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पुस्तक समीक्षा:कविता को महज शिल्प और भाषा चिंतन तक नहीं सीमित किया जा सकता है/महेश चंद्र पुनेठा

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अक्तूबर 05, 2014 | रविवार, अक्तूबर 05, 2014

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-16, अक्टूबर-दिसंबर, 2014
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अच्युतानंद मिश्र युवा पीढ़ी के उन गिने-चुने रचनाकारों में हैं जिनका हिंदी कविता और आलोचना में बराबर का हस्तक्षेप है। वह अपनी लोकधर्मिता और गहरी वैचारिकी के चलते लगातार सबका ध्यान अपनी ओर खींचते रहे हैं।उनकी वैचारिक और सैद्धांतिक तैयारी मुझे बहुत प्रभावित करती रही है। उनकी कविता हो या आलोचना हमेशा लोक के पक्ष में खड़ी रहती है और बड़ी मजबूती से उसका पक्ष रखती है।

   गतवर्ष ‘आँख का तिनका’ शीर्षक से उनका पहला कविता संग्रह आया है।इस संग्रह  में अच्युतानंद अपने समय की गति और समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन में आ रहे परिवर्तनों को बहुत बारीकी से दर्ज करते हैं। उनकी कविताओं को महज शिल्प और भाषा चिंतन तक नहीं सीमित किया जा सकता है। संग्रह की पहली कविता में ही उन्होंने अपने कविता लिखने के प्रयोजन को साफ कर दिया है। वह कविता कर्म को भी सामूहिक कर्म की तरह देखते हैं और मिलकर प्रतिरोध करने की बात कहते हैं-‘मैं इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कविता/कि मेरे हाथ काट दिए जावें/मैं इसलिए लिख रहा हूँ/कि मेरे हाथ तुम्हारे हाथों से जुड़कर/उन हाथों को रोकें/जो उन्हें काटना चाहते हैं।’ उनकी कविताओं में काटने वाले और रोकने वाले हाथ साफ-साफ दिखाई देते हैं। वह ‘इस बेहद सँकरे समय मंे’ चारों ओर फैली उदासी और अंधेरे कोे बारीकी से पकड़ते हुए रोशनी की निरंतर तलाश करते हैं। उनकी कविता में उदासी और अंधेरे का जिक्र बहुत अधिक बार आता है जिसके कारण उनके अतीत के साथ-साथ हमारे इस समय में भी बिखरे हुए हैं। यह अंधेरा अंधेरे से मिलकर गहराता जाता है। कहीं भूख ,प्यास,सन्नाटे ,ठिठुरन का अंधेरा है तो कहीं बेरोजगारी, भ्रष्टाचार ,असफलता का अंधेरा है। अच्छी बात यह है कि इन कविताओं में उदासी है तो सुखी होने की चाह भी है तथा गहरा अंधेरा है तो ‘जलती हुई अलाव के भीतर/चिटकेगी कोई चिंगारी’ की एक आशा भी। उदासी से वह मुक्त होकर सुखी होना चाहते हैं। भीतर -बाहर फैले अंधकार से लड़ते हैं। 




आँख में तिनका(कविता संग्रह) 
अच्युतानंद मिश्र  
प्रकाशक-यश पब्लिकेशन दिल्ली 
मूल्य-एक सौ पचास रुपये।      
कवि मानता है कि यह ऐसा बेहद संकरा समय है ,जिसमें रास्ते खत्म हो रहे हैं। रास्ते खोजने वालों को गैर जरूरी करार दिया जा रहा है। एक उदासी लगातार उनका पीछा करती रहती है कि जिसका असर इतना गहरा है कि उनकी ‘आँखें रोशनी में भी/ढूँढ लेती थीं धुंधलापन’। यह स्थिति हमारे समय की अविश्वसनीयता और भयावहता को बताती है। जमीन धँस रही है। नदियाँ सूख रही हैं। मौसम बेतरह सर्द हो रहा है। धूप,पेड़,पक्षी,बादल सभी संकट में हैं। आदमी मुक्त होना चाह रहा है लेकिन उसे मुक्ति की युक्ति नहीं दिख रही है। बावजूद इसके कवि बचे हुए शब्दों और उन लोगों के सहारे जिनकी आँखों में सूरज चमक रहे हैं और जिनके मन में बेचैनी व रास्तों में बिछने का हौसला है, ‘सभ्यताओं की शिलाओं पर/बहती नदी की तरह’ रास्ते तलाशता है जो हमें ‘जमीन के उस पार’ तक ले जाएंगे। यही तलाश है जो कविता के होने को सार्थक करती है।

  उनकी उदासी के भौतिक, ठोस और विश्वव्यापी कारण हैं। ‘दुनिया का नक्शा’ उन्हें उदास करता है। इस दुनिया में मजदूर-किसान के लिए कोई स्थान नहीं है। वह शोषण-उत्पीड़न का शिकार है। उसे उपेक्षा झेलनी पड़ रही है।किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है। उसकी जमीन उससे छीनी जा रही है। उसे विस्थापित होना पड़ रहा है। उसका अस्तित्व संकट में है। जंगली जानवरों तक को बचाया जा रहा है लेकिन किसान को बचाने की किसी को चिंता नहीं है। कच्ची उम्र में बच्चे कठिन श्रम करने को अभिशप्त हैं। पेट की आग शांत करने के लिए चोरी करने को मजबूर हैं। युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।अपना हक मांग रहे युवाओं को पुलिस के डंडे पड़ रहे हैं उन्हें नक्सली,तस्कर,अपराधी,पॉकेटमार,स्मैकिए,नशेड़ी घोषित किया जा रहा है। ये सब उदास-हताश हैं। यही उदासी कवि को भी घेर लेती है-‘मैं उदास सोचता रहता हूँ/मेरी उदासी नाप आती है/दुनिया की पूरी लंबाई/मेरे पैरों के नीचे/घूमती धरती थम जाती है।’ कवि प्रश्न पूछता है-क्या दुनिया के इस नक्शे को/इसी दुनिया का नक्शा मानना चाहिए/जिसमें कहीं कोई लड़की फसल का गीत नहीं गाती/जहाँ कोई बच्चा गिरकर/उठ नहीं पाता/जहाँ पत्थरों को तोड़ते हाथ/फूलांे को सहलाते नहीं......अगर ऐसा नहीं है/तो फिर ये कैसी दुनिया है? एक अच्छा कवि दुनिया कैसी है? तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि वह दुनिया कैसी होनी चाहिए? के बारे में भी बताता है। अच्युतानंद के यहाँ हमें यह बात दिखाई देती है। वह वैकल्पिक दुनिया की एक तस्वीर हमारे सामने रखते हैं-मैं चाहता हूँ/दुनिया के नक्शे को/मेरे रूखड़े सख़्त हाथों की तरह/होना चाहिए/मेरी बेटी के हँसते वक़्त/दिखने वाले छोटे दाँतों की तरह/होना चाहिए/मेरी पत्नी के/खुले केशों की तरह/होना चाहिए।’ इसके साथ ही वह यह बताना भी नहीं भूलते हैं कि ऐसी दुनिया कैसी बनेगी? इसके लिए अच्युतानंदन को मेहनतकश जन पर गहरा विश्वास है,वह कहते हैं-दुनिया के सबसे/मेहनतकश हाथ से/कि एक दिन/चाहे सदियों बाद ही सही/बनेगा दुनिया का एक ऐसा नक्शा/जहाँ हर उठे हाथ मे फावड़ा/और हर झुके हाथ में रोटी होगी।’ यहाँ फैज़ अहमद फैज़ ,विरेन डंगवाल जैसे कवि याद हो आते हैं।

  अच्युतानंद मिश्र एक जागरूक कवि हैं उनकी दृष्टि किसी भूगोल की सीमाओं तक सीमित नहीं है तभी तो वह ‘म्याँमार की सड़कों पर खून नहीं था’ जैसी कविता लिख पाते हैं। इस कविता में ‘खून नहीं था’ पदबंध युवा शक्ति,जोश और साहस के अभाव को व्यंजित करता है।इसी अभाव के चलते -‘रोशनी भी नहीं थी वहाँ/हवा बंद थी सींखचों में...उलझन में थी हवा/उलझन में थे लोग।’ आंग सान सू की -‘तलाश रही थी आग/भड़काकर जिसे वह जलाना चाहती थी शोला/पिघलाना चाहती थी लोहे की सींखचों को।’ लेकिन यह कैसे संभव होता-‘हवा कैद थी सींखचों में/लोग बंद थे घरों में।’ जबकि आवश्यकता यह थी-यूँ कुछ भी कर सकते थे लोग/आ सकते थे घरों के बाहर/ तोड़ सकते थे जेल की दीवारें/हवा को कर सकते थे आजाद/भड़का सकते थे आग पिघला सकते थे सींखचे।’ सचमुच जनशक्ति यदि एकजुट हो जाए तो कुछ भी कर सकती है। ये पंक्तियां कवि की जनशक्ति पर गहरी आस्था को व्यक्त करती हैं साथ ही इस अफसोस को भी कि-पर म्याँमार की सड़कों में खून नहीं था।

 ‘निहाल सिंह’ कविता के माध्यम से कवि एक सिपाही के अंतर्द्वंद्व को मुखरित करता है।एक ओर बीबी-बच्चों व अपनी जमीन की यादें हैं और दूसरी ओर ड्यूटी की मजबूरी ,एक फौजी इनके बीच झूलता रहता है। उसके लिए बीबी-बच्चों से मिलना भी एक सपना ही होता है। वो इन छोटे-छोटे सपनों के खिलाफ फौंजें खड़ी करते हैं और निहाल सिंह सपना देखता है-‘एक दिन उनके खिलाफ/खड़ी होंगी फौजें।’ इस तरह यह कविता उनके खिलाफ है जो सपनों के खिलाफ फौजें खड़ी करते हैं। यह एक बड़ी हकीकत है कि सदियों से फौजें हमेशा शासकों द्वारा जनता के सपनों को कुचलने के लिए ही खड़ी की गई और उससे आशा की जाती है कि वे देश के बारे में सोचंे।उसकी रक्षा करें।दिन-रात अपनी ड्यूटी में मुस्तैद रहें।

  ‘देश के बारे में’ कविता लिखते हुए अच्युतानंद एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान खींचते हैं-‘हमारे संविधान में/पेट का जिक्र कहीं नहीं है/संविधान में बस/मुँह और टांगें हैं।’वास्तव में अभिव्यक्ति और भ्रमण की आजादी की बात तो हमारा संविधान करता है लेकिन हर हाथ को काम और हर पेट को भोजन की गारंटी की बात नहीं करता। ऐसे में एक गरीब आदमी से हम कैसे आशा कर सकते हैं कि वह देश के बारे में सोचे क्योंकि जब भी वह देश के बारे में सोचता है उसके सामने घूम जाता है-‘तपेदिक से खाँसते हुए/पिता का चित्र।’ वह झंडा लहराता देखता है तो सोचने लगता है-‘कितने झंडो के/कपड़ों को/जोड़कर/मेरी माँ की साड़ी/बन सकती है।’ लेकिन यह कविता जब आगे बढ़ती है और बचपन के दिनों को अपने जीवन के सबसे अच्छे दिन बताती है तो प्रश्न पैदा होता है कि जिसका वर्तमान ही जब इतना अभाव ग्रस्त है तो अतीत तो और भी अधिक अभावग्रस्त रहा होगा फिर अपने गुजरे दिनों को बचाए रखने के यह इच्छा क्यों?

    आज की इस पूँजीवादी व्यवस्था में हर व्यक्ति पर इतना दबाब है कि रचनात्मकता के लिए भी उसके पास समय नहीं बचा है। अपने और परिवार के भरण-पोषण में व्यक्ति का पूरा जीवन व्यतीत हो जा रहा है।वह कमाने की मशीन में बदलकर रह जा रहा है। उसकी भीतर की आग,कलम की स्याही और संवेदनाएं समाप्त होने के कगार पर है। एक लेखक इस दबाब के चलते यह निर्णय लेने को विवश है-कल से नहीं लिखूँगा/जाऊँगा काम पर/नहीं लिखँूगा कि दुःख है बहुत/नहीं लिखूँगा कि फूट-फूट कर रोती है/एक बुढ़िया/आज लिखने दो कि/अभी थोड़ी आग/थोड़ी स्याही/थोड़ी चलने की ताकत बची हुई है। (लेखक का कमरा) इससे दुखद स्थिति क्या हो सकती है एक लेखक के लिए।यह इसी पूँजीवादी व्यवस्था की त्रासदी हेै कि- ‘सड़कों पर बहुत है भीड़/पर इंसान नज़र नहीं आते।’हर तरफ बिन चेहरे वाले लोग हैं, जिन्हें भूख खाए जा रही है।‘एक अजीब सी चुप्पी है।...समय सायरनों में बँट गया है।’लोग काम पर जा रहे हैं ,काम से लौट रहे हैं। काली सड़कों पर पड़े लाल धब्बों को देखकर भी इन्हें कोई फर्क नहींे पड़ता है। ‘मेरे शहर के लोग’ कविता में गहराई से व्यक्त हुई यह त्रासदी भीतर तक डरा देती है और एक अजीब सी बेचैनी से भर देती है। पाठक खुद को टटोलने लग जाता है। उसे शहर के उन लोगों में खुद का चेहरा भी दिखाई देने लग जाता है। यह कितना डरावना दृश्य है-‘ये जीते-जागते लोग हैं/इनकी आँखें पत्थरों की नहीं हैं/इनके फेफड़ों में हर पल/उतनी ही हवा भरी होती है/जितनी कि एक जिंदा स्वस्थ आदमी के/इनका रक्तचाप कभी नहीं बढ़ता।’ दुर्भाग्यपूर्ण यही है कि ये जीते-जागते लोग हैं पर इनका रक्तचाप कभी नहीं बढ़ता है। क्या सचमुच ये जीते-जागते लोग हैं? यह प्रश्न इस कविता से बार-बार ध्वनित होता है और शांत जल में मारी गई कंकड़ी के बाद उठी तरंगों की तरह फैलता जाता है। बहुत देर तक इनका  प्रभाव हमारे मन-मस्तिष्क में बना रहता है। एक अच्छी कविता की यह विशेषता भी होती है।

   अच्युतानंद की कविताओं में बच्चों का उल्लेख भी बहुत अधिक आता है विशेषरूप से गरीब वर्ग के बच्चों का जिनका बचपन कहीं खो गया है, जो जूठे प्लेटों,चाय की प्यालियों ,बड़े-बड़े तसलों पर साबुन और मिट्टी से वर्णमाला उकेर रहे हैं ,जो अखबार,खिलौने,आइसक्रीम,चाट,पापड़ी बेचते हुए जवान हो रहे हैं। उनके ये बच्चेे रोज हमें अपने आसपास दिख जाते हैं-कभी बर्तन धोते हुए ,कभी अखबार बाँटते हुए ,कभी घर-घर दूध की बोतलें पहुँचाते हुए,कभी सब्जी की ढेली लगाते हुए,कभी मालिक के हाथों पिटते हुए,गाली खाते हुए। ‘ढेपा’ ऐसे ही बच्चे की दास्तान है जो खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने की उम्र में श्रम की तलाश में पहाड़ से मैदान में उतर गया है।  जिससे वह प्रश्न करते हैं-तुम्हारी जाति क्या है छोटुआ?/रंग काला क्यांें है तुम्हारा?/कमीज फटी क्यों?/तुम्हारा बाप इतना पीता क्यों है?/तुमने अपनी कल की कमाई/पतंग और कंचे खरीदने में क्यों गँवा दी?/गाँव में तुम्हारी माँ,बहन और छोटा भाई/और माँ की छाती से चिपटा नन्हका/और जीने से ऊब चुकी दादी/तुम्हारी बाट क्यों जोहते हैं?/क्या तुम बीमार नहीं पड़ते/क्या तुम स्कूल नहीं जाते/तुम एक बैल की तरह क्यों होते जा रहे हो।’ कवि उसके लिए एकदम सटीक रूपक का प्रयोग करता है-छोटुआ पहाड़ से नीचे गिरा हुआ/पत्थर नहीं/बरसात में मिट्टी के ढेर से बना/एक भुरभुरा  ढेपा है।’ यह रूपक छोटुआ की स्थिति को बहुत अच्छी तरह व्यक्त करता है। जैसे मिट्टी का ढेर थोड़ी सी ठोकर से कहीं भी बिखर जाता है,थोड़े से पानी मंे बह जाता है, छोटुआ की भी वही स्थिति है। उसके साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार से उसकी संवेदना कुंद हो चुकी है। ‘न माँ को याद करता है न बहन को’।‘छोटुआ की आँख में अजीब सी नीरसता है।’ उसकी हालत को देखकर कवि प्रश्न करता है-‘क्या छोटुआ सचमुच आदमी है/आदमी का ही बच्चा है छोटुआ क्या?’ यह कविता उस ओर  इशारा करती है कि यह व्यवस्था कैसे एक आदमी को अमानवीय बना देती है?उस पूरी प्रक्रिया को यह कविता पाठक के सामने रख देती है। छोटुआ के साथ होने वाला व्यवहार उसको शरीर  से न सही पर मन से पत्थर बना रहा है।  ‘छोटुआ धीरे-धीरे सख्त हो है/बरसात के बाद जैसे मिट्टी के ढेपे।’ ये पंक्तियां छोटुआ के भीतर के पानी के सूखते जाने की ओर भी संकेत करती हैं।यही परिस्थितियां हैं जो आज बच्चों को अपराध की ओर धकेल रही हैं। एक ऐसे बच्चे को जिसे समाज से प्यार,स्नेह और सम्मान न मिला हो ,कैसे आशा की जा सकती है कि वह संवेदनशील होगा? अच्युत कोे उस बच्चे का दुःख बहुत सालता है-जो अँधेरे मुँह निकला था/रात को जब लौटा तो/झोपड़ी कहीं नहीं थी/बस सुलगती हुई इच्छाएँ/दम तोड़ती इच्छाएँ/मुँह फाड़े ठंडा चूल्हा था।’ कवि उस बच्चे की ठिठुरन,कँपकपी,उदासी,नींद के साथ होना चाहता है। इस तरह अपनी कल की छूटी हुई नींद तक पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसकी आत्मा पूरे दर्द के साथ जाग जाती है।उसे माँ की याद सताती है। वह रोना चाहता है लेकिन अकेले का रोना उसे सार्थक नहीं लगता है। कवि प्रश्न खड़ा करता है-अगर पत्थर देश का है/तो बच्चा देश का क्यों नहीं?/देश गहरी नींद में सोया था/बच्चा पूरी रात ठिठुरता रहा।’ यहाँ पत्थर और बच्चे को समानांतर रखकर कवि यह दिखाना चाहता है कि यह कैसी विडंबना है कि एक पत्थर बच्चे से अधिक महत्व पाता है और बच्चा भूख शांत करने के लिए चोरी करने को विवश होता है जिसके लिए कड़ी सजा पाता है। उनकी  ‘बच्चे-1’कविता इस हालत को कम शब्दों में बहुत गहराई से व्यक्त करती है। इस कविता को यहाँ पूरी उद्धरित करने का लोभ संवलित नहीं कर पा रहा हूँ-बच्चे जो कि चोर नहीं थे/चोरी करते हुए पकड़े गए/चोरी करना बुरी बात है/इस एहसास से वे महरूम थे/दरअसल अभी वे इतने/मासूम और पवित्र थे/कि भूखे रहने का/हुनर नहीं सीख पाए थे।’ एक लोकतंत्र के लिए इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि एक बच्चे को अपनी भूख शांत करने के लिए चोरी करने को विवश होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में बच्चे के भीतर आक्रोश का पैदा होना जायज है-सड़क पर चलते हुए एक बच्चे ने घुमाकर/एक घर की तरफ पत्थर फेंका/एक घर की खिड़की का शीशा टूट गया/पुलिस की बेरहम पिटाई के बाद बच्चे ने कबूल किया/वह बेहद शर्मिंदा है उसका निशाना चूक गया।(बच्चे-2)यह कविता न केवल आक्रोश को बल्कि प्रतिरोध को भी व्यक्त करती है।‘ढेपा’ कविता की अंतिम पंक्तियों में भी यह प्रतिरोध हमें दिखार्इ्र्र देता है।  

   आज मीडिया अपनी संवेदनहीनता के लिए बुरी तरह बदनाम हो चुका है।वह भूख-दुर्दशा-युद्ध-अकाल को बेचने से भी नहीं चूकता है। उसका अंतिम साध्य टी0आर0पी0 हो चुका है। अच्युतानंद की कविताओं में भी उसकी संवेदनहीनता के उदाहरण मिल जाते हैं-एक डूबे हुए गाँव का चित्र/दिखाने से पहले/बजाता है एक भड़कीली धुन/और धीरे-धीरे डूबता है गाँव/और तेज बजती है धुन/एक दस बरस का अधनंगा बच्चा/कुपोषित कई दिनों से रोता हुआ/दिखता है टी0वी0 पर/बच्चा डकरते हुए कहता है-/भूखा हूँ पाँच दिन से/कैमरा मैन सूट करने का मौका नहीं गँवाता।’कितनी दुःख की बात है कि मीडिया के लिए डूबता गाँव ,डूबता बच्चा,भूखा बच्चा,फूलती लाशें केवल खबर है। जिस समय लोग डूब रहे थे ,गाँव डूब रहे थे हमारे जनप्रतिनिधि ‘अपने मजबूत किले में बंद थे।’आदमी को डूबते हुए देखकर एक आदमी रो पड़ता है और दूसरा उसे अपनी खबर बनाने में लगा हुआ है। और फिर उससे अपनी आँखें फेर लेता है।  मीडिया पर यह बात पूरी तरह लागू होती है ‘याद रखो /वे भूलना सिखाते हैं।’

 ‘शहर में एक बस्ती थी’कविता उन लोगों की आवाज है जिनके बदौलत कोई भी शहर बसता है और सुख-सुविधा का उपभोग करता है। शहर में रहने वाले खाते-पीते लोगों के चेहरे की चमक उनके श्रम से ही संभव होती है जिन बस्तियों की छाती पर पाँव रखकर जवान होते हैं शहर। लेकिन उन बस्तियों में हमेशा अभाव और पेरशानी रहती है।वहाँ रहने वालों के ‘आँखों की चमक मालिक के सिहराने दबी’ रहती है और उनके ‘सपने फटी हुई रजाई के/भूगोल से शुरू होकर/घिसी हुई चप्पलों तक/आते-आते खत्म हो जाते।’ 

कवि इनकी चिंता करते हुए इस कविता में कुछ जायज सवाल खड़े करता है, जो एक प्रतिबद्ध और हमदर्द कवि के मन में ही पैदा हो सकते हैं-शहर की यह बंजर बस्ती थी/जहाँ बाँझ सपने उगते/नंग-धड़ंग बच्चे थे/टीन की कटोरी थी/जिसमें दूध और पानी का हिसाब/एक सवाल था/सवाल यह भी था/कि वह बच्चा/किस देश,किस मिट्टी/किस हवा,किस शहर का है/सवाल था कि उसकी माँ/किस युग से चली आई थी/उसका पिता पीठ के बल रेंगकर/शहर की आलीशान कोठियों में/क्यों चिराग जला रहा था/सवाल था कि/शहर में बस्ती क्यों थी।’ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ये सवाल कभी हमारे रहनुमाओं के कान खड़े कर पाएंगे? या यूँ ही किताबों के पन्नों तक दब कर रह जाएंगे? लेकिन एक कवि तो केवल इस उपेक्षित आवाज को शब्द दे सकता है उन शब्दों को गूँज मंे बदलना जनपक्षधर नेतृत्व का दायित्व है।दुर्भाग्य है कि यह नेतृत्व दिन-प्रतिदिन सिमटता ही जा रहा है।

 ‘स्त्रियाँ’ कविता स्त्री जीवन में आ रहे परिवर्तन को रेखांकित करती है। आज वे अपने व्यक्तित्व को आकार प्रदान कर रही हैं। अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना रही हैं। सपने देख रही हैं। नई-नई संभावनाओं को जन्म दे रही हैं। परम्परागत छवि को तोड़ बाहर निकल रही हैं और एक नई छवि गढ़ रही हैं। इस छवि का अनंत तक विस्तार कर रही हैं। अब वे पुरुष की छाया से मुक्त होने लगी हैं। अपने रास्ते खुद बना रही हैं। कवि उसे इस रूप में पहचान रहा है-स्त्रियाँ अपने कंधों से/समय की गर्द/झाड़ रही है/उनके पैरों ने/सीख ली है/हवा की भाषा/अपने पैरों से वे/धरती पर उभार रही है/वर्णमालाएँ/कई-कई पैर मिलकर/रच रहे हैं शब्द/जीवन स्त्रियों का/रच रहा है एक समय/जो खड़ा है उस समय के बरक्स/जो कै़द है पत्थरों में।’     अब उनका वक्त पत्थरों मेें नहीं-गीली मिट्टी की तरह/कैद है उन हाथों मंे/जिन्होंने मेंहदी की जगह/अपने हाथों को सराबोर/कर लिया है मिट्टी से।’अब वह अपनी मनचाही मूर्तियां खुद गढ़ेंगी। दूसरों की बनाई मूर्तियों को स्वीकार नहीं करेंगी।बहुत हद तक यह घटते हुए हम देख भी रहे हैं।

 ‘किसान’ कविता पिछले दो दशकों के दौरान किसान के जीवन में आए परिवर्तनों को दर्ज करती है। किसान के प्रति उनकी चिंता प्रकट होती है।कवि साफ-साफ देख रहा है-उसके हाथ में अब कुदाल नहीं रही/उसके बीज सड़ चुके हैं/खेत उसके पिता ने ही बेच डाली थी/उसके माथे पर पगड़ी भी नहीं थी.....बखार माने/पूछता है उसका बेटा/जो दस रुपये रोज पर खटता है/नंदू चाचा की साइकिल की दुकान पर...वे जो विशाल पंडाल के बीच /भव्य समारोह में/मना रहे थे पृथ्वी दिवस/वे जो बचा रहे हैं बाघ को/और काले हिरन को/क्या वे एक दिन बचाएंगे किसान को/क्या उनके लिए भी यूँ ही  होंगे सम्मेलन।कवि को आशंका है कि मिट्टी के भीतर से जीवन रस खींचने वाला किसान एक दिन लुप्तप्रयाः हो जाएगा। वह डायनासोर की तरह प्राकृतिक कारणों से नष्ट नहीं होगा बल्कि उसे सुनियोजित तरीके से नष्ट किया जाएगा। निःसंदेह यह समय किसान विरोधी समय है। उसके अस्तित्व को समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।किसान आए दिनों आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन शासक वर्ग को इसकी कोई चिंता नहीं है। वह अपनी किसान विरोधी नीतियों को जारी रखे हुए है। उसको इस बात की कोई परवाह नहीं कि उसके आर्थिक सुधारों के चलते किसान किस तरह तबाह हो रहा है? सरकारी खजाने का मुँह कॉरपोरेट के लिए खोला गया है उसे सब्सिडी दी जा रही है। उसके ऋण माफ किए जा रहे हैं लेकिन किसान की सब्सिडी विश्व व्यापार संघ की शर्तों का हवाला देकर समाप्त की जा रही है। उसकी उपजाऊ जमीन को कभी सेज तो कभी कॉरीडोर के लिए कब्जाया जा रहा है। किसान भूमिहीन होता जा रहा है। दो रोटी के जुगाड़ में शहरों की ओर भागने केे लिए मजबूर है। उसके लड़के शहर जाकर अपनी पहचान को भूलते जा रहे हैं। इंटरनेट-मोबाइल की दुनिया में खो गए हैं। वे संदीप राम से सैंडी में बदल तो रहे हैं लेकिन अपने जीवन को नहीं बचा पा रहे हैं तमाम दबाबों के चलते एक दिन आत्महत्या कर रहे हैं। कैसी विडंबना है गाँव में उनके किसान पिता और शहर में वे आत्महत्या कर रहे हैं।अच्युतानंद मिश्र की कविताओं में यह विडंबना अलग-अलग तरह से अभिव्यक्त हुई है।  

 इन कविताओं की खासियत यह है कि ये यथास्थिति का गहराई से चित्रण तो करती ही है लेकिन वहीं तक सीमित नहीं रहती हैं उसको भंग भी करती हैं। आज जो किंकर्त्तव्यविमूढ़ की स्थिति है- बहन पूछती है क्या करें?/माँ पूछती है क्या करें?/पिता पूछते हैं क्या करें?/आखिर क्या करे?(शायद कोई बाहर गया ) इस स्थिति से बाहर निकालती है। भले ही यह दुनिया चाय के पानी की तरह खदबदाती दुपहरिया की तरह  हो पर उनके भीतर इन जलते हुए रास्तों को पार कर जाने की चिलचिताती हुई बेचैनी है। यही इन कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है। जीवन की द्वंद्वात्मकता भी। लिखना आसान नहीं रह गया  है इस समय में फिर भी लिख रहे हैं। आसान क्यों नहीं रह गया है इसे समझने की जरूरत है।वह कौनसी परिस्थितियां हैं जो लिखने को कठिन बना रही हैं?इसका उत्तर इन कविताओं में फैली उदासी और अंधकार में मिलता है। उदास रातों और बेतरतीब दिनों में मिलता है। 

उनके कविताओं में ‘जीवन बाढ़ के पानी सा/उफनता नहीं/न ही सूर्य की तरह तेज चमकता है/जीवन पृथ्वी की तरह/बिना रूके घूम रहा है लगातार.....इस कोने से उस कोने तक/पृथ्वी भरी हुई है/हवा और गैस से नहीं/जीवन से। ’जीवन के प्रति गहरी आस्था से भरा कवि ही ऐसी पंक्तियाँ लिख सकता है। जीवन में फैली उदासी और अंधेरे का उल्लेख उनकी लगभग हर कविता में है लेकिन जीवन के प्रति आस्था कहीं भी कम होती नहीं दिखाई देती है। अंधेरे से ही होती है रोशनी की तलाश। भले ही कुछ लोग इस पृथ्वी को जमीन के टुकड़ों में बदल देना चाहते हैं और उन टुकड़ों को में अपना कब्जा जमा लेना चाहते हैं लकिन कवि कहता है-और पृथ्वी गर्म हो रही है/अधिक गतिशील अविभाजित/एक कभी न डूबने वाले सूर्य की तरह/आखिर समुद्र भी तो पृथ्वी में है/कोई डूबकर भी नहीं जा सकता/पृथ्वी से बाहर।

  ‘धूल कण’ कविता उस सर्वहारा की प्रतीक है जिसके बारे में इतिहास ग्रंथों या अर्थशास्त्रों में बहुत कम लिखा गया है लेकिन जिनके श्रम से ही धरती में लहलहाती हैं फसलें ,फूटते हैं जल के सोते और यह पृथ्वी चमक उठ ती है। किसी कवि की सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपने वर्ग की सीमाओं से बाहर निकलकर  जीवन को व्यापकता और गहराई से कितना देख पा रहा है। क्या वह उस निम्न वर्गीय जीवन की पीड़ाओं ,कष्टों व संघर्षों को देख व समझ पा रहा जो अभी भी हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा है?अच्युतानंद बहुत हद तक इस चुनौती को स्वीकार करते हैं अपनी कविताआंे में उस जीवन को लाते हैं जो भूखा-दूखा है,कुपोषित है,किंकर्त्तव्यविमूढ़ ,घाम,लू,गलन सह रहा है,बाढ़ में घिरा है,इलाज के अभाव में दम तोड़ रहा है,बेरोजगारी का दंश झेल रहा है,आत्महत्या करने को मजबूर है,जिनके जीवन में अंधेरा ही अंधेरा और उदासी ही उदासी भरी है, कठिन परिश्रम के बाद भी भूख का कोई स्थाई समाधान नहीं ढूँढ पा रहा है। लेकिन ‘सुबह के इंतजार में’ उनकी आशा से भरा यह स्वर प्रीतिकर लगता है- ‘समय का रथ कहीं/कीचड़ में फंसा सा लगता है/भीषण रात ये/सीने पर बज्रपात ये/कटेगी मगर रात जरूर......मगर अभी-अभी खुलते देखा/कुछ कोपलों को/बढ़ रहे हैं ये/लेकर खाद पानी मिट्टी से/हम भी टिके हैं/खुदे न सही जुड़े तो हैं/कुछ बढ़ेगे/हम जरूर/दुःख अभी आधा ही है/पकड़े हुए है मिट्टी/आधा दुःख/यह आधी रात/सुबह के इंतजार में।’

    
महेश चंद्र पुनेठा
युवा कवि 
शिव कॉलोनी 
पियाना वार्ड 
पो. डिग्री कॉलेज 
जिला-पिथौरागढ़ 262501 
मो09411707470
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अच्युतानंद मिश्र कविता में ओढ़ी हुई जटिलताओं और कविता के शिल्पक्रांत होने के विरोधी हैं।पूरी कोशिश करते हैं कि उनकी कविता उससे बची रहे। बावजूद कहीं-कहीं उनकी कविता अबोधगम्य हो जाती है जिसके लिए उन्हें और साधना की जरूरत है। ऐसा उनके प्रतीकों और रूपकों के चयन के चलते होता है। कहीं-कहीं कबीर की जैसी उलटवाँसियां भी दिखाई देती हैं।लेकिन लोक में प्रचलित मुहावरों का प्रयोग बहुत प्रभावशाली तरीके से करते हैं। एक बानगी इन पंक्तियों में देखी जा सकती है-‘माई कहती थी/गरीबन के आँख में/सपना भी चुभता है।.....भूख में गुल्लर मीठी। ’ ‘गर्म पकौड़ी सी शामों’,‘उबले हुए आलू सा दोपहर’,‘भूख रात भर /एक सियार की तरह कहरती रहती’,‘तारीखों में लिपटी खुशबूदार रूमाल’,‘दुपहरिया खदक रही होगी/पिता के रक्तचाप सी’,‘गीले धान की तरह खुले में सूख रहे होंगे लोग’ जैसे प्रयोग उनकी काव्य प्रतिभा का परिचय देते हैं।  इस दृष्टि से वह बहुत सचेत रहते हैं कि कविता कहीं नारा या विचार का उल्था न हो जाए।उनकी यह सजगता भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। संग्रह के ब्लर्व में बजरंग बिहारी तिवारी उनकी कविताओं के बारे में बिल्कुल सही लिखते हैं कि इन कविताओं में असंभव को संभव होते देखने की ललक है। ....सभ्यता के विकास की समीक्षा है।      
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1 टिप्पणी:

  1. इस संग्रह पर इतनी अच्छी समीक्षा पहली बार पढ़ने को मिली ! हार्दिक धन्यवाद पुनेठा सर !!

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'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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