समीक्षा:अपनी जड़ों से कटने का दंश बनाम ‘टूटा मठ’ / डॉ.आलोक कुमार सिंह - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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समीक्षा:अपनी जड़ों से कटने का दंश बनाम ‘टूटा मठ’ / डॉ.आलोक कुमार सिंह

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-22(संयुक्तांक),अगस्त,2016
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अपनी जड़ों से कटने का दंश बनाम टूटा मठ’/डॉ.आलोक कुमार सिंह



चित्रांकन
सलाम आज़ाद बांग्लादेशी लेखक हैं । उनका उपन्यास भंग मठ सन् 2004 में कोलकाता में प्रकाशित हुआ था| प्रकाशित होते ही इस उपन्यास के कुछ अंशों को विवादित कहते हुए बांग्लादेश की सरकार ने इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध लगा दिया। 18 जुलाई 2004 में ही बांग्लादेश की सरकार की ओर से यह वक्तव्य दिया गया कि- प्रख्यात बांग्लादेशी लेखक सलाम आजाद के भंग मठ  कोलकाता से प्रकाशित उपन्यास पर बांग्लादेश कि सरकार नें पाबंदी लगा दी है । इस पुस्तक के वितरण, बिक्री आयात, मुद्रण, पुनर्मुद्रण और भंडारण पर भी पाबंदी है । इस पुस्तक में सलाम नें इस्लाम, कुरआन और पैगंबर मुहम्मद के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखीं हैं । आजाद नें बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और उन पर अत्याचारों के बारे में लिखा है, जो सही नहीं है । यह एक तरह की उकसाहट है। अगर इस किताब का वितरण और इसकी बिक्री बांग्लादेश में हुयी तो मुसलमानों और हिंदुओं के रिश्तों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा । इस कारण भंग मठ की बिक्री बांग्लादेश में नही होगी । इस पर आज से पाबंदी लगाई जाती है ।1

इस तुगलकी फरमान के बाद इस उपन्यास को कभी भी बांग्लादेश में प्रकाशित नहीं किया गया। उसी फरमान के अनुसार आज भी भंग मठउपन्यास के वितरण, बिक्री, आयात, मुद्रण, पुनर्मुद्रण और भण्डारण पर पूर्णरूप से प्रतिबंधित है। इसी कारण भारतीय प्रकाशकों ने इसका नाम बदल कर, इसे टूटा मठनाम से प्रकाशित किया है। उपन्यास में बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दू परिवारों की त्रासद एवं दहशत भरी जिन्दगी का वर्णन किया गया है, जो हिन्दू-मुसलमान एक साथ नहीं रह सकतेकी साम्प्रदायिकतावादी विचारधारा और इसके परिणामस्वरूप धर्म के आधार पर बँटे देशवासियों की संकीर्ण मानसिकता के शिकार हैं।

      उपन्यास की कथा एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो पैदा तो बांग्लादेश में हुआ लेकिन विभाजन की त्रासदी के कारण वह अपनी जड़ों से कट कर अपनी जन्मभूमि से दूर हो जाता है । अनुराग भट्टाचार्य उपन्यास का प्रमुख पात्र है, जो जिन्दगी की आखिरी छोर तक पहुँचकर, अपनी जन्मभूमि की माटी को छूकर प्रणाम् करने के लिए बांग्लादेश में स्थित अपने जन्म-स्थान माइजपाड़ा जाता है। माइजपाड़ा पहुँचते ही अनुराग एक अख़बार में प्रकाशित एक घटना से क्षुब्ध हो जाता है इस खबर में एक अल्पसंख्यक निरंजन भट्टाचार्य के मकान में दहशतगर्दों द्वारा हमला कर तीन औरतों का हथियारों की नोंक पर सामूहिक बलात्कार करने, बलात्कार की शिकार एक महिला के पति की निर्मम हत्या और घर का सारा माल-असबाव लूटकर ले जाने की घटना का वर्णन था। इस खबर को पढ़कर अनुराग के मन में यह सवाल जाग उठता है कि यह परिवार हिंदू के बजाय अगर मुसलमान होता, तो क्या उन पर ऐसा क्रूर जुल्म बरसाया जाता? समूचे देश में, हिन्दुओं को यूँ डरा-धमकाकर आतंकित करने के पीछे, योजनाबद्ध तरीके से उन्हें निश्चिन्ह करने की साजिश की जा रही है या नहीं।2

      बागेरहाट की यह खबर पढ़कर, उसे बचपन में पढ़ा हुआ इतिहास बार-बार याद आता रहा। सबसे ज्यादा उसे सांप्रदायिकता, दंगे-फसाद, हिंदू-मुसलमानों में आपसी रिश्तों की टूटन का ख्याल आता रहा। ये दोनों जातियाँ एक-दूसरे को अपना दुश्मन समझने लगी हैं और इसके बीज अंग्रेज हुक्मरानों ने बोए थे।दंगों का जिक्र छिड़ते ही अनुराग के मन में कलकत्ता और नावाखाली के दंगों की याद आ जाती है। कलकत्ते में दंगों की शुरूआत तब हुई थी, जब मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता प्रत्यक्ष संग्राम के कार्यक्रमों का पालन कर रहे थे। सन् 1946 की 16 अगस्त की सुबह-सुबह, शहर कलकत्ता के मानिकतल्ला इलाके में, मुस्लिम लीग के हथियारबंद कार्यकर्ताओं और समर्थकों द्वारा, हिंदुओं पर एकतरफा टकराहट आरंभ हुई घटनाओं का सूत्रपात हुआ, दिन चढ़ने के साथ-साथ, वह हर तरफ फैल गया। शाम को मैदान में मुस्लिम लीग के नेताओं के उत्तेजक भाषण सुनने के बाद, कार्यक्रमों और पार्टी के लोग और ज्यादा उत्तेजित हो उठे, मैदान में मीटिंग खत्म होने के बाद वापस लौटते हुए, रास्ते में जगह-जगह दंगे छिड़ गए और ये दंगे दुगने उत्साह के साथ, भयंकर हो उठे। यह दंगा पूरे चार दिन तक चलता रहा। उन दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री, हुसेन शहीद सोहरावर्दी साहब खुद लाल बाज़ार के पुलिस कंट्रोलरूम में मौजूद थे और उन्होंने पुलिस की गतिविधियों के संचालन का जिम्मा, अपने कंधों पर ले लिया, मगर दंगा कम होने के बजाय, और ज्यादा भयावह और वीभत्व हो उठा खौफनाक फसाद अपनी हद पार कर गए। चार दिनों के इस दंगे के दौरान, कम से कम दस हजार औरत-मर्द-बूढ़े-बच्चे, निर्मम भाव से हिंसा की बलि चढ़ गए और करीब पंद्रह हजार लोग जख्मी हो गए। करोड़ो-करोड़ रूपयों की सम्पत्ति आग में भस्म हो गई या लूट ली गई। उस दौरान औरतों के शीलहरण के साथ-साथ अपनी-अपनी, सुरक्षा के लिए हिंदुओं और मुसलमानों को अपना ठौर ठिकाना छोड़कर, विपुल संख्या में हिंदु बहुल और मुस्लिम बहुल इलाकों में स्थानांतरित होना पड़ा और इस तरह उपमहादेश-विभाजन की बुनियाद रखी गयी।3

      इसी समय नोवाखाली में दंगा भड़क गया, जहाँ लगभग पचास हजार औरत-मर्द तबाह हुए थे। इंसान के इस विपदा में, खासकर औरतों की बेइज्जती से विचलित होकर, महात्मा गांधी, दिल्ली में क्षमता हस्तांतरण के बारे में आयोजित सभा छोड़कर, नोवाखाली आ पहुँचे। जो लोग दंगे के शिकार हुए थे, उन पर जिस तरह की तबाही आई, वह नुकसान कभी पूरा नहीं होनेवाला! लेकिन जो लोग दंगे के शिकार नहीं हुए, वे लोग उनका विवरण पढ़कर या सुनकर जिस हद तक मन से दुखी हुए, वह भी कुछ कम नहीं हैं।4

      अनुराग श्रीनगर से माइजपाड़ा तक का सफर रिक्शे द्वारा तय करता है। रास्ते में श्रीनगर बाजार, कुमार-कोठी, श्यामसिद्धि-मठ का गुंबद आदि देखकर उसे अपने बचपन की याद आ जाती है। रास्ते में दायला गाँव आता है, उस गाँव में दाखिल होते ही रिक्शेवाला बताता है कि वह उसका अपना गाँव है। इस अनुराग रिक्शेवाले से पूँछता है कि उसके गाँव के हिन्दुओं के कितने घर हैं? इस पर रिक्शेवाले द्वारा दिये गये उत्तर में हिंदुओं के प्रति झलकती नफरत और अश्रद्धा को महसूस कर अनुराग सोचता है कि उसके बचपन में हिंदू-मुसलमानों में जो प्रीति थी, इंसान और इंसान के बीच जो प्यार का रिश्ता था, वह धीरे-धीरे मरता जा रहा है। माइजपाड़ा बाजार में अनुराग की मुलाकात उसके बचपन के दोस्त नूरूल हुसैन से होती है, जो अनुराग द्वारा स्वयं को सीमारेखा का बड़ा भाई कहकर परिचय देने पर ही पहचान पाता है। हुसेन अनुराग को अपने घर ले जाता है। रास्ते में जगदीश चन्द्र बसु के पैतृक मकान में चल रहे स्कूल, राड़ीखाल का मकान, यूनियन परिषद् का दफ्तर आदि देखकर उसके बचपन की यादें ताजा हो रही थीं। हुसैन के घर के पास स्थित मदरसा देखकर नुरूल हुसैन कहता है कि-हर साल इसी मदरसे में गँवार मुसलमान तैयार किए जाते हैं। इस मदरसे में जो लड़के भर्ती होते हैं, वे लोग शुरू से ही दूसरों पर ही निर्भर रहते हैं, दूसरों के आसरे-भरोसे जीते रहते हैं। नमाज पढ़ने-पढ़ाने, अजान देने, कुरान पढ़ने-पढ़ाने के अलावा इनका और कोई काम नहीं होता। ये लोग समाज और राष्ट्र के लिए बोझ हैं। मदरसे की शिक्षा से ये लोग कसकर चिपके हुए हैं, ताकि वे लोग अपनी मध्ययुगीन मानसिकता को समाज में टिकाएं रख सकें। आज इंसानों के धार्मिक विश्वास को अपनी पूँजी बनाकर, ये लोग युग-युगों से सालोंसाल अपना जीवन गुजारे जा रहे हैं।5

      अनुराग हुसैन के साथ माइजापाड़ा घुमने के लिए निकलता है। दोनो बालाशूर होते हुए भाग्यकुल देखने का कार्यक्रम बनाते हैं। बालाशूर के रास्ते में ऊँचे-से मठ को देखकर वह हुसैन से पूछता है कि क्या यह श्यामसिद्धि मठ है? इस पर हुसैन बताता है कि  वह माइजापाड़ा राय घराने का मठ है। पाल लोगों के घर पहुँचकर हुसैन अनुराग का परिचय उस परिवार के लोगों से कराता है। रोगिणी का नाम जयश्री पाल है जिसकी एक दीदी दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहती है। जयश्री पाल का जन्म भी कलकत्ता में ही हुआ था और उसका बचपन भी वहीं पर बीता और विवाह भी वहीं हुआ था, परन्तु ब्याह के बाद वह यहाँ, इस देश में चली आई।

      घूमते हुये वह एसे परिवारों से मिलता है जिनके लिए आजकल सम्मान-रक्षा करना काफी मुश्किल हो गया है। जिनके मकान पर जबर्दस्ती दखल कर लिया गया। उसमें स्थित एक मंदिर तोड़-फोड़ डाला गया और वहाँ काठ-टिन लगाकर, एक मस्जिद बना डाली गई। जिसने यह करतूत की, वह कुछ सालों पहले तक, इस मकान में रात को पहरेदारी करता था। उस घर का पहरेदार था। वह उस घर के किसी बंदे ने बाधा नहीं दी! अगर वे लोग बाधा देते, तो भी नाकाम रहते। बाधा देना फिजूल है, इसलिए उन लोगों ने एतराज भी नहीं उठाया। इस देश में गिनती के जो हिंदू बच रहे हैं, वे सब हर पल मानसिक यंत्रणा और दहशत में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं।6 बचे हुये हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की कोई गिनती ही नहीं है । जबरन उनके घर लूटे जा रहे हैं, उन्हें घर से बे-दाखल किया जा रहा है । कोई भी कानून उनके हितों का रक्षक नहीं है ।

      वहीं पर भाग्यकुल में नुरूलहुसैन अनुराग को लेकर जदुनाथ चौधरी की कोठी में ले जाता है। इस कोठी को सरकार के समाज कल्याण विभाग ने यतीम बच्चों का आशियाना बना दिया था। ये वही जदु चौधरी थे जिसने परिवार के लोगों को अंग्रेजों ने राय बहादुर की उपाधि दी थी औरइस अंचल में जितने सब रास्ता-घाट, पानी के नल, नहर-झील, अस्पताल उन दिनों तैयार किया गया था, उनकी हर प्रतिष्ठा में उन लोगों का महत्वपूर्ण अवदान है।  जदु बाबू की यह कोठी किसी जमाने में पूरे इलाके की सबसे सुन्दर और आलीशान कोठी थी, परन्तु आज खंडहर की तरह नजर आ रही थी। जदु बाबू भाग्यकुल में हर साल रासलीला का आयोजन करते थे, परन्तु स्थानीय मुसलमानों ने हिंदुओं की रासलीला में मुसलमानों का भाग लेना वर्जित कर दिया। जदू बाबू को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने निश्चित किया कि-अगले साल यह रास-उत्सव, वे स्थानीय लोगों के हाथों में सौंप देंगे, ताकि यह उत्सव चलता रहे। कोई भी बंदा इस उत्सव को धार्मिक या सांप्रदायिक नजरिए से न देखे, इसलिए स्थानीय लोगों की माँग मुताबिक इस उत्सव में कुछ सुधार-परिवर्तन भी करेंगे। हाँ, उस उत्सव में जितना ख़र्च होगा, उसका इंतजाम वे कर देंगे। वे तो बस, उत्सव चाहते थे। वे कोई धार्मिक संकीर्णता नहीं चाहते थे, परन्तु आज इन्हीं जदुनाथ चौधरी की कोठी में उनके खानदान की महिलाएँ, जिस कमरे में पूजा-पाठ किया करती थीं, उसी कमरे को मस्जिद बना दिया गया है।

      ऐसी परिस्थितियाँ किसी के भी मन को विचलित कर  देंगी अनुराग स्वयं को बहुत आहत महसूस करता है । वह नुरूलहुसैन के साथ अतीत की यादों, बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति, मदरसों में दी जा रही शिक्षा, धर्मान्धता की विभीषिका एवं धर्मनिरपेक्षता आदि के सम्बन्ध में बातचीत करता है, जिसमें हुसैन मदरसों में दी जा रही शिक्षा की आलोचना करते हुए देश में धार्मिक कट्टरता और अल्पसंख्यक विरोधी प्रवृत्ति के फैलाव पर चिन्ता व्यक्त करता है।  वह ज्वलंत प्रश्नों से घिर जाता है और हुसैन से पूछता है कि किस कदर बदल गया है, तुम्हारा यह देश! सोचने बैठो, बेहद तकलीफ होती है। सन् इकहत्तर में जो आदर्श, जो उद्देश्य लेकर, इस देश के लोगों ने जंग की थी, पता नहीं कहाँ तो गुम हो गया। धर्मनिरपेक्षतानामक मानवीय शब्द को, जाने कैसे ढकेल दिया गया। लेकिन, क्या यह सिर्फ शब्द है। यह शब्द किसी देश के नागरिकों के लिए कितनी बेशकीमती है। कितनी जरूरी है, यह तुमलोगों ने नहीं समझा, न तुम लोगों के शासकों ने समझा।7

विभाजन के दंश को सलाम आजाद नें बहुत ही खुले और बेबाक ढंग से अभिव्यक्त किया है। उन्होनें स्वीकार किया है कि हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए अब तीन ही रास्ते खुले हैं एक, धर्म बदलकर मुसलमान हो जाएँ, जो धर्मप्राण हिंदुओं के लिए मौत के बराबर है। दो, आत्महत्या कर लें। तीन, देश-त्याग करके, सीमा लाँघकर, भारत चले जाएँ। इसमें से कोई भी राह, स्वस्थ-स्वभाविक इंसान के लिए आसान नहीं है। इनसे बाहर, हिंदुओं के लिए और कोई राह खुली हुई नहीं है। हाँ, एक आखिरी कोशिश जरूर की जा सकती है। अंतर्राष्ट्रीय दबाव डाला जाए। अगर यह उपाय प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाए, तो मुमकिन है कि हिंदू समुदाय, बांग्लादेश में अपने नागरिक अधिकार के साथ रह सकेंगे।8 यह देश जिस तरह कट्टरवादियों द्वारा नियंत्रित हो रहा है उसके मुताबिक तो भविष्य में संविधान में धर्मनिरपेक्षता को जगह देने की कोई संभावना नजर नहीं आती। इसीलिए अनुराग अपने-आप से यह प्रश्न पूँछता है कि एक संप्रदाय पर इस तरह की जोर-जुल्म, अत्याचार बरसाया जा रहा है, उसकी रोक-थाम के लिए इस देश का प्रशासन, इस देश की सरकार क्या कर रही है? या सरकार की मदद से ही यह सब हो रहा है

      ऐसी घटनाओं के बारे में जानकर अनुराग का मन क्षत-विक्षत हो आया। वह इस माइजपाड़ा, इस बांग्लादेश के परिदर्शन के लिए नहीं आया था। ऐसी कुछेक घटनाएँ, उसने अखबारों में पढी जरूर थीं, लेकिन वह तस्वीर इतनी भयावह है, उसे नहीं मालूम था। माइजपाड़ा के बाजार में अनुराग हरिपाइन मंडल की दुकान के फोन से स्विटजरलैण्ड स्थित अपनी बेटी से बात करता और बेटी द्वारा अनुराग के पुराने घर के बारे में पूछने पर बताता है कि हाँ वह टूटा मठ अभी मौजूद है। मैंने उसे छू-छू कर देखा इससे ज्यादा वह कुछ नहीं बोल पाया। इससे आगे, कुछ बताना भी मुश्किल था। वैसे अनुराग के लिए यह सिर्फ टूटा मठ नहीं है। यह मठ उसकी नजर में देश-विभाजन का प्रतीक है। जिन्होंने इस मठ के गुंबद के निर्माण का व्रत लिया था, वे देश-त्याग करके चले गए। वे पश्चिम बंगाल, कलकत्ता जा बसे। और यह मठ आधा-अधूरा ही, पूर्वी बंगाल में रह गया। बंगाल को द्विखण्डित करने का प्रतीक भर बनकर यह खंडित मठ, आज भी खड़ा है।9

      इसी के साथ उपन्यास समाप्त हो जाता है और छोड़ जाता है एक प्रश्न कि क्या उपमहादेश में साम्प्रदायिकता, धार्मिक उन्माद और नफरत की फसल के फलने-फूलने में हम लोगों का भी हाथ तो नहीं है, जो ऐसी किसी भी स्थिति से स्वयं को बचाने के लिए शुतुरमुर्ग की तरह अपना सर रेत में छुपा कर यह सोचते हैं कि वे तो सुरक्षित हैं। तसलीमा नें भी बांग्लादेश की इसी वीभत्स और भयावह स्थिति को लिखा और वह भी आज तक बांग्लादेश से निर्वासन का दंश झेल रही हैं । सांप्रदायिकता की समस्या आज की उपजी हुयी नहीं है । यह सैकड़ों वर्ष से फल-फूल रही है।राजनीति की आँच में अपनी रोटियाँ सेकनें वाला वर्ग इसे हमेशा से इसे सींचता आया है ।

संदर्भ-
1- द डेली भोरेर कागोज (एक बंगाली दैनिक), 19 जुलाई 2004, वेबसाइट- www.bhoreekagoj.net
2- टूटा मठ- सलाम आजाद वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, तृतीय संस्करण-2005, पृ0- 10
3- वही, पृ0- 11-12
4- वही, पृ0- 13
5- वही, पृ0- 32
6- वही, पृ0- 44
7- वही, पृ0- 71
8- वही, पृ0-96
9- वही, पृ0

डॉ.आलोक कुमार सिंह
हिन्दी विभाग ,नगर निगम डिग्री कॉलेज,लखनऊ 
फोन-8004710122,8115682129 ,ईमेल -akschauhan777@gmail.com

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