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कविताएँ:डॉ.मोहसिन खान

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मई 14, 2014 | बुधवार, मई 14, 2014

                 साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
    'अपनी माटी'
         (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
    वर्ष-2 ,अंक-14 ,अप्रैल-जून,2014

मैं नहीं लौटना चाहता बचपन में

तुम लौट जाना चाहते होगे बचपन की ओर
अपने वर्तमान जीवन की
चिंता, निराशा, ख़तरों को देखकर
या यूँ ही ज़माने के कहन की तर्ज़ पर ।

मैं नहीं लौटना चाहता अपने बचपन में
क्योंकि उन दिनों के चेहरे
संकट से बड़े विकृत थे ।
समय की गति भी बड़ी धीमी थी
जिसने बहुत पीड़ा देकर
और भी अधिक समय लगाकर
हमारे दु:खों को अधिक दिनों तक
सहने पर मजबूर किया ।

याद आते हैं कभी मुझे
बचपन के वो दिन
तो मैं अपने ही मन के कोने में
हाथों में मुँह छिपाए बैठता हूँ सहमकर
कि जैसे मुझे कोई अपराध पर ग्लानि हो
और अक्सर जब बचपन के आते हैं सपनें
तो नींद में भी दरार पड़ जाती है
और रात का ख़ाली वक़्त
टूटे-टूटे अधूरेविचारों और चिंताओं
 के मलबे में दब जाता है ।

मैं बहुत डरता हूँ बचपन के उन दिनों से
और लौटना भी नहीं चाहता उन दिनों में
मेरा बचपन, मेरे बचपने में ही
मेरे भीतर मर गया था,
मेरे पिता से उधारी चुकवाने के लिए
आए उन लोगों की माँगने की
आवाज़ों की नोकों से,
जो मेरे भीतर अक्सर
मुझे छेदते हुए उतर जाती थीं ।
मेरा बचपन मर गया
या हत्या हुई नहीं मालूम ?
पर मेरे पिता मेरे बचपन को
ज़िन्दा रखना चाहते थे,
सहेजना चाहते थे,
कम पैसों में
लेकिन उन्हें क्या मालूम था
वो मरी चीज़ों को
जीवित व्यर्थ कर रहे थे ।
मैंने मेरे पिता के कान्धों का बोझ
और चेहरे की शिकन को
पढ़ा और सहा था,
मुझसे पहले के तीन भाई-बहनों का ख़र्च
और अपने पर होने का ख़र्च
सब हिसाब जोड़कर
मैं अपने हिस्से में अभाव रखकर
उनके लिए पैसे बढ़ा देता था ।

मेरी माँ मेरे लिए कपड़े खरीद लाती थी
किसी भारतीय मुस्लिम से
जो पाकिस्तान होकर आता था
और वहाँ से रेडीमेड उतरनें लाता था
मैं उन उतरनों को नया जानकार पहनता रहा
फिर भी भीतर पता था यह उतरनें हैं।

मेरी माँ भी मेरे बचपन को बचाती रही
अपना सारा ज़ेवर बेचकर,
सहेजना चाहा मेरे बचपन को
पर मेरा बचपन तो मर गया था
और दफ़्न हो गया था
मेरे पिता के परिवार को दी गयी
उस बिना फ़रियाद की रहमत की ज़मीन
और छत के बीच में ।

मैं नहीं लौटना चाहता बचपन में
और न ही जन्म देना चाहता हूँ
एक और बचपन को
जो बचपन तो जी लेगा ठीक से
लेकिन यूवा होकर माँगेगा
वही सारे सपने जो मैंने बचपन में देखे थे
और तब मेरा बूढ़ापा
फिर से बदल जाएगा एक डरावने बचपन में ।
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युग-चिंता

कितनी पीड़ा सही होगी
ईसा के साथ उन हाथों ने
सच को मारने के लिये !

जिन्होंने ठोंकी थीं कीलें,
झूट,अन्याय, अत्याचार की
आतताइयों के आदेश पर
ईसा के हाथों और पैरों में ।

दर्द सहा होगा हर नस में,
पर ज़्यादा न सहा होगा ईसा ने ।

हो सकता है, मेरे पूर्वजों ने
उस दर्द का हिस्सा किया होगा वहन
भीतर कायर की तरह
और तड़पा होगा, ईसा की तड़पन से भी अधिक
सही होगी पीड़ा,
ईसा की पीड़ा से भी अधिक
जब तक दर्द की अंतिम सांस
न हो गई होगी पूरी,

क्योंकि वह मजबूर थे
उन कीलों को गाड़ देने के लिये, ईसा में
और ईसा में थी ताक़त सहने की
हर मुसीबत, हर विरोध के साथ
इसीलिये मेरे पूर्वज नहीं बने ईसा
क्योंकि वह पंगु थे, ग़ुलाम थे ।
मेरे पंगु, ग़ुलाम  पूर्वजों ने सहा होगा
कितने ही दिनों तक
उस घिनौने कर्म को
और सहा होगा दु:ख मरती सत्यता का ।

आज मैं भी ऐसा ही घिनौने कर्म करना चाहता हूं !
मैं लिये फिर रहा हूं, सदियों से
अपने हाथों में कीलें और हथौड़ी
मेरे पास कीलें और हथौड़ी तो हैं
लेकिन एक बौझ और व्यर्थता के साथ !

मैं भी गाड़ देना चाहता हूं
हाथ और पैरों में कीलें
लेकिन कोई ईसा नहीं मेरे युग में
जिसके शरीर में ठोंककर कीलें
मैं उसकी सच्चाई को अमर बनादूं !

मैं जानता हूं,
मेरी यह तलाश
कभी न होगी पूरी
क्योंकि यहां ईसा हो ही नहीं सकता है कोई !

सब पंगु और ग़ुलाम हैं,
मेरे पंगु, ग़ुलाम  पूर्वजों की तरह !!!

इसलिये कभी बड़ी ही चिंता के साथ
मैं हँस देता हूं ख़ुद पर
और कहता हूं, ख़ुद से
क्यों व्यर्थ काम की तलाश है तुझे
और मैं मान भी लेता हूं
यह काम जीतेजी
कभी नहीं कर पाऊंगा !!!  
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वक़्त अच्छा हो जाए 

कोई औपचारिकता नहीं
इसलिये बने बनाए शब्दों का
सहारा भी नहीं.....

मैं नहीं चाहता कि
बरसों के घिसे-पिटे शुभकामनाओं
के शब्दों को
फ़िर से थोप दूँ तुम पर
जैसा दुनिया करती आई है ।

मैं नहीं देता हूँ तुम्हें....
कोई बधाई या शुभकामनाएँ,
"इस अशुभ समय में"
अगर दूँ तो महज़ यह एक दिखावा होगा ।

समय की बहती नदी
और उसके माप की एक कोशिश
समय गणना (केलेंडर)
तुम्हें एक नये वक़्त का आभास देता होगा ।

मगर यह सच नहीं
वक़्त नहीं बदलता....
हम बदल जाते हैं
और हमारे बदलने को
वक़्त बदलना कह देते हैं ।

इसलिये ख़ुद को बदलो
और समय को बदल दो,
समय लाता नहीं कुछ तुम्हारे लिये
तुम ही लाते हो
ख़ुद के लिये सब कुछ ।

इसलिये इस नये साल पर
नहीं कहूँगा, वह सब कुछ
जिसे दुनिया दोहराती है

मेरी तो इतनी ही पुकार है....
आज से हम
और भी अधिक भीतर से
हो जाएँ
पावन, विनत, सदय, सहज, और समर्पित
ताकि वक़्त अच्छा हो जाए !!! 


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' मोतीराम का लोकतंत्र '

बूनता है जब तो
बड़ी ही तल्लीनता के साथ
बुनाई करता है।
चार आधार रखता है
और शुरू करता है बूनना
कई लचकदार तीलियों से।
उसकी तीलियों में जितनी है लचक,
उससे कहीं अधिक लचक है उसकी अँगुलियों में।
वो सधी हुई ऐसी हैं
जैसे ट्रेन की पटरियाँ।
बूनता है जब धीरे,धीरे तो
और भी आधारों को उनमें जोड़ देता है
ताकि रूप और मज़बूती न हो ख़त्म।
कई बार घुमा-घुमा कर
जोड़ता चला जाता है कई तीलियाँ,
अनवरत चलते हुए हाथ
तबतक नहीं थमते,
जबतक उसे पूर्ण आकार
उसको संतुष्टि के साथ न मिल जाए।
उसको दिखाई नहीं देता
बस एक अँधरे क्षितिज को देखते हुए ही बूनता है टोकरी,
आँखों का है अंधा
नाम है मोतीराम
पर ग़ज़ब का  है हुनरबाज़ ।
मुझे पता है उसकी टोकरी का क्या मूल्य है !
कम से कम इस लोकतंत्र से तो अधिक मूल्यवान है !
जिसे लोग सिर पर लिए ढोते हैं।
उस मोतीराम और उसकी टोकरी से
कभी नहीं की जा सकती है तुलना लोकतंत्र की
और उसके बूनने वाले की,
क्योंकि लोकतंत्र बूनने वालों ने
खुली आँखों से बूना
और बड़ी चालाकी के साथ !!!

मोहसिन 'तन्हा'          
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष 
एवं शोध निर्देशक 
जे. एस. एम्. महाविद्यालय,
अलीबाग- 402201 
ज़िला - रायगढ़ (महाराष्ट्र)

ई-मेल khanhind01@gmail.com
मो-09860657970


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