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आलेख:टूटते परिवार, ढीलते संबंध और विकृत होती मनोवृति /डाॅ. रामाशंकर कुशवाहा

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मई 14, 2014 | बुधवार, मई 14, 2014

                 साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
    'अपनी माटी'
         (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
    वर्ष-2 ,अंक-14 ,अप्रैल-जून,2014


चित्रांकन :शिरीष देशपांडे,बेलगाँव 
‘मित्रो मरजानी’ कृष्णा सोबती की प्रतिनिधि रचनाओं में से एक है। यह रचना बनावट और बुनावट के साथ अपनी चरित्र योजना के लिए काफी चर्चित रही। रचना की प्रमुख पात्र ‘मित्रो’ के जिस रूप को लेकर पाठक-आलोचकों की अच्छी-बुरी प्रतिक्रिया देखने को मिली, अन्ततः वह भी किसी न किसी समाज की ही उपज है। यह अलग बात है कि उस तरह के चरित्र को हम सहन नहीं कर पाते, जो प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं। वह प्रतिक्रिया, जो मित्रो देती है, आज का सिनेमा उसे खूब भुना रहा है। लेकिन जब मित्रो का जन्म हुआ तब वह दौर था, जहां स्त्री सबकुछ कर सकती थी, प्रतिक्रिया नहीं दे सकती थी। तमाम समाज सुधार के आन्दोलनों और दावों के बाद भी उदारीकरण से पहले स्त्री सभ्य, सुशील, कोमल, अबला आदि जैसे विशेषणों से ही नवाजी जाती रही। उसके कर्मठ होने का उदाहरण केवल अपवाद ही था। लेकिन साहित्यकार सामाजिक स्वीकृति न मिलने के बाद भी स्त्री के स्वतंत्र और उन्मुक्त रूप का चित्रित कर रहे थे। शायद उन्हें इस बात का एहसास था कि भविष्य संवारने के लिए स्त्री को नए प्रतिमान बनाने ही पड़ेंगे। कृष्णा सोबती स्त्री-विमर्श यो कहें कि स्त्री-सशक्तिकरण की भूमिका तैयार करने वाले रचनाकारों में से ही एक हैं। वह जाने-अनजाने ‘मित्रो मरजानी’ की मित्रो के माध्यम से मूकों को ज़बान देने का ही कार्य करती हैं। 

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो यह सत्य है कि व्यक्ति और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार व्यक्तियों से समाज का निर्माण होता है, उसी प्रकार समाज व्यक्तियों का भी निर्माण करता है। शिशु के रूप में व्यक्ति जिस ‘परिवार’ संस्था में जन्म लेता है वह समाज की ही इकाई है। समाज में हिस्सेदारी निभाने की शिक्षा उसे परिवार से ही मिलती है। परिवार के माध्यम से व्यक्ति समाज से जुड़ता है और समाज व्यक्ति से जुड़ता है और यह कार्य समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से संभव हो पाता है। निष्कर्षतः समाज और व्यक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। समाज के ही कारण व्यक्ति अकेले रहते हुए भी अकेला दिखाई नहीं पड़ता।


जिस प्रकार समाज से मनुष्य का गहरा संबंध है, इीक उसी प्रकार साहित्य का भी समाज से गहरा संबंध है। रचनाकार की पृष्ठभूमि उसके अपने समाज से ही बनती है। रचनाकार सदैव प्रगतिशील होता है और वह अपनी रचनाओं के माध्यम से भूत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य का निर्माण करता है। फिर साहित्यिक मूल्य तो समाजिक मूल्यों के मुखापेक्षी होते हैं। सामाजिक मूल्य परिवर्तनशील होते हैं। पुराने मूल्यों की जड़ता जब सामाजिक विकास में अवरोधक सिद्ध होने लगती हैं तो उनमें क्रमशः टूटन का सिलसिला आरेभ हो जाता है। नए मूल्य धीरे-धीरे आकार ग्रहण करते हैं और अंततः स्वीकृत होकर समाज के विकास में अपनी भूमिका निभाते हैं।  यह अलग बात है कि साहित्य में किसी भी तरह के मूल्य को अभिव्यक्ति नहीं मिलती, बल्कि ऐसे मूल्य को मिलती है जो समाज स्वीकृत और प्रासंगिक होते हैं। इस क्रम में हम यदि कृष्णा सोबती के उस समाज पर नज़र डालें जिसमें साहित्यकार कृष्णा सोबती का जन्म हुआ, तो यह पता चलता है कि वह ऐसा समाज था जहां धार्मिक रूढि़यां और पंरपराएं धीरे-धीरे समाप्त हो रही थीं तथा भारत में एक नवीन युग का अवतरण हो रहा था। शिक्षा का प्रसार, नवीन वैज्ञानिक आविष्कार तथा सुधारवादी आन्दोलनों के परिणाम स्वरूप उत्पन्न नवीन चेतना भारतीय युवा मानस को नवीन दिशा प्रदान कर रही थी। यहां यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि कृष्णा सोबती समाज के उस सूत्र को पकड़ने में सफल रहीं हैं, जिसकी मानवता के विकास के लिए आवश्यकता है। 
 
 कृष्णा सोबती ज़मीनी रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में उहात्मकता नहीं बल्कि जीवन की सच्चाई व्यक्त होती है। उन्होंने समाज को बहुत नजदीक से परखा है। उनकी रचनाएं इस बात की गवाह हैं कि सामाजिक संरचना और स्त्री चेतना में किस प्रकार का परिवर्तन हो रहा है। इसीलिए इनके पात्र समाज की यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। इनके पात्रों की विशेषता है कि वह लोकमर्यादित रूप का चोला पहने, जीवन की अमूर्त व्याख्या और मानवीय संपूर्णता का उदघोष करते नहीं दिखते, बल्कि वे हमारे वर्तमान समाज में पनपने वाले जीवित चरित्र की भांति लगते हैं। वे मूलतः परिवश के बीच पिसते, टूटते, बिखरते प्रतिपल संघर्षरत अपनी अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई लड़ते दिखाई देते हैं। इनके साहित्य में उभरने वाला समाज, केवल शहरी मध्यवर्ग या शोषित-दमित वर्ग का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि वह अपनी संपूर्णता में ग्रामीण परिवेश से भी हमारा साक्षात्कार कराता है। 

कृष्णा सोबती का साहित्य मूलतः धर्म, संस्कृति और मर्यादा की आड़ में शोषित लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। राजेन्द्र यादव, कृष्णा सोबती के चरित्रों के बारे में लिखते हैं कि, ‘‘कृष्णा सोबती हिन्दी की पहली लेखिका हैं, जिन्होंने पहली बार पुरुष सत्तात्मक समाज में दी गई अपनी सामाजिक छवि से निडर होकर पुरानी नीवों, शहतीरों को हिलाती मित्रो मरजानी की रचना की। कृष्णा सोबती की नायिका पति से अतृप्त होकर आंचल में छुपकर सुबकती नहीं और पारंपरिक स्त्राी की भांति उसे अपनी नियति का खेल नहीं मानती बल्कि विद्रोह का स्वर बुलंद करती है।’’  मित्रो बहुत ही जीवंत चरित्र है। वह सामाजिक परिस्थितियों के सामने शरत्चन्द्र या जैनेन्द्र के पात्रों की भांति घुटने नहीं टेकती बल्कि उस स्थिति का डटकर सामना करती है। वह ऐसी चरित्र है जो अपनी जीवंतता में इंसान क्या भगवान से भी दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो जाती है।  

‘मित्रो मरजानी’ की मित्रो जिस समाज में पली-बढ़ी थी, वहां जिन्दगी केवल जीने की चीज थी। यही कारण है कि वह समाज में होने वाले सामान्य परिवर्तनों से अनभिज्ञ रहती है। क्योंकि भविष्य की नहीं वह वर्तमान की चिंता अधिक करती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि वह अपनी शारीरिक जरूरतें पूरी न हो पाने के कारण पति को छोड़ती नहीं है, लेकिन पतिव्रता भी नहीं बनना चाहती। किन्तु पुरुषप्रधान समाज किसी स्त्री या बहू का ऐसा चाल-चलन स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए समाज में सरदारलाल और गुरुदास की बड़ी लानत-मलामत होती है। हालांकि इसका दूसरा पहलू यह है कि आज जिस स्त्री स्वतंत्रय ;देह मुक्ति की बात नारी विमर्शकार कर रहे हैं और उसके लिए लंबी-चौड़ी भूमिकाएं बना रहे हैं, वह काम मित्रो ने बिना किसी भूमिका के कर डाला। उसका विद्रोह एक बहुत बड़े सामाजिक परिवर्तन को जन्म देता है। लेकिन यह परिवर्तन इतना शांति से होता है कि जितना बड़ा परिवर्तन है, उतना शोर नहीं होता। यह कृष्णा सोबती की अभिव्यक्ति का एक सबल पक्ष है जो उनको भीड़ से अलग करता है। 

‘मित्रो मरजानी’ रचना एक विशेष सामाजिक परिवेश की उपज है। इसके सभी पात्रा किसी न किसी समस्या विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसे घर के मुखिया गुरुदास और धनवंती ‘संयुक्त परिवार’ को बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन लेकिन पुत्रों की मनमानी और सत्ता उनके हाथ हस्तांतरित होती देखकर वे चिंतित हैं। यह तत्कालीन समाज का ही चित्र है जब बाजारवादी प्रभाव के कारण एकल परिवार बढ़ रहे थे। इस वृद्धि के लिए बेरोजगारी भी जिम्मेदार है। महानगरों में जीविका के लिए होने वाले पलायन से यह समस्या और अधिक बढ़ गई थी। इससे केवल संयुक्त परिवार ही विकृत नहीं हुए, बल्कि और भी कई सामाजिक विकृतियां पैदा हुईं। क्योंकि मानव जीवन समाज की सीमाओं में टूटता, बनता है। उसकी आस्थाएं, विचारधाराएं, सामाजिक परिवेश में ही जन्म लेती हैं, विकसित होती हैं या विछिन्न होकर बिखरती हैं। 

साहित्य में समाज का प्रतिबिंब होता है। हम जिस वातावरण में, परिवेश में जीते हैं, साहित्य में उसी का चित्रण होता है। इसीलिए साहित्यकार का यह निजी दायित्व बन जाता है कि वह नैतिक, सामाजिक सीमाओं के भीतर जाकर उसका अन्वेषण करने का हौसला रखे। तभी उसकी रचना सामाजिक जीवन का बेखौफ और बेलौस उद्घाटन करने में सफल होती है। कृष्णा सोबती इस सन्दर्भ में बहुत ही सतर्क रचनाकार रही हैं। वह लेखक की सोच के सन्दर्भ में लिखती हैं कि ‘‘दोस्तों हर लेखक अपने लिए लेखक है। अपने किए लेखक है। वह अपने चाहने से लेखक है। अगर वह संघर्ष में जूझता है, परिस्थितियों से टक्कर लेता है तो उसका एहसान किसी दूसरे पर नहीं, सिर्फ उसकी अपनी कलम पर है। लेखक की लेखनी ही समाज को उस रूप में लोगों के सामने प्रकट करती है जैसा कि वह खुद अनुभव करता है। कोई भी अच्छी कलम मूल्यों के लिए लिखती है। मूल्यों के दावेदारों के लिए नहीं।’’  कृष्णा सोबती के इस वक्तव्य से इस बात को बल मिलता है कि लेखक परिस्थिति और परिवेश की उपज होता है। वाल्मीकि क्रौंच जोड़े को बिछड़ते हुए नहीं देखते तो आज हमारे लिए डकैत होते, रामायण के रचनाकार नहीं। स्वतंत्राता के बाद जब जीवन में कुछ स्थिरता आई तो लेखनी प्रकृति के बजाय मनुष्य की समस्याओं पर केन्द्रित हो गई। संबंध, जीवन-मरण या जिन्दगी में आने वाले भटकाव आदि जैसे प्रत्येक पहलू पर लेखक अपनी लेखनी चलाने लगे। 

स्वतंत्रयोत्तर रचनाकारों में कृष्णा सोबती की लेखनी लीक छोड़कर चलती रही। परंपरा से स्त्री को संबंधों के दायरे तक सीमित करते हुए स्त्री मन या उसकी आकांक्षा को दबाकर प्रस्तुत किया जाता रहा, लेकिन कृष्णा सोबती ने उनको अस्तित्ववान बनाने की भरपूर कोशिश की। इनके स्त्री-पात्र अपने अस्तित्व के प्रति जागरुक हैं, अधिकारों के प्रति सजग हैं और धार्मिक-सामाजिक रूढि़यों व परंपरागत मूल्यों के विरोध में खड़ी दिखाई देती हैं। लेखिका यहां स्त्री-पुरुष के आचरण के दोहरे प्रतिमानों केा चुनौती देते हुए नारी की स्वतंत्रा सत्ता पर बल देती हैं। अपने साहित्यिक परिवेश के अनुकूल ही कृष्णा सोबती एक तरफ ‘आजादी शम्मोजान की’, ‘एक दिन’ जैसी कहानियों में नारी मनोविज्ञान को टटोलती हैं तो दूसरी तरफ ‘मित्रो मरजानी’ में मित्रो को पारिवारिक वर्जनाओं से बाहर निकलकर अपनी इच्छाएं प्रकट करते हुए दिखाती हैं। लेकिन इनके स्त्री पात्र पंरपरा को तोड़ते हुए भी विद्रोही नहीं दिखते। अपने अधिकारों के प्रति सजग होते हुए भी आक्रामक नहीं हैं, वरन् उनमें नारी सुलभ कोमलता, प्रेम, सहानुभूति आदि अपने चरम रूप में विद्यमान है। अधिकारों की मांग करते हुए वहां प्रतिस्पर्धा का भाव नहीं है केवल अपने स्व को पहचानने का स्वर मिलता है।  

डाॅ. रामाशंकर कुशवाहा
हंसराज काॅलेज
हिन्दी विभाग
ईमेल-rsmoon.kushwaha@gmail.com
‘मित्रो’ का शारीरिक खुलापन उसके समाज की ही देन है। बचपन में जिस बच्चे का लालन-पालन वासनाग्रस्त वातावरण में होता है, वह बच्चा बड़ा होकर मानसिक ग्रंथि का शिकार हो जाता है, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘निम्फोमेनिया’ कहते हैं। मित्रो को यह उन्मुक्त और कामुक वृत्ति अपनी मां से मिली थी जो खुद स्वच्छंद और कामुक वृत्ति की मित्रो थी। वह एक रमणी थी, जिसके सैकड़ों यार थे। वह सबको नचाती थी। इस सामाजिक वातावरण का प्रभाव मित्रो पर भी पड़ा था। लेकिन व्यवहारकुशल मित्रो अपनी मां के रास्ते नहीं जाना चाहती थी। इसीलिए उसने घर बसा लिया। वह रमणी समाज से इतर ‘घर’ की कीमत समझती थी।

मित्रो की मां का घर उसके ससुराल की तरह नहीं था। वह जब मायके जाती थी तो उसकी मां के आसिकों और सेठ-साहूकारों की नजर उसपर भी पड़ती थी। दुकानदार बोली-ठोली बालते थे और उसे पाने की चाहत रखते थे। ‘मित्रो मरजानी’ में वर्णित समाज भौतिकवादी व्यवस्था की तरफ उन्मुख समाज का संकेत दे रहा है, जिसमें व्यापारी, कारोबारी, धंधेवाली रमणियां आदि रहते हैं। इस व्यवस्था में पनपता मध्यवर्ग टूटते परिवार, ढीले होते संबंध के बंधन और विकृत होती वासना, कुंठा आदि से लड़ रहा है। इनका जीवन एकांगी होता जा रहा है। वे परिवार, समाज, नैतिकता, स्वच्छंता आदि के बीच खुद को फंसा हुआ पा रहे हैं।   
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