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लघुकथा:रघुविन्द्र यादव

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अगस्त 03, 2014 | रविवार, अगस्त 03, 2014

            साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
'अपनी माटी'
        वर्ष-2 ,अंक-15 ,जुलाई-सितम्बर,2014                      
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कार्यालय में आकर बैठा ही था कि सेवादार ने आकर बताया रात्री चौकीदार मिलना चाहता है।
मैंने उसे अन्दर बुलवाया तो वह सीधे पैरों में गिर गया| बोला-''साहब मुझे बचा लो, वह मार डालेगा।
''क्या हुआ रामचरण, कौन मार डालेगा तुम्हें?”
''मेरा अपना बेटा साहब।
''मगर क्यों ?”
''वो कहता है तुमने अपनी जिन्दगी जी ली अब हमारे लिए मर जाओ। मैं मरना नहीं चाहता साहब मुझे बचा लो।
''देखो मुझे पूरी बात बताओ ताकि कोई समाधान खोज सकूँ।
''साहब, हमने उसे एम.ए.तक पढाया, मगर कई साल से बेरोजगार है, कहीं नौकरी नहीं मिली। इसलिए वह चाहता है कि मैं अगले महीने सेवानिवृत होने से पहले मर जाऊं ताकि उसे अनुग्रह कोटा में नौकरी मिल जाए। अभी उसने मुझे बाइक से टक्कर मार कर मारने का प्रयास भी किया। मैं जान बचाकर यहाँ भाग आया साहब, मुझे बचा लो।
''बताओ कैसे तुम्हारी मदद करूँ? उसे अन्दर करवा दूं?”
''नहीं साहब, उसे नहीं, मुझे एक महीने के लिए लॉक-अप में बंद करवा दो। सेवानिवृति वाले दिन बहार निकलवा देना। फिर उसे मुझे मारने के कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए वह नहीं मारेगा।

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उगते सूरज को सलाम
विधवा माँ ने बेटी की ख्वाहिश पूरी करने के लिए उसे डांस क्लास में क्या दाखिल करवाया, मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। गली-मुहल्ले के लोगों से लेकर रिश्तेदार तक सब उपहास उड़ाने लगे, ताने देने लगे। बेटी को अब लोग मेधा की जगह नचनी कहने लगे। शादी समारोह का निमंत्रण भी देते तो कहते-''दोनों माँ-बेटी नाचने आ जाना हमारे यहाँ ख़ुशी का अवसर है।
तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद माँ का हौसला कायम था, क्योंकि बेटी अच्छा कर रही थी, लेकिन तभी एक पड़ोसन ने ताना देते हुए कहा-''अरे जमुनिया, अब तो तेरी नचनी जवान हो गई इसे किसी कोठे पर बिठा दे।
माँ ने उसी पल कोई निर्णय लिया और बेटी को साथ लेकर निकल पड़ी रेल लाइन की तरफ। वे अभी लाइन से कुछ ही दूरी पर थी कि उन्हें एक बोर्ड पर लिखा दिखाई दिया 'आज रात को शहर में विशाल डांस कम्पटीशन, इनाम पच्चीस लाख।‘  माँ का निर्णय बदल गया और दोनों के कदम तेजी से लेजर वेल्ली पार्क की ओर मुड गए। मेधा ने प्रतियोगिता में भाग लिया और अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन कर प्रथम पुरस्कार जीत लिया। साथ ही फिल्म में काम करने का अवसर भी। एक ही रात में वह छोटे और बड़े परदे की स्टार बन गई।
अब मोहल्ले वाले मेधा के सम्मान में समारोह आयोजित कर रहे हैं, उसे मेधा बेटी और जमुना को जमुना बहन कहते थक नहीं रहे।
दोनों माँ-बेटी ईश्वर का धन्यवाद करती हुई यह नौटंकी देख रही हैं।
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सम्मान या भीख
हमारे मित्र सेठ मुरारीलाल गरीब और बेसहारा लोगों को कम्बल बाँटने के लिए हैदराबाद से हरिद्वार आये हुए थे। उनके आमंत्रण पर हम भी सहयोग के लिए वहां पहुँचे। वे कोई प्रचार नहीं चाहते थे, इसलिए मीडियाकर्मी या फोटोग्राफर नहीं बुलाये थे। जरूरतमंद लोग कतार में एक-एक कर आ रहे थे और कम्बल ले रहे थे।
एक व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए हमारे चालक ने कहा-''साहब अपने क्षेत्र के वोटदल वाला बलवंत सिंह नेताजी भी कंबल लेने के लिए कतार में खड़ा है। ये लोग कल से आये हुए हैं और इसी धर्मशाला में ठहरे है।
हमारी चर्चा सुनकर मुरारी के पिताजी बोले-''इसे कम्बल जरुर देना यही तो असली गरीब है। बाकी लोग तो धन से गरीब हैं यह मन से गरीब है।
अपनी बारी पर वह आया कम्बल लिया और चला गया। इस दौरान किसी ने फ़ोन से उसका फोटो भी खींचा।
तीसरे दिन सुबह जब अखबार खोला तो उसमे एक फोटो छपा था जिसका शीर्षक था- 'वोटदल के वरिष्ठ नेता बलवंत सिंह को समाज सेवा के लिए हरिद्वार में सम्मानित करते सेठ मुरारीलाल।

अपना-अपना भाग्य
चट्टान को जब टुकड़ों में काटा गया तो एक पत्थर पुजारी ने खरीद लिया और दूसरा तवायफ़ ने। पुजारी ने खऱीदा वो पत्थर खुश था कि सदा देव प्रतिमा के सामने रहेगा, सब भले लोग आकर उसी पर खड़े होंगे और ईश्वर का स्मरण करेंगे। दूसरी तरफ तवायफ ने जो पत्थर खऱीदा था वह दुखी था कि उस पर तो रोज गंदे लोगों के ही पैर पडऩे हैं, उसे तो नरक द्वार पर पड़े रहना पड़ेगा।
संयोग से मंदिर और तवायफख़ाना दोनों आमने सामने ही थे। एक दिन शहर में कफ्र्यू लगा था इसलिए दोनों पत्थर फुर्सत में थे। मंदिर वाले ने पूछा-''कैसे हो भाई?
अप्रत्याशित जवाब मिला-''बहुत मजे में हूँ। आप बताइए, आप कैसे हैं?
''भाई मैं तो नरक भोग रहा हूँ। इस मंदिर में कोई भला आदमी नहीं आता, सब स्वार्थी आते हैं, ईश्वर से सौदेबाजी करने। सब के सब मुझ पर जूते निकालते हैं और फिर अपनी डील की शर्ते भगवान को सुनाते हैं। मेरा तो यहाँ दम घुटता है अब।
''तुम कोठे पर भी मजे में कैसे हो?
''भाई. मुझ पर ये लोग अपने साज रखती हैं और हर रोज उनकी पूजा करती हैं, उनके साथ मैं भी पूजा जाता हूँ और हाँ यहाँ जो लोग आते हैं वे सौदागर बनकर ही आते हैं पुजारी बनकर नहीं।
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रघुविन्द्र यादव
संपादक,बाबूजी का भारतमित्र,
प्रकृति-भवन, नीरपुर, नारनौल,
(हरियाणा) 123001,
ई-मेल:raghuvinderyadav@gmail.com
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