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शैक्षिक सरोकार:चिली की शिक्षा प्रणाली और छात्रों का आंदोलन/गौरव सुशांत

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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शैक्षिक सरोकार:चिली की शिक्षा प्रणाली और छात्रों का आंदोलन/गौरव सुशांत

सन १९९० में लोकतंत्र के आगमन के बाद, चिली ने आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन और लोकतांत्रिक समेकन में उल्लेखनीय प्रगति की। Concertación गठबंधन जो कि तानाशाही शासन के अंत के बाद सत्ता में आई, सत्ता में आने के बाद इसने आम सहमति नीति के मॉडल को अपनाया। आम-सहमती की इस नीति को गठबंधन ने ना सिर्फ विकास के नव-उदारवाद मॉडल में लागू किया बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने और सामाजिक नीतियों के खर्च बढ़ाने में भी इसे लागू किया। यह संभव हो पाया क्योंकि Concertación गठबंधन ने निष्पक्षता के साथ विकासके मॉडल को अपनाया जो की सन 1990 के बाद हमेशा से गठबंधन द्वारा अपनाई गयी विभिन्न परियोजनाओं का मर्म रहा इस मॉडल के माध्यम से गठबंधन सरकार ने सामाजिक नीतियाँ तैयार की; यह सोच कर कि इसके कार्यान्वयन से और अधिक पैठ और सफलता मिलेगी। Concertacion गठबंधन द्वारा लागु की गयी ये सारी नयी सुधारित सामाजिक नीतियां नवउदारवादी मॉडल पर आधारित थी, जिनमें से एक हिस्सा सेना की सत्तावादी शासन से विरासत में मिली थी। इसी तरह, वहां की शिक्षा नीति भी अलग नहीं थी जिसने कि इन नवउदारवादी गुणों को वहां की सत्तावादी शासन से विरासत के रूप में लिया इस बात में कोई संदेह नहीं है कि शिक्षा की इन नयी योजनाओं के कारण निरक्षरता दर और स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में कमी आईलेकिन इन उपलब्धियों के अलावा, बहुत सारी नयी समस्या भी पनपीजैसे– शिक्षा की खराब गुणवत्ता और इसकी उच्च लागत. इन समस्याओं ने गरीब छात्रों की ऊर्ध्वमुखी सामाजिक गतिशीलता को और भी जटिल एवं प्रतिबंधित बना दिया था

चिली में शिक्षा नीति: राज्य नियंत्रण से बाजारवाद की ओर

चिली में ऐतिहासिक रूप से, सरकारें ही शिक्षा के विस्तार में हमेशा से संचालक शक्ति हुआ करती थीं। शिक्षा नीति का निर्धारण राष्ट्रीय परियोजना का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ नागरिकता का भी एक प्रमुख तत्व हुआ करता था चार सालों की अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा जिसकी शुरुआत सन 1920 में की गयी थी, सन 1965 में बढ़ा कर आठ साल कर दिया गया उस समय के दौरान, सरकारों ने सख्त नियमन के द्वारा शिक्षा पे अपनी मजबूत पकड़ बरकरार रखी थीइस तरह से सरकारें बहुत हद तक देश और नागरिकता की नींव रखने में सफल रहीं, तथापि, चिली की शिक्षा व्यवस्था में मौलिक रूप से एक बदलाव तब आया जब सैन्य शासन ने सन् 1980 और 1981 में शिक्षा सुधारों की शुरुआत की इन नीतियों को आम तौर पर श्रम बाजार, तकनीकी व पेशेवर व्यवसाय में कुशल कर्मियों की मांग को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था

सैन्य शासन के दौरान शैक्षिक नीतियाँ जो लोकतंत्र की बहाली के बाद भी जारी रहीं:
1.    नई नीति के तहत, अधिकांश सरकारी स्कूलों का प्रशासन नगर पालिकाओं को स्थानांतरित किया गयाऔर नगर पालिकाओं ने शिक्षा प्रशासन के लिए दो दृष्टिकोण को अपनाया। पहला विकल्प था स्थानीय प्रशासन के अंतर्गत नगर पालिका शिक्षा प्रशासन विभाग की स्थापना दूसरा विकल्प था संगठनात्मक  रास्ते का पालन करना जिसके अंतर्गत शिक्षा के संचालन को निजीकरण करना

2.    इसके अलावा सेना की सत्तावादी सरकार ने एक ऐसी प्रणाली की स्थापना की जिसके अंतर्गत शिक्षा को आंशिक रूप से उपभोगी वस्तु के रूप में परोसा जाने लगाइस प्रणाली के भीतर, सरकार स्कूलों की  निधि-बंधन का भुगतान वहां पढ़ रहे छात्रों की संख्या पर निर्धारित करने लगी, जिसके कारणवहां की शिक्षा प्रणाली में एक सख्त प्रतिस्पर्धा की प्रवृति आ गयी यह प्रतिस्पर्धा मूलतः नगरपालिका संचालित स्कूलों एवं निजी स्कूलों के बीच में थी जिसके अंतर्गत दोनों प्रकार के स्कूल ज्यादा से ज्यादा छात्रों को अपने स्कूलों में नामांकन के लिए आकर्षित किया करते थे और उसके फलस्वरूप वे सरकार से अनुदान की मांग करते थे इस प्रणाली को वाउचर प्रणाली के नाम से भी जाना जाता हैइस तरह, अगर कोई स्कूल इस नए बाज़ार वाले वातावरण में प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ हो जाता है तो फिर उसे विफल मान कर बंद करने की अनुमति दे दी जाती है।हालाँकि, इन सुधारों के कारण सार्वजनिक शिक्षा-व्यय में भारी कमी आयी, लेकिन इसके परिणाम स्वरुप शिक्षकों के वेतन में भी भारी गिरावट आयी और अंततः स्थानीय नगरपालिकाओं के ऊपर वित्तीय बोझ बढ़ गया

सन १९९० से तानाशाही युग के बाद की शिक्षा नीति
सन १९९० के दशक में, जब चिली में लोकतान्त्रिक सरकारें बननी शुरू हो गयीं, बहुत सारे दीर्घकालिक नीतिगत निर्णय लिए गए इन निर्णयों ने चिली की शिक्षा व्यवस्था में Concertación गठबंधन सरकार के हस्तछेप को निर्धारित किया था। इन नीतिगत निर्णयों के तहत,शिक्षा में गुणवत्ता एवं शैक्षिक नीति कीकार्य-सूची में निष्पक्षता जैसे मुद्दों को महत्व दिया गयायह प्रणाली सार्वजनिक नीतियोंमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सरकारी हस्तक्षेप पर आधारित थीहालाँकि, इन नीतियों का कार्यान्वयन विरासत में मिले सैन्य शासन के तहत ८० के दशक की संरचनाओं को बिना बदले किया गया था। इसलिए, प्रति छात्र सरकारी आर्थिक सहायता, जो कि सार्वजनिक और निजी स्कूलों को दी जाती थी,उसके बजट में थोड़ी बढ़ोतरी कर के उसी तरह बिना बदले जारी रखा गयाइस बजट वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा शिक्षकों के वेतन बढ़ाने में गया जिसमें की सालों साल सापेक्ष गिरावट आई थीइसी तरह, सरकार ने पी-900 नामित एक कार्यक्रम शुरू की,जो कि वैसे स्कूलों को ध्यान में रख के बनाया गया था, जो  वित्तीय रूप से कमजोर थेइस कार्यक्रम की शुरुआत चिली के सबसे गरीब और आशा से कम सफलता पाने वाले 900 प्राथमिक विद्यालयों के लिए किया गया था जिसके अंतर्गत उन्हें सामग्री और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती थीइसके अलावा, सरकार ने कुछ ऐसे उपायों की शुरुआत की जिसे सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को ध्यान में रख के बनाया गया था इनमें से कुछ थे स्कूल पूर्व हस्तक्षेप, नि: शुल्क स्कूल भोजन, शिक्षण सामग्री, और किशोर माता पिता के लिए सहायता।

इसके अतिरिक्त सरकार ने माध्यमिक स्तर पर छात्र प्रतिधारण को प्रोत्साहित करने की पहल कीयह पहल वित्तीय सहायता प्राप्त सरकारी और निजी स्कूलों को विशेष वित्तीय प्रोत्साहन देकर और अनिवार्य शिक्षा की अवधि को 12 साल तक वृद्धि के द्वारा की गयी थी। इन उपायों के कारण कम आय वाले परिवारों के बच्चों की अवधारण में सुधार हुआ इसके अलावा, सन १९९६ में सरकार छात्रों के लिए पूरे दिन स्कूल में बिताने का प्रस्ताव लायी,जिसके फलस्वरूप  छात्रों द्वारा स्कूलों में व्यतित किये गये समय में बढ़ोतरी हुई

बाद में, वाउचर प्रणाली को जारी रखते हुए सरकार ने सहभाजित निधिकरण व्यवस्था प्रणाली को भी लागु की जिसके अंतर्गत छात्रों के माता-पिता को स्कूलों में अतिरिक्त राशी योगदान करने के लिए कहा जाने लगाहालाँकि इस पहल ने स्कूलों की शिक्षा गुणवत्ता में सुधार करने के लिए अतिरिक्त संसाधन तो दे दिए लेकिन यह भेदभावपूर्ण थाएक तरफ, जहाँ निजी स्कूलों को प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर राजस्व जुटाने के लिए स्वतंत्रता मिली थी, वहीँ दूसरी ओर नगरपालिका के स्कूल माता-पिता की सहमति पर निर्भर हुआ करते थे। इस सहभाजित निधिकरण प्रणाली के कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप, परिवार की आय के आधार पर एक शैक्षिक वर्गीकरण उभर के सामने आने लगा इसके अंतर्गत धनी परिवारों के बच्चों से ज्यादा स्कूली शुल्क वसूल किया जाने लगा लगी और कम धनी परिवार वाले बच्चों से तुलनात्मक रूप से कम शुल्क वसूल किया जाने लगायही कारण है कि नगरपालिका के स्कूलों को ज्यादा वित्तीय योगदान नहीं मिल सका क्योंकि वहां पढ़ने वाले बच्चे कम आमदनी वाले परिवारों से आते थेहालाँकि, सहभाजित निधिकरण समझौते ने शिक्षा के कुल व्यय में वृद्धि की लेकिन अंततः यह शिक्षा के क्षेत्र में निष्पक्षता के विचार के खिलाफ था ऐसा इसलिये माना गया क्यूँकि इस प्रणाली में शिक्षा में असमान व्यय का वितरण होने लगा था

उसी प्रकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सरकार ने निजी शिक्षण संस्थानों की स्थापना के लिए अधिक जोर दियाजिसकी वजह से, नए निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में काफी बढोतरी हुई लेकिन नए सरकारी विश्वविद्यालयों की संख्या स्थिर बनी रहीउच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकार ने सहभाजित निधिकरण प्रणाली का पालन किया, यही कारण है कि सरकारी विश्वविद्यालयों को सरकार की ओर से अपर्याप्त वित्तीय अनुदान प्राप्त होता था और छात्रों को अपनी पढ़ाई के भुगतान के लिए लंबी अवधि के बैंक ऋण लेने की जरूरत पड़ती थीइसके कारण, यहां तक ​​कि इन सरकारी विश्वविद्यालयों में कम आय वर्ग के छात्रों की पहुँच दरें कम बनी रहीं। इतना ही नहीं, सरकारें इन निजी विश्वविद्यालयों में गुणवत्ता और शिक्षा की लागत को विनियमित करने में भी असफल रहीं थी, जिसके फलस्वरूप इन विश्वविद्यालयों में गरीब छात्रों की पहुँच को सीमित कर दिया और निवेशकों को बड़ा मुनाफा प्रदान कर दियाइन सभी कारणों के कारण, चिली में उच्च शिक्षा प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में दुनिया भर के दुसरे देशों से सबसे महंगी साबित होने लगी  शिक्षा की बढ़ी हुई लागत और उसके साथ उच्च ब्याज दरों ने छात्रों के एक बड़े अनुपात को उनके ऋणों को चुकाने में असमर्थ बना दिया था

शिक्षा नीति के खिलाफ छात्रों का संघर्ष
चिली के शिक्षा क्षेत्र में उपर्युक्त नीतियों के कार्यान्वयन के कारण, चिली के युवाओं ने अपने सामाजिक गतिशीलता में अवरोध को अनुभव कियाइसके कारण शिक्षा के सामाजिक स्तरण में ध्रुवीकरण की समस्या सामने आने लगी यह ध्रुवीकरण कुछ इस तरह हुआ की शिक्षा की गुणवत्ता और दाखिल छात्रों का प्रतिशत पारिवारिक आय की तरह बिलकुल भिन्न पाया गयाकहने का मतलब यह है कि वैसे छात्र जो की कम आय वाले परिवारों से आते थे कम गुणवत्ता वाले स्कूलों में नामांकन लिया करते थे जबकि अमिर परिवार के बच्चों का अच्छे स्कूलों पर एकाधिकार प्राप्त हो गयाथाइसके परिणामस्वरुप एक आँकड़ें के अनुसार यह पाया गया की ७० प्रतिशत से अधिक वैसे छात्र जिनकी पढाई नगरपालिका या अर्ध-सरकारी स्कूलों से होती थी विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा पास करने में असमर्थ होते थेजिसके कारण चिली में गरीब आर्थिक तबके से मात्र १० से २० प्रतिशत छात्र ही उच्च शिक्षा में नामंकन ले पाते थेइस प्रकार, वैसे तो समानता के साथ विकास”  के कार्यक्रम के अंतर्गत सरकार अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा सभी चिली के नागरिकों को मुहैया करवाना चाहती थी लेकिन शिक्षा में आय की महत्ता ने वर्ग रुपी दोहरी प्रणाली को बढ़ावा दिया,जिसके कारण चिली के शिक्षा प्रसार में गहरी असमानता ने अपनी पकड़ बना ली इन कारणों से सन २००० के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गयी और जिसके फलस्वरूप शिक्षा नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में काफी वृद्धि हुईनीचे दिए गए अनुभागों में, शिक्षा नीतियों के खिलाफ प्रमुख विरोध आंदोलनों पर चर्चा की गयी है:-

1.    २००६ की पेंगुइन क्रांति:-
पेंगुइन क्रांति की शुरुआत उच्च विद्यालय छात्रों की समन्वय समिति ने २४ अप्रैल, २००६ में की थीयह छात्र आंदोलन बहुत सारे लोगों के लिए आश्चर्यजनक बात थी क्योंकि तानाशाही शासन समाप्त होने के बाद चिली की राजनीतिक लामबंदी में उल्लेखनीय गिरावट आयी थी इस आन्दोलन की शुरुआत महंगे स्कूल बस के किराये और विश्वविद्यालय के बढ़े हुए प्रवेश शुल्क के खिलाफ एक प्रतिक्रिया के रूप में हुई थीविरोध प्रदर्शन जैसे-जैसे बढ़ता गया, छात्रों की मांग ने शिक्षा प्रणाली के व्यापक आलोचना की शुरूआत कर दीवहाँ से, यह आन्दोनल एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लेने लगाजिसमें शिक्षा की गुणवत्ता में बढ़ोतरी की मांग की गयीआन्दोलन और भी तेज़ हो गया जब राष्ट्रपति मिशेल बी बेचेलेट ने २१ मार्च २००६ के अपने वार्षिक भाषण में शिक्षा सुधारों को ले कर कोई बात नहीं की, जिसके फलस्वरूप छात्र नेताओं ने स्कूलों का अधिग्रहण कर आन्दोलन को जारी रखने का निर्णय लिया

विरोध कर रहे सरकारी स्कूल के छात्रों के समर्थन में बढ़ोतरी तब हुई जब इस आन्दोलन ने विश्वविद्यालय के छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और अंततः निजी स्कूल के छात्रों को भी आकर्षित कर इसमें शामिल कर लियाविरोध प्रदर्शन ३० मई को राष्ट्रीय प्रदर्शन का रूप ले लिया जब तत्कालीन शिक्षा मंत्री मार्टिन ज़िलिक ने प्रदर्शन को शांत करने के लिए उप-मंत्रियों को बात करने के लिए भेजा, लेकिन इस बातचीत में बहुत कम छात्रों को अपनी बात रखने का मौका दिया गया सरकार के इस रवैये को देखते हुए लगभग दस लाख(१००००००)लोगों ने जुलूस निकाला, जिसके कारण कई स्कूल और कॉलेजों में कामठप पड़ गएहालांकि ये जुलूसदेश भर में शांतिपूर्ण थे, लेकिन पुलिस ने फिर भी अत्याधिक सख्ती,जैसे छात्रों की पिटाई , आंसू गैस का उपयोग और पानी के तोपों का भरपूर इस्तेमाल आदि के रूप में दिखाईइन घटनाओं ने आम जनता को और भी उग्र बना दिया जिससे विरोध प्रदर्शन के समर्थन में वृद्धि हुई इस स्थिति ने राष्ट्रपति मिशेल बेचेलेट पर शिक्षा मंत्री को हटाने के साथ-साथ छात्र नेताओं से सीधी बातचीत करने के लिए दबाव बनायाऐसा होने पर भी, इन वार्ताओं से कोई ठोस परिणाम नहीं निकल सका, क्योंकि सरकार ने छात्रों की मांग जैसे बस किराया मुक्त करना और विश्वविद्यालय के प्रवेश शुल्क में कमी  को स्वीकार नहीं कियाछात्रों की सिर्फ एक मांग को स्वीकार किया गया जिसके तहत सरकार १९९० में लाये गए शिक्षा के संवैधानिक कानून में अनिर्दिष्ट परिवर्तन लाने को राजी हुई अपनी मांगों को सरकार द्वारा पूरा ना होते देख कर, छात्रों ने अपने प्रदर्शन और स्कूलों पर कब्ज़ा बनाये रखा ५ जून २००६ को फिर से राष्ट्रीय हड़ताल की घोषणा की गयी

अंततः सरकार एक राष्ट्रपति सलाहकार समिति के गठन की घोषणा करती है जिनके सदस्य के रूप में शिक्षकों और माध्यमिक स्कूल के छात्रों को भी शामिल किया जाता है इस तरह से, वार्ता की शुरुआत होते ही छात्र अपनी कक्षाओं में वापस लौटने लगते हैं और १२ जून को धिकारिक तौर पइस हड़ताल को समाप्त घोषित किया जाता हैएक आम सहमति के बाद  समन्वय समिति निम्न सिफारिशों के साथ सामने आती हैसार्वजनिक और निजी शिक्षा दोनों का उपयोग, छात्रों और उनके परिवारों का स्कूल के प्रबंधन में अधिक से अधिक भागीदारी, शिक्षकों और स्कूल निर्देशकों को उनके पदों में रहने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उपाय, शिक्षा के अधिकार की गारंटी के लिए शिक्षा कानून में परिवर्तन, शिक्षा के लिए राज्य कोष में वृद्धि, नए शैक्षिक मानकों का प्रवेशन, मनमाने ढंग के भेदभाव को समाप्त करना और शिक्षा के लिए राज्य के पर्यवेक्षी संस्थानों में परिवर्तन, लेकिन इन प्रस्तावों के कार्यान्वयन में सरकार ने काफी समय ले लिया और इसे पूरी तरह से पालन भी नहीं किया गया ऐसा ना होने के प्रमुख कारणों में बेचेलेट सरकार द्वारा दृढ़ता की कमी और पार्टी के लोगों के हित की सुरक्षा करना जो की निजी संस्थानों से भारी लाभ कमा रहे थे, को मना गया हैइसके कारण, छात्रों का विरोध जारी रहा लेकिन कम पैमाने पर


2.    २०११ में छात्रों का विरोध आंदोलन:
२०११ में छात्रोंके विरोध की लामबंदी की शुरुआत पूर्व में माध्यमिक स्कूलों के छात्रों द्वारा की गयीयहकई सारे विरोध प्रदर्शन से जुड़ी हुई थीइसके अलावा इस प्रदर्शन ने शिक्षा में संरचनात्मक बदलाव को अपनी मांगो में भी शामिल किया

मूलतः इस आन्दोलन की शुरुआत अप्रैल महीने में छात्र हड़ताल से हुई जब सरकार ने चिली केंद्रीय विश्वविद्यालय को मुनाफा धारण कंपनी को बेचने का निर्णय लेती हैकुछ हफ्तों में, इस अभियान में और भी  सामान्य मांगों को शामिल किया गया जिसके अंतर्गत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफे पर प्रतिबंध लागू करना और निजी विश्वविद्यालय के संचालन को मजबूत सरकारी नियमों के द्वारा चलाना एक महीने के भीतर, इस अभियान में CONFECH (विश्वविद्यालय छात्रों के राष्ट्रीय परिसंघ) के आने से राष्ट्रीय रूप ले लिया हालाँकि, छात्रों ने अपने संघर्ष को और भी तेज़ कर दिया जब संसद में वार्षिक अध्यक्षीय भाषण में तत्कालीन राष्ट्रपति ने छात्रों की मांगो को फिर से अनदेखा कर दियासरकार के इस रवयै को देख कर मई महीने में दूसरी लामबंदी की शुरुआत की गयी, जिसके समर्थन में श्रमिकों के राष्ट्रीय परिषद और शिक्षक महासंघ भी सामने आयेबाद में, माध्यमिक स्कूलों के छात्र भी इस आन्दोलन में शामिल हो गए क्योंकि उनकी मांगे भी कॉलेज के छात्रों से मेल खा रही थी इन मांगो में प्रमुख थेनि: शुल्क शिक्षा, मुनाफे के लिए स्कूलों के इस्तेमाल पर मनाही और चिली के सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली के सुधार के लिए अधिक से अधिक सार्वजनिक निवेशकई विश्वविद्यालयों और स्कूलों पर छात्रों ने कब्ज़ा कर लिया और इन जगहों पर पढाई को अगली सूचना तक निलंबित कर दिया गया १० लाख से अधिक लोगों ने चिली की राजधानी सेंटिआगो में विरोध प्रदर्शन निकाले और इनके साथ-साथ बाकी दूसरे शहरों में भी बड़े पैमाने पर रैलियां निकाली गयीं छात्रों के इन विरोध प्रदर्शन एवं रैलियों में विपक्षी दल के संसद, प्रमुख सरकारी विश्वविद्यालयों के कुलपति और प्राध्यापक और यहाँ तक की प्रसिद्ध टेलीविज़न हस्तियां भी जुड़ने लगे इन विरोध प्रदर्शनों को देख कर सरकार ने छात्र नेताओं के साथ मिल कर एक समन्वय समिति बनाने की पेशकश की, जिसे की छात्र नेताओं ने सीधे ख़ारिज कर दिया ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि छात्र किसी भी बंद दरवाजे की वार्ता के खिलाफ थे इसके तुरंत बाद, सामाजिक संगठन, मजदूर संगठन तथा छात्र संगठनों द्वारा एक-दो दिन की राष्ट्रीय हड़ताल की घोषणा की गयी, जिसमे लगभग 40 लाख लोगों ने भाग लियाइस विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा की घटना भी सामने आयी, जिसके फलस्वरूप कई लोगों को गिरफ्तार भी किया गया

इन पारंपरिक जुलूस और विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ, छात्रों ने कई रचनात्मक जन प्रदर्शनों को इस्तेमाल कियादाहरण के लिए, २००० से आधिक छात्रों का सामूहिक रूप से नृत्य करने के लिए एकत्र होना और प्रेत - आत्माओं की वेशभूषा दिखाना, जिसका मकसद शैक्षिक ऋण के कारण छात्रों की मौत को प्रदर्शित करना थाइसके साथ छात्रों ने राष्ट्रपति के महल के चारों तरफ एक रिले दौड़ का आयोजन किया, जिसे उन्होंने नाम दिया १८०० घंटे शिक्षा के”.इस दौड़ में, छात्रों ने दिन-रात १८०० घंटे लगातार चिली की ध्वज के साथ दौड़ लगाई इस दौड़ का मकसद ये बताना था कि चिली में एक वर्ष की मुफ्त उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए १८ अरब चिली पैसों की आवश्यकता पड़ेगी इन विरोध प्रदर्शनों में से कुछ छात्र नेता भी उभर के सामने आएं जिनमे से प्रमुख थे चिली कैथोलिक विश्वविद्यालय से जिओर्जियो जैक्सन, चिली विश्वविद्यालय संघ से कैमिला वाएखो और सेंटिआगो विश्वविद्यालय से कामिलो बल्लेस्तेरोस

ये सारे विरोध प्रदर्शन 2012 तक भिन्न-भिन्न रूपों में जारी रहे, जिसके फलस्वरूप 2011 से 2012के बीच तीन बार शिक्षा मंत्रियों को बदला गया इन सभी घटनाओं के बीच, वार्ता भी चलती रही, जिसके परिणाम स्वरुप निम्नलिखित प्रस्तावों का कार्यान्वयन किया गया:-

  1.  उच्च गुणवत्ता के शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक गारंटी के रूप में समावेश।
  2.  छात्रवृत्ति और वित्तीय सहायता के लिए और अधिक पैसे का सम्मिश्रण ताकि ४० प्रतिशत गरीब परिवारों के योग्य छात्र इसका लाभ उठा सकें।
  3.  सरकार द्वारा एक नए सरकारी एजेंसी के निर्माण का ऐलान करना, जो कि पहले से मौजूद निजी उधारदाताओं को प्रतिस्थापित करेगी साथ ही साथ शिक्षा ऋण पे ब्याज को ६ प्रतिशत से घटा कर प्रतिशत करेगी, लेकिन १० प्रतिशत अमीर आबादी को इस लाभ से अलग रखा जाएगा 
  4. प्रस्ताव में विश्वविद्यालयों को मुनाफे के उद्देश्य से नहीं चलने पर भी जोर दिया गया और उच्च शिक्षण संस्थानों में पारदर्शिता हेतु एक निगरानी एजेंसी के गठन पर जोर दिया गया
  5.   कर सुधारों के भी प्रस्ताव लाए गए, जिसके अंतर्गत व्यापार मुनाफे में कर को बढ़ा कर १७ से २० प्रतिशत करने के लिए कहा गया, जिससे की राष्ट्रीय खजाने से शिक्षा में योगदान ७०० मिलियन पेसोस से बढ़ कर 1000 पेसोस हो जाए

हालाँकिइन प्रस्तावों ने प्रचलित मॉडल के बुरे प्रभावों को कम जरुर किया थालेकिन इन प्रस्तावों का उद्देश्य तीन दशकों से आकार ली हुई आधारभूत सिद्धांतो को बदलना नहीं था जिनमें से प्रमुख थे। सब्सिडी की मांगनिजी क्षेत्रोंकी महत्वपूर्ण भूमिका और मुक्त प्रतिस्पर्धा का नियमन एवम् गुणवत्ता उपलब्धि को तंत्र के रूप में मांगइन प्रस्तावों से यह प्रत्यक्ष रूप से स्पस्ट था कि सरकार की स्थिति बनी रहे और मौजूदा नवउदारवादी मॉडल में कोई परिवर्तन नहीं आया

१९७० और १९८० के दशक के नवउदारवादी सुधारों ने चिली में एक सांस्कृतिक बदलाव लाया, जिसके अंतर्गत राज्यों को बाज़ार ने विस्थापित किया, सार्वजनिक क्षेत्र का महत्त्व कम हुआ उसे निजी क्षेत्र ने विस्थापित किया, सामूहिक राष्ट्रीय परियोजना विघटित हो गयी और उसकी जगह व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद ने ले लियायही कारण है कि छात्र आन्दोलनों की तीव्रता, कालावधि और विशेषताओं ने राजनितिक दलों और पारंपरिक नागरिक समाज को हैरान कर दियासंघर्ष की जड़ में शिक्षा की भिन्न अवधारणा एवं समाज और राज्य के बीच संबंध अवस्थित थे छात्र आन्दोलन ने एक तरफ शिक्षा को कुछ के लिए एक विशेषाधिकार से सभी नागरिकों के लिए आधारभूत जरुरत के रूप में परिभाषित किया,दूसरी तरफ, सरकार ने शिक्षा को एक 'निवेश' और  एक बिकने की वस्तु” के रूप में समझासाथ ही साथ शिक्षा को जन-साधारण की उपभोक्ता वस्तु के बजाय एक विलासिता की वस्तु के रूप में महत्त्व दियाइन कारणों से छात्र आंदोलनों ने समाज में अपनी पैठ बना ली,जिसमें उन्होंने सार्वजनिक शिक्षा को  समान अवसरकी ओर बढ़ने का एक मात्र तरीका घोषित किया इस लक्ष्य ने समाज के विभिन्न वर्गों को आन्दोलन में सम्मिलित किया जिसके कारण एक वैविध्य पूर्ण गठबंधन का निर्माण हुआ, जिसमें समाज के हर वर्ग शामिल होने लगे आम जनता की इस जबरदस्त समर्थन ने चिली के खंडित एवं व्यक्तिवादी समाज में एक अभूतपूर्व परिवर्तन दिखाया, जो कि समाज और उसके प्रत्येक सदस्य को बहिर्मुखी व्यक्तित्व प्रदान करते हुए एक-दूसरे के करीब लाया।

इसके अलावा, चिली में युवा पुनः राजनीती से जुड़ गए और वेसामना कर रहे बाधाओं के प्रति जागरूक बन गए और नए उपायों को इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो गएयही कारण है कि कैमिला वैलेजो और जियोर्जियो जैक्सन जैसे युवा नेताओं ने आम चुनाव लड़ा ताकि वो अपने संघर्ष को संसद तक ले कर जा सकें यहाँ तक कि मार्च 2014 की कांग्रेस चुना में इन छात्र नेताओं ने जीत भी हासिल कीजीतने के बाद ये छात्र नेता नई गठबंधन सरकार का हिस्सा बनें और उनके उच्च शिक्षा की सार्वभौमिक और अबाध पहुँच की मांग को सत्तारूढ़ गठबंधन ने अपने सामान्य कार्यक्रम के रूप में अपनाया नयी सरकार ने भी छह साल की एक समय सीमा के भीतर इस कार्यक्रम को लागू करने का निर्णय लिया है
  • गौरव सुशांत,सहायक प्राध्यापक (स्पेनिश भाषा एवं साहित्य),वी आई टी,विश्वविद्यालय,वेल्लोर,तमिलनाडु, 632014.,सम्पर्क– 09787083763,gauravsushant@gmail.com

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