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कविताएँ:रश्मि बड़थ्वाल

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अप्रैल 15, 2014 | मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

           साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            
'अपनी माटी' 
(ISSN 2322-0724 Apni Maati
इस अप्रैल-2014 अंक से दूसरे वर्ष में प्रवेश
चित्रांकन:रोहित रूसिया,छिन्दवाड़ा



अपने बड़े होते बेटों से

लहरों पर
तुम्हारी बढ़ती नाव के विपरीत
आएंगी जो धाराएं
उन्हें रोकूंगी मैं
अपनी सामर्थ्य के शेष रहने तक
निरंतर।
वो आंधियां 
जो बढ़ेंगी तुम्हारे प्रकाश की ओर
उन्हें दीवार बनकर रोकूंगी मैं
मुझमें सामर्थ्य है 
मेरे बच्चों!
इतनी कमजोर नहीं हूं मैं
अपने भीतर संभाला है मैंने
ऊर्जापुंज।
पक्षियों की तरह
पशुओं की तरह
पालूंगी तुम्हें
कि अपने कर्तव्य के बदले
कुछ नहीं चाहूंगी तुमसे
और पेड़-पौधों की तरह
अंत में खाद बन जाऊंगी
तुम्हारे लिए
क्योंकि इस देह के अशेष होने के बाद
मैं तुममें जिऊंगी
फिर तुम्हारे बच्चों में
फिर तुम्हारे बच्चों के बच्चों में
उस लंबे जीवन के हित में
अपना यह छोटा जीवन
सारा का सारा 
लगा दूंगी मैं
तुम्हारे रास्ते के कांटे हटाने में।
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बच्चों का खेल नहीं

कैरम भी खेलना नहीं आता, बेचारी मम्मी!’
ठठा कर हंसते हैं मेरे बच्चे
मुस्कराती हूं उनके बचपन पर
हत्यारों के बीच से जीवित बच निकलना
किसी बेचारे के बस की बात नहीं
बिना हथियार
बिना कूट-कपट
बिना छल छद्म
बिना घुटने टेके
निकल आयी मैं
हत्यारों की कतार के मध्य से
यह क्या बच्चों का खेल है!

मृत्योपरान्त

एक दिन
मैं बिला जाऊंगी
अनंत अंधकार में
सो जाऊंगी अखंड षून्य में
और मुझे खोजते ही रह जाएंगे मेरे बच्चे
चिता से बचे फूलों को कांेचते
परेषान होंगे कुछ दुष्मन
कि किस ठौर पाएंगे अब वे
परपीड़न सुख का धाराप्रवाह स्वाद।
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प्रजातंत्र का कार्टून

बित्ता भर जगह में 
बैठे रह जाते हैं सारे दिन
बिना उफ् किए
हाथ भर जगह में 
बिना कराहे
सो लेते हैं सारी रात

चार निवालों में 
निपटा लेते हैं दो जून
सबसे बड़ी संख्या में हैं जहां ऐसे ही लोग

उंगलियों पर गिने जाने योग्य
औद्योगिक घराने
खून और कालिख से रंगे
हाथों वाले सफेद कुर्ते
और सेंध लगाती बहुराष्ट्रीय कंपनियां

बाजार की लालसा को निरंतर
उत्तेजित करते
विज्ञापनों का अश्लील कारोबार
भौतिक ऊंचाई के लिए भागते पैर

कम से कमतर होता जाता
मनुष्यता नामक प्राणवायु का दबाव
और लापता होते करुणा के स्त्रोत
देख लो गौर से 
यह है प्रजातंत्र का कार्टून।
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भीड़

भीड़ जागी
भीड़ नहाई
भीड़ भागी।

भीड़ ने ट्रेन पकड़ी
भीड़ बस में ठुंसी
ट्रक पर लटकी
भीड़ सड़क पर दौड़ी  
भीड़ क्रॉसिंग पर अटकी।

भीड़ ने दिए हॉर्न पर हॉर्न
भीड़ ने खाई चाट
भीड़ ने फेंके पत्ते
भीड़ ने मचाया शोर 
भीड़ ने दिए धक्के पर धक्के।

भीड़ ने कुछ रौंदा कुछ कुचला
कुछ तोड़ा कुछ फोड़ा
भीड़ ने छुड़ाए दुनिया के छक्के।
भीड़ ने खड़ा किया कंक्रीट का जंगल
भीड़ ने हर जंगल का किया 
अमंगल पर अमंगल।

भीड़ ने बनाए जंगली विधान
भीड़ को संभालते लस्त-पस्त हुए कानून
भीड़ के आगे हैरान हो गया संविधान।
भीड़ ने सुखा दी नदियों की काया
भीड़ ने फैला दी रेगिस्तान की माया

भीड़ ने हौल उठा दी आकाश के दिल में
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रश्मि बड़थ्वाल
जन्मः 28 जनवरी 1962 पौड़ी गढ़वाल, परास्नातक (इतिहास, पत्रकारिता) सृजनः बैताल प्रश्नों के बीच (कहानी संग्रह), पुरवा पछुआ...(नवसाक्षरों के लिए) प्रकाशित। एक गढ़वाली कविता संग्रह प्रकाशित। उत्कृष्ट पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन। कुछ रचनाओं का पंजाबी, बंगाली, मराठी व अंग्रेजी में अनुवाद। सम्प्रतिः आकाशवाणी से संबद्ध एवं स्वतंत्र लेखनपताः 21, नील विहार, निकट सेक्टर 14, इंदिरा नगर लखनऊ 16, दूरभाषः 8090751294, ईमेलः rashmi_barthwal28@yahoo.com
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