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सिनेमा: हिंदी सिनेमा में ’दलित स्त्री’/रंजीता सरोज

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, सितंबर 08, 2015 | मंगलवार, सितंबर 08, 2015

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-19,दलित-आदिवासी विशेषांक (सित.-नव. 2015)
                   
     हिंदी सिनेमा में ’दलित स्त्री’
रंजीता सरोज 

चित्रांकन-मुकेश बिजोले(मो-09826635625)
सिनेमा एक सशक्त दृश्य व श्रव्य माध्यम है। समाज में सृजनशीलता की अभिव्यक्ति के  कई माध्यम हैं, उनमें से सिनेमा अब एक लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। सिनेमा के अध्ययन के कई पहलू हैं। यहां हम कुछ फिल्मों के माध्यम से दलित स्त्री के प्रतिनिधित्व पर चर्चा करेंगे। कुछ विचारकों ने स्त्रियों को दलितों में भी दलित कहा है लेकिन यह बात सभी स्त्रियों पर लागू नहीं हो सकती है। दलित स्त्रियों के संघर्ष कुछ पहलुओं पर सवर्ण स्त्रियों से अलग हो जाते हैं। सवर्ण स्त्रियों को जातिगत अपमान नहीं झेलना पड़ता है। साहित्य हो या सिनेमा स्त्री हर जगह हाशिए पर रखी गयी हैं। स्त्री अधिकार पर होने वाली तमाम बहसों में दलित स्त्रियों के स्वर ज्यादातर गायब ही रहे हैं। उनका क्या जीवन है, वो कैसे अपने आप को बचाए रखने के लिए दिन-रात संघर्षरत हैं। यह कभी भी चर्चा का मुद्दा नहीं रहा है। समाज के विभिन्न पहलुओं से हमारा साक्षात्कार कराने का माध्यम गीत, नृत्य, कला, साहित्य, और सिनेमा आदि रहा है। दलित स्त्री को अगर हिंदी सिनेमा के पर्दे पर ढ़ूढ़ा जाए तो वह कहीं नहीं मिलेगी अगर मिलेगी तो वह भी मुख्य एंगल के बाहर। हां कुछ फिल्में जरूर आई हैं, जिनमें दलित स्त्री का स्वर मुखर हुआ है। लेकिन उन फिल्मों को भी राजनैतिक, सांस्कृतिक, कलात्मक धरातल पर परखे जाने की जरूरत है। हिंदी सिनेमा को ’दलित स्त्री’ के नजरिए से देखे जाने की जरूरत है। देखा जाए तो जो समाज में हाशिए पर रहा है वो सिनेमा के पर्दे पर भी हाशिए में ही रखा गया है। ज्यादातर फिल्मों में वह पर्दे पर आया, कामवाली, नौकरानी आदि रूपों में ही क्षण भर के लिए ही उपस्थित होती है। हिंदी सिनेमा के 100 वर्षों के इतिहास में कुछ गिनती की फिल्में हैं जिनमें दलित महिलाओं को मुख्य विषय बनाया गया है। इन फिल्मों में जाति व्यवस्था के प्रति गांधीवादी, सुधारवादी, सहानुभूतिपरक दया का रुख अपनाया गया है। शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, जातिगत-बराबरी, अंतरजातीय विवाह आदि सवाल उन फिल्मों के मुख्य विषय से गायब रहे हैं, जो दलित आंदोलन के मुख्य विचार रहे हैं।  

हम बात शुरु करते हैं हिमांशु राय के बैनर तले बनी फ्रैंज ऑस्टन öारा सन् 1936 में निर्देशित फिल्म ’अछूत कन्या’ से। यहां अछूत कन्या है कस्तूरी (देविका रानी)। यह ब्रिटिश राज में भारत के सिनेमा का सुधारवादी दौर है। कस्तूरी एक चंचल, अल्हड़ और गौर वर्ण की खूबसूरत आकर्षक स्त्री है। उसके पिता का नाम है दुखिया (कामता प्रसाद)। फिल्म में दिखलाया गया समाज कस्तूरी और उसके उच्च जाति के प्रेमी प्रताप (अशोक कुमार) के प्रेम को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हालाकि प्रताप के पिता मोहन (पी एफ पीठावाला) गांधीवादी व सुधारवादी किस्म के पात्र हैं जो कस्तूरी के पिता के घनिष्ठ मित्र हैं। लेकिन यह मित्रता जातिगत स्तर को कभी नहीं छेड़ता है। फिल्म के सभी पात्र जाति प्रथा को मौन सहमति देते हुए दिखते है। दुखिया के अत्यधिक बीमार होने पर मोहन उसे समाज का विरोध झेलकर भी अपने घर में सेवा-सुश्रुषा के लिए ले आता है और इस क्रम में अपना घर बार गवां बैठता है लेकिन प्रताप और कस्तुरी की शादी के प्र्रश्न पर मौन रहता है। प्रताप की शादी अपने ही वर्ण की मीरा से हो जाती है। कस्तुरी एक त्यागमयी पात्र बनी रहती है। उसके जीवन का एकमात्र दुख है प्रताप से विवाह न हो पाना। जाति-बिरादरी की परंपरा को परम सत्य मानकर वह प्रताप के साथ भागने से मना करती है और अपने पिता की मर्जी से मनु (अनवर) से विवाह कर लेती है। उसे एक ’देवी’ टाइप पात्र के रूप में चित्रित किया गया है, यहीं से उसके विद्रोही संभावनाओं को खत्म कर दिया जाता है। उसका चरित्र कुछ यों दिखाया गया है कि अछूत होते हुए भी उसने दूसरों के लिए जानें दी और शहीद होकर बड़ी हो गई। फिल्म के आरंभिक दृश्य में एक रेलवे क्रासिंग है जहां पर एक देवी की मूर्ति लगी है जिसके नीचे लिखा है ’’इसने अपनी जान दी दूसरों की जाने बचाने के लिए’’। फिल्म कस्तूरी के माध्यम से कुछ यों कहना चाहती है कि अछूत होते हुए भी व्यक्ति अपने बलिदान द्वारा महान बन सकता है, लेकिन जातिगत यथार्थ को चुनौती देने वाले किसी भी बहस को फिल्म मुद्दा नहीं बनाता है। 

दूसरी फिल्म सन् 1940 में आई ’अछूत’ है जिसका निर्देशन सरदार चंदूलाल शाह ने किया था। इस फिल्म में दलित स्त्री का स्वर मुखर रूप से उभर कर आया है। फिल्म की दलित पात्र लक्ष्मी (गौहर) और उसके पिता जातिगत अपमान से त्रस्त होकर ईसाई धर्म अपना लेेते हैं। लक्ष्मी को एक अमीर परिवार गोद ले लेता है। लक्ष्मी उसकी इकलौत पुत्री सविता की अच्छी सहेली बन जाती है। लक्ष्मी उस परिवार में अच्छी शिक्षा पाकर बड़ी होती है और समाज में एक उच्च वर्ग की महिला समझी जाती है। सविता और लक्ष्मी को एक ही व्यक्ति मधुकर से प्रेम होता है। सविता के पिता सेठ हरिदास अपनी बेटी की शादी की बाधा को रोकने के लिए लक्ष्मी को उसके अपने माता-पिता के पास वापस भेज देता है। लक्ष्मी अपने समाज की अमावनीय परिस्थितियों को बदलने का संकल्प लेती है, इस क्रम में  वह ’अछूतों’ के लिए मंदिर प्रवेश के आंदोलन का नेतृत्व करती है। अंत में लक्ष्मी के प्रयास को सफलता मिलती है और ’अछूत’ मंदिर में प्रवेश कर पाते हैं। यहां लक्ष्मी का चरित्र अपने समाज के प्रति जागरूक दलित स्त्री का है। वह शिक्षित होकर अपने लोगों के बीच जागरूकता फैलाती है, आंदोलन करती है। हालंाकि पूरी लड़ाई मंदिर प्रवेश तक ही सीमित कर दी जाती है इसे जातिगत अस्मिता की आगे की लड़ाई की ओर नहीं ले जाया जाता। सन् 1960 में विमल रॉय ने ’सुजाता’ बनाई। यहां छूआछूत की समस्या को गांधीवादी नजरिए से हल करने की कोशिश की गई है। सुजाता (नूतन) अछूत व अनाथ है, उसे एक सुधारवादी सोच का उपेन (तरुन बोस) अपने घर पर पत्नी के विरोध के बावजूद पालता है। उसे नया नाम देता है सुजाता, जिस पर पत्नी कहती है कि  ’’जाति कुजाता और नाम सुजाता’’। यहां भी ’अछूत कन्या’ की ’कस्तूरी’ की तरह सुजाता भी त्यागमयी, कर्मशील, समर्पणशील नारी के रूप में पर्दे पर आई है। क्योंकि जहां उसे आश्रय मिला है, उस आश्रय के भार तले वह अपना सर्वस्व समर्पित कर देना चाहती है। वह उपेन की बेटी रमा (शशिकला) की तरह पढ़ने, कॉलेज जाने के बारे में सोचते हुए दिखाई नहीं पड़ती। जबकि रमा एक आधुनिक नारी के रूप में दिखाई देती है, कॉलेज जाती है, नृत्य-गायन तमाम कलाओं का प्रशिक्षण लेती है, टेनिस खेलती है। न तो रमा न ही उपेन सुजाता की शिक्षा की ओर सोचते हुए दिखाई पड़ते हैं। गांधीवादी नजरिए से ’हृदय परिवर्तन’ का जोर फिल्म में रहा है क्योंकि फिल्म में रमा की मां ही एक ऐसी पात्र है जो सुजाता को कभी भी मन से अपना नहीं पाती है लेकिन अंत में सुजाता के द्धारा दिए गए खून से ही उसकी जान बच पाती है। इस घटनाक्रम से उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। फिल्म में सुजाता के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश है कि उच्च जाति के लोगों को ’अछूतों’ के प्रति अपनी सोच बदलकर उन्हें अपनाने की जरूरत है, बाकि दूसरे प्रहार जो जातिगत संरचना को तोड़ने के लिए हो सकते थे, वो फिल्म से नदारद हैं। हां स्त्री अधिकारों के संदर्भ में अपनी प्रजनन क्षमता पर अधिकार की बहस को सामने लाने के रूप में सन् 1977 में आई श्याम बेनेगल की फिल्म ’अंकुर’ को याद किया जा सकता है। फिल्म में जमींदार (मिर्जा अली बेग) का बेटा सूर्या (अनंत नाग) कॉलेज की पढ़ाई के दौरान थोड़ा आधुनिक विचारों का दिखाई पड़ता है। पिता के एक दलित स्त्री कौशल्या के साथ संबंध हैं जिससे एक बेटा प्रताप है। जमींदार ने कौशल्या को एक छोटा सा खेत गुजर-बसर करने के लिए दिया है। सूर्या और उसकी मां इस रिश्ते को आत्मसात नहीं कर पाते हैं। गाँव की जमींदारी की देखभाल के दौरान सूर्या के भी संबंध एक दलित स्त्री लक्ष्मी (शबाना आजमी) से हो जाते हैं। लक्ष्मी गर्भवती हो जाती है। पत्नी के आ जाने पर सूर्या लक्ष्मी से दूरी बरतता है। उसके बच्चे को अपना नाम देने से मना करते हुए उसे गर्भपात कराने की सलाह देता है। सूर्या अपने जातिगत प्रभुत्व का इस्तेमाल करता है लेकिन लक्ष्मी उसके विरोध में खड़ी हो जाती है। सूर्या कहता है कि वह उसके बच्चे को अपना नाम नहीं देगा तो लक्ष्मी का जवाब है कि उसे कोई परवाह नहीं- ’’वह उससे कहां कह रही है कि उसे पैसा और संरक्षण चाहिए’’। वह बिना किसी आर्थिक मजबूती, भवनात्मक सहयोग के भी अकेले ही बच्चे को पैदा करने के लिए तैयार है। इसी तरह का प्रयास सन् 1984 में टी एस रंगा की फिल्म ’गिदध’ में देखते हैं जहां महाराष्ट्र और कर्नाटक के बार्डर पर बसे एक गाँव की पृष्ठभूमि में ’देवदासी प्रथा’ के विरोध में अहनामी (स्मिता पाटिल) खड़ी हो जाती है। वह गांव वालों को समझाती है लेकिन देवी के प्रकोप से डरने वाली धर्मभीरू जनता से उसे पूरा सहयोग नहीं मिलता है। फिर 1984 में गौतम घोष की फिल्म ’पार’ आती है। फिल्म में ग्रामीण बिहार में दबंगों द्धारा जातिगत उत्पीड़न का शिकार बने चौरंगिया (नसीरूद्दीन शाह) और उसकी पत्नी रमा (शबाना आजमी) आजीविका की तलाश में कलकत्ता जाने को मजबूर होते हैं। रमा एक भोली-भाली, सहमी सी महिला है जो पति के साथ दुर्दिन झेलने को विवश है। प्रकाश झा की फिल्म दामुल जिसका अर्थ है ’मृत्यु तक गुलाम’ में जातिगत राजनीति और निम्न जातियों के बंधुआ मजदुरी में जीवन पर्यन्त पिसने की व्यथा है। लेखक शैवाल की कहानी ’कालसूत्र’ पर आधारित फिल्म ’दामुल’ अंत में एक दलित महिला रजूली द्धारा जमींदार की गर्दन पर गंडासा से वार करते हुए दृश्य के साथ खत्म होती जाता है। यह दिखाता है कि सदियों से जाति-व्यवस्था के उत्पीड़न को सहने वाला समुदाय अब चुप नहीं रहेगा। 

महिलाओं को अपशकुन मानने की प्रथा भी हमारे देश में रही है। अभी भी खबरें आती हैं कि महिला को डायन मानकर जला दिया गया। कल्पना लाजमी की सन् 1993 में आई ’रूदाली’ में शनिचरी (डिम्पल कपाड़िया) भी अपशकुनी मानी जाने वाली दलित स्त्री है। पैदा होते ही माँ (राखी गुलजार) का छोड़कर जाना, पति की अकाल मृत्यु, बेटे का घर छोड़कर जाना, यह सब उसे समाज की नजरों में अपशकुनी बना देता है। इतना दुःख झेलने के बाद भी उसके आँख से कभी आँसू नहीं निकल पाया है, वह खुद भी नही जानती है कि ऐसा क्यों होता है। राजस्थान के गाँवों में रूदालीकी प्रथा है जिसमें उच्च वर्ण के पुरूषों के मरने पर रोने के लिए निम्न जाति की महिलाओं को बुलाया जाता है। शनिचरी की माँ भी रूदाली का काम करती है। शनीचरी की परिस्थितियां ऐसी बनती है कि आखिर में उसे भी रूदाली का काम करना पड़ता है और आखिर में उसके आँख से आँसू निकलते हैं। फिर पर्दे पर आती है जाति-व्यवस्था के विरोध में सशस्त्र विद्रोह करती दलित स्त्री फूलन देवी। सन् 1994 में शेखर कपूर ने बैंडिट क्वीनबनाई। हालांकि फिल्म सत्य घटना पर आधारित है लेकिन उसके कुछ सत्य के फिल्मांकन को लेकर लोगों की आपत्तियां हैं जिनमें बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखिका व सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधती राय की आपत्ति प्रमुख है। रॉय का कहना है कि फिल्म में बलात्कार के दृश्य को दिखाना उस जीवित महिला के वर्तमान जीवन का अपमान करना है। यह उसके व्यक्तित्व और गरिमा का हनन है। एक और सत्य घटना पर आधारित फिल्म आई जगमोहन मूंदड़ा की सन् 2000 में बवंडर। राजस्थान में उच्च जातियों की दबंगई, शोषण-उत्पीड़न की शिकार भंवरी देवी के जीवन पर आधारित इस फिल्म में मुख्य किरदार नंदिता दास ने निभाया था। हालांकि खुद भंवरी देवी फिल्म को देखकर खुश नहीं थीं, उनका कहना था कि फिल्म में कई सारे तथ्यों से छेड़छाड़ की गई है। हां ये जरूर है कि फिल्म ने भारतीय न्याय व्यवस्था में व्याप्त जातिगत दुराग्रहों के वीभत्स चरित्र को उजागर करने में जरूर कामयाबी हासिल की।

कुल मिलाकर कहा जाए तो हिंदी सिनेमा में दलित स्त्रीके प्रस्तुतीकरण के कई पक्ष उभर कर आते हैं, एक ओर वह पतिव्रता हिंदु नारी के रूप में दर्शायी जाती है, तो दूसरी ओर सामाजिक भेदभाव के खिलाफ मुखर रूप में। पर यह दूसरा स्वर कम ही मुखर रहा है। नहीं तो लोकप्रिय प्रचलित मान्यताओं को आधार बनाकर एक यौन वस्तुके रूप में, जैसा कि राकेश ओम प्रकाश मेहरा की सन् 2009 में आई फिल्म दिल्ली 06’ में जलेबीके संदर्भ में देखा जा सकता है। या फिर कुछ फिल्में सत्य घटनाओं को आधार बनाकर बनाई गईं, लेकिन उनकी प्रस्तुति में उन्हें एक वस्तुके रूप में ही दर्शाया गया है। ज्यादातर फिल्मों में जाति-प्रथा, दलित पात्र आदि के प्रति एक सहानुभूति परक नजरिया रखने की ही वकालत की गई है, न कि उनके संघर्षों को वर्तमान समाज के संदर्भ में चुनौती देने के रूप में।

रंजीता सरोज, शोधार्थी, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
ई-मेल:sarojranjeeta@gmail.com
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