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आलेख:दलित जीवन के अंतर्विरोध और 'अपने-अपने पिंजरे'/डॉ.बृज किशोर वशिष्ट

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, अगस्त 06, 2016 | शनिवार, अगस्त 06, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-22(संयुक्तांक),अगस्त,2016
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दलित जीवन के अंतर्विरोध और 'अपने-अपने पिंजरे' /डॉ.बृज किशोर वशिष्ट


    
भारतीय दलित आंदोलन सवर्ण वर्चस्ववादी मानसिकता के गर्भ की उपज है। आत्मकथात्मक साहित्य के माध्यम से सदियों से दबाए गए दलित-समाज ने अपनी कराहको मुखर किया है। आत्मकथा यथार्थ आत्माभिव्यक्ति का सर्वाधिक सच्चा जरिया है। शास्त्रबद्ध परिभाषाओं से बचते हुए इतना तो निसंकोच कहा जा सकता है कि आत्मकथा में लेखक अपने समय को लिपिबद्ध करता है। पुनसर्जित करता  है। यह पुनर्सृजन काल्पनिकता और आत्मश्लाघा से भरसक दूरी बनाए रखते हुए किया जाता है । लेकिन अधिकां आत्मकथाएं इन बीमारियों से निजात नहीं पा पाती हैं। इस अर्थ में दलित आत्मकथाओं पर दोहरी जिम्मेदारी आ जाती है। काल्पनिकता और आत्मश्लाघा से बचते हुए उन्हें दलित समाज में जागरुकता फैलाने का काम भी करना होता है। वे उन सेठों-सवर्णों की आत्मकथाओं की तरह उच्श्रृंखल नहीं हो सकती जिनको आत्मप्रशंसा के उद्देश्य से लिखा-लिखवाया जाता है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं दलित आंदोलन का ह्रास करती हैं।

     आत्मकथात्मक दलित साहित्य का आधार यथार्थबोध है। दलित यथार्थ ने याचना से आक्रोश तक की यात्रा की है। विभिन्न पडावों से होकर गुजरने वाली इस यात्रा से मुक्तिकामी दलित आंदोलन को नया आयाम मिला है। उसमें नयी ऊर्जा का संचार हुआ है। राजेन्द्र यादव दलित और गैर-दलित आत्मकथाओं के अंतर के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं कि, ‘‘गैर दलित अपनी आत्मकथा में अपने व्यक्तित्व के बनने, निखरने की बात करता है, दलित की कोशिश अभी अपने साथ-साथ समुदाय की पहचान भी है। लेकिन दलित लेखक जिस अपमानजनक परिस्थितियों में रहा है उनको स्वीकार करने के लिए एक बहुत बड़े साहस की जरूरत है जो सवर्ण लेखक नहीं कर सकता। जिस सामाजिक और जन्मगत अपमान से उसे गुजरना होता है वह उसकी मुख्य थीम है। जबकि सवर्ण लेखक की मुख्य थीम सम्मान अर्जित करना है........ कि हम अपनी विशिष्टता के कारण अधिक-से-अधिक अपने वर्ग में - खासकर उच्च वर्ग में सम्मानित और प्रतिष्ठित हों। दलित का मुख्य काम यह है कि हमें कहां-कहां पर अपमानित, वंचित और दलित किया गया और इसके जिम्मेदार कौन थे। इस तरह सवर्ण का समाज अमूर्त होता है, दलित का ठोस और साकार जो इसका दमनकर्ता है। फर्क सम्मान और अपमान का है।’’1

            मोहनदास नैमिराय की आत्मकथा अपने-अपने पिंजरेदो भागों में लिखी गई सुचिंतित रचना है। पहले और दूसरे भाग के प्रकान में पांच साल का अंतर है। प्रथम भाग सन् 1995 में प्रकाशित हुआ और दूसरा सन् 2000 में। इन पांच  सालों में लेखक के व्यक्तिगत चिंतन में आए बदलावों  को सहज ही रेखांकित किया जा सकता है। पहला भाग मेरठ हर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के वर्णन से आरंभ होता है और लेखक के बचपन से गुजरते हुए युवावस्था में घर से भागकर बंबई पहुंचने की घटना पर समाप्त होता है। दूसरा भाग बंबई से मेरठ वापसी की घटना से प्रारंभ होकर लेखक के पुत्र की दर्दनाक मृत्यु के साथ समाप्त होता है। जिस तरह बीतते समय के साथ लेखक के अनुभव घनीभूत होते जा रहे हैं और लगता है कि आने वाले वर्षों में अभी और भी भाग आ सकते हैं

            दलित साहित्य का मूल्यांकन अक्सर परम्परागत मानदण्डों को आधार बनाकर किया जाता है। इसी आधार पर शास्त्रीय आचार्य खीजकर दलित साहित्य के शिल्प को दोयम सिद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। इसके विरोध में दलित साहित्यकार नये सौंदर्यशास्त्र की मांग करते रहे हैं। जो विद्वान आचार्य दलित साहित्यकारों की भाषिक योग्यता को संदेह की दृष्टि से देखते रहे हैं उन्हें अपने-अपने पिंजरेके पहले भाग में मेरठ हर के वर्णन को देखना चाहिए। अद्भुत है। ऐतिहासिक-सामाजिक आकलन करते हुए लेखक वर्तमान मेरठ तक पहुंचा है। इस वर्णन से पाठक को सहज ही यह आभास हो जाता है कि लेखक के कितने गहरे सामाजिक सरोकार हैं। मेरठ हर के गंवईं-हरी परिवे के आरंभिक बिम्ब का विकास बाद में लेखक के व्यक्तित्व में देखा जा सकता है।

            पराजित जाति के वर्णन में लेखक अधिकां स्थलों पर सैद्धान्तिक हो जाता है। जिनमें लम्बे समय से घायल मन की व्यथा मुखर होती है, ‘‘हम लम्बे समय से अपमान सहते आए थे, पर गुनहगार न थे हम। हम हारे हुए लोग थे जिन्हें आर्यों ने जीतकर हाशिए पर डाल दिया था। हमारे पास अंग्रेजों के द्वारा दिए गए तमगे, मेडल, पुरस्कार न थे। हमारे पास था सिर्फ कड़वा अतीत और जख्मी अनुभव।’’2 अथवा, ‘‘हमारी जात के योद्धा कितनी बार हारे होंगे, कितनी बार टूट-टूटकर बिखरे होंगे। जब इस दे में आर्य आए होंगे। कितनी यातनाएं सहनी नहीं पड़ी इस देश के मूल निवासियों को। वही यातनाएं हज़ारों सालों से आज भी झेल रहे हैं।’’3 अथवा  ’’हम गरीब जरूर थे पर हमने न अपना दे बेचा था न जमीर। न हम डंडीमार थे और न ही सूदखोर। चोर-लुटेरों की श्रेणी में भी हम नहीं आते थे। हमारे पुरखों ने घर बनाए, हर बनाए, पर हमारे पास ढंग के घर न थे और न बस्तियां।’’4 अथवा ’’हमारी जात के हिस्से में थी तो कंगाली की ऐसी चादर जिसमें से एक के बाद एक संकट झांक रहे थे। संकटों के साथ-साथ हम अस्पृश्यता के भी शिकार थे। उन संकटों से बाहर आने का रास्ता भी न था। मुक्तिद्वार हमारे लिए बंद थे। हम केवल तड़प सकते थे, रो सकते थे, सिसक सकते थे। हमारे भीतर बाहर अजीबोगरीब हाहाकार थे। पर उन्हें सुनने के लिए वहां फुर्सत किसे थी?’’5

     दलितमानस को भाग्यवादी बनाए रखने का प्रयास सवर्ण हमेशा से करते रहे हैं। कारण स्पष्ट है कि अगर वह विवेकशील हो गया तो वह मुक्तिकामी हो जाएगा। तथाकथित जनतांत्रिक सिहांसन पर सत्तारूढ़ व्यक्ति ऐसा कभी नहीं चाहेगा। भाग्यवाद के कारण निष्क्रियता पैदा होती है। यथास्थितिवाद पैदा होता है। भाग्यवादी अपनी यथार्थ स्थिति से कभी भी अवगत नहीं हो पाता। सदा दीन-हीन बना रहता है। जो है उसी में खु रहता है। अधिकार विहीन होकर सुसुप्तावस्था में जीवन जीता है। इन सब स्थितियों का दलित साहित्यकार विरोध करता है। अपने समाज की यथार्थ स्थिति के संज्ञान के लिए संस्मरणात्मक साहित्य को अपना अस्त्र बनाता है। यही कारण है कि दलित साहित्य की सभी विधाओं में ऐसे निजी अनुभवों की भरमार है, जिनमें वैयक्तिक-सामुदायिक दुःख की अभिव्यक्ति मिलती है। इन अनुभवों में स्वाभाविक आक्रोश की मात्रा काफी अधिक रहती है। नैमिराय जी ने इस तथ्य का खुलासा काफी विस्तार के साथ किया है कि दलित समाज आधुनिकता-प्रगतिशीलता को अपनाने के स्थान पर रूढि़वादी संस्कारों से चिपटे रहना चाहता है। वे लिखते हैं कि, ‘‘दलित जातियों में हालांकि शिक्षा आने लगी थी, पर वह सतही सिद्ध हो रही थी। लोग पंरपराओं को छोड़ना न चाहकर उन्हें सीने से चिपकाए रखने में ही अधिक विश्वास करते थे। दलितों में कुलदेवता और गोत्र देवता उभरने लगे थे। वे अपने बाप-दादाओं की छोड़ी हुई लकीरें पीटने में लगे थे। उस लकीर को मिटाकर नई लकीर खींचने का साहस बहुत कम लोगों में था, जो संघर्षशील थे, कुछ नया करने के लिए जूझ रहे थे।’’6

     दलित आंदोलन के लिए यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उनके बीच में भी सवर्ण समाज की तरह एक श्रेणीबद्ध जाति-व्यवस्था काम करती है। आंतरिक सोपानीकरण और जाति-भेद दलितों में एक बहुत बड़ी चुनौती है।  1919 में डॉ॰ अम्बेडकर ने साउथ बरो आयोग के सामने दावा किया किया था कि अछूतों के लिए अलग मतदाता मंडल बनाए जाने चाहिए। इस घटना को हम दलित आंदोलन का प्रस्थान बिन्दु मान सकते हैं। बाबा साहेब के इस कदम के पीछे दलितोद्धार की भावना काम कर रही थी। लेकिन दलित समाज उनकी इस भावना को ठीक से नहीं समझ पाया और वह ब्राहमणवादी सोपानीकरण का शिकार हो गया। सन् 1931 की जनगणना के अधीक्षक जे.एच. हटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक भारत में जाति प्रथामें भारतीय जाति प्रथा के बारे में लिखा था कि, ‘‘भारत में जाति व्यवस्था जितनी जटिल, सुव्यवस्थित और रूढ़ है उसकी मिसाल विश्व के किसी भी भाग में कहीं नहीं मिलेगी। वस्तुतः जब हम गहराई से सोचते हैं तो यही पाते हैं कि यह भारत में ही मिलती है अन्यत्र नहीं।’’7 

दलित आंदोलन जिस जातिवाद के विरोध में खड़ा हुआ था वह स्वयं जातिगत अन्तर्विरोधों से ग्रस्त हो गया। ये अन्तर्विरोध इस आंदोलन की सतह पर दिखाई भी देने लगे हैं। ऊंच-नीच के भेदभाव को यहां सहज ही देखा जा सकता है। वाल्मीकिऔर जाटवजातियां एक-दूसरे को हीन दृष्टि से देखती हैं। इसका संकेत कई साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में दिया है। दलित समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव का नैमिराय जी ने विस्तार से वर्णन किया है, ‘‘दलितों में ही जाटव और वाल्मीकि जातियों में संवाद का अभाव तो था ही साथ ही आपस में घृणा और तनाव का वातावरण भी रहता था। कभी-कभी तो मारपीट भी हो जाती थी। दोनों जातियों के व्यवसाय/रहन-सहन/खान-पान तथा धार्मिक परंपराओं में जमीन आसमान का अंतर था। एक जाति के लोग सुअर खाते थे, दूसरी जाति के लोग सुअर देखना भी नहीं चाहते। पर दोनों की आर्थिक स्थिति में भी फर्क था। वाल्मीकि समाज के लोग आर्थिक दृष्टि से कमजोर थे जबकि जाटवों की माली हालत लगभग ठीक-ठाक ही थी। हालांकि दे को आजादी मिलने तक दोनों ही जातियों के अधिकां लोग गुलाम जैसा जीवन जीने को बाध्य थे। आजादी के बाद भी पूर्वी उत्तरप्रदे के कुछ गांव/कस्बों में यह स्थिति बंधुआ मजदूरों की तरह भी थी। पर दुखद आश्चर्य की बात तो यह भी थी कि वहीं एक जाति दूसरी जाति के साथ गुलामों और जानवरों जैसा व्यवहार करती थी। इसका मुख्य कारण था कि जाटवों में से कुछ जो बौद्ध हो गए थे उन्होंने पूरी तरह से बाबा साहेब के दर्शन को आत्मसात नहीं किया था। और वे उसी वर्ण व्यवस्था-परंपरा तथा जातिभेद को आंख मींचकर मानते थे।’’8 

दलितों में ब्राहमणवादी ढांचे के अनुसरण को ज्यों का त्यों अपनाया गया है, इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए लेखक का कथन है कि, ‘‘हमारी जात के घरों में भी सफाई करनेवाले/करनेवाली आती थी, जिन्हें अन्य की तरह हम भी अबे ओ भंगी के , अरी ओ भंगन...... आदि-आदि नामों से पुकारने में अपना बड़प्पन समझते थे। उन्हें बात-बात पर गालियां भी दे देते थे। हमारे घरों में जब किसी की मृत्यु हो जाती तो मृतक के अन्य कपड़े, सामान आदि उन्हें दिए जाते थे। शादी-विवाहों के अवसरों पर उनकी स्थिति दीनहीनता से भरपूर और भी विचित्र बन जाती थी। जब सभी लोगों का भोजन समाप्त हो जाता था तब तक टोकरा, सिलवर की परात, गिलास आदि लिए वे भिखमंगे की तरह इंतजार करते थे। बीच में उनकी औरतें चिरौरी करतीं और हमें सेठजी, चौधरी, माई-बाप, हजूर आदि-आदि नामों से अलंकृत करतीं। दूसरी तरफ मर्द उन्हें डांटे-फटकारे बिना न रहते। कभी-कभी गालियां भी दे देते। वे विव, भूखे पेट लिए घर बैठे बच्चों को जल्द-से-जल्द जूठन खिलाने के लिए सब कुछ सहन करतीं। असल में इस जूठन में सब कुछ मिलकर गड़मड्ड हो जाती थी। वैसे वे अपने टोकरों में वैसे ही समेटतीं कभी-कभी वे चील, गिद्ध और कऊवे बन जाते और जमीन पर पड़ी या बिखरी जूठन को अपनी अंगुलियों से कुरेदतीं। हमारी जात के लोग उन्हें कुत्ता/बिल्ली समझ कर डांटते/फटकारते/तथा भगाते। पर वे वहीं जमीं रहतीं। एक-एक मुट्ठी चावल के लिए घंटों-घंटों खुशामद कर पांवों को हाथ लगातीं। पर उसके अलावा थोड़े साफ स्वच्छ भोजन की भी चाह उन्हें होती। जब सारे लोग भोजन कर लेते, तब उनको थोड़ा-बहुत बांटने का समय आता था।’’9  एक ही समाज की दो जातियों के बीच के फासला इतना अधिक है कि उन दोनों जातियों के लोग एक साथ एक पंगत में बैठकर खाना भी नहीं खा सकते। लेखक इस स्थिति का वर्णन करते हुए लिखता है कि, ‘‘उस समय तक हमारी जात के विवाह आदि में कोई भी वाल्मीकि समाज का व्यक्ति पंगत में हमारे साथ बैठने की हिम्मत नहीं करता था। और न ही हमारे बीच से ही उन्हें बुलाने का साहस करता था। दलित जातियों में भी परस्पर समरसता का अभाव था। एक दूसरे के प्रति घृणा तथा ईर्ष्या अधिक थी। मैं कभी-कभी वाल्मीकि बस्ती में जाता, उनके घर पर थोड़ा ठहरता, चाय-पानी पीता और लौट आता। मेरठ की कुछ बस्तियों से वाल्मीकि परिवारों से दलित आंदोलन में शामिल होने लगे थे। उनके होठों पर भी बाबा साहेब डॉ॰ अंबेडकर का नाम आने लगा था। वे भी शिक्षा, व्यापार तथा राजनीति में प्रगति कर रहे थे, पर उन्हें इस बात का मलाल अवश्य था कि वाल्मीकि जाटवों से पीछे क्यों हैं।’’10


     जैसा कि हम ऊपर भी स्पष्ट कर आए हैं कि दलित आत्मकथाओं के पीछे एक विशिष्ट उद्देश्य रहता है। इस दृष्टि से विचार करने पर यह लगता है कि लेखक कई स्थलों पर अपनी इस महती जिम्मेदारी को भूल गया है। अपने समाज की वास्तविकताओं को अभिव्यक्त करने में लेखक का मन उतना नहीं रमा है जितना कि विभिन्न स्त्रियों से अपने संबंधों का वर्णन करने में रमता है। आत्मकथा के दोनों भागों में उसने आठ महिलाओं से अपने प्रेम संबंधों का खुलासा किया है। जब लेखक ने भूरी नामक लड़की से प्रेम करना आरंभ किया उस समय उसकी अवस्था मात्र बारह साल की थी। उसके बाद बिरजो, रसवंती, सूजी, भाइयों की सालियां, सिनेमाघर में मिलने वाली अघेड़ महिला, चांदनी, तृप्ती और विमला से अपने संबंधों पर लेखक विस्तार से प्रका डालता है। इन वर्णनों को पढ़ते समय पाठक सोच में पड़ सकता है कि वह एक विशिष्ट दृष्टि और उद्देश्य से सम्पृक्त आत्मकथा को पढ़ रहा है या कि वह किसी लोकप्रिय रचनाकार की धन कमाने के उद्देश्य से लिखे गए काल्पनिक उपन्यास को पढ़ रहा है। उदाहरण के लिए आत्मकथा के पहले भाग में आए सूजी के प्रसंग को लिया जा सकता है। लेखक बंबई में अपने चाचा-चाची के पास से वापस अपने हर लौटने वाला है। सूजी को उससे प्रेम हो गया था। वह अपना प्रणय निवेदन उससे करती है। वह कहती है, ‘‘इधर स्साला कोई लाइफ नई। जब से पैदा हुआ, तभी से यहीं लोगों को दारू पिलाना। न चाहते हुए भी उनसे हंस-हंसकर बातें करना।’’ कहते-कहते उसकी आवाज़ भर्राने लगी थी। फ़र्स्टटाइम तुमको देखा, तुम दूर गांव से आया, हमने सोचा, तुमसे दोस्ती करेगा। अपने सुख-दुःख का बात करेगा। पर, पर इधर हम पिंजरे में बंद होने के माफिक फड़फड़ाता है। यह पिंजरा तोड़कर किधर जाये।’’..................... तभी सूजी ने मेरी तरफ अपना हाथ बढ़ाया और अपनी हथेली मेरे होंठों पर रखते हुए भावुक होकर कहा- ‘‘मेरी मुट्ठी में अपनी सांसें भर दो। जब तक तुम लौटकर नहीं आओगे, तुम्हारे सांसों की गंध मैं संभालकर रखूंगी। मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी।’’11 यहां पाठक के समक्ष सवाल यह पैदा होता है कि लेखक के द्वारा सूजी की हथेली पर होंठ रखते ही सूजी की भाषा बंबइया हिन्दी से मानक हिन्दी में कैसे तब्दील हो गई? ऐसा चमत्कार केवल काल्पनिक दुनिया में ही संभव है।

     इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते कि दलितों के ऊपर सदियों से निर्ममता से अत्याचार किए गए हैं। लेकिन दलित आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वह तार्किकता को अपना अस्त्र नहीं बनाएगा। आंदोलन के आरंभ में भावनाओं को जगाकर भीड़ तो इकट्ठी की जा सकती है लेकिन ऐसी भीड़ को किसी सकारात्मक निष्कर्ष की तरफ भावनाओं के सहारे नहीं ले जाया जा सकता। अपनी बात को प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. ऐन्द्रे बेते के ब्दों से समाप्त करना चाहूंगा। उनके अनुसार, ‘‘दलित आपस में भी लड़ते हैं। यह भारतीय लोकतंत्र है। हर कोई एक-दूसरे से लड़ रहा है। एक स्तर तक तो यह प्रगतिशीलता है। प्रतिस्पर्धा है। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा अपनी प्रकृति में विनाक नहीं होनी चाहिए। अन्य किसी या स्वयं के विना की प्रकृति इसमें नहीं होनी चाहिए।’’12


संदर्भ
1.             जवाब दो विक्रमादित्य, राजेन्द्र यादव, पृष्ठ 39
2.             अपने-अपने पिंजरे, मोहनदास नैमिशराय, भाग 1, पृष्ठ 17
3.             वही, पृष्ठ 19
4.             अपने-अपने पिंजरे, भाग2, पृष्ठ 14
5.             वही, पृष्ठ 25
6.             वही, पृष्ठ 46
7.             भारत में जाति प्रथा, जे.एच.हटन, पृष्ठ 45
8.             अपने-अपने पिंजरे, भाग-2, पृष्ठ 67
9.             वही, पृष्ठ 67
10.          वही, पृष्ठ 67-68
11.          अपने-अपने पिंजरे, भाग-1, पृष्ठ  140-141
12.          13.01.2005 को बृज किशोर/ सुबोध कुमार को दिए गए साक्षात्कार से उद्धृत

डॉ.बृज किशोर वशिष्ट
सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य)
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
ई मेल:-bkv_70@yahoo.com
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