Latest Article :
Home » , , , , » समीक्षा:आदिवासी जीवन-समाज का सच और उपन्यास धार / डॉ.धनंजय कुमार साव

समीक्षा:आदिवासी जीवन-समाज का सच और उपन्यास धार / डॉ.धनंजय कुमार साव

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, अगस्त 05, 2016 | शुक्रवार, अगस्त 05, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-22(संयुक्तांक),अगस्त,2016
  ---------------------------------------\

        आदिवासी जीवन-समाज का सच और उपन्यास धार / डॉ.धनंजय कुमार साव
                                                                   

चित्रांकन
यह एक सच है कि हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, जो सूचना ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी  का युग है। जहाँ समूची दुनियाँ सिमट-सी गयी है। जहाँ भारत देश की पहचान एक उभरती हुयी शक्ति के रूप में बतायी जा रही है, विश्व के बड़े बाजार के रूप में ज्यादा। कहा यह भी जाता है कि भारत विश्वग्रामके कॉन्सेप्ट का अभिन्न हिस्सा है। किंतु ऐसे ही समय में, जहाँ भारत को एक विकसित राष्ट्र कहकर इसका सब-कुछ उजला-उजला बताया जा रहा है, उसका एक दूसरा भी पक्ष है। जिसके अनुसार भारत राष्ट्र का एक बड़ा भू-भाग, जहाँ रौशनी की जगह गहन अँधेरा है। जहाँ, भूख का तांडव प्रतिदिन होता है। जहाँ, असभ्य और अस्तित्वहीन समझे जाने की घृणा और अपमान के साये में बस साँस ले रही जिंदगी है।

 समाजशास़्त्री इसे ही मुख्यधारा से अलग आदिवासी जीवन- समाज कहते हैं। प्रख्यात विद्वान मैनेजर पाण्डेय इसे परिभाषित करने के  क्रम में कुछ यही कहते हैं-‘‘ आदिवासियों के जीवन, उनकी सामाजिक संरचना, उनकी संस्कृति आदि को ध्यान में रखें, तो सुविधा के लिए यह कहा जा सकता है कि इस देश में बड़ी संख्या में और अगर आप भारत के नक़्शे को देखें, तो बहुत बड़े भू -भाग में जो लोग मुख्यधारा, तथा कथित मुख्यधारा से अलग रहते हैं, जो अपनी जि़ंदगी मध्यकालीन और आधुनिक सामाजिक प्रक्रियाओं से नहीं चलाते, बल्कि पुरानी प्रक्रिया से चलाते हैं, उन्हीं लोगों को आदिवासी कहा जाता है।’’1 कहने की जरूरत नहीं है कि आज जिसे इक्कीसवीं सदी का विकसित भारत बताया जा रहा है उसका एक बड़ा भू-भाग यही आदिवासी लोगों की अविकसित दुनिया है, जो समूचे भारत के विभिन्न हिस्सों में पसरा हुआ है।

 कहा तो यह भी जाता है कि स्वतंत्रता के वर्षों बाद भी आदिवासी जीवन-समाज के उपेक्षित होने में, निरंतर गर्त में धँसते जाने के पीछे मुख्यधारा समाज भी दोषी है, जो आदिवासी जीवन-समाज का दोहन करता हुआ एकांतिक रूप से स्वयं को समृ़द्ध और विकसित करता जा रहा है। आदिवासी जीवन से गहरे जुड़े सामाजिक चिंतक-विचारक वीर भारत तलवार का निम्न मंतव्य उक्त सच की ओर ही संकेत करता है-’’ आदिवासी इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों और सस्ते श्रम का शोषण करके भारत राष्ट्र की जो प्रगति हुई वह हमारी और आपकी -भारत की विकसित राष्ट्रीयताओं के चरागाह (ग्रेजिंग ग्राउंड) बने हुए हैं। नियम है कि हर यज्ञ में बलि जरूरी है। स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास का जो यज्ञ पिछले पचास सालों से चल रहा है, उसमें बलि आदिवासियों की दी गई है।’’2 स्पष्ट है कि आदिवासी जीवन- समाज वर्षों से तथाकथित मुख्यधारा समाज के उपनिवेश बने हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि आज जहाँ, इक्कीसवीं सदी का भारतीय मुख्यधारा का समाज विश्व से अपना सम्पर्क -सू़त्र साध रहा है, वहीं वह अपने आस-पास पसरे उपेक्षित-अविकसित आदिवासी जीवन-समाज की कितनी सुधि ले रहा है, यह यक्ष प्रश्न हमारे समाज-संस्कृति-साहित्य के सम्मुख विचारणीय है। ऐसे विकट समय में यदि हमारा साहित्य भी आधुनिक होने या कहलाने का लोभ- संवरण करता हुआ इससे किनारा कर आगे बढ़ने की कवायद करता है, तो यह निश्चित तौर पर उसका बौद्धिक दिवालियापन कहलाएगा पर इस संदर्भ में, यह जानकर सुखद लगता है कि हिंदी का एक कथाकार संजीव, अपनी पूरी दिलचस्पी के साथ भारत के एक आदिवासी क्षे़त्र और जीवन की कथा को अपने उपन्यास के केन्द्र में लाने का पराक्रम करता है।

हिंदी कथाकार संजीव का धार’ (1990) एक ऐसा ही उपन्यास है, जो बिहार पहले, अब झारखंड राज्य के एक आदिवासी जीवन और समाज (संथाल परगना) की वास्तविकता को पूरी सिद्दत  से उभारता है। प्रस्तुत उपन्यास संथाल परगना के आदिवासियों के शोषण, संघर्ष और उनके जीवन की चुनौतियों के साथ उनके जेहन में पल रहे सपनों को भी स्वर देता है। संजीव का यह उपन्यास (धार) तमाम नामचीन लोगों के साथ संथाल परगना के वासियों को समर्पित है, जो उनके कथाकार की आदिवासी जीवन-समाज से होने वाली गहरी सम्पृक्ति को बताता है।

 कथाकार संजीव का यह उपन्यास दो खंडों में विभाजित है। इन दोनों खंडों में समूची कथा मैना तथा उसके परिवार-समाज के ईद-गिर्द घूमती है जो, बाँसगड़ा आदिवासी अंचल के वृहत्तर कथ्य को अपने तईं समेटे रहती है। मैना ही इस उपन्यास की कथा-नायिका है, जो हिंदी उपन्यास साहित्य की परंपरा में एक अविस्मरणीय चरित्र के रूप में अपनी पहचान स्थिर करती है। प्रस्तुत उपन्यास की कथा की शुरुआत जेल की उस घटना से होती है जहाँ, एक स्त्री (कैदी) जेल में जन्म दिए अपने बच्चे को छोड़कर अकेली चली जाती है। किंतु जेलर द्वारा उस नवजात शिशु को जेल के ही एक कैदी (मंगर) को सौंपने के तुरंत बाद ही वह स्त्री अपने बच्चे को अपनाने को विवश हो जाती है।

 प्रस्तुत उपन्यास की उक्त घटना स्त्री  के दो रूपों से हमारा साक्षात्कार कराती है। पहले रूप में वह हमें एक ऐसी स्त्री  लगती है, जो जेल में अपने ऊपर हुए दैहिक अत्याचार (बलात्कार) के विरोध स्वरूप अपने उस बच्चे को छोड़कर चली जाती है, जो उसकी इच्छा के विपरीत उस पर थोप दिया जाता है। जबकि दूसरे रूप में वह, हमें एक ऐसी स़्त्री लगती है जिसके लिए एक माँ का अपने बच्चे के प्रति होने वाला ममत्व ही सर्वोपरि है। यह स़्त्री मैना है, जो जरूरत पड़ने पर अन्याय-अत्याचार की खिलाफत भी करती है और परिस्थिति की माँग के अनुसार अपना सारा अभिमान-आक्रोश त्यागकर अपनों को अपनाने के लिए आगे भी आती है।

 मैना की पहचान मुख्यधारा से अलग आदिवासी जीवन-समाज से है। जिसे जेल की नारकीय यंत्रणा, उस विरोध के कारण सहनी पड़ती है, जो वह अपने आदिवासी अंचल और समाज को बचाने की खातिर करती है।  वह अपने ही परिवार (पिता-पति) तथा उस परिवार को दलाल की भाँति इस्तेमाल करने वाली मुख्यधारा समाज की वर्चस्ववादी शक्तियों के खिलाफ खड़ी हो जाती है। मैना इस विरोध में स्वयं को अकेली पाती है, क्योंकि उसका साथ ना वह सरकार देती है जिससे वह तथाकथित शासित होती है और ना वह परिवार जहाँ वह पालित होती है; जहाँ वह घर कर के रहती है।

 उसकी लड़ाई दोहरी है, अपने-पराये दोनों से। वह उन सबकी खिलाफत करती है, जो आदिवासी जीवन-समाज को गंदला करने में;  उसका लूट-खसोट करने पे अमादा रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मैना की लड़ाई आदिवासी जीवन और समाज को मुख्यधारा समाज की पूँजीवादी शक्तियों द्वारा मुनाफे का चरागाह समझने की मानसिकता के खिलाफ होती है। यही कारण है कि वह बाँसगड़ा अंचल से तेजाब (जहर) की फैक्टरी हटाने को कटिबद्ध होती है। इसी फैक्टरी के विरोध स्वरूप उसे जेल जाना पड़ता है; अपने उस परिवार को त्यागना पड़ता है, जो महेन्द्रबाबू जैसे मुख्यधारा समाज की पूँजीवादी वर्चस्वशील शक्ति के हाथों की कठपुतली बन जाता है।

 महेन्द्रबावू जैसे लोग अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने की कला में निष्णात हैं वह एक तरफ आदिवासी समाज की जमीन हथियाने तथा उस पर अपने मुनाफे की पौध ( तेजाब फैक्टरी) लगाने की चालाकी में आदिवासी समाज के धर्मभीरू व्यक्ति टेंगर की धार्मिकता ( मानवीयता) को उकसाता है | यह कह कर कि यह फैक्टरी जरूरमँद आदिवासियों की भूख को मिटायेगा; उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करेगा | जबकि दूसरी तरफ, वह आदिवासी युवकों (फोकल जैसे) की स्वछंद वृत्ति को हवा देकर उनका गलत इस्तेमाल करता है। व अपने मुनाफे के कारोबार को धर्म-सम्मत  बनाने के लिए सीताराम पंडित जैसे मुख्यधारा की वर्चस्ववादी जाति के प्रतिनिधि को भी अपनी लूट में शामिल करता है। इस उपन्यास में सीताराम पंडित और टेंगर का निम्न संवाद उक्त सच को ही जाहिर करता है -‘‘तुम का चाहते हो, जिस फैक्टरी के लिए तुम राजा बलि की तरह सब-कुछ दान दे दिए, उसी का तुम्हारी बेटी बंद करवा दे और इतना आदमी भूखे मर जाय।’’ ना पंडिज्जी !’’ टेंगर घबरा उठा ‘‘ इ फैक्टरी अन्नपूरना माई है इ बंद नहीं होगा चाहे इसकी खातिर हमको धर्मजुद्ध ही करना पड़े।’’3

मैना महेन्द्रबाबू के इस धर्मसम्मत कारोबार का असली रहस्य जानती है। वह इस सच से पूरी तरह बाख़बर है कि तेजाब की फैक्टरी के बहाने मुख्यधारा समाज का शोक वर्ग आदिवासी समाज की ज-जंगल-जमीन को लूटना ही नहीं चाहता है, अपितु उस पूरे आदिवासी समाज को अपने लाभ के खेल में गंदला कर उसके अस्तित्व को ही लील लेना चाहता है। मैना अपनी पूरी ताकत से इन तत्वों (शोषक शक्तियों) का मुकाबला करने को आगे आती है। जिसमें उसे शर्मा जैसे बुद्धिजीवी तथा अपढ़ मोड़ल जैसे आदिवासयिों के कुछ लोगों का साथ मिलता है। और देखते ही देखते मैना का संघर्ष पूरे आदिवासी जीवन-समाज के संघर्ष में परिणत हो जाता है।

 मैना की इस लड़ाई में उस पर कई तरह के प्रहार होते हैं, किंतु मैना का स्वतंत्र निर्भीक व्यक्तित्व हर वार का प्रतिकार करता हुआ संघर्ष पथ पर प्रशस्त होता है। वह न सिर्फ अपने परिवार और समाज के पितृसत्तात्मक संस्कारों को धता बताती है, बल्कि अपने समाज की अंदरूनी कमजोरियों (सामाजिक’-धार्मिक अंधविश्वास रूपी जड़ताओं) को भी निर्मूल करने हेतु सचेष्ट रहती है। क्योंकि, वह जानती है कि आदिवासी समाज की इसी जड़ मान्यताओं का सहारा लेकर मुख्यधारा समाज की शोषक शक्तियाँ अपनी सत्ता को यथावत् बनाये रखती है।

 इस उपन्यास में मैना की माँ को अपने पति टेंगर और परोक्ष भाव से तेजाब की फैक्टरी का  विरोध करने के कारण मुख्यधारा समाज की शोषक शक्तियाँ (महेन्द्रबाबू और उनके तमाम साथी) जो सजा देती हैं,  वह आदिवासी जड़ मान्यताओं का सहारा लेकर (मैना की माँ को डायन बताकर उसके अस्तित्व को मिटाना) ही होता है। जिसे इस उपन्यास में मैना के निम्न कथन में देखा जा सकता है -‘‘ जब पएले-पएले तेजाब का फैक्टरी बना न, तो हमारा माँ से बाप का झगड़ा हुआ। तब महेन्द्र बाबू जनगुरु ओझा को दो सौ रुपैया दिया। इधर गाँव में जब तेजाब का बहा हुआ पानी पी के श्याम का भैंस मर गया तो उसका बाप ओझा का पास गया। ऊ शाल का पत्ता में तेल लगा के मंतर पढ़ा, बोला मैना का माँ डायन है उसका चलते -ई ये सब होता। माँ का सब घेर लिया उसकों, बोला तू डायन है। सब ऐसे खदेड़ लिया जैसे वो मानुख जात नहीं पागल कुतिया हो।’’4 किंतु मैना अपने ऊपर अपनी माँ की कहानी को दुबारा दुहराने नहीं देती है। वह अपने विरोध के अकेलेपन में भी वश न होकर शोषक-शक्तियों के खिलाफ मजबूती से खड़ी होती है। वह तेजाब (शोषक-शक्तियों द्वारा पोषित असामाजिक तत्वों) का जवाब तेजाब (प्राणघातक प्रतिकार) से देती है।

 यहाँ उपन्यासकार का वह स्त्री -विमर्श नज़र आता है, जो यह कहता है कि स्त्री का स्वतंत्र  अस्तित्व अपने अधिकार के लिए मजबूती से खड़े होने में ही है। मैना भी अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बचाकर ही अपने तथा अपने समाज के हक की लड़ाई जारी रखती है। मैना जेल की यंत्रणा से ना स्वयं टूटती है और ना अपने समाज के लोगों को टूटने देती है। इस उपन्यास के उस प्रसंग में, जब सामूहिक भोज-भात के बाद उसका समूचा समाज एक जगह एकत्रित होता है, तब वह लोगों का आहवान करती हुयी आदिवासी समाज की दुर्गती करने वाले तत्वों की कारस्तानियों के साथ आदिवासी क्षेत्र की वर्षों से हो रही वंचना की ओर सभी का ध्यान आकर्षित करती है- ‘‘हमको याद आता, जब हम बच्चा था, खेती से चार-छै महीना का काम चल जाता, आज एक दिन का भी नई। खेत-खतार, पेड़ रूख कूँआ तालाब हम और हमरा बाल-बच्चा तक आज तेजाब में गल रआ है भूख में जल रआ है। पहले हम चोरी का चीज है, नई जानता था, भीख कब्भी नहीं माँगा, चुगली-दलाली कब्भी नहीं किया, इज्जत कब्भी नहीं बेचा, आज हम सब करता, आदत पड़ गया है, बल्कि कहें इसके बिना गुजारा नई। शरमा बाबू चाअता था कि हमको इज्जत मिले, आदमी की तरह रएँ - इसका खातिर कहाँ-कहाँ दरखास नहीं दिया, मगर कोई सुनवाई नई-सब मर गया हाकिम-सरकार, भगवान-सब। आज इ ठो सोचने की बात है कि हम ऐसे ई रएगा। पानी का पाइप हमारी छाती पर से गुजरता- हमको एक बूँद पानी नईं, रेललाइन बगले में है, मगर हमरा खातिर सौ कोस दूर वोट देने को हमको आज तक कोई बोला नईं हमरा चिट्ठी-पत्री  निहालसिंह के दुकान के पते पर आता। हमारा कोई पता-ठिकाना नई।’’5

स्पष्ट है कि यहाँ, मुख्यधारा समाज और सरकार को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। ये सवाल आदिवासी जीवन-समाज को जल-जंगल-जमीन से महरूम करते हुए उनके अस्तित्व को झुठलाने की बदनीयत को जाहिर करते हैं। किंतु मैना इस पर भी निराश नहीं होती है, बल्कि अपने समाज के लोगों के बीच हुंकार भरती हुई लोगों को अपने चतुर्दिक फैली खनिज-सम्पदा को अपने श्रम से निकालकर अपने जीवन को नए तरीके से जीने का रास्ता सुझाती है-‘‘ कोइला के खजाना पे हम रएता है फिर भी कंगाल? कब तक अइसा माफिक चलेगा?’’6 मैना अपने मेहनतकश समाज को उसके श्रम का हवाला देती हुई कहती है कि हम अपने श्रम पर उन्हें नहीं पलने देंगे जिन्हें हमारी रत्ती भर परवाह नहीं है।

 मैना का उक्त स्वर समूचे आदिवासी समाज में प्राण फूँकता है जिससे पूरा समाज समवेत रूप में अपने अंचल को विषाक्त करने वाले षड़यंत्र को नाकाम करने हेतु कटिबद्ध हो जाता है -‘‘यह एक मीटिंग फिर क्रम-क्रम से कई मीटिंगे . . .। सीधे सपाट आदिवासी जिस बात पर अड़ गये, अड़ गये, उन्हें वहाँ से कोई टस-से-मस नहीं कर सकता। अब वे इस बात पर जिद पकड़ चुके थे  कि इस जहर की फैक्टरी को अपने इलाके में और नहीं चलने देंगे- न खुद इसमें काम करेंगे न औरों को ही काम करने देंगे। उन्हें अपनी जमीन की सलामती चाहिए। खेती ही बच जाए, नहीं चाहिए मजदूरी।’’7 कहने का अभिप्राय यह है कि मैना की अकेली लड़ाई देर से ही सही, पूरे आदिवासी समाज की लड़ाई बन जाती है। जिसमें एक कदम आगे बढ़ कर रास्ता दिखाने, शर्मा जैसे जनसेवक भी शामिल होते हैं।

 शर्मा जैसे लोग, महेन्द्रबाबू तथा उनकी जमात की उस पूँजीवादी सोच को बेनकाब करने में आगे आते हैं, जो आदिवासी जीवन-समाज का बस अपने स्वार्थ के खेल और छल में दोहन करने में लगा रहता है । जनसेवक शर्मा जैसे चंद लोग ही होते हैं, जो मुख्यधारा समाज के विकास के नाम पर आदिवासी अंचल के खनन और दोहन का कड़ा प्रतिवाद करते हुए लूट की सरकारी और निजी योजनाओं के विरुद्ध जनखदानजैसे वैकल्पिक रास्तों को सुझाते हैं। यह जनखदानइस उपन्यास के बहाने आदिवासी जीवन और समाज को अपने श्रम के सहारे स्वतंत्र रूप से अस्तित्ववान होने की न सिर्फ पहचान देता है,  बल्कि स्वातंत्र्योत्तर सरकार के समक्ष पूँजीवादी नीतियों के बरक्स जनवादी नीतियों को प्राथमिकता प्रदान कर विकास को सर्वांगीण बनाने की सदिच्छा को प्रकाशित करता है।

 आलोच्य उपन्यास में यह स्पष्ट देखने को मिलता है कि जनखदान तथा उससे जुड़े नए कार्य में मैना समेत तमाम आदिवासी लोगों को अपने भावी जीवन के आशा- स्वप्न दिखायी देते हैं। किंतु दुःखद बात यह होती है कि मुख्यधारा की समाज-सरकार इसकी तनिक भी परवाह नहीं करती है -‘‘सरकार को सदा सूचित करते रहने के बावजूद अभी तक जनखदान के प्रति उन्होंने कोई स्पष्ट  सकारात्मक रुख नहीं अपनाया। मजदूरी और अन्य खर्च के अलावा सारा कोयला आपके सामने छोटी पहाड़ी की शक्ल में फैला हुआ है। हमने सरकार को लिखा है कि यह कोयला उठाकर ले जाए लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया।’’8 यही नहीं, सरकार का पोषण करने वाले तथा उससे स्वयं पोषित होने वाले महेन्द्रबाबू जैसे मुख्यधारा समाज के पूँजीवादी लोग जनखदान को अपने अस्तित्व के लिए चुनौती मानते हैं।

 यहीं करण होता है कि यह वर्ग वह तमाम प्रयास करता है कि जिससे जनखदान के अस्तित्व को मिटाना संभव हो सके। इसी प्रक्रिया में मैना और शर्मा जैसे जननेताओं को निष्क्रिय करने तथा जनखदान के कामगरों को गुमराह करने की साजिश होती है;  सत्ता-समाज के आवांछनीय तत्त्वों -दलालों द्वारा जनखदान को लील लेने की धमकी भी दी जाती है। किंतु दिलचस्प बात यह होती है कि इससे जनखदान से जुड़े आदिवासी भयभीत नहीं होते हैं। इस उपन्यास के एक प्रसंग- शर्मा और महेन्द्रबाबू के प्रत्यक्ष संवाद - में आदिवासी समाज की प्रतिरोधी चेतना ही जाहिर होती है -‘‘ आप खुद नहीं लड़ सकते, भाड़े के गुंडे बुलाएँगे, हम खुद लड़ते हैं इसलिए कि हममें से हर कोई जानता है कि यह उनकी अपनी लड़ाई हैं। तीर-धनुष, बम, बन्दूक-लाठी गोली नहीं, लड़ती, लड़ता है आदमी के भीतर का नैतिक बल?’’9

 कहने का अभिप्राय यह है कि मैना समेत आदिवासी समाज अपनी असल ताकत को पहचान लेता है। यह ताकत उनका अपने जीवन-समाज के शोषण और लूट के खिलाफ समवेत प्रतिवादी स्वर होता है;  उनकी आपसी एकाशक्ति होती है, जो उनके जीवन के भावी संबल बनते हैं। इस उपन्यास में बाँसगड़ा आदिवासी समाज की एकाशक्ति और संगठित प्रतिरोधी चेतना ही उनकी धार कहलाती है।
 शर्मा जैसे जननेता इस धार के बने रहने में ही नहीं, बल्कि इसे दिनों-दिन प्रखर बनाने में बाँसगड़ा के आदिवासी समाज का भला देखते हैं। तभी वे आदिवासी लोगों को उत्प्रेरित करते हैं -‘‘यह छोटी-सी जनखदान भी किरकिरी बन गई है आँख की। चारों तरफ भेडि़यें गुर्रा रहे हैं। वे हमें खा जाने पर आमादा हैं लेकिन क्या हम उनके नापाक इरादे पूरे होने देंगेनहीं ! हर्गिज नहीं। इसलिए हमें धार की जरूरत है, सतत सान से ताजा होती धार-चाहे हमें कोई भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े’’ ‘‘सारा लोहा उन लोगों का, अपनी केवल धार।’’10 यहाँ कहने की जरूरत नहीं है कि शर्मा के उक्त कथन में उपन्यासकार की आदिवासी जीवन-समाज के प्रति होने वाली गहरी चिंता और संवेदना साफ जाहिर होती है।

उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में बाँसगड़ा आदिवासी समाज की धार ही, जनखदान जैसे विकल्प को जन्म देती है, जो उनके श्रमशील जीवन को एक नया अस्तित्व प्रदान करता है। किंतु, यह जनखदान तथा उससे जुड़ी जीवन-प्रक्रिया उन लोगों को नहीं सुहाती है जिन्हें आदिवासी समाज के उन्नयन की फिक्र की बजाय मुनाफे,  केवल अपने मुनाफे की चिंता सालती है। जिन्हें आदिवासी समाज की जल-जंगल-जमीन पर जबरन अधिकार करना आता है। उनके श्रम को कौड़ियों के दाम खरीदना आता है। जिन्हें आदिवासी समाज की स्त्रियों की देह को भोगने-बेचने की सुधि लगी रहती है। जिन्हें आदिवासी युवकों को गुमराह कर अपना व्यावसायिक दलाल बनाने की चिंता रहती है। जिन्हें आदिवासी जन-जीवन की हँसी-खुशी और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं होता है,  वरंच उनकी सामाजिक-सांस्कृतिविशिष्टताओं की आड़ लेकर जिन्हें  प्रताडि़त करना आता है।

यही वजह है कि महेन्द्रबाबू समेत तमाम पूँजीवादी शक्तियाँ बाँसगड़ा आदिवासी समाज की धार तथा उकी रचना- जनखदान को अपने विलास-पूर्ण जीवन के लिए संकट मानती हैं। इसलिए महेन्द्रबाबू की पूरी जमात इस जनखदान तथा उसके नेतृत्व से भयभीत होकर लामबंद होती है ताकि, इस जनखदान को खत्म किया जा सके ।  आलोच्य उपन्यास में महेन्द्रबाबू का निम्न कथन उक्त सच को ही प्रकाशित करता है -‘‘ इलाके में अभी तक एक शाख थी। सिर उठाकर, भर नजर आँख में आँख डालकर कोई ताक दे, ऐसा लाल किसी माँ ने पैदा ही नहीं किया। जानगुरु हो माझी हड़ाम (प्रधान), नेता हो या अफसर-सब अपने था। बड़े हूलऔर छोटे हूल (संथाल परगना के हूल विद्रोह) हमारा कुछ खास न बिगाड़ सके। लेकिन जिस औरत और लौंडे को आप लोगों के कहने के चलते छोड़ते रहे वही आज सबसे बड़े सिरदर्द बन गए हैं। बाहर तो बाहर, घर के नौकर भी फोड़ ले गये ये। सब जनखदान।’’11

 विडम्बना तो इस बात की होती है कि महेन्द्रबाबू जैसे लोगों के कुकृत्य में दे की जनविरोधी सत्ता भी शामिल होती है। जिसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि सत्ता का जनविरोधी हाथ एक तरफ महेन्द्रबाबू के अवैध खदान को सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि दूसरी तरफ मैना समेत तमाम आदिवासियों की पहचान वाले जनखदान को, जो अपनी नेकनिष्ठा को पहले ही जाहिर कर चुका होता है, उखाड़ फेंकने को आगे बढ़ता है। क्योंकि, सत्ता का हित मैना या उसकी जमात के लोगों से नहीं, बल्कि महेन्द्रबाबू तथा उनके गिरोह से सधता है, जो सत्ता के चुनावी खेल को सफल करने का रणकौशल (जनबल-धनबल का प्रयोग) जानते हैं।

 मैना तथा उसके समाज की विडम्बना यह होती है कि जिस सत्ता-सरकार को जनखदान की नेक-भावना को समझना चाहिए होता है,  वही अपनी क्रूरता में उस पर बुलडोजर चलवा देता है -‘‘ बुलडोजर इन्दिरा गाँधी जनकल्याण खदानको पाटने गया है। सामने इंदिराजी का आशीर्वाद देता हाथ है,  जैसे ट्राफिक का सिग्नल हो। बुलडोजर ठिठक जाता है। आगे नहीं बढ़ता,  वापस मुड़ता है। अरे भागो, जनखदान की ओर आ रहा है लो ढलान की ओर बढ़ा मैना! कहाँ है मैना   ? बुलडोजर को संभ्रम हुआ -फिर एक मूरत इन्दिराजी की! अरे यह तो मैना है, यहाँ की मजूरन।हट जाओ सामने से।जवाब में सिर्फ एक खिलखिलाहट । बुलडोजर जो मूर्ति को बचाने के चलते चोरों की खदान ध्वस्त नहीं कर सका, इस बार दुविधा त्यागकर जिंदा मैना को रौंदते हुए चला गया।’’12  स्पष्ट है कि सत्ता को सिर्फ अपनी फिक्र सताती है, इसलिए वह उस मूर्ति को तवज्जो देती है, जो निर्जीव होकर भी उसे शासन करने का बार-बार मौका देती है, किंतु वह जिंदा हाड़-माँस की स्त्री या उसके समाज की जनाकांक्षा की तनिक भी परवाह नहीं करती है जिसकी सेवा के नाम पर वह चुनी जाती है।

पर सत्ता का यह दमन मैना को नहीं मार पाता है। इस उपन्यास में यह देखने को मिलता है कि जनखदान से जुड़े मैना के तमाम साथियों जिनमें शर्मा, पंडा, माँझी और बीसों गाँव के बहुतरे लोग होते हैं, जिन्हें अंधी और भ्रष्ट सत्ता अपराधी (मजदूर की बजाय) मानती है और हाजत में ठूस देती है उनमें मैना का कहीं कोई जिक्र नहीं रहता है। क्योंकि, मैना हर उस जगह होती है, जहाँ शोषण और अन्याय के विरोध में प्रतिकार चेतना संगठित हो रही होती है।

वह लछमनपुर के उस सूती मिल के परिवेश में भी जिंदा रहती है, जहाँ मजदूरों का शोषण किया जा रहा होता है। और उस आदिवासी समाज में भी, जिसे मुख्यधारा समाज की पँजीवादी शक्तियाँ गंदला और विषाक्त करने में;  उसकी खनिज सम्पदा को सत्ता के साथ मिलकर लूटने में लगी रहती है। मैना ही आदिवासी-जीवन-समाज की धार का प्रतीक बनती है। जिसके प्रयास –जनखदान, को तो निरस्त किया जा सकता है, किंतु उसकी धार- आदिवासी जीवन-समाज की एकाशक्ति और उनकी संगठित प्रतिकार चेतना को खत्म करना संभव नहीं होता है। यही इस उपन्यास की मूल संवेदना होती है।

            वैसे देखा जाए तो इस उपन्यास में मैना ही केन्द्रीय चरित्र है और उसकी कथा  ही मुख्य धुरी| किंतु, इसके अतिरिक्त भी इस उपन्यास में कई ऐसे पात्र होते हैं, जो समग्रता में आदिवासी जीवन-समाज को जाहिर करते हैं | जिसका संश्लिष्ट उद्घाटन उपन्यासकार का निहितार्थ होता है। उदाहरणस्वरूप इस उपन्यास में मंगर का चरित्र तथा उसके अंतर्द्वंद्व से  आदिवासी जीवन-समाज की सभ्यता-संस्कृति,  उनके रहन-सहन से मुख्यधारा समाज की घृणा और विलगाव रूपी वह संस्कार उद्घाटित होता है, जो सदियों से उनके भीतर पलता हुआ एक ग्रंथि का रूप ले लेता है।

 इसी तरह जानगुरु ओझा,  टेंगर और फोकल के चरित्र से आदिवासी जीवन-समाज की अंदरुनी कमजोरियाँ उजागर होती हैं | जिसमें शामिल रहता है उनका सामाजिक-धार्मिक अंधविश्वास,  भोली मानसिकता, उच्छृंखल कामनायेँ आदि | ये सब भी आदिवासी जीवन –समाज की  दुर्गति के कारण बनते हैं | उनकी इन कमजोरियों का लाभ पँजीवादी शक्तियाँ (महेन्द्रबाबू जैसे लोग) उठाती हैं | वे  नका इस्तेमाल अपने स्वार्थपूर्ण हितों को साधने में करते हैं। इसी भाँति शर्मा तथा उसके साथियों के चरित्र से मुख्यधारा समाज से, क्षीण रूप में ही सही,  उठने वाली साम्यवादी चेतना झलकती है, जो सबका समान विकास होने की आवाज उठाती है। चाहे वह मुख्यधारा समाज का वंचित-शोषित वर्ग हो या सदिेंयाँ से अस्तित्वहीन समझा जाने वाला आदिवासी जीवन-समाज। इसी तरह रमिया, सितवा, मैना की माँ तथा अन्य आदिवासी स्त्रियाँ का चरित्र आदिवासी समाज में नारी-दुर्गति और नारी-शोषण का सच दिखाते हैं।

 इस प्रकार समग्रता में कहा जाय तो संजीव का आलोच्य उपन्यास धार’,  मैना और उसके समाज की कथा के माध्यम से विहार, अब झारखंड राज्य के आदिवासी जीवन-समाज (संथाल परगना) को जीवंत करने का प्रयास करता है। जहाँ आदिवासी जन –जीवन स्वतंत्रता के वर्षों बाद भी बुनियादी जरूरतों के अभाव से गुजर रहा होता है। जहाँ मुख्यधारा की पँजीवादी शोषक शक्तियां उनके जल-जमीन-जंगल को हड़पने तथा उसे विषाक्त करने हेतु सदा सचेष्ट रहती हैं जहां सत्ता का भ्रष्ट रूप आदिवासी जीवन-समाज की सम्पदा की लूट को तो खुली छूट देता है किंतु, उनकी जनाकांक्षा- जनखदान की तनिक भी परवाह नहीं करता है।

संजीव का यह उपन्यास अपने कथ्यात्मक कैनवास में, मैना तथा अन्य गौण चरित्रों के माध्यम से आदिवासी जीवन-समाज के शोषण, संघर्ष और स्वप्न को पूरी गंभीरता से प्रस्तुत करता है। साथ ही उनका उपन्यासकार अपने निहितार्थ में, संपूर्ण समाज को अपने आस-पास अविकसित, वंचित पड़ी आदिवासी जाति और समाज को आगे बढ़कर थामने का आहवान भी करता है,  ठीक कवि भवानी प्रसाद मिश्र की इन संवेदनात्मक पंक्तियों की भाँति- ‘‘मुझे कोई हवा पुकार रही है/ कि घर के बाहर निकलो / तुम्हारे बाहर आए बिना एक समूची जाति एक समूची संस्कृति हार रही है।’’13

   संदर्भ
1.    उद्धृत, वर्तमान साहित्य, अप्रैल 2009
2.    उद्धृत आलोचना, अक्टूबर-दिसम्बर, 2008
3.  संजीव,धार उपन्यास,राधाकृष्ण प्राइवेट लिमिटेड,दरियागंज नई दिल्ली,प्रथम संस्करण:1990,पृ  22
4.         उद्धृत, पृ़. 39
5.         उद्धृत, पृ़.  54
6.         उद्धृत पृ.  54
7.         उद्धृत, पृ.  55
8.         उद्धृत, पृ.  157
9.         उद्धृत, पृ .146
10    .उद्धृत, पृ. 157-158
11    .उद्धृत, पृ. 168
12.    उद्धृत, पृ. 199
13.    सिंह, विजय बहादुर (संपादक), भवानी प्रसाद मिश्रः परिचय एवं प्रतिनिधि कविताएँं, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, संस्करण: 1986, पृ. 104
                                                    
डॉ.धनंजय कुमार साव
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कालियागंज कालेज, उत्तर दिनाजपुर,पश्चिम बंगाल, पिन 733129 
संपर्क:-09474439158, ईमेल –shawdhananjay10@gmail
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template