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शोध:मध्यकाल में नारी की स्थिति / उमेश चन्द्र

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अप्रैल 15, 2014 | मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

      साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            
'अपनी माटी' 
(ISSN 2322-0724 Apni Maati
इस अप्रैल-2014 अंक से दूसरे वर्ष में प्रवेश

शोध:मध्यकाल में नारी की स्थिति / उमेश चन्द्र (अलीगढ़)

चित्रांकन:रोहित रूसिया,छिन्दवाड़ा
इतिहास के प्रारम्भिक रूप को देखने से ज्ञात होता है कि शुरू से ही नारी परिवार का केन्द्र बिन्दु रही है। उन दिनों परिवार मातृसत्तात्मक था। खेती की शुरूआत तथा एक जगह बस्ती बनाकर रहने की शुरूआत नारी ने ही की थी, इसलिए सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भ में नारी है किन्तु कालान्तर में धीरे-धीरे सभी समाजों में सामाजिक व्यवस्था मातृ-सत्तात्मक से पितृसत्तात्मक होती गई और नारी समाज के हाशिए पर चली गई। आर्यों की सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भिक काल में महिलाओं की स्थिति बहुत सुदृढ़ थी। ऋग्वेद काल में स्त्रियां उस समय की सर्वोच्च शिक्षा अर्थात् बृह्मज्ञान प्राप्त कर सकतीं थीं। ऋग्वेद में सरस्वती को वाणी की देवी कहा गया है जो उस समय की नारी की शास्त्र एवं कला के क्षेत्र में निपुणता का परिचायक है। अर्द्धनारीश्वर की कल्पना स्त्री और पुरूष के समान अधिकारों तथा उनके संतुलित संबंधों का परिचायक है। वैदिक काल में परिवार के सभी कार्यों और भूमिकाओं में पत्नी को पति के समान अधिकार प्राप्त थे। नारियां शिक्षा ग्रहण करने के अलावा पति के साथ यज्ञ का सम्पादन भी करतीं थीं। वेदों में अनेक स्थलों पर रोमाला, घोषाल, सूर्या, अपाला, विलोमी, सावित्री, यमी, श्रद्धा, कामायनी, विश्वम्भरा, देवयानी आदि विदुषियों के नाम प्राप्त होते हैं। उत्तरवैदिक काल में भी स्त्रियों की प्रतिष्ठा बनी रही। इसके अलावा शासन, सेना, राज्य-व्यवस्था में स्त्रियों के योगदान के प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति से संबंधित दो विचार के सम्प्रदाय मिलते हैं। एक सम्प्रदाय के समर्थकों का कहना है कि महिलायें ’पुरूषों के बराबर’ थीं, जबकि दूसरे सम्प्रदाय के समर्थकों की मान्यता है कि महिलाओं का न केवल अपमान ही होता था बल्कि उनके प्रति घृणा भी की जाती थी। वैदिक सूत्रों के आधार पर उक्त काल खण्डों में स्त्री की गौरवपूर्ण एवं सम्मानजनक स्थिति स्वीकार करते है तथा परवर्ती सूत्रों में उत्तरवैदिक काल से स्त्रियों की निम्नतर स्थिति के स्पष्ट संकेत मिलते हैं । नारी समाज का वह अंग है जो व्यक्ति और समाज के स्तर पर अनेक भूमिकाओं को एक साथ ही निर्वाहित करती है। एक ही समय में वह एक से अधिक रूपों में जीवित रहती है और इन विभिन्न रूपों में वह एक साथ ही माता, बहन, पुत्री, प्रेयसी, दोस्त तथा वेश्या तक हो जाती हैै। वह किसी न किसी रूप में कहानी में अवश्य ही चित्रित होती है। ”वास्तव में गृहस्थाश्रम की सफलता नारी पर आधरित है। इसीलिए तो प्राचीनकाल में नारी प्रतिष्ठित पद पर विराजमान थी। मनु ने भी अपने सामाजिक ग्रन्थ ‘मनु स्मृति’ में लिखा है-

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफलाः क्रियाः ।’’1

अर्थात् जिस कुल में स्त्रियों की पूजा होती है, उस कुल पर देवता प्रसन्न होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा, वस्त्र, भूषण तथा मधुर वचनादि द्वारा सत्कार नहीं होता है, उस कुल में सब कर्म निष्फल होते हैं। उपनिषदों में भी कहा गया है,-’’सृष्टि की सम्पूर्ण रिक्तता की पूर्ति स्त्री से मानी गयी है।’’2 मानव जीवन के सर्वतोन्मुखी विकास में नारी की अहम भूमिका रही है। जिसने बृहदरूपेण समाज का चतुर्दिक विकास किया है। नारी की स्थिति उसकी आर्थिक प्रगति राजनितिक सक्रियता तथा उसके वैचारिक आदर्शों से निरंतर प्रभावित होती रही है। महाभारत काल में नारी के अधिकार पहले जैसे नही रहे। वर्ण व्यवस्था में भी कठोरता आई तथा नारी घर-ग्रहस्थी तक सीमित रहने लगी। बहुपत्नी व्यवस्था और अनुलोम विवाह के कारण नारी उपभोग की वस्तु बनने लगी। तप, त्याग, नम्रता, धैर्य आदि पतिव्रत धर्म का पालन करना उनके प्रमुख लक्ष्य माने गये। पति के मनमाने अधिकार का ज्वलंत उदाहरण द्रोपदी और सीता बनी। किशोरियों को शिक्षा से वंचित रखा जाने लगा। बहु-विवाह एवं बाल विवाह होने लगे, विधवाओं की संख्या बढ़ने लगी। विधवा-विवाह पर प्रतिबंध लग गया। पतिव्रत धर्म सर्वोच्च बन जाने के कारण विधवा का जीवन नरक हो गया, परिणामस्वरूप सती प्रथा का जन्म हुआ।

मध्ययुग में डावांडोल राजनैतिक स्थिति का प्रभाव देश की सामाजिक, आर्थिक स्थितियों पर पड़ा। लगातार विदेशी आक्रमणों एवं भिन्न सांस्कृतिक परिवेश के साथ भारत में इस्लाम के आक्रमण ने पहले संघर्ष फिर सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए जमीन तैयार की। स्त्रियों की स्थिति में भी परिवर्तन आया। मुसलमानों के वर्चस्व का जितना असर पुरुषों की स्थिति पर दिखायी देता है, स्त्रियों की अधीनस्थ की भूमिका ने उसे क्रमशः अवनति की ओर अग्रसर किया। भारत के मध्यकाल में स्त्रियों के अगाध पण्डिता होने के दृष्टांत भी पाये जाते हैं। स्त्री का यह युग भारत के इतिहास का ’’स्वर्णिम युग’’ कहा जा सकता है। इस युग के आते ही स्त्री के दिव्य गुण धीरे-धीरे उसके अवगुण बनने लगे, साम्राज्ञी से वह धीरे-धीरे आश्रिता बन गयी। जो स्त्रियां वैदिक युग में धर्म और समाज का प्राण थीं, उन्हें श्रुति का पाठ करने के अयोग्य घोषित किया गया। वैदिक युग का दृष्टिकोंण स्त्री के प्रति दिव्य कल्पनाओं तथा पुनीत भावनाओं से परिवेष्टित था, जो धीरे-धीरे पूर्णतयाः बदल चुका था। यह युग तो जैसे स्त्रियों की गिरावट का युग था। ’’उनके मानसिक तथा आत्मिक विकास के द्वारों पर ताले लगा दिए गये। उनकी साहित्यिक उन्नति के मार्ग पर अनेकों प्रतिबंध लगा दिए गये। ’स्त्री शूद्रो नाधीताम्’ जैसे वाक्य रचकर उसे शूद्र की कोटि में रख दिया।’’3 स्त्री को विवाह संस्कार के अतिरिक्त और सभी संस्कारों से वंचित कर दिया। सनातन, वैदिक काल के उच्च, सुदृढ़ आदर्शों की इमारत ढह चुकी थी। फिर पुरूष ने स्त्री को अपनी भोग्य वस्तु बना लिया था, वह पशु के तुल्य पराधीन हो चुकी थी। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और श्रीरामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है, ’’ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी’’, तो दूसरे भक्त कवि कबीर ने तो नारी की परछाईं से बचने का उपदेश दिया, ’’नारी की झाईं परत अंधा होत भुजुंग कबीरा, तिनकी का गति जो नित नारी के संग।’’4 इस काल में धीरे-धीरे बाल-विवाह, पर्दे की बेड़ियां तथा अविद्या का अंधकार नारी समाज के लिए अभिशाप बनने लगे। स्वेच्छाचारिता तथा अमानुषिकता की पराकाष्ठा हो गई थी, क्योंकि आत्मज्ञान में निमग्न पुरूषों ने उसे मोक्ष मार्ग की मुख्य बाधा माना। सभ्य पुरूषों ने स्त्री की चर्चा करना वैषियकता का लक्षण माना और विरक्तों ने उसका मुखावलोकन करना निषिद्ध माना। विलासियों और कवियों ने उसे विलास की वस्तु समझा। गृहस्थों ने माता, भगिनी तथा कन्या के रूप में उसे देवता, धरोहर माना परन्तु किसी ने भी उसे तुल्य, स्वत्व और पराक्रम मानव नहीं माना।

मध्यकालीन काव्य में मीरा को छोड़कर अन्य भक्त एवं सन्त कवियों ने नारी की सार्थकता पुरूष वर्चस्ववादी ढांचे में ही सुरक्षित की है। हिन्दी साहित्य में नारी की अस्मिता की पहली आवाज मीरा के काव्य में सुनाई पड़ती है। मीरा के काव्य में एक ओर स्त्री की पराधीनता और यातना की अभिव्यक्ति है तो दूसरी ओर उस व्यवस्था के बंधनों का पूरी तरह निषेध और उससे स्वतंत्रता के लिए दीवानगी की हद तक संघर्ष भी है। अन्तर्द्वन्द्व, नारी उत्पीड़न, नारी के विरूद्ध अन्याय के विरोधी तेवर, अस्तित्व बोध, समता, चेतना तथा रूढ़िता विरोधी क्रान्ति स्वर परिलक्षित हैं। हर युग में अनेक दृष्टि से नारी का संरचनात्मक योगदान जहां सर्वथा सराहनीय रहा है, वहीं इस युग में भी सुभद्रा कुमारी चौहान, तोरन देवी, शुक्ल लली, सुमित्रा कुमारी सिन्हा आदि जिन्होंने स्त्री को अपनी आवाज दी। मध्यकाल में सैकड़ों बार पुरूषों के हाथ से जाती हुई बाजी को पुनः हस्तगतः करने में उन्होंने अदम्य उत्साह एवं साहस का परिचय दिया। अंग्रेजों की साम्राज्य-पिपासा ने जब फ्रांस देश का राज्य हड़प लिया, तो स्वदेश फ्रांस को उनके डरावने मुख से साबित बाहर निकाल लाने वाली वीर रमणी देवी जोन का नाम उल्लिखित है।’’5 मध्यकालीन नारी कुसंस्कारों में पली हुई, परम्परा के बन्धनों में सीमाबद्ध, अशिक्षित दृष्टि बिन्दु, गृह की क्षुद्र सीमा में ही केन्द्रित रहा है। इतिहास तथा साहित्य में इसके अपवाद भी हैं, पर जनसामान्य में नारी निश्चित सीमाओं, आदर्शों, रेखाओं पर इच्छा अथवा अनिच्छा से चली है। उसके अशिक्षित मस्तिष्क कुसंस्कारों से पूर्ण हृदय पर नियामकों ने आदर्श का भार लादने का प्रयास किया है। बौद्धिकता तथा तर्क-वितर्क की भावना रहित नारी के सरल हृदय ने इन आदर्शों को अपने जीवन पथ का ध्रुवतारा समझा। इन आदर्शों, एक पक्षीय पवित्रता तथा पतिव्रत को उसने सदा ही शिरोधार्य किया है। इन आदर्शों की उपलब्धि के प्रयास में उसे विस्मृत हो गया कि उसके पग श्रृंखलाबद्द हैं, अतः वह पतित भी हुई। मानुषी तथा अमानुषी शक्तियों के संघात से उसका अपकर्ष हुआ। निरीह सरल विश्वास से उसने पुरूष को आत्मसमर्पण कर दिया तथा पति को ही परमेश्वर माना। फलतः मध्ययुग की नारी पुरूष के इंगित पर नृत्य करने वाली काष्ठ-पुत्तिलिका मात्र रह गयी। उसमें चेतनता तथा व्यक्तित्व का अभाव रहा। भक्तिकाल में नारी के भौतिक और अध्यात्मिक दोनों प्रकार के सौन्दर्य की अनुभूति हुई है। नारियों के शारीरिक और मानसिक सौन्दर्य का निरूपण किया गया है।

’’नारी सौन्दर्य की उदात्तता, उसके तीनों रूपों- माता, पत्नी और कन्या में भक्तिकाल के कवियों ने अंकित की है। ज्ञानमार्गियों के लिए माता परमात्मा स्वरूप भी है अथवा कहना चाहिए कि उन्होंने माता में परमात्मा की विशेष स्थापना देखी है।’’6 सन्तों और भक्तों ने अपनी वैराग्यपूर्ण वृत्ति से प्रेरित होकर उसे ’सर्पिणी’ और ’भव-बन्धन’ का मुख्य कारण बताया। तुलसी जैसे समन्वयात्मक दृष्टि सम्पन्न कवि ने उसे माता और जीवन की सच्ची सहधर्मिणी के रूप में भी चित्रित किया। मध्ययुग के वैभवपूर्ण भौतिक वातावरण में नारी के प्रति एक विशेष प्रकार के दृष्टिकोंण का आविर्भाव हो जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी। भारतवर्ष में नारी की निन्दा और प्रशंसा दोनों बातें पाई जाती हैं। एक ओर सन्तों ने उसे काम-स्वरूपा जानकर उसकी निन्दा की है, तो दूसरी ओर भारतवर्ष में ही यह भी कहा गया है कि जहां स्त्रियों का आदर होता है, वहां देवता विचरण करते हैं। स्त्री के सम्बन्ध में मीरा का दृष्टिकोंण अन्य भक्तिकालीन कवियों में एकदम अलग है। सामन्ती समाज व्यवस्था ने स्त्री को सिर्फ तीन नाम दिए हैं-पत्नी, रखैल एवं वैश्या और उसे सिर्फ दो रूपों में देखा है-देवी तथा दासी। मीरा ने स्त्री के इन सब परंपरागत रूपों को अस्वीकार किया है। मीरा की कविता में सामन्ती समाज और संस्कृति की जकड़न से बेचैन स्त्री-स्वर की मुखर अभिव्यक्ति हुई है। उनकी स्वतंत्रता की आकांक्षा जितनी अध्यात्मिक है, उतनी ही सामाजिक भी। आज स्त्री-विमर्श के बुलन्द नारे के बीच मीरा का व्यक्तित्व एवं उनका काव्य किस प्रकार प्रासंगिक हो सकता है, यह विचरणीय है। ’’सूरदास ने माता यशोदा के मक्खन समान स्नेह, आत्मत्याग और निःस्पृह वात्सल्य का जो चित्र प्रस्तुत किया है, वह मधुरता के साथ उदात्त है।’’7 वहीं तुलसीदास ने ’’माता को परमाभिवंधा कहा है, जिसका स्थान पिता की अपेक्षा अत्युच्च है।’’8 नारी हृदय कोमलता, दया, सहानुभूति और स्नेह की सजीव प्रतिमा है। कार्याें, रूपों और स्थितियों के अनुसार नारी के अनेक नाम भारतीय साहित्य में प्रचलित है, जिससे नारी के विभिन्न स्वरूपों का बोध होता है। ’’नर के धर्म वाली या नर के संबंध होने के कारण उसका ’नारी’ नाम पड़ा। इस शब्द से सृष्टि के एक-एक प्राणी विशेष का रूप सामने आता है और यह भक्तिकाल में प्रायः उसी अर्थ में प्रयुक्त भी होता था, जिस अर्थ में आजकल साधारणतयाः ’मादा’ शब्द का प्रयोग होता है।’’9

मध्यकाल में कन्या जन्म के अशुभ माने जाने के संकेत मिलते हैं। सदैव लड़कियां पैदा करने वाली स्त्री को घृणा से देखा जाता था। स्त्री को कुछ सम्मान पुत्र की माता बनने पर मिलता था। परन्तु इस्लाम के भारत में आने के बाद सुरक्षा, विवाह, दहेज आदि प्रश्नों ने कन्या जन्म को सामाजिक अप्रतिष्ठा का विषय बना दिया। अतः कन्या शिशु हत्या की परम्परा प्रारम्भ हुई। स्त्रियों की सुरक्षा व अप्रतिष्ठा के प्रश्न ने कन्या शिशु हत्या के आंकड़ों में बृद्धि की। ’अमीर खुसरो’ इसीलिए कहते हैं, ’’मैं चाहता था कि तुम्हारा जन्म ही नहीं होता और यदि होता भी तो पुत्र के रूप में। कोई भाग्य का विधान नहीं बदल सकता, परन्तु मेरे पिता ने एक स्त्री से जन्म लिया और मुझे भी तो एक स्त्री ने ही पैदा किया था।’’10


उमेश चन्द्र
शोधार्थी, हिन्दी-विभाग,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
अलीगढ़
ई-मेल:
umeshchandra.261@gmail.com
मध्यकालीन भारत में स्त्री शिक्षा के बारे में जानकारी अपर्याप्त है। यद्यपि इब्नबतूता लिखते हैं कि ’’जब वह हानौर पहुँचा तो वहां उसने 23 ऐसे विद्यालय देखे जिनमें बालिकायें शिक्षा ग्रहण करतीं थीं। नगरों व बड़े घरानों की स्त्रियों के पढ़ने-लिखने के संकेत मिलते हैं किन्तु सामान्य परिवारों एवं ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का स्तर नीचा था।’’11 ’’भक्तिकालीन साहित्य में मीराबाई, गबरीबाई, दयाबाई, सहजोबाई का योगदान’’12 एवं पातुरों द्वारा लिखा गया साहित्य’’13 द्वारा स्त्रियों में शिक्षा के प्रसार के बारे में जानकारी मिलती है। भक्तिकाल का साहित्य सृजन लोकभाषा एवं मातृभाषा में होने के कारण स्त्रियों को पढ़ने-लिखने की प्रेरणा मिली। इस काल में नारी की स्थिति और भी बदतर हो गयी। कुल के रक्त की शुद्धता, नारी के सतीत्त्व की रक्षा और हिन्दू धर्म की रक्षा के नाम पर नारी को ऐसे सामाजिक-धार्मिक बंधनों में जकड़ दिया गया कि वह पुरूष की छायामात्र होकर रह गई और उसका स्वतंत्र अस्तित्व लुप्त हो गया। इस काल में स्त्री-शिक्षा समाप्त हो गई। पर्दा-प्रथा और सती प्रथा यहां तक कि मादा-शिशु की हत्या भी होने लगी। उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में विदेशी आक्रमणों का प्रभाव कम था, इसलिए वहां बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा और सती-प्रथा जैसी कुप्रथायें कम पनप सकीं। यद्यपि मध्यकालीन इतिहास में रजिया बेगम, चाँद बीबी, ताराबाई, अहिल्याबाई आदि वीरांगनाओं ने शासन संचालन में ख्याति प्राप्त की किन्तु इन चंद नारियों के उदाहरण से यह नहीं कहा जा सकता कि सामान्य स्त्री की स्थिति किसी भी तरह संतोषजनक थी। ’’11वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही भारतीय समाज पर उसके आपसी मतभेद एवं फूट के कारण मुस्लिमों का आधिपात्य हो गया था। उनके प्रतिदिन के बढ़ते वर्चस्व के कारण संस्कृति रक्षा एवं मनु स्मृति के नाम पर नारी के स्वतंत्र अस्तित्व का न केवल पूर्णतयाः लोप हो गया वरन् उन्हें समाज की चाहरदीवारों में कैद कर दिया गया। लगातार आक्रमणों में भागीदारी, परिवार एवं समाज को सुरक्षा प्रदान करते रहने के कारण पुरूषों का गौरव बढ़ता चला गया।’’14 धीरे-धीरे स्थिति यह आयी कि सुविधा एवं सुरक्षा जुटाते रहने के कारण पुरूषों के वर्चस्व को समाज में मान्यता दे दी गई, नारियां मात्र भोग-विलास का पर्याय बन गयीं। उनका कार्य केवल सज-संवर कर पुरूषों की इच्छा पूर्ति करना अथवा उनके बच्चों की माँ बनकर उनकी देख-रेख करना रह गया। वे बाजार की एक बेजान वस्तु की भांति हो गईं जिनकी हर सांस पर दूसरों का अधिकार था।

संदर्भ ग्रन्थ
1- अग्रवाल, चन्द्रमोहन, भारतीय नारी: विविध आयाम, पृ‐ सं‐ 35, श्री अल्मोड़ा बुक डिपो, अल्मोडा़।
2- बृहदारण्यक, उपनिषद, 1/4/17  
3- अग्रवाल, प्रेमनारायण, सम्पादन, जगदीश्वर चतुर्वेदी, पृ. सं. 23-24, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिपो, नई दिल्ली।
4- स्त्री: भारतीय एवं पाश्चात्य अवधारण, डॉ. मधु देवी, अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका, शोध, समीक्षा और मूल्यांकन, पृ. सं. 74।
5- शर्मा, गजानन, प्राचीन साहित्य में नारी, पृ. सं. 21, रचना प्रकाशन, 45-ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद।
6- सूरसागर, पहला खण्ड, सं. नन्द दुलारे बाजपेयी, पृ. सं. 255 से 594 तक के विविध प्रसंग
7- अयोध्या काण्ड, दोहा, 56, चौ. 1 
8- शर्मा, गजानन, प्राचीन भारतीय साहित्य में नारी, पृ. सं. 42-43, रचना प्रकाशन, 45-ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद। 
9- वही,  पृ. सं. 42-43
10- कस्तवार, रेखा, स्त्री चिन्तन की चुनौतियां, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2006, पृ. सं. 64
11- वही,  पृ. सं. 64 
12- वही,  पृ. सं. 64 
13-वही,   पृ. सं. 64
14- कौशिक, आशा, नारी सशक्तीकरण: प्रतिशत विमर्श एवं यथार्थ, पोईन्टर पब्लिशर्स, जयपुर, 2004, पृ. 200

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