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संस्मरण:मेरे यादव अंकल –मोहम्मद उमर

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, नवंबर 16, 2016 | बुधवार, नवंबर 16, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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                         संस्मरण:मेरे यादव अंकल –मोहम्मद उमर

कई बरस पहले,आई आई टी कानपुर की बात है। हमारे मोहल्ले की रामलीला चल रही थी। राम जी वनवास जा चुके थे। दशरथ जी बिस्तर पर पड़े अपना संवाद बोल रहे थे। धपाक की जोरदार आवाज हुई। ऊपर से एक हट्टा-कट्टा जवान लडका, शैया पर लेटे दशरथ जी की छाती पर धम्म से आ गिरा था। दशरथ जी घायल हो गये। अफरा तफरी मच गई। फौरन एम्बुलेंस बुलाई गई । दशरथ जी को लाद-फाद कर अस्पताल ले जाया गया। बेचारे की जान जाते जाते बची। असल में आज की लीला में स्पेशल इफेक्ट लाने के लिए यादव अंकल ने कुछ नवाचार किया था। यादव अंकल हमारे मोहल्ले में ही रहते थे और हर साल रामलीला कमेटी में उन्हें साज सज्जा मंत्री का पद दिया जाता था। इस पद को वे बहुत ही जिम्मेदारी से निभाते थे। लीला की प्रस्तुति से लेकर दशहरा मेले में लटटू बल्ब टांगे जाने तक की व्यवस्थाओं में उनके मार्गदर्शन में ही काम होता था।
आज के दृष्य में वो दशरथ के प्राण पखेरू उड़ते हुए दिखाना चाहते थे। मंच के चारों कोनो और ऊपर की तरफ लोहे के मोटे पाइप लगे थे। एक टेंट वाले लड़के को सीढ़ी के सहारे ऊपरचढ़ाकर उन्होने पहले ही बिठा दिया था। ऊपर छत के तंबू में छिपा यह लड़का दर्शकों को नहीं दिखता था। पतले नाइलोन की रस्सी के एक सिरे पर बैटरी से जलने वाला लाल बल्ब टांग दिया गया था। रस्सी का दूसरा सिरा ऊपर पाइप पर बैठे लड़के के हाथ में था। तय था, कि दशरथ जी को मरने के साथ ही बल्ब का बटन दबाना है  और ऊपर बैठा लड़का धीरे धीरे नाइलोन के धागे को उपर खींच लेगा। इस तरह मैदान में बैठे दर्षकों को दषरथ जी की आत्मा लाल दीपक के रूप में ऊपर की ओर जाती हुई दिखाई पड़ेगी। लेकिन..........सब प्लान फेल हो गया। ऊपर बैठा लड़का अपना संतुलन नही बनाए रखा सका और इतनी ऊपर से आकर धपाक से दशरथ जी की छाती पर आ गिरा। बच गए दशरथ जी के प्राण पखेरू, नही तो सच मुच ही ऊपर चले जाते.....बगैर लाल बत्ती जलाये ही। कमेटी के लोगों ने यादव अंकल को दोबारा ऐसे खतरनाक आइडिया न लगाने की सलाह दी।

यूँ तो, यादव अंकल का पूरा नाम शिवनाथ यादव था। जिसे वे एस.एन. यादव लिखा करते थे, लेकिन मोहल्ले के हम सब बच्चे उन्हें यादव अंकल के बजाय ‘यादो’अंकल ही कहते आ रहे थें। अब पता नही कि ये हम सबका उच्चारण दोष था या भाषा पर क्षेत्रीयता का प्रभाव, पर बच्चों के साथ बडे भी उन्हें यादो जी ही कहते थें। यादव अंकल की सबसे पुरानी छवि जो मेरे जेहन में अब भी बसी है, वह तब की है जब मेरी उम्र सात आठ साल की रही होगी। गहरा सांवला रंग , खिलाड़ियों वाली टी- शर्ट में तगड़ा कसरती शरीर, रोबदार मूछें। एक बड़े से गत्ते के डिब्बे में कई फुटबाल, गेंद, बल्ला और तमाम खेल का सामान रखा था। हम सभी बच्चे मधुमक्खी की तरह छेंक कर बैठे थें। यादव अंकल बता रहे थे कि सामने के बड़े मैदान को, जो तब उबड-खाबड़ सरपत और कंटीली झाडियों वाला चरागाह हुआ करता था, तैयार करके बडा खेल मैदान बनाया जाएगा। यह सुनकर हम सब बच्चे बडे खुश हुए थे। यादव अंकल उस समय शायद आई आई टी कानपुर संस्थान के कर्मचारियों के संगठन की तरफ से क्रीडा मंत्री जैसे पद पर हुआ करते थे। उनकी सबसे पुरानी याद मेरे दिमाग में बतौर एक खिलाडी के रूप में ही अंकित है।

मुझे याद है, उन दिनों हमारे ब्लाक- बारह घरों वाली दो मंजिला बिल्डिगं जिसमे छह घर नीचे थे और छह घर उपरमें, टी.वी. सिर्फ दो घरों में ही था। एक तो ऊपर मकान नम्बर 124 में निगम आन्टी के यहाँ और दूसरी मकान न. 117 में गुप्ता अंकल के घर। मोहल्ले का सिनेमा हाल गुप्ता जी का घर ही हुआ करता था। निगम आन्टी के घर तो हम सब कभी कभार ही जाते थे। हम बच्चे टी.वी. के पास घुसकर सबसे आगे जमीन पर बैठ जाया करते थे, जबकि बड़े लोग पीछे रखे तख्त और कुर्सियों पर बैठ पोग्राम देखते थे। आमतौर पर फिल्म,चित्रहार, रामायण और महाभारत जैसे पोग्राम के दौरान ज्यादा भीड हो जाया करती थी। आई.आई.टी. के पीछे बसे गाँव के लोग भी टी.वी. देखने गुप्ता अंकल के घर चले आया करते थे। काफी लोग एक भीड़ के रूप में दरवाजे के बाहर से ही खड़े-खड़े टी.वी. देखा करते थे।

बाहर खेलते हम बच्चों को जैसे ही अपने पसंदीदा कार्यक्रमों के शुरू होने की आवाज आती हम भीड़ को चीरते हुए सबसे आगे जाकर, बिल्कुल टी.वी. के पास बैठ जाते थे। यादो अंकल की कुर्सी ठीक दरवाजे के पास होती थी। वे वहां बैठे बैठे ही अपनी कमेंट्री जारी रखते थे। हम बच्चों का ध्यान टी.वी. के साथ ही यादव अंकल की बातों पर भी होता था। अक्सर वो आगे घटने वाली घटना को पहले ही बोल जाया करते थे। कई बार तो बहुत गुस्सा लगती थी। हम बहुत चाव से मिथुन की फिल्म देख रहे होते और यादव अंकल पीछे बैठे दिलीप कुमार, गुरूदत्त और राजेन्द्र कुमार आदि का बखान करने लगते। हम बच्चे मार-धाड़ से भरपूर फिल्म पसंन्द करते थे और वो बडों के साथ मिलकर जय संतोषी माँ और पाकीज़ा टाइप फिल्मों की चर्चा शुरू कर देते थे। हम लोगों को बिल्कुल अच्छा नही लगता था।

एक दिन इन्ही गुप्ता अंकल के घर पर लगी टी.वी. में हम बच्चों ने धर्मेन्द्र की एक फिल्म यादों की बारात देख ली थी।फिल्म में एक गीत था.....यादों की बारात निकली है दिल के द्वारे। यह गाना हम बच्चों की जुबान पर चढ गया था। इसके बाद कई दिनों तक हम बच्चे यादो जी को आता जाता देख छिपकर यही गीत ...यादो की बारात निकली है दिल के द्वारे....गुनगुनाया करते थे। कुछ दिनों तक तो यादव अंकल समझ ही नही पाते थे कि यह गीत उनके लिए ही गाया जा रहा है, लेकिन फिर वे समझने लगे थे। एक दिन तो हम बच्चों को इसी बात को लेकर जोरदार फटकार भी पड़ी थी।

यादव अंकल को पौधे लगाने का बड़ाशौक था। अपने घर के आगे पीछे की छोटी छोटी क्यारियों में उन्होने तमाम किस्म के पौधे लगा रखे थे। नागफनी , हडजोड, गुलाब,गेंदा,अंगूर,अनार,डहेलिया,गेंदा, पपीता, शहतूत....और न जाने क्या क्या। दूर दराज़ भी किसी की हड्डी- वड्डी टूटती तो उसके घर के लोग हडजोड के डंठल मांगने सीधे यादव अंकल के घर चले आते थे। यादव अंकल हडजोड के डंठलों के साथ ही ढेर सारी हकीमी सलाह भी मुफ्त दे दिया करते थे।

यूँ तो हम बच्चे पूरी दोपहरी आसपास के सभी घरों की क्यारियों में लगे फलों पर धावा बोला करते थे , परंतु यादव अंकल की क्यारी में एक साथ कई विकल्प होते थे। वहां से फल चुराने में कुछ ज्यादा ही मजा आता था। उनकी क्यारी में लगा पपीते का एक पेड़ फलों से लदा पड़ा था। एक बडा सा पपीता पीला हो चला था, पर यादव अंकल शायद उसे अभी और पकने देना चाहते थे। सो वह अगले दो तीन दिन भी लटका ही दिखता रहा। हम बच्चों ने एक दोपहरी, सब से छुपकर उसे तोड लिया। छत पर ले गये। एक दोस्त के घर से चाकू लाकर उसे छील काट निपटा दिया। शाम को यादव अंकल खूब बड़बड़ाए  पर ये न जान सकें कि वारदात को अंजाम देने में कौन -कौन शामिल था।

अगली सुबह जब मै सो कर उठा तो मुझे बुलवाया गया। वहां दो दोस्त पहले से ही कान पकडे खडे थे, हमारे एक दोस्त की बहन, जिसने चाकू से पपीते की फाक काटकर हम सब का हिस्सा लगाया था, वह सरकारी गवाह बन गई थी। उसकी सजा तो माफ हो गई पर हम लोगों को काफी देर तक मुर्गा बनाया गया। मुर्गा बनकर भी संतोष था। पपीता था बडा लाजवाब। ऐसे पपीते के लिए दस बार मुर्गा बनना भी गवारा है।

एक सुबह हमने देखा कि यादव अंकल कुछ बनाने में व्यस्त हैं। हम सब बच्चे उन्हें घेर कर खड़े हो गए। वे एक बड़े से बांस के उपरी सिरे पर साईकिल का टायर बांध रहे थे। हम बच्चों को उन्होने कुछ सेठा तोड़कर लाने का काम सौंपा। कुछ ही देर में हम लोग सेठा तोड़ लाए। यादव अंकल ने सेठे की छड़ी को तोडकर टायर में इस तरह से फॅसा दी थी कि दूर से वह एक चक्र जैसा दिखने लगे। फिर इस चक्र को उन्होने हरे रंग के कपडे से लपेट डाला था। उन्होने बहुत लंबे,मोटे से बांस के उपरी हिस्से पर यह चक्र टांग दिया और अपने मुख्यद्वार पर गाड़ दिया। ये जनता दल पार्टी का चुनाव निशान था, जिसे यादव जी सपोर्ट कर रहे थे। साईकिल के टायर से बना यह चक्र अगले कई दिनों तक हम सभी बच्चों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा।


तब के चुनाव बच्चों के लिए बडे ही रोचक हुआ करते थे। आज जैसा नही था कि भाषण और सिर्फ भाषण।तब तो भोंपू बजाती जीपें आती, सब बच्चे उनके पीछे दौड पड़ते। जीप में सवार लोग ढेर सारे बिल्ले,टोपी उछाल कर जाते थे। ये पंजे वाला बिल्ला, ये चक्र वाला बिल्ला .....और न जाने क्या क्या। रोज सुबह उठकर हम लोग सबसे पहले बाहर भागते और यादो अंकल के दरवाजे पर लगे बड़े से चक्र को देखते।यादो अंकल को राजनीति में गहरी रूची थी। आई आई टी कानपुर जहाँ के वे कर्माचारी थे , वहां संगठन चुनाव से लेकर, पार्षद,विधायक और सासंद तक के चुनावों में उनकी बहुत ही सक्रिय भागीदारी हुआ करती थी।
बहुत ही उत्सवधर्मी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे यादव अंकल। यूँ तो वे सभी त्योहार उत्साह से मनाते थे, परंतु दीपावली और जन्माष्टमी की उनकी तैयारियां देखते ही बनती थी। उनके पास बिजली के झालर का बरसों पुराना सैट था जिसे वे प्रत्येक दीपावली में सुबह ही निकालकर बरामदे में फैला लेते और फिर दिनभर टेस्टर हाथ में लेकर एक एक बल्ब चैक करते हुए झालर को दुरूस्त करते थे। कई बार तो उन्हे अंधेरा होने तक भी जुटे रहना पडता था। लेकिन हाँ, एक बार जो झालर टॅग गई तो महीना डेढ़ महीना द्वार पर टॅगी ही रहती थी। जनमाष्टमी का तो कहना ही क्या.... सप्ताह भर पहले से ही तैयारियांशुरू  कर देते थे। कृष्ण जी की झांकी सजाते थे। लोग दूर -दूर से यादव जी की झांकी देखने आया करते थे। हम बच्चे स्कूल से लौटते समय अलग अलग तरह के पत्थर खोजते हुए आते थे। ये पत्थर झांकी में पर्वत बनाने के काम आते थे।

लगातार कई साल ये काम करके हम लोग जाने गए थे कि यादव अंकल को कौन से पत्थर पसंद आते हैं। एक कत्थई रंग को हल्का पत्थर होता है...कुछ स्पंज जैसा । इस पत्थर का बना पहाड़ बहुत शोभा देता था। यादव अंकल रूई की परत बिछाकर नदी और झरना बना देते थे, मोरपॅखी और आम के पत्तों से पेड पौधे,जंगल आदि बनाते थे। छोटे से पालने में किशनकन्हैया लेटे होते और हम बच्चे बारह बजने का इंतजार करते थे। यादव अंकल का कहना था कि बारह बजते ही खीरा अपने आप फट जाएगा और तब कृष्ण जी का जन्म होगा। हम लोग अपनी आखों सेखीरा फटते हुए देखना चाहते थे, पर ठीक बारह बजने के पहले यादवजी हम सब बच्चों को बाहर कर झांकी पर परदा डाल देते और फिर दस-बीस मिनट बाद ही पंजीरी और चरनामृत बाटने बाहर आते थे। हर साल कृष्ण जी का जन्म होते हुए न देख पाने का मलाल तो होता था पर पंजीरी और चरनामृत पाकर हम लोग सब भूल जाते थे। अगले दिन सुबह एक पुड़िया पंजीरी और मिल जाया करती थी। पंजीरी बहुत खाई है पर यादव अंकल के घर जैसी पंजीरी आज तक नही मिली। आंटी बहुत जतन से सारी प्रसाद सामग्री बनाती थी।

यादव अंकल ने मोहल्ले के सभी बच्चों का नामकरण अपनी ही स्टाइल में कर रखा था। कईयों के तो बाप के नाम में ही जूनियर लगाकर बुलाया करते थे। मेरे बड़े अब्बा के बच्चों के नाम जैसे गयासुददीन में आने वाले दीन को लेकर आगे कुछ भी जोडकर वो एक नया नाम बना लेते थे। किसी को कमरूददीन तो किसी को सफरूददीन बना देते थे। छोटे भाई जफर को तो अभी तक भी वो आदावदीकहकर ही बुलाते थे। जैसा मैं अब समझ सका हूँ कि ये आदावदी शब्द असल में आदाब अर्ज का अपभ्रषं रूप रहा होगा।

स्कूल की परीक्षाओं का पेपर देकर लौटते ही यादव अंकल हम सब बच्चों को अपने पास बुला लेते और पूछते कि किस सवाल के लिए क्या लिखा है ? उनके ऐसा करने से हम सब बच्चे बहुत डरते थे क्योंकि तुरंत सबके माँ -बाप को फीडबैक मिल जाता था कि कौन, कैसा पेपर करके आया है। यही हाल रिजल्ट मिलने वाले दिन भी होता था। वे एक -एक बच्चे को बुलाकर उसका रिजल्ट देखते थे। अच्छे नम्बर लाने वाले को शाबासी देते और फेल होने वाले को तसल्ली देकर आगे मेहनत करने को प्रोत्साहित करते थे। 

वह स्वभाव से संवेदनशील आदमी थे। मेरी दादी के इंतकाल के समय सब कामों में आगे रहकर उन्होने एक अच्छे पड़ोसी की जिम्मेदारी निभाई थी। कब्र खोदे जाने से लेकर कफन-दफन तक, सबमें साथ रहे थे। वहां कब्रस्तान के पास की नहर के पानी से एक खेत सींचा जा रहा था। उस बहती हुई नाली में यादव अंकल ने अपने हाथ पैर धोयें और सिर पर रूमाल रखे हम सब के पास आकर बोले वो पानी पाक है सब लोग जाकर वुजु बना लो। जनाजे की नमाज के वक्त मैने देखा कि उन्होने भी अपने सर पर रूमाल रखकर ठीक वैसा ही अहतराम किया जैसा बाकी मुसलमान कर रहे थे। उस दिन मुझे समझ आया कि यादव अंकल सिर्फ अपने धर्म के बारे में ही नही बल्कि दूसरे धर्म के रिवाजों को भी खूब अच्छे से समझते हैं। उनके मन में सभी धर्मों के लिए खूब सम्मान था। आज मै जब कभी किसी चर्चा में या टी.वी. की बहसों में सैक्यूलर या समाप्रदायिक सौहार्द जैसा शब्द सुनता हूँ तो यादव अंकल का चेहरा सामने घूम जाता है। यह भी सोचता हॅू कि मैं आज जैसा हूँ , जिन विचारों को मानता हॅू, उसमें यादव अंकल जैसे लोगों के सानिध्य ने भी अवश्य ही प्रभाव डाला होगा।

एक समय ऐसा भी आया था जब उत्तर प्रदेश के हिन्दु मुसलमान के दिलों में एक दूसरे के लिए खूब नफरत भर दी गई थी। कानपुर में जबरदस्त दंगों का दौर जारी था। आई.आई.टी. कानपुर जैसे संस्थान के भीतर भी कुछ संगठनों द्वारा आए दिन जुलूस निकालना और शोर –शराबा करना होता रहता था। पूरे कैंपस में चार-छह घर ही मुसलमान थे। सब डरे सहमे रहते थे। अक्सर घर पर अम्मा अब्बा में बातचीत होती थी की अगर रात बिरात कहीं छिपना पड़े तो किसके घर पनाह मागना ठीक होगा। उस वक्त एक ही घर सूझता था – यादव अंकल का घर। सच में,यूँ तो सारा मोहल्ला ही अपना था पर ऐसे वक्त में सबसे ज्यादा ऐतबार यादव अंकल के घर पर ही बन पाता था।

सबके साथ हॅसने हॅसाने वाले यादव अंकल अब समय बीतने के साथ ही काफी परेशान और बीमार से नजर आने लगे थे। डाक्टरों ने बताया था कि उनको दमा की बीमारी है, लंबा इलाज करना पड़ेगा। इधर घर पर होने वाली बातों से पता चला कि कई साल पहले यादव अंकल का तबादला एक विभाग से दूसरे किसी विभाग में किया जा रहा था। वे नही माने, दूसरे विभाग में जाने से इन्कार कर दिया। उधर प्रशासन भी अपनी जिद पर अड़ा रहा। मामला इतना बिगड़ाकी कोर्ट कचहरी तक जा पहुंचा । कोर्ट कचहरी के फैसले इतनी जल्दी कहाँ सुलझते हैं। मामला बहुत लंबा खिच गया। इस दौरान यादव अंकल सस्पेंड कर दिए गये। पिछले कई बरस से उन्हें अपने मूल वेतन का कुछ ही हिस्सा मिल रहा था। इसी में वे अपने दमे का इलाज, पत्नी के ब्लड प्रेशर और तीन बेटियों की पढ़ाई का खर्च किसी तरह से पूरा करते आ रहे थे। स्वाभिमानी इतने थे कि अपनी परेशानियों को कभी लोगों के सामने जाहिर भी नही करते। बच्चों से तो हमेशा ही उनको प्यार रहा। पुराने पड़ोसियों के नाती-पोते और नए पड़ोसियों के बच्चे तो उनकी गोद में ही खेलकर बड़े हुए हैं। अपने माँ -बाप से ज्यादा यादव अंकल और यादव आंटी को ही पहचानते हैं।

समय बीतता गया। काम काज के चलते मेरा कानपुर छूट गया। साल छह महीने में जाना आना होता तो सबसे मुलाकात हो जाया करती थी। यादव जी से भी दुआ सलाम हो जाती थी। बातचीत में पता चलता था कि उनका कोर्ट केस और भी जटिल रूप लेता जा रहा है। प्रशासन तरह तरह से उनको परेशान करने लगा था। इस सिलसिले में उन्हे हाईकोर्ट के कई चक्कर लगाने पड़ते थे। गाँव के खेत से मिला कुछ राशन जरूर आ जाया करता था लेकिन दूसरे खर्च पूरा करने के लिए यादव जी ने बच्चों को टयूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। कोर्ट कचहरी और अपनी बीमारी से जूझते हुए भी यादव जी ने अपनी बेटियों को अपने पैरों पर खडा किया। तीनों अच्छा पढ़ लिख गई और घर को आर्थिक सहयोग देने लगी हैं। बडी की शादी हो चुकी है। मॅझली ने बचपन से ही अपने पिताजी को अदालतों में दौड़ते देखा है। इसलिए वह वकालत की पढ़ाई पूरी कर स्थानीय कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही है। उसे उम्मीद थी की पिताजी के केस में वह मदद कर सकेगी। छोटी वाली पास के निजी स्कूल में बतौर शिक्षिकापढ़ाने लगी थी।

बेटियों के सहारे अब आर्थिक परेशानियाँ तो काफी हद तक कम हो गई थीं लेकिन कुछ दूसरी समस्याएं सामने आने लगी थी। गाँव में चचेरे भाइओं ने यादव जी की खेत जमीनों पर कब्जा़ जमा लिया था। इस सिलसिले में कुछ और केस में दौड़ भाग बढ़ गई थी। इधर उम्र के साथ -साथ दमा भी अब ज्यादा परेशान करने लग गया था। सर्दियों में तो उनकी ऐसी साँसचढ़ जाया करती कि लगता अब गए कि तब। बिटिया ने सांस देने की मशीन घर पर ही ला कर रख ली थी। अब रात बिरात उसी के सहारे उनको कुछ राहत दे दी जाती और सुबह होने पर अस्पताल लेकर भागते थे।अभी दो तीन साल पहले पता चला कि वे बरसों से चल रहा अपना केस हार गये हैं। सरकार ने उनकी सेवा तत्काल समाप्त करके सरकारी मकान भी वापिस ले लिया है। अब वे पास की ही एक बस्ती में दो कमरे का छोटा सा किराये का मकान लेकर रह रहे हैं।

आज सुबह अम्मा का फोन आया। आमतौर पर अम्मा शाम को ही फोन करती हैं। सुबह का फोन देखकर ही लगा कि कुछ खास बात होगी। अम्मा ने बताया कि यादव अंकल अब इस दुनिया में नही रहे, आज सुबह तड़के ही उनका इंतकाल हो गया। अपने दमे की वजह से सुबह चार बजे उनकी सांसे थम गई थी। कल रात तक ठीक ठाक थे। पूरी सर्दियाँ पार कर आए थे। रात को अच्छे भले सोये थे। सुबह उनकी साँस उखड़नाशुरू हुई। हमेशा की तरह घर वालों ने मशीन लगाकर कुछ राहत देने का प्रयास किया, पर बात नही बनी। सुबह तड़के सब उन्हें लेकर पास के अस्पताल भागे जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

अतीत का सारा दृश्य मेरी आँखों के सामने कौंध रहा है ,एक के बाद एक चलचित्र की तरह उनका बनाया हुआ साइकिल के टायर का चक्र , लाल बल्ब से बनी दशरथ की आत्मा, पत्थर के पहाड़ों से गिरती रूई की परत की नदी, उनके पेड़ का पपीता और पॅजीरी की पुड़िया सब कुछ आँखों के सामने तैरती जा रही हैं। पाठकों ! वे एक जिंदादिल इन्सान थे इसलिए ऐसे लोगों का मरना, मरना नहीं होता,जिन्दा रहेंगे तब तक, जिन्दादिली और इंसानियत की जरूरत रहेगी जब तक।

ग़ालिब के शब्दों में,
‘बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना’

अपने यादो अंकल की याद में........
      मोहम्मद उमर
                   संदर्भ व्यक्ति(गणित) अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन,राजसमन्द
       संपर्क:9001565000,mohammed.umar@azimpremjifoundation.org
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