समीक्षा:दरकती संवेदना की कविता है ' आँगन की धूप'/ कमलानंद झा - अपनी माटी

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समीक्षा:दरकती संवेदना की कविता है ' आँगन की धूप'/ कमलानंद झा

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-17, जनवरी-मार्च, 2015
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चित्रांकन: राजेश पाण्डेय, उदयपुर 
बलवंत की कविता छीजती मनुष्यता और दरकती संवेदनशीलता की पड़ताल करती कविता है। आपने अपने प्रथम काव्य संग्रह आँगन की धूप में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि कविता का काव्यत्व और लयत्व अभी हिंदी कविता में बचा हुआ है। सही भी है कि अगर कविता को बचाना है तो उसके प्राणतत्व लयात्मकता को बचाना होगा। आँगन की धूप संग्रह आरंभ से अंत तक मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठा दिलाने की जद्दोजहद से गुजरती है। संग्रह की अधिकांश कविताओं की पृष्ठभूमि में पार्श्वसंगीत की तरह मनुष्यता की पीड़ा और उसके अवसाद की अनुगूंज अनवरत सुनाई देती रहती है। कवि के अनुसार इस अदम्य पीड़ा से दो-चार करना कविता ही सिखाती है। संग्रह की पहली कविता कविता का धर्म में कवि कहते हैं-

कविता जगाती है,
उठने के लिए उकसाती है,
कविता अपने आप में एक बड़ी तहजीब है,
जो चलना सिखाती है।

(आँगन की धूप- आचार्य बलवंत, सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर-2013) कदाचित इसीलिए कविता को भाषा में आदमी होने की तमीज कहा गया है।आचार्य बलवंत काव्य-कर्म तथा काव्य-लक्ष्य को लेकर अत्यंत सजग और सतर्क नज़र आते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी कई कविताओं में कविता के उद्देश्य को उद्घाटित किया है। अपनी एक कविता कविता के आयाम में कविता की पहुँच का विस्तार करते हुए वे लिखते हैं-

हँसी में, ख़ुशी में, बसी-बेवशी में,
            हर एक दौर में इठलायी है कविता।
            मौजों की मस्ती, वीरानों  की बस्ती,
            सभी को गले से लगायी है कविता।
            ये कविता है प्राणों से पैदा हुई
            और जी भर के नभ में नहायी है कविता।

             प्रत्येक युग के कवि, आलोचक कविता की पहचान को लेकर चिंतित नज़र आते रहे हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कविता क्या है नामक अत्यंत महत्त्वपूर्ण निबंध लिखकर कविता की वर्तमान अर्थवत्ता को रेखांकित किया है। दूसरी तरफ धूमिल कविता की नितांत अलग व्याख्या करते हुए लिखते हैं-

           अब उसे मालूम है कि कविता
           घेराव में
           किसी बौखलाए हुए आदमी का
           संक्षिप्त एकालाप है।

             आँगन की धूप की कई कविताएँ आदमियत की टोह लेती नज़र आती हैं। आज सर्वाधिक पतन आदमियत की ही हुई है। स्वाभाविक है कि कवि का हृदय गुम हो गयी आदमियत की पड़ताल करता है-

गीत को ग़ज़ल, ग़ज़ल को गीत का श्रृंगार दो,
आदमी हो, आदमी को,  आदमी  का प्यार दो।

एक दूसरी ग़ज़ल आदमी में आचार्य बलवंत चौतरफा खौफ़ के बाजार में आदमियत की बेचारगी को दर्शाते हुए लिखते हैं-
           बात होती नहीं शराफ़त की,
           आज हर आदमी बीमार नज़र आता है।

             ऐसा इसलिए है क्योंकि आदमी के बीच से संवेदनाएँ गायब होती जा रही हैं। रहीम ने बहुत पहले इसी संवेदना रूपी पानी को बचा लेने की बात कही थी-रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।किन्तु आज आदमी की आँखों से सारा पानी बह गया। अब किसी दूसरे का गला दूसरे के दुःख से नहीं भर्राता, दूसरे की आँखें किसी अन्य की पीड़ा से नहीं छलछलाती। कवि की तकलीफ यही है-

दिल में मुहब्बत की कोई रवानी।
आँखों में है आज आँखों का पानी।
हुआ आदमी बेख़बर धीरे-धीरे।
चले जा रहे हम किधर धीरे-धीरे?

कवि की दुनिया सामान्य लोगों की दुनिया से अलहदा होती है। जहाँ सामान्य आदमी अपनी सीमित दुनिया में सिमटा-सकुचा होता है, वहीं कवि की दुनिया अत्यंत विस्तार लिये होती है। इस विस्तार में प्राणी ही नहीं प्राणीतर भी पारिवारिक हो जाते हैं। इसलिए तो जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में अपने सुख को विस्तृत करके जग को सुखी बनाओ का संदेश दिया था। आचार्य बलवंत भी वगैर किसी भेद-भाव के हर एक आँगन में खुशियों का उजाला तलाशते हैं-

       हर  आँगन में उजियारा हो,  तिमिर मिटे  संसार का।
      चलोदिवाली आज मनायें, दीया जलाकर प्यार का।

कवि की इसी उदार भावना को लक्षित करते हुए पारसनाथ मिश्र जी ने आचार्य बलवंत की कविता के लिए लिखा है, गीत को आत्मनिष्ठ प्रकार का मुक्तक माना जाता है। कवि की गहन अनुभूतियाँ जब तत्वतः एवं संक्षिप्त रूप से लयात्मक तथा बिंबात्मक स्वरूप धारण कर उसके अंर्तमन में गायी जाने लगती हैं, तब वे समष्टि में सम्प्रेषणीयता की सहचरी बन लुभावनी हो जाती हैं। कवि की संवेदना जगत की संवेदना बन जाती है। 
कवि चुप्पी की संस्कृति को खतरनाक मानते हैं। क्योंकि सब कुछ सहन कर जाना अपराधिक संस्कृति को पोषित करता है। समाज को सही दिशा देने का काम मौन होकर नहीं, मुखर होकर किया जा सकता है। अन्याय के विरुद्ध हल्ला बोल चुप होकर नहीं बोला जा सकता। इसलिए कवि डांटने के अंदाज में कहता है-
सब सुनते हो, सब सहते हो,
बोलो तुम  क्यों चुप रहते हो?

आँगन की धूप की एक खास विशेषता यह है कि कवि की दृष्टि छोटी से छोटी बातों पर गई है। ऐसी बातों पर जिसे लोग सामान्यतया नजरअंदाज कर जाते हैं। मसलन आज व्यक्ति अपने आग्रहों से टस से मस नहीं होना चाहता। भले ही यह आग्रह दुराग्रह ही क्यों हो? अपने पूर्वाग्रह के प्रति आलोचनात्मक विवेक का होना बहुत आवश्यक है। स्वस्थ समाज का निर्माण तभी संभव है जब हम अपने पूर्वाग्रह के बरक्स अन्य के आग्रहों को आत्मसात करने का विवेक पैदा कर सकें। कवि बलवंत ने इस छोटे किंतु जटिल मुद्दे को विलक्षण काव्याभिव्यक्ति देते हुए  पूर्वाग्रह कविता में लिखा है-

            हम जहाँ खड़े हैं
            जिस जिद पर अड़े हैं
            वहाँ से हटें,
            पूर्वाग्रह का परित्याग कर
बिना पछताए
दो-चार शिथिल कदमों से पीछे आयें
क्योंकि अभी भी मुरझाए जीवन की जड़ें जीवित हैं।

आचार्य बलवंत की अधिकांश कविताओं में या तो शुभेच्छाएँ हैं या फिर निराशा। जीवन के कठोरतम संघर्ष से उपजी धुप्प अंधेरे में लालटेन की रोशनी की तरह आशा या उम्मीद की किरणें यहाँ कम नज़र आती हैं। कई बार काव्य-सौंदर्य दो पंक्तियों के बीच अनकही बातों या अत्यंत बारीक और महीन संकेत में भी निहित होता है। सीधे-सीधे काव्यात्मक शैली में बात कह देने का दूरगामी मारक प्रभाव पाठकों पर नहीं पड़ पाता। तात्पर्य यह है कि सरलीकरण कविता का आवश्यक गुण है लेकिन कई बार विषयानुसार कविता को सरलीकरण से बचाने का प्रयास भी होना चाहिए।  

बेटी के प्रति कवि की अवधारणा से सहमत होना थोड़ा कठिन है। कवि ने बेटी के लिए जिन आदर्श नारियों (सीता, सावित्री) की उपमा दी है, आज की तारीख में वे पर्याप्त नहीं हैं। आज तक बेटियों को इन्हीं आदर्शों को बता-बताकर उन्हें कमजोर और असहाय बनाया गया है। शील, समर्पण और त्याग जैसे गुणों को बेटियों पर चस्पा कर पुरुष समाज आज तक उनका शोषण करता आया है। बेटी को सामान्य बेटी ही रहने देने की आवश्यकता है, उसे विशेष दर्जा देकर देवी की कोटि तक पहुंचाना आज की तारीख में कत्तई उचित प्रतीत नहीं होता। कारण वे लादे गये सारे गुणों, आदर्शों और नैतिकता के बोझ तले घुटती-पिसती रह जाती हैं। आज बेटियों को भी चालाक, शातिर, थोड़ा धूर्त और पराक्रमी होना चाहिए। ताकि समय आने पर वह अन्य ही नहीं पिता, पति, भाई और गुरुओं के खिलाफ भी आवाज बुलंद कर सके। ये मेरे निजी विचार हो सकते हैं या मेरे पूर्वाग्रह।

इन थोड़ी सीमाओं के अतिरिक्त आँगन की धूप पढ़ते हुए काव्यात्मक सुकून मिलता है, इसमें दो राय नहीं। कवि ने अपनी कविताओं में अत्यंत मोहक और विषयानुकूल शब्दों का चयन किया है। सभी कविताओं में एक बेहतरीन प्रवाह है, जो काव्य-पाठ सा आनंद देता है। कई कविताएँ समाज और संस्कृति पर थोड़ा रुककर सोचने की मांग करती हैं और बेहतर मनुष्य बनने की सिफारिश। आचार्य बलवंत की कविता की गुणवत्ता पर रीझकर ही हिंदी के श्रेष्ठतम गीतकार नीरज जी ने लिखा है, “आपकी हर कविता, हर दोहा, हर क्षणिका बड़ी ही मार्मिक है। वो हृदय को बड़ी ही गहराई तक स्पर्श करती है। आप जन्मजात कवि हैं। कविता आपके भीतर पूरी तरह फूटती है जैसे कि धरती से चश्मे फूट पड़ते हैं।” 

प्रकाशित कृति :  आँगन की धूप (काव्य संग्रह)  बीकानेरराजस्थान
कवि:बलवन्त,विभागाध्यक्ष हिंदी,कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एण्ड साईंस,450, .टी.सी.रोडकॉटनपेटबेंगलूर-560053,मो. 91-9844558064,Email- balwant.acharya@gmail.com
समीक्षक:कमलानंद झा,अध्यक्ष, हिन्दी विभाग,बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय,गया, बिहार         

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