान नहीं  देना है। याद रखो हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है और गंगा को हम बकायदा गटर बना चुके हैं। पर अपन तो महान हैं अपने तुलसी बाबा तो मानस में लिख गए हैं कि ब्रह्म राम ते नाम बड़। राम से बड़ा राम का नाम है तो गंगा से बड़ा गंगा का नाम। गंगा गटर हो जाए तब भी नाम तो गंगा ही रहेगा न ? बस अपना  उद्धार पक्का। 

सम्पादक 
अशोक जमनानी
अब छोड़िये ये बात वरना मैं खेत जाते-जाते अक्सर खलिहान चला जाता हूँ। बात साहित्य और रोड शो  की हो रही थी। तो मालिक साहित्य को रोड शो का हिस्सा इसलिए बनाना है क्योंकि सियासी जुबां बदचलन हो चली है। लफ़्ज़ों का पतन शुरू हुआ था तो लफ्ज़ कीचड़ उछालते थे पर अब लफ़्ज़ कीचड़ उछालते नहीं हैं अब तो दुनियां भर की गंदगी सियासी लफ़्ज़ों की नस-नस में लहू बनकर दौड़ती है। अब घात-प्रतिघात का हथियार हैं शब्द। वही शब्द जिसे इस  देश की मनीषा ने ब्रह्म कहा। वही ब्रह्म कितना विवश है कितना असहाय है इस देव भूमि पर। तो कैसे वे दिन आएंगे जब साहित्य सियासत की ज़ुबान बन सकेगा। क्या मज़ाक है !! साहित्य और सियासत की ज़ुबान ??? ऐसा कहीं संभव है ??? पता नहीं पर सुना है बंकिम चंद्र नाम का एक शख़्स था उसके उपन्यास 'आनंद मठ' में दो शब्द थे - वन्दे मातरम् ………… Print Friendly and PDF

 


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