काव्य-लहरी:सरिता पन्थी की कविताएँ - अपनी माटी

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बुधवार, नवंबर 16, 2016

काव्य-लहरी:सरिता पन्थी की कविताएँ

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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काव्य-लहरी:सरिता पन्थी की कविताएँ
स्त्री स्वर 
नही बन सकती
हर किसी के लिए अच्छी....
नहीं रख सकती मैं,
हर किसी को खुश....
थक गयी हूँ मैं
सबकी उम्मीदों पर
खरा उतरते उतरते...
मेरा भी दिल करता है
मैं भी गलतियां करूँ..
हर सांस का जवाब
नही दे सकती मैं..
आती है तो क्यों आती है..
जाती है तो क्यों जाती है..
थक गयी हूँ मैं..
सबके अनुसार खुद को
ढालते ढालते..
जरुरी नही मेरी हर बात
अच्छी ही हो..
जरुरी नही मैं जो करूँ
वो सही ही हो..
मुझे भी अपनी गलतियों से
सीखने का हक़ है..
भूल गया है ये दिल भी धड़कना..
धड़कने से पहले 
इजाजत लेनी होती है इसे भी..
शायद थक गया है..
इसलिए अब धड़कना भी नही चाहता. 

सिगरेट का टुकड़ा
महँगी सस्ती कोई भी
हो सकती हूँ।
सजी सजाई, चुस्त दुरुस्त
सलीके से पैक की हुई।
कहीं कोई कमी नही,
कोई शिकायत का मौका भी नही।
निकाला जाता है मुझे
नयी नवेली दुल्हन की तरह
बड़ी अदायगी के साथ,
फिर जलाया जाता है।
बड़े प्यार से होंठों से
चूमा जाता है।
हर एक कश में मैं
पीनेवाले में समाती
चली जाती हूँ।
दोनों के एक होने का
संकेत देता है
नाक से निकलता धुँआ।
जो ये बताता है कि हाँ,
मैं पीनेवाले में समा चुकी हूँ।
हर कश के साथ
मैं मिटती चली जाती हूँ।
और अंत में एक 
ठूंठ बनकर रह जाती हूँ।
अब मुझमें ना वो स्वाद है।
ना रूप है और ना ही नशा।
बड़ी बेदर्दी से जूते के नीचे
फेंककर मसल दी जाती हूँ।
क्योंकि अब मुझमें
कुछ नही बचा.....
मैं एक सिगरेट का टुकड़ा...


हाँ में किन्नर हूँ ||
हँसते हो तुम सब मुझको देख
नाम रखते हो मेरे अनेक||
सुन्दर सुन्दर उसकी रचना
मेरी ना किसी ने की कल्पना||

ईश्वर ने किया एक नया प्रयोग
स्त्री पुरुष का किया दुरूपयोग||
जाने क्या उसके जी में आया
मुझ जैसा एक पात्र बनाया||

तुम क्या जानो मेरी व्यथा
कैसे मैं ये जीवन जीता||
घूंट जहर का हर पल पीता
क्या जानो मुझपे क्या बीता ||

नारी मन श्रृंगार जो करता
पुरुष रूप उपहास बनाता
तन दे दिया पुरुष का
और मन रख डाला नारी का||

गलती उसने कर डाली
तो मैं क्यों होता शर्मिंदा
भोग रहा हूँ मैं ये जीवन
रह सकता हूँ मैं जिन्दा||

तुमको तो दीखता है तन
मुझको तो जीना है मन||
हँस देते सब देख मुझे
हाय मेरी ना कभी लगे तुझे||


नारी
चार दिवारी में रहे
दुःख हजार सहे
दिल का दर्द 
कभी ना किसी से कहे||
निरीह है निरर्थक है
निष्प्रयोजन निष्काम है
उसकी ही कृति में
होता ना उसका नाम है||
दया ममता संवेदना
सब उसकी ही खोज है
जीवन उसका समर्पित
दुनिया पर वो बोझ है||
जो छोड़कर लाचारी
लांघ देती चार दिवारी
पलकों पर बैठाने को
तैयार रहती दुनिया सारी||
रूप उसका मोहिनी
बातें उसकी मधुरस
काया देख यूँ लगता
ज्ञान रहा हो बरस||
उससे ही दिन है
उस से ही रात है
हर महफ़िल की शान
उसकी ही बात है||
वाह रे नारी
अजब तेरी लाचारी
जब जब तू जाती वारी
दुनिया से तब तू हारी
छोड़ दे जब तू लाचारी
क़दमों में होती दुनिया सारी
सरिता पन्थी
महेंद्रनगर नेपाल 
जिला कंचनपुर
सम्पर्क: 09779848720721
saritapanthi1234@gmail.com

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