दो कविताएँ:सुधीर मौर्य - अपनी माटी

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रविवार, अक्तूबर 05, 2014

दो कविताएँ:सुधीर मौर्य

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-16, अक्टूबर-दिसंबर, 2014
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मैं जनता हूँ
तुम्हे लौटा लाएगा
एक दिन
मेरा प्रेम

तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरे हाथ के
लिखे खत

तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरी आँख से
झरते अश्रु

तुम्हे लौटा लाएंगी
हरसिंगार की कलियाँ
मेरे घर की
मेहंदी की महक

तुम्हे लौटा लाएंगी 
तुम्हारी गलियों में बहती हवा
मेरी अटारी से उड़ती पतंग 

तुम्हे लौटा लाएंगे
तुम्हारी आँखों में
बसते मेरे ख्वाब

तुम लौट आओगी
इसलिए नहीं कि
मै करता हूँ तुम्हे प्रेम

इसलिए
कि मैं प्रियतम हूँ तुम्हारा।
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देवलदेवी 

सुनो अलाउद्दीन
मैं वही हूँ
जिसे उठा लाये थे तुम
देवगिरि की गलियों से
सौप दिया था मुझे
अपने नशेड़ी-गंजेड़ी शहज़ादे के बिस्तर को
तुम भी चाहते थे हासिल करना मेरी देह को
मेरी पथभ्रस्ट माँ की देह की तरह

मेरी देह छीन ली थी
तेरे ही बेटे मुबारक ने
तेरे ही बेटे ख़िज़्र से

जानते तो होंगे
तेरे इन दोनों बेटो के साथ
तेरे वंश को
मैने ही मिटाया था
अपने एक स्वदेशी से मिलके

याद आया मेरा नाम
हाँ में देवल देवी हूँ
जिसे कम लोग ही जानते हैं
क्योंकि कभी कोई इसामी
हिन्दू राजकुमारी की वीरता का
इतिहास नहीं लिखता

सुधीर मौर्य
युवा रचनाकार
उन्नाव,उत्तर प्रदेश
विस्तृत परिचय यहाँ 

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