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शोध:उदय प्रकाश की कहानियों में जादुई यथार्थवाद/ डॉ. सीमा सिंह

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मई 14, 2014 | बुधवार, मई 14, 2014

                 साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
    'अपनी माटी'
         (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
    वर्ष-2 ,अंक-14 ,अप्रैल-जून,2014

चित्रांकन :शिरीष देशपांडे,बेलगाँव 
उदयप्रकाश अपनी कथा पीढ़ी में जादुई यथार्थवाद और कुछ अनोखे चरित्र सामने लाने के कारण अधिक लोकप्रिय हुए। इनकी कहानियों के विकास को देखकर सबसे पहले यह लगता है कि शुरू की उनकी कुछ कहानियाँ आशावादी हैं और बाद की प्रायः निराशावादी हैं। इन मामलों का संबंध उदयप्रकाश के कितने निजीपन से है और कितना सार्वभौम सच्चाइयों से है, इस पर विवाद हो सकता हैं फिर भी इसमें संदेह नहीं है कि उदयप्रकाश ने भारतीय जीवन के बदलते यथार्थ को उसकी जटिलताओं के साथ उद्घाटित किया है। निश्चय ही उनकी कहानियाँ सरल रेखा नहीं हैें। उनमें बिना किसी पूर्वग्रह के पूरी संवेदनशीलता के साथ पैठने की जरूरत हैं.

उदयप्रकाश की कहानियाँ समासामयिक परिस्थितियों, संवेदनाओं तथा सामाजिक दायित्वबोध से पैदा हुई कहानियाँ हैं। इनकी कहानियों में जीवनानुभव अपनी भाषिक-शैल्पिक पुनःसृजन में विविधता और वैभव के साथ उजागर होता है। कहानीकार उदयप्रकाश के विषय में कहा जाता है कि उन पर लैटिन अमेरिकी लेखक मार्क्वेस-बार्खेस के जादुई यथार्थवाद का असर है। राजेन्द्र यादव ने इस मुददे पर खासतौर पर बल देते हुए कहा है कि उन पर मार्क्वेस का प्रभाव है। उदयप्रकाश ने इस संदर्भ में अपना पक्ष स्पष्ट किया है, ‘‘इतिहास में आख्यान या यथार्थ में कल्पना के संश्लेष की यह पद्धति किसी मार्क्वेस की नहीं हजारी प्रसाद द्विवेदी और मेरी है।‘‘1

इसमें संदेह नहीं है कि जादुई यथार्थवाद की अपनी एक भारतीय परंपरा भी रही है। इसके बावजूद यह स्वाभाविक है कि उदयप्रकाश की शिल्पविधि पर लैटिन अमेरिकी जादुई यथार्थवाद का भी असर पड़ा हो। यह जरूर है कि उदयप्रकाश ने जादुई यथार्थवाद का रचनात्मक इस्तेमाल एक शिल्पविधि के रूप में किया है, विचारधारा के रूप में नहीं। उनकी कहानियों की सबसे अच्छी बात यह है कि उनके शिल्प और जटिल बनावट को एकबार समझ लेने के पश्चात उनकी कहानियों को समझने में दिक्कत नहीं होती है। ये कहानियाँ आम पाठकों को एक नए ढंग का कथात्मक आनंद देती हैं और उन जटिल स्थितियों को भी उजागर करती हैं जिनमें पाठक कैद होता हैं।

उदय प्रकाश जी 
एक तरफ उदयप्रकाश की कहानियाँ कहीं गहराई से उपभोक्ता समाज की बिडंबनाओं से जुड़ी हैं । ये इस समाज में फँसे आम आदमी की संघर्ष चेतना, शोषण-विरोधी स्वर और आशा के साथ खड़ी दिखाई पड़ती हैं। दूसरी तरफ ये कहानियाँ मौजूदा बाजारतंत्र में फँसे, बेबस, टूटते और दमनकारी परिस्थितियों में निराश लोगों की चेतना से जुड़ी हैं। इनकी कहानियों में आम मनुष्य जीवन की ही तरह आशा और निराशा के साथ जीवन जीते चरित्र नजर आते हैं। उनकी आरंभिक कहानियों में ‘टेपचू‘, ‘हीरालाल का भूत‘ और ‘छप्पन तोले का करधन‘ उल्लेखनीय हैं।

उदयप्रकाश की जिन आरंभिक कहानियों में वर्गचेतना और आशावाद की झलक मिलती हैं उनमें प्रमुख हैं ‘टेपचू‘ और हीरालाल का भूत‘। ‘टेपचू‘ बिना बाप का बेटा ह,ै जिसे उसकी माँ फिरोजा ने बड़ी तकलीफ से पाला-पोषा है। टेपचू का पिता अब्बी नदी में स्थित किसी कुइयाँ में पैर फँस जाने से डूब कर मर जाता हैं। यहीं से टेपचू की जिंदगी के संघर्ष की शुरूआत होती है। भूख ने उसको भीतर एक गजब का साहस भर दिया था -‘‘नीद खुली तो आंतों में खालीपन था पेट में हल्की सी ऑंच थी भूख की। बहुत देर तक वह योें ही पड़ा रहा, टुकुर-टुकुर आसमान ताकता रहा। फिर भूख की ऑंच में जब कान से लरे तक गर्म होने लगे तो सुस्त सा उठकर सोचने लगा कि अब क्या जुगाड़ किया जाए।‘‘2 टेपचू को जिंदा रहने के लिए रोज एक लड़ाई लड़नी पड़ती है। कमलगट्टे के लिए वह छोटा सा बालक गहरे पानी में पैठ जाता है और एक व्यक्ति परमेसुरा उसे डूबने से बचाता है। टेपचू होश में आते ही उस व्यक्ति से कमलगट्टे तोड़ देने का निवेदन करता है भूख ने उसके अंदर से लोग-बाग, समाज, भूत-प्रेत का ही नहीं, मौत का डर भी खत्म कर दिया थां। ताड़ी के लिए बिना किसी साधन के पेड़ पर चढ़ने और उस पर से गिरने पर भी वह नहीं मरता, न ही किसनपाल के गंुडों द्वारा पीटकर सोन नदी में फेंकने पर ही मरता है। वह शहर जाकर मजदूरों की हक की लड़ाई में पुलिस के अत्याचार या गोली से भी नहीं मरता है।

टेपचू एक ऐसे वर्ग का चरित्र है, जो सामंती व्यवस्था से लेकर पूंजीवादी व्यवस्था तक लड़ता हैं । हर युग में टेपचू‘ जैसे लोगों के माध्यम से यह संघर्ष चेतना जीवित है बची रहती हैं ‘टेपचू‘ जनता की ताकत है। वह बदलने और लड़ने की ताकत है। वह एक ऐसी चेतना है, जो कभी नष्ट नहीं होती। संघर्षजीवी समुदाय की कभी मृत्यु नहीं हो सकती, ‘‘जितने भी लोग, ‘टेपूच‘ को जानते हैं, वे यह मानते हैं, कि ‘टेपचू‘ कभी मरेगा नहीं साला जिन्न है। ‘‘3 आगे चलकर उसी का एक नया अवतार ‘हीरालाल के भूत‘ के रूप में होता है। ठाकुर हरपाल सिंह और मलखान चौधरी जैसे लोगों के शोषण का शिकार हीरालाल मरकर भी विरोध करना नहीं छोड़ता। वह भूत बनकर अत्याचार का बदला लेता है। कहानीकार ने इन दोनों कहानियों में निम्नवर्गीय मनुष्य की जिजीविषा और संधर्ष की क्षमता को हमारे सामने रखा है।

उपभोक्ता समाज अन्य पंूजीवादी समाजों की तरह एक विषमतामूलक समाज है, जो अमीर हैं, वे अधिक अमीर बनते जा रहे हैं। उनका भोग-विलास लगातार बढ़ता चला जा रहा हैं पर हम देखते है कि निम्नवर्ग की हालत वैसी ही है। वह आज भी शोषित है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मजदूरों को उनका हक नहीं मिल रहा है और विद्रोह की आवाज बेअसर हो गई है। निश्चय ही उपभोक्ता समाज सामंती आकांक्षाओं का भी पोषण करता है इस दृष्टि से देखा जाए तो ‘टेपचू‘ और ‘हीरालाल का भूत‘, जमीदारी सामंती व्यवस्था के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखता है। उदयप्रकाश ने ऐसे सकारात्मक चरित्र बाद में नहीं उठाए।

उदयप्रकाश की एक कहानी है ‘छप्पन तोले का करधन‘। इसमें मानवीय संवदेनहीनता और लालसा का वह रूप दिखाई पड़ता है, जो स्वाघीनता के पश्चात पूँजीवादी जनतंत्र की वजह से बढ़ गई थी। लेखक ने इसी पूँजीपरक समाज की ओर इंगित किया है। इस कहानी का वाचक एक छोटा बच्चा है और उसकी दृष्टि से ही कहानी को पाठक के समक्ष रखा गया है। ‘‘दीवाली की रात उन्होंने दादी को छप्पन तोले का करधन दिया था सोने का उसी साल आजादी मिली थी, उसी साल दादा लौटे थे, लेकिन उसी साल वे बीमार हो गए थें ‘‘4 यह छप्पन तोले का करधन कुछ और नहीं था, स्वाधीन भारत से जुड़ा आमलोगों का सपना था । लोगों ने जो सपने देखे थे वे सब एक-एक कर टूट रहे थे। पूँजीवाद ने उन सपनों को चकानाचूर कर दिया था। स्वतंत्रता का लाभ कुछ अवसरवादी लोगों को ही मिला था। उनका सत्ता पर एकाधिकार हो गया था। यह विशेष वर्ग शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य बुनियादी क्षेत्रों में उपलब्ध अल्प सुविधाओं को स्वाभाविक रूप से केवल अपने लिए सुरक्षित रखना चाहता था। बाकी लोगों को इन सबसे वंचित रखा गया था। इसका असर यह पड़ा कि देश स्वाधीन होकर भी देश के लोग गुलाम थे, वे किसी न किसी घरेलू उपनिवेश के शिकार थे।

छप्पन तोले का करधन भी ऐसे ही एक मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है, जिसकी स्थिति देश आजाद होने के पश्चात धीरे-धीरे बिगड़ती जाती है और अंदर ही अंदर पूरा परिवार खोखला होता जाता है। इस विपन्नावस्था से निकलने का एकमात्र आस मा,ँ पिताजी बुआ, चाची सभी के लिए छप्पन तोले का करधन ही बच गया था। उसी आस में सभी ने बूढ़ी माँ को जिलाये रखा था। भारतीय जनता भी इसी आशा में जीती रहती है कि शायद एक दिन उनकी स्थिति विकास से सुधर जाए। 

देश में फैली पँूजीवादी मानसिकता ने मानवीय रिश्तों के बीच कभी न भरने वाली खाई का निर्माण  किया है। इसी मानसिकता से प्रभावित ‘छप्पन तोले का करधन‘ कहानी में पूरा परिवार मिलकर करधन के लालच में अलग-अलग तरह से माँ को यातनाएँ देता है। उस धन की आस ने उनकी भावनाओं को सोख लिया है, सभी ने अपने ‘‘दिल की जगह पर लकड़ी का चौकोर टुकड़ा लगा रखा है। ‘‘5 पूँजीवादी युग में माँ एवं अन्य रिश्तों की गरिमा खो गई हैं छप्पन तोले के करधन की वजह से माँ को उसके अपने ही बेटे शत्रु समझने लगते हैं। इस लालच में बेटे अपने घर की बुनियाद खोद डालते हैं। आम जनता को भी उपभोक्तावाद ने ऐसे ही लालच में फँसा डाला है, जहाँ उनकी उपभोग की लालसा उनकी ही बुनियाद खोद रहा है। उदयप्रकाश ने इस कहानी में खोते जा रहे पारिवारिक और मानवीय संबंधों और जड़विहीन होती जा रही मानवीय जिंदगी का चित्र खींचा है।
आज उपभोक्तावादी संस्कृति के बिंब छलनामय हो गए हैं। यथार्थ ही हमारे सामने यथार्थ बनकर घूम रहा है। यह आभासी यथार्थ का युग है। कहानीकार उदयप्रकाश ने इसी आभासी यथार्थ का प्रयोग अपनी कहानियों में किया है। उन्होंने लोहे को काटने के लिए लोहे का प्रयोग किया है। उनकी एक कहानी है तिरिछ। एक बच्चा अपनी फैंटेसी की दुनिया के द्वारा पूँजीवादी समाज के यथार्थ को व्यक्त करता है। तिरिछ एक ऐसा जीव है य जिसके काटने पर व्यक्ति को तत्काल कुछ महसूस नही होता, उसका जहर धीरे-धीरे अपना असर दिखाता है। ’’वह तिरिछ है, काले नाग से सौ गुना ज्यादा उसमें जहर होता है। उसी ने बताया कि सांॅंप तो तब काटता है य जब उसके ऊपर पैर पड़ जाए या जब कोई जबरदस्ती उसे तंग करे। लेकिन तिरिछ तो नज़र मिलते ही दौड़ता है। पीछे पड़ जाता है। उसमे बचने के लिए कभी सीधे नही भागना चाहिए। टेढ़ा-मेढ़ा, चक्कर काटते हुए, गोल-मोल दौड़ना चाहिए।’’6

कहानीकार ने यहॉं बताना चाहा है कि सामंतवादी युग सॉंप के समान था जब तक व्यक्ति उसे छेड़े नहीं अर्थात् कोई उसके खिलाफ विरोध की आवाज न उठाए तब तक वह आम मनुष्य को काटता या उसके विरोध को कुचलता नहीं है। तिरिछ उस बाजारवाद का प्रतीक है, जिसका प्रभाव हमारे समाज को विकृत कर रहा है। पूॅंजीवादी युग ने चारों ओर बाजार का ऐसा चकाचौंध फैला दिया है कि मनुष्य उसके सम्मोहन में बंॅंधने को मजबूर है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण विज्ञापन है। बाजार ने विज्ञापनों का जाल हमारे चारो ओर फैला रखा है ये विज्ञापन मनुष्य के विवके को कैद करने की एक कला है। यह मनुष्य के विवेक बुद्धि को तब तक कैद करके रखता है, जब तक इससे अपना लाभ नहीं कमा लेता है। अनजाने में भी मनुष्य की नजरें तिरिछ से मिल ही जाती हैं। मनुष्य के पास बाजारवादी तिरिछ से बचने का एक ही उपाय है, वह है अपने ज्ञान, विवक, चेतना और संवेदना पर भरोसा करना। यही वह टेढ़ा-मेढ़ा चक्कर या गोल-मोल दौड़ है, जिसके द्वारा इस बाजारवाद के व्यापक प्रभाव से कुछ समय के लिए बचा जा सकता है।

बाजारवादी जहर ने मानवीय रिश्तों और मूल्यों में व्यापक क्षरण ला दिया है । पिता शहर के नहीं गाँव के रहने वाले थे। किसी केस के सिलसिले में शहर गए थे। शहर में पिता अर्द्धबेहोशी की हालत में अपना रास्ता भूल जाते हैं। कहानीकार ने हमे यह बताया है कि शहरीकरण पूँजीवादी विकास का ही एक रूप है, जहाँ भौतिक सुखों से भरा व्यक्ति अपनी ही मौजमस्ती में लीन है। अत्यधिक उपभोग की लालसा ने उन्हे संवेदनहीन बना दिया है। पिता संवेदनविहीन मनुष्यों के बीच सारे शहर में असहाय सा भटकते रहते हैं और आखिरकार मर जाते हैं। ‘तिरिछ‘ के पिता के सच्चे शब्दों को कोई नही सुन पाता। बाजार में आदमी की आवाज का कोई असर नही है। नतीजे सामने देखकर भी समस्या को लेकर कोई बेचैनी नहीं है, शहर में ठंडापन है। कहानी के अंत में पिता का चेहरा मरते समय जिस तरह विकृत हो गया था, वह और कुछ नही इसी समाज का विकृत चेहरा था। कहानी के विभिन्न स्थलों से गुजरते हुए पाठक जब अपने ही चेहरों को आईने में देखता है, उसके मस्तिष्क के तंतु झनझना उठते हैं। उदयप्रकाश का इसमें रोष झलकता है, पाठक निराशा से भरा हुआ है। उन्होंने इसे स्वीकार करते हुए कहा है-’’यह हताशा से उत्पन्न गुस्सा है।’’7 इस तरह तिरिछ कहानी समाज के विकृत होते जा रहे चेहरे से पाठक को रूबरू करती है।

दुनिया में उपभोक्ता समाज ने जितना विस्तार बाजार के बल पर किया है,उसका उतना ही गहरा प्रभाव मनुष्य को सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर पड़ा है। उसकी आंकाक्षाओं ने कभी न खत्म होनेवाली महत्वाकांक्षाओं का रूप धारण कर लिया है। उदयप्रकाश की कहानी ‘पॉल गोमरा का स्कूटर‘ में रामगोपाल सक्सेना का अपना नाम बदलकर पॉल गोमरा करना विशिष्टता की आकांक्षा है, पर उसकी परिणति बहुत सामान्य होती है। सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास ष्मुझे चाँद चाहिए ष् में यशोदा शर्मा इसी आकांक्षा से ष्वर्षा वशिष्ठ ष् बन जाती है।

कहानी में महत्वाकांक्षा का सार्वभौम रूप तब दिखाई पड़ता है, जब पॉल गोमरा प्राविडेंट फंड से रुपया निकाल कर स्कूटर खरीदता है। जिस तरह गोदान में गाय की आकांक्षा कृषि समाज से जुड़ी हुई है, उसी प्रकार पॉल गोमरा का स्कूटर खरीदने की आंकाक्षा उपभोक्ता समाज से जुड़ी हुई है। आज बाजार इसी महत्वाकांक्षा को अपने फायदे के लिये भुनाता है। बाजार की इसी मायावी दुनिया में किशनगंज के एक सफाई कर्मचारी की बेटी सुनीला और छपरा की प्राइमरी स्कूल की टीचर आशा मिश्रा जैसी लड़कियाँ फँस जाती है। विज्ञापन एजेंसियाँ उनके देह का बाजारीकरण कर लोगों की कामुकता का बढ़ावा देती हैं। उदयप्रकाश कहते हैं, ‘‘ सुनीला रातोंरात मालामाल हो गई थी । टी.वी. के विज्ञापन में वह आठ फुट बाई चार फुट साइज के विशाल ब्लेड के मॉडल पर नंगी सो गई थी। सुनीला को अपने चेहरे पर उस ब्रांड के ब्लेड से होने वाली सेविंग चिड़ियों के पर के स्पर्श से उपजने वाले सुख और आनंदातिरेक को दस सेकंड के भीतर व्यक्त करना था । ‘‘8

वैश्वीकरण के जमाने में कंपनियां अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए मनुष्य की कृत्रिम इच्छाओं को जरूरत में बदलने में लगी रहती हैं। उनका हथियार आशा मिश्रा और सुनीला जैसी लड़कियाँ बनती हैं हालाँकि ऐसी लड़कियों की परिणति ’यूज एंड थ्रो‘ जैसी वस्तुओं में होती है। आज ंस्त्री को एक ब्रांड या उत्पाद के रूप में देखना मीडिया व्यवसाय का बीज पद बन गया है। विज्ञापन की जादुई दुनिया के आक्रमण के शिकार आज सभी है। अपनी अचार, चटनी, पापड़, मठरी, लस्सी छाछ को भूलकर आज की नई पीढ़ी चिप्स, सॉस, जैम, नूडल्स, पिज्जा, कोल्ड ड्रिंक के पीछे दौड़ रही है। इनके उपभोग भर से वे आधुनिक और जीनियस बन जा रहे है। पॉप कल्चर का ऐसा प्रभाव है कि पॉल गोमरा का बेटा मंटू जिसे परसांे पैर में मोच आई थी, वह अब सब भूलकर मेडोना के गाने पर डांस कर रहा था। उसकी पत्नी कपड़ांे और साज-सज्जा द्वारा मशहूर मॉडल मेहर जेसिया बनी हुई थी । पॉल गोमरा को ऐसा आभास होता है, वह पत्नी के साथ नहीं , बल्कि मेेहर जेसिया के सथ सहवास कर रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि बाजार एक आभासीय यथार्थ हमारे सामने रखता है। आज जीवन की सार्थकता की कसौटी बाजार की वस्तुएँ बन गई हैं। बाजार ने जनसंचार माध्यमों द्वारा उपभोक्ताओं को मानसिक रूप से इस तरह नियंत्रित किया है, जिससे उनमें ज्यादा से ज्यादा उपभोग की वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा प्रबल हो । उधार लेकर भी सभी अपनी कृत्रिम इच्छाएं पूरी करने में लगे हुए हैं। एक तरफ मनुष्य की कृत्रिम इच्छाएं बढ़ी हैं, दूसरी तरफ उसकी जिंदगी में अतृप्ति बढ़ी है। 

आज पूँजी ने कला को भी अपने कब्जे में कर रखा है। कोई कलाकार तब तक प्रतिष्ठित नहीं हो सकता, जब तक उसे बड़े-बड़े पूँजीपतियों द्वारा सम्मान नहीं मिलता । इसका लाभ ‘पॉल गोमरा के स्कूटर‘ कहानी के पद्मश्री सचिव जैसे प्रशासनिक अधिकारी उठाते है। उनका कवि के रूप में सम्मान मोकांजी ग्रुप की कंपनी करती है, जो कभी किसानों का शोषण कर नील की खेती करवाया करती थी । इन सबके माध्यम से एक खास तरह से उपभोक्तावादी मूल्यों की स्थापना की जाती है। इन सबके बीच एक सच्ची रचनात्मक प्रतिभा अंततः कही गुम हो जाती है। पॉल गोमरा जैसे कवि हाशिए पर आ जाते हैं । वे आज के समय में अनफिट सा महसूस करते हुए पूँजी की सत्ता के समक्ष अकेेले अपने भीतर घुटते दिखाई देते हैं। कहानी में पॉल गोमरा की यह कविता मिलती है - 

‘ मैं नहीं बन सका सीवेज पाइप ।
अपने भीतर से नहीं गुजर जाने दूंगा मैं ।
ये सारा कीचड़, इस बूढ़ी सदी की निष्ठा ।। 9

समाज के भ्रष्ट लोगों के प्रति पॉल गोमरा का जो क्षोभ है, उसके भीतर ही हुमड़ कर रह जाता है । वह कोई सार्थक विद्रोह का रूप धारण करने के बजाय बुझ-सा गया है । पॉल गोमरा एक हास्यस्पद विद्रूप-सा बन जाता है ।  

उदयशंकर की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का सॉंड‘ एक रूपक कथा है । इस कथा में इतिहास का मिश्रण है । वारेन हेस्टिंग्स के समय के इतिहास को समकालीन समस्याओं से जोड़ा गया है । वारेन हेस्टिंग्स का प्रसंग कुछ औपनिवेशिक समय की भारतीय स्थितियों का अनावरण है और उसका कुछ संबंध आज की दशाओं में स्वाधीनता से संबंधित चिंताओं से है । आज जब साहित्य का अन्य कलाओं के साथ अन्तर्संबंध टूट गया है, कहानीकार ने साहित्य को अन्य कलाओं के साथ जोड़ने की कोशिश की है । उन्होंने इसमें चि़त्रात्मकता‘का प्रयोग किया है, जो युग की परिस्थिति को ठीक से समझने और परिवेश की वास्तविक झलक प्रस्तुत करने में सहायता करती है । कहानी को चि़त्रों से जोड़ना हमें प्राचीन युग से चली आ रही कलाओं के संगम की याद दिलाती है ।

आज से तीन सौ साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी जिस उद्देश्य को सामने रखकर काम कर रही थी, आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी वही काम कर रही हैं । दोनों का एकमात्ऱ लक्ष्य पॅूजी के बल पर मुनाफा कमाना है । स़त्रहवीं शताब्दी में भारत आनेवाले डच, पुर्तगाली, फ्रेंच और ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह ही नई विदेशी कंपनियों के हाथों भारतीय संप्रभुता या स्वतंत्रता को नई गुलामी की ओर धकेलने के प्रतिपक्ष में यह कहानी खड़ी होती है ।

वारेन हेस्टिंग्स पहले पहल भारत को ताज्जुब और विस्मय से भरकर देखा करता था, धीरे-धीरे वह उन सबके साथ घुल-मिल जाता है । वह भारतीय कला, धर्म और मनुष्यों के प्रति लगाव और अभिरुचि दिखाता है । उसका उद्देश्य इन सबकेे महत्व को जानना नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक अत्याचार को ढकने का एक तरीका था । बंुतु के साथ भारतीय    शिल्पकृतियॉं देखते समय उसे शेक्सपीयर द्वारा लिखित एक पंक्ति याद आती है - ‘‘इफ यू हैव टु डिफीट देम, यू हैव टू किल देयर मेमरीज । यु हैव टु डिस्ट्राय देयर पास्ट यू हैव टु  शूट देयर स्टोरिज। ‘‘10 वारेन हेस्टिंग्स यहॉं के लोगों को उनके अतीत से काटकर उनको बदलना नहीं चाहता, बल्कि इंडिया को उनके जैसे लोगों में ही बदल डालना चाहता है ।  बुन्तु के साथ उसका सखा-भाव भी छलावा था । हेस्टिंग्स का कहना था कि भारत एक पूर्ण जनतॉंत्रिक राज्य बनेगा, लेकिन वह आज के उपभोक्तावादी युग के समान ही भारत को उपभोग्य वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे । उसके नेटिव शब्द में भारतीयों के प्रति एक प्रकार की घृणा की भावना छिपी हुई थी । चोखी के प्रति उसका प्रेम भी प्रेम के पीछे छिपे कामुकता को दर्शाता है । उन्होने चोखी का राधा-कृष्ण के आड़ में धार्मिक शिकार किया । भारत के धर्म, साहित्य और दर्शन की खोज के लिये उसकी केवल बाहरी छवि है, इन सबके पीछे नृशंसता छिपी हुई थी । 

लेंटन, डाउनटेन, फ्रेडरिक जैसे चरित्र पाश्चात्य गंदी नालियों के कीड़े हैं, जिन्हें इंग्लैंड का समाज अपने यहाँ रखना नहीं चाहता है । वे उस समाज के निकाले हुए व्यक्ति हैं, जो अपने जैसे लोगों की ही जमात तैयार करते हैं । यूरोप में रिनेसॉ आ चुका था, पर ये ब्रिटिश लोग वहॉं का कुछ भी ‘अच्छा‘ नहीं दे पाते हैं । वे यूरोप की दौलत के पूँजीवादी नशा का प्रतिनिधित्व करते है । वे अपने नशे में सुविधाभोगी मध्य वर्ग का शिकार करते हैं । मोहिनी और उसका परिवार भी इसी पूूँजी के दल-दल में फॅंसा हुआ था । लेंटन के प्रेम में पड़कर मोहिनी को महसूस होता है -- ‘‘जैसे मेरी नसों में सारे यूरोप की गंदी नालियों का विषाक्त उच्छिष्ट बह रहा है। ‘‘11 पर वह चाहकर भी इस दल-दल से बाहर नहीं निकल पाती । उदयप्रकाश इसी उपभोक्ता समाज में रहते हैं, उन पर भी इसका प्रभाव किसी न किसी रूप में पड़ा है। उन्होंने चोखी के वक्षों पर वारेन हेस्टिंग्स द्वारा चित्र बनाने का और मोहिनी ठाकुर का अंग्रेज अफसरों के साथ काम मुद्राओं का बड़े ही लजीज और चटपटे ढंग से वर्णन किया है। साहित्य में इस तरह मजा लेना उपभोक्तावादी संस्कृति का ही एक लक्षण है । 

वारेन हेस्टिंग्स ने भारत को लूटने के लिये यहॉं का नक्शा बनवाया है । वह उसे नई दुनिया में ले जाना चाहता है, अर्थात इसे कंपनी का उपनिवेश बनाना चाहता है । वह पुराने ढंग की औपनिवेशिक लूट के लिये भारत का नक्शा बना रहा था, जबकि आज उसी उद्देश्य से नक्शा विश्व बाजार में बनाया जा रहा है । आगे चलकर आजादी का प्रतीक बन सॉंड हमारे सामने आता है । उसके द्वारा वारेन हेस्टिंग्स का बग्घी उलट देना साम्राज्यवाद से लेकर उपभोक्तावाद तक शोषण और गुलामी के विरू़द्ध विरोध का वह स्वर है, जो आज भी हमारी संघर्शशील चेतना को जीवित रखे हुये है ।

उपभोक्तावाद पुराने अस्त्रों को एक नए रूप में हमारे सामने लाकर उपस्थित हुआ है । उपनिवेशीकरण के दौर में वह असंगठित रूप में काम करता था पर आज उसका रूप संगठित है। उपभोक्तावाद के कठोर हमले का जवाब देने के लिये आज विरोधी ताकतें भी खड़ी दिखाई नहीं दे रही हैं न ही ऐसी कोई विचारधारा है जो मनुष्य जीवन की आस्था, विश्वास और मूल्यों को दिन-प्रतिदिन उनके क्षय होने से बचाते हुये सामाजिक चेतना का प्रतिनिधित्व करे । पूॅंजी के इसी जाल में फॅंसी और सत्ता के पैरों के नीचे दबी आम आदमी की कहानी को उदयप्रकाश ‘मोहनदास‘ के रूप में हमारे सामने रखते हैं ।

‘मोहनदास‘ एक प्रकार से सत्ता विमर्श की कहानी है । समकालीन विमर्श सूचना और ज्ञान का ही एक रूप  है । यह ऐसी ताकत है, जिसकी बदौलत पूॅंजी मनुष्य के पास आ पा रही है । आज इसी ताकत के अधीन सारा विश्व है, इसी कारण सभी देशों की अपनी अलग स्वायत्तता नहीं रह गयी है, सभी इस न दिखने वाली पूूॅंजी की जंजीरों में बंधे हुये हैं । यह सत्ता विमर्श एक तरह का जीवन चक्र बन गया है, जिससे होकर हर एक को गुजरना पड़ता है ।

इसी जीवन चक्र के चक्रव्यूह में मोहनदास जैसा मेरिट पानेवाला दलित व्यक्ति अपना रास्ता तलाशते हुये भटकता रहता है और अपने परिवार की मूलभूत जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता है । कहानी का नायक मोहनदास है । वह दलित समाज का हिस्सा है और डॉ0 अम्बेडकर के --‘शिक्षित होवो, संगठित होवो, संघर्ष करो ।‘ 12 के पथ पर चलना शुरू करता है । वह बी.ए. में अव्वल भी आया, लेकिन उसका संघर्ष कोई सुनहरा भविष्य न पा सका । यह आरक्षण के युग में एक दलित की त्रासदी की कथा है । कहानी एक नये मोड़ पर ले जाती है, जो समाज में दमन का एक नया चित्र पेश करता है । मोहनदास का अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ एक ऐसा सवर्ण व्यक्ति उठाता है, जिसके पास ज्ञान, सत्ता, पूॅंजी ताकत से लेकर वह सब है जो आज के युग में आगे बढ़ने के लिय जरूरत सी बन गई है । यह आरक्षण की व्यर्थता को उजागर करती कहानी है । यातना यह है कि विसनाथ मोहनदास बनकर उसकी जगह नौकरी करने लग जाता है ।

वह मोहनदास से उसकी पहचान तक छीन लेता है। मोहनदास से जब कोई उसका नाम पूछता है, उसकी स्थिति अजीबो-गरीब हो जाती है। उसे समझ में नही आता कि वह क्या जवाब दे। यह स्थिति केवल मोहनदास की नहीं है, उसके जैसे अनेक व्यक्तियों की है।

मोहनदास जैसे लोगों को इस व्यवस्था ने जिंदा रहने का हक नहीं दिया है। ऐसा नही है, मोहनदास ने बिना लड़े ही परिस्थितियों से समझौता कर लिया हो। उसने इस युग की मांग के अनुसार टाइपिंग, कंपोजिंग और प्रिंट निकालने का काम सीखा, सरकारी बैंक से लोन लेकर स्वयं कुछ करने एवं शिक्षाकर्मी का अस्थायी काम के लिए दौड़ा, पर इन सबके बावजूद उसके हाथ कुछ नहीं लगा। मोहनदास अपनी स्थिति में कुछ भी बदलाव नहीं ला पाया, बल्कि उसके घर की स्थिति बद से बदतर होती गई। भूमंडलीकरण के आने से मोहनदास जैसे लोगों को एक फायदा यह हुआ कि बीच-बीच में उसे मोहनलाल मारवाड़ी की दुकान ‘विंध्यांचल हैंडीक्राफ्ट्स‘ से बांस और छींदी की चटाई खोंलरी और पकउथी बुनने का बड़ा आर्डर मिल जाता था। मोहनदास की गृहस्थी की रुकी गाड़ी थोड़ी देर के लिए चल पड़ती थी। भूमंडलीकरण के इस दौर में प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर उपयोग किया जाता है, जो चीज जहां अच्छा और कम लागत में बन जाए। इस सूत्र का प्रयोग मानव से लेकर वस्तुओं तक सब पर होता है। इससे होनेवाले लाभ का बड़ा हिस्सा बड़े-बड़े व्यापारियों के तिजोरी में जाता है। मोहनदास जैसे लोगों को थोड़ा-बहुत काम मिल जाता रहा है, पर इतना नहीं कि वह जिंदा रह सके।

उपभोक्तावादी युग में भी निम्नवर्ग पुराने सामंतवादी युगों की तरह शोषित है, केवल उसका बाहरी चोला बदला है। प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति‘ का दुखी चमार के समय का न होते हुए भी मोहनदास शोषित होने के लिए लाचार है। उसकी अभावग्रस्त स्थिति कहानी में इस रूप में उजागर हुई है - “मोहनदास का बाप काबादास जिसे पिछले आठ साल से टीवी है उसकी माँ पुतलीबाई जिसकी आँखे किसी मुफ्त नेत्र शिविर में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने के बाद अंधी हो चुकी है।” 13 इन पंक्तियों से हमें सरकारी अस्पताल में चल रहे भ्रष्टाचार का पता चलता है, जिसकी कड़ियों को उदयप्रकाश ने अपनी कहानी ’और अंत में प्रार्थना’ के डॉ0 वाकणकर वाले प्रसंग के साथ जोड़ते हुए दिखाया है।

यह व्यवस्था इंसान के जीवन के साथ किस तरह खिलवाड़ करती है। उदयप्रकाश ने इसे विभिन्न रूपों में दिखाया है। यह एक विडम्बना है कि एक ओर जनसंचार माध्यमों का गांव के कोने-कोने तक फैलाने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर लोग भूख और बीमारी से मर रहे हैं। मोहनदास की कहानी उन स्वयंसेवी संस्थाओं या एन.जी.ओ. के सच को भी उजागर करती है, जिसके पीछे पूंजीवाद अपने घिनौने चेहरे को छिपाकर रखता है। उपभोक्ता समाज में मनुष्यों की माननीय संवेदना और मूल्यों का लगातार क्षय होते देखकर कार्ल मार्क्स द्वारा कही बातें याद आती हैं कि ’पूंजीवादी व्यवस्था में ‘कैशकनेक्सस‘ यानी मुद्रा के लेन-देन के समीकरण सारे मानव संबंधों का स्थान लेने लगते हैं।’ एक ही समय में एक समुदाय पूंजी, सूचना और सत्ता के बल पर ऐशोआराम की सारी वस्तुओं का उपयोग कर लगातार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही है। दूसरी ओर मोहनदास जैसे निम्नवर्गीय लोग उपभोक्तावादी साम्राज्य के दलदल में फंसते जा रहे हैं, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से होनेवाले सारे दुष्परिणामों को इन्हें सहना पड़ रहा है।

इस दुनिया में सभी लोग आज की हवा के रुख के अनुसार ही नहीं चलते हैं, कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनके अंदर मानवीय संवेदना, मूल्य बचे हुए हैं। वे मोहनदास जैसे लोगों के हक की लड़ाई लड़ने में आज भी साथ दे रहे हैं। उदयप्रकाश ने इस कहानी में अपने पुराने अंदाज में फेंटेसी के माध्यम से यथार्थ को सबके समाने रखा है। उन्होंने मुक्तिबोध को जज बना दिया है। शमशेर बहादुर सिंह अनूपपुर में एस.एस.पी हैं । पब्लिक प्रोसीक्यूटर के रूप में परसाई दिखाई पड़ते है। यह कथा में नया प्रयोग है। इन सारे चरित्रों में उनके स्वभाव के अनुसार ही विवेकबोध, सत्य का साथ, सक्रियता, जुझारूपन आदि मानवीय गुणों की झलक दिखाई पड़ती है। वे लोग भी मोहनदास की स्थिति को बदल नही पाते। इस न्याय की लड़ाई में सत्ता और पूंजी के समक्ष निरूपाय एवं बेबस दिखाते हैं। 

डॉ. सीमा सिंह
कलकत्ता विश्विद्यालय से 
'उपभोक्ता समाज और 
समकालीन हिन्दी कहानी' 
पर शोध 
संपर्क पता:मकान नंबर-13,
उत्सव विहार कोलोनी,
हरिश्चंद्र मार्ग,रोहिणीपुरम,
रायपुर-492010 (छत्तीसगढ़)
मो-09804428969, 9302447958,
ई-मेल:drseemasingh.22@gmail.com
अंत में जाकर मोहनदास की स्थिति इतनी दयनीय और लाचारगी भरी हो जाती है कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी चीज उसकी पहचान ही मोहनदास के जीवन की सबसे बड़ी फांस हो जाती है। कहानी के नायक मोहनदास का नाम गांधी के नाम से साम्य रखता है । कहानीकार उनकी याद दिलाता है। साथ ही मोहनदास का गांव पुरबनरा भी पोरबंदर से ध्वनि-साम्य रखता है। इन सबके द्वारा उदयप्रकाश ने हमारे सामने गांधी द्वारा समाज में दलित वर्ग को बराबरी का दर्जा देने और उसके लिए सुनहरे भविष्य की याद दिलाई है । उन सपनों का देश आजाद होने के इतने वर्षों बाद भी क्या हश्र हो रहा है, यह भी देखने को मिलता है। उदयप्रकाश ने इस कहानी के बीच-बीच में टिप्पणियों का भी प्रयोग किया है जो कहानी को समकालीन गतिविधियों से जोड़ती हुई और भी यथार्थपरक बनाती हैं। ‘मोहनदास‘ कहानी के माध्यम से कहानीकार ने पूंजी और सत्ता के खिलाफ अपना प्रतिरोध समाज के सामने रखा है।

उदयप्रकाश की कहानियों की विषयवस्तु में उपभोक्ता समाज के यथार्थ की प्रधानता है। उन्होंने सामान्य जीवन पर उपभोक्ता समाज के यथार्थों का पड़नेवाले प्रभावों को बहुत बारीकी एवं कलात्मक्ता से दिखाया है। कुछ कहानियां जो मुख्यतः इसी विषयवस्तु पर आधारित है जैसे ’वारेन हेस्टिंग्स का साँड’, ’पॉल गोमरा का स्कूटर’, ’तिरिछ’, ’मेंगोसिल’ आदि। कुछ ऐसी है जो उपभोक्ता समाज पर केंद्रित नहीं है, पर उन कहानियों के चरित्र इससे प्रभावित लगते हैं। जैसे ’दत्तात्रेय का दुःख’, ’और अंत में प्रार्थना’, मोहनदास आदि। उनकी कहानियों की विशेषता है कि उपभोक्ता समाज हो या जीवन की कोई और बिडंबनायुक्त व्यवस्था, उदयप्रकाश इसमें किसी न किसी स्तर पर प्रतिरोध की सृष्टि करते हैं।

संदर्भ-सूची

1. उदय प्रकाश, अपनी उनकी बात, वाणी प्रकाशन 2008, पृष्ठ-27
2. उदय प्रकाश दरियाई घोड़ा, वाणी प्रकाशन, 2006 पृष्ठ-103
3. वही पृष्ठ 107
4. उदय प्रकाश, तिरिछ, वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली 2001, पृष्ठ-50-51
5. वही पृष्ठ-50
6. वही पृष्ठ-25
7. उदय प्रकाश, अपनी उनकी बात, वाणी प्रकाशन 2008, पृष्ठ-145
8. उदय प्रकाश पॉल गोमरा का स्कूटर, वाणी प्रकाशन 2004, पृष्ठ-38
9. वही, पृष्ठ-66
10. वही, पृष्ठ-113
11. वही, पृष्ठ-125
12. उदय प्रकाश, मोहनदास, वाणी प्रकाशन 2006 पृष्ठ-79
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुंदर ढंग से पूरा उदय प्रकाश पढ़ा दिया आपने।
    धन्यवाद।

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