आधी दुनिया:समकालीन हिंदी गजल में स्त्री अस्मिता – पूनम देवी - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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आधी दुनिया:समकालीन हिंदी गजल में स्त्री अस्मिता – पूनम देवी

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आधी दुनिया:समकालीन हिंदी गजल में स्त्री अस्मिता – पूनम देवी  


                             
चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
हिन्दी साहित्य का इतिहास काफी प्राचीन रहा है। कई प्रवृतियां ,वादों एवं विधाओं का विकास हिन्दी साहित्य में हुआ है। जब हम समकालीन हिन्दी साहित्य की बात करते हैं तो उनमें एक नवीन विधा ग़ज़ल से हम रूबरू होते हैं। एक समय ऐसा आता है जब नीरस कविता से ऊब चुका पाठक किसी एक ऐसी विधा को पढ़ना चाहता है जो उसके जीवन के अनुभवों को एक नया आयाम प्रदान करे तथा उसके जीवन के सुखद क्षणों को ही नहीं बल्कि उसके जीवन के कटु सत्यए वेदना तथा तात्कालिक समाज की सच्चाइयों को समझे और उनको समाज के समक्ष प्रस्तुत करे।  उसी समय दुष्यन्त कुमार का ग़ज़ल.संग्रह ष्साये में धूपष् पाठकों के सामने न केवल श्रृंगारिक ग़ज़ल की विविधताए व्यापकता एवं संजीदगी के साथ उपस्थित होता है बल्कि ग़ज़ल को व्यक्ति और समाज के लिए उपयोगी भी बनाता है। हिन्दी ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों को सामने लाने का काम बख़ूबी किया है। भूमंडलीकरण के इस दौर में मनुष्य विकास की अंधी दौड़ में दिन.प्रतिदिन बस भागे ही जा रहा है। सच तो यह है कि उसे स्वयं अपने लिए भी कुछ करने की फुर्सत नहीं है तो ऐसे में वह समाज और देश के लिए क्या सोचेगाघ् अभिव्यक्ति के अनेक साधन होने के बावज़ूद आज का मनुष्य अपनी भावनाओं को समझने एवं उन्हें प्रेषित करने में स्वयं को असमर्थ महसूस करता है। इन सभी मुद्दों के बीच की कड़ीए रुमानियत और अहमियत दोनों को सुप्रसिद्ध उर्दू शायर कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल का यह शेर बखूबी अभिव्यक्ति प्रदान करता है दृ श्प्यार का जश्न नयी तरह मनाना होगा ध् ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा । 

समकालीनता के परिदृश्य से विचार किया जाये तो सन 1960 ईव के बाद से चाहे उस्ताद नज़ीर अकबराबादी हों या फिर कैफ़ी आज़मी सभी लोगों की शेर.ओ.शायरी में स्त्री.अस्मिता की झलक बख़ूबी दिखाई देती है। रचनाकारों ने अगर स्त्री को मयए प्यालाए सुरा से जोड़ा है तो वह उस समय का वातावरण था इससे यह बिल्कुल नहीं सोचा जाये कि ये शब्द सिर्फ स्त्री को भोग्य के रूप में प्रदर्शित करते हैं बल्कि ये शब्द नवचिंतन को भी जन्म देते हैं कि क्या स्त्रियाँ इस उपमा के लिए उपयुक्त हैंघ् क्या समाज में इनकी जगह यही हैघ् इन शब्दों के माध्यम से स्त्री के प्रति ग़ज़ल में जो सहानुभूति व चिंतन का सूत्रपात हुआ वह धीरे.धीरे त्रिलोचन और दुष्यन्त के आगे आज अद्यतन प्रगति कर रहा है और करता ही जा रहा है। अब ग़ज़ल सिर्फ रुमानियत में सिमटी नहीं रही बल्कि वह स्त्री अस्मिता की एक आवाज़ भी बन चुकी है। हिन्दी ग़ज़ल समकालीनता के विभिन्न आयामों को आत्मसात करती हुई उसे आम जनजीवन के साथ जोड़ देती है और आम लोगों के विचारए भावनाए व्यवहार तथा वेदना को उजागर करती है। समकालीन हिन्दी ग़ज़ल आज समय के स्वर से स्वर मिला रही है। हिन्दी ग़ज़ल में हर प्रकार के अस्तित्ववादी और अस्मितावादी पहलू पर बात की गई है। अतः यह स्वाभाविक है कि वर्तमान में साहित्य.चिंतन का मुख्य विषय स्त्री.अस्मिता और नारीवादी चिंतन से उसका दामन खाली नहीं हो सकता। हिन्दी ग़ज़ल ने समय के अनुरूप स्त्री के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन किया है। अब नारी के केवल ईश्वरीय तथा सौन्दर्यात्मक रूप का ही वर्णन नहीं किया जाता बल्कि उसके जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाईयों एवं परिवर्तनों को भी ग़ज़ल में स्थान दिया जाने लगा है। आज के समय में स्त्री का जीवन पहले से कहीं अधिक दूभर हो गया है। उसकी इस परेशानी को समझते हुए दुष्यन्त कुमार लिखते हैं दृ श्कौन शासन से कहेगाए कौन समझेगा ध् एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है। श् आज का समाज एक स्त्री के लिए काफ़ी असहजतापूर्ण परिवेश का निर्माण कर रहा है। ऐसे में वह समाज के दहशतगर्दों से स्वयं का बचाव भी करना चाहती है। यह बात दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल में कुछ इस रूप में अभिव्यक्त हुई है दृ श्शहर की भीड़.भाड़ से बचकर ध् तू गली से निकल रही होगी। =

आज की नारी अपने अधिकारों के प्रति भी सजग है। आवश्यकता है तो केवल एक चिंगारी की जो उसके अन्दर सुप्त ज्वालामुखी को जागृत करने में सक्षम हो। नारी के माँए भार्याए बहन आदि तथा विभिन्न दैवीय रूपों का ही वर्णन प्रायः साहित्य में देखने को मिलता है। ग़ज़ल के माध्यम से कई ग़ज़लकारों द्वारा नारी की स्वतन्त्रता तथा उसके जीवन के यथार्थ को उद्घाटित करने का प्रयास समय.समय पर किया गया है सदियों से पद.दलित नारी के जीवन में क्रान्ति का बीज बोने का कार्य भी ग़ज़लकारों ने किया है। साथ ही साथ ग़ज़लकार यह बताने की कोशिश भी करते रहे हैं कि अगर नारी का सही मार्गदर्शन किया जाए तो वह अपने जीवन में परिवर्तन ला सकती है और समाज की दिशा और दशा में भी परिवर्तन एवं सुधार ला सकती है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल का शेर इस बात को बख़ूबी बयाँ करता है दृ श्एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तो ध् इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है। श् विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए समाज में अपना एक विशेष मुकाम हासिल करने वाली नारी के प्रति नरेन्द्र वसिष्ठ कुछ इस तरह से अपने भावों को व्यक्त करते हैं . श्अकसर नींद मेरे ख़्वाबों को यह मंजर दे जाती है ध् एक शिकस्ता नाव है लेकिन तूफाँ से टकराती है। 

एक स्त्री के मन की दशा और उसके जीवन को नदी के माध्यम से ग़ज़लकार दुष्यन्त कुछ इस तरह से व्यक्त करते हैं दृ श्निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी ध् पत्थरों सेए ओट में जो.जाके बतियाती तो है। श् सही परिप्रेक्ष्य में अगर विचार किया जाये तो इसमें भी पुरुष की सहज मानसिकता का रूप परिलक्षित होता है जो एक स्त्री के जीवन में पुरुष के वर्चस्व को बनाये रखना चाहता हैए परन्तु समय में परिवर्तन के साथ जिस तरह नारी की स्थिति में बदलाव आया हैए वह समाज में अपनी स्थिति के प्रति सजग एवं सचेत हुई है। स्त्री अपनी पति.परमेश्वर और गुलाम मानसिकता वाली छवि को तोड़कर अपना स्वतंत्र वजूद बनाने में कामयाब हो रही है तथा पुरुष के समान हर कार्य में उसकी सहभागिनी है। स्त्रियों ने कई क्षेत्रों में तो पुरुषों से भी बेहतर तरीके से स्वयं की पहचान बनाई है। आधुनिकताए जागरूकता और बौद्धिकता के कारण आज वह अपने अस्तित्वए भावनाओं और इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के प्रति पहले से कहीं अधिक सचेत व सजग हुई है।  सुप्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा के अनुसार .ष्ष्हमें न किसी पर जय चाहिएए न किसी से पराजयए न किसी पर प्रभुता चाहिएए न किसी पर प्रभुत्वए केवल अपना वह स्थान व स्वत्व चाहिये जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं हैए परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नहीं बन सकेगी। ष्ष् कुछ इसी तरह के विचार ग़ज़लकार कुँअर ष्बेचैनष् भी व्यक्त करते हैं। ऐसे लोग जो अपनी बच्चियों की क्षमता और हुनर से अनजान होते हैंए उन लोगों को जागरूक करने के लिए वह कहते हैं .श्किसी दिन देख लेना वो उन्हें अंधा बना देगी ध् घरों में कैद कर ली है जिन्होंने रोशनी सारी वर्तमान समय में नारी घर एवं अपने कार्य.क्षेत्र दोनों की जिम्मेदारी बख़ूबी निभा रही है। स्त्री गृहलक्ष्मी हैए अन्नपूर्णा भी है। उसके इन रूपों का वर्णन दूसरा ग़ज़ल शतक में कुँअर ष्बेचैनष् की ग़ज़ल श्दिलों की साँकलेंश् में कुछ इस तरह किया गया है दृ श्तुम्हारे घर की रौनक ने जो बाँधी हैं अँगोछे में ध् चलो बैठोए पसीना पोंछो और ये रोटियां खोलो। श् आज के समय में भी जिस तरह से नारी का शोषण आये दिन देखने को मिलता है तथा अज्ञानतावश और समाज के कटाक्ष के बाद जो नारी की मनोस्थिति होती है उसे पुरुषोत्तम ष्वज्रष् इस तरह देखते हैं दृ श्जिसकी अस्मत लुटी सरेबाज़ार ध् बन गई वो तो गूँगी.बहरी.सी। श् नारी सदैव ही जीवन के विभिन्न पक्षों को सार प्रदान करती हुई उसे संगीतमय बना देती है और नारी का अभाव उस जीवन को संगीतविहीन बना देता है। इसी बात को महेश जोशी अपने शब्दों में कुछ इस तरह पिरोते हैं . श्गोपियों को छोड़ देगा फिर कभी कान्हा तो सुन ध् राग तेरी बांसुरी का बेसुरा हो जाएगा। 

21वीं सदी की नारी के अनुरूप वर्तमान हिंदी ग़ज़ल का मिज़ाज और तेवर बदला है। आज के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विमर्शों एवं अस्मिताओं में स्त्री अस्मिता का विशिष्ट स्थान है। साहित्य का क्षेत्र संवेदना और विचार का क्षेत्र है। श्महापंडित राहुल सांकृत्यायन का कहना है की केवल लिखने मात्र से स्त्रियाँ दिव्यलोक की प्राणी नहीं हो सकतीं वे भी पुरुषों की तरह इसी लोक की जीव हैं। वे पुरुषों के भोग.विलास की सामग्री मात्र नहीं बल्कि उन्हीं की तरह वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी रखती हैं और इसी दृष्टि से साहित्य में उनका चित्रण भी होना चाहिए। श् इसी बात के अनुरूप बल्ली सिंह चीमा कामगार स्त्री के बारे में कुछ तरह अपने ज़ज्बात बयां करते हैं दृ श्यह अभावों से उलझती काम करती औरतेंध्अब अंधेरे में मशालें बन जलेगीं औरतें। श्  कमलेश भट्ट ष्कमलष् नारी के प्रति श्रद्धाभाव से उसके कोमल भावोंए उसके अस्तित्व और अस्मिता को व्यक्त करते हुए लिखते हैं दृ श्औरत है एक क़तराए औरत ही ख़ुद नदी हैध् देखो तो जिस्मए सोचो तो कायनात सी हैध् संगम दिखाई देता हैए इसमें ग़म ख़ुशी काध् आँखों में है समन्दर होंठों पे एक हँसी हैध् आदम की एक पीढ़ी फिर ख़ाक हो गई हैध् दुनिया में जब भी कोईए औरत कहीं जली हैं। 

भूमंडलीकरण के इस दौर में स्त्री का जीवन केवल चारदीवारी तक ही सिमट कर नहीं रह गया है बल्कि उसे समाज में हर प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करना होता है। नारी को अपने से कम केवल एक पुरुष ही समझता हो ऐसा नहीं है बल्कि सम्पूर्ण पुरुषवादी मानसिकता वाला समाज उसे पीछे धकेलना चाहता है। समाज में केवल पुरुष ही नहीं हैं स्त्री भी है तभी तो मृदुला अरुण कहती हैं .श्मुझको शिकवे तो बहुत से हैं मगर तुझसे नहीं ध् इस शहर में जो रहेगा बेवफा हो जायेगा। श् हर प्रकार की मुसीबतों को झेलने के बाद भी अगर नारी अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए आवाज उठाती है तो समाज उसे कई तरह के ताने देने लगता है। इसी रोष को शगुफ़्ता ग़ज़ल कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं . श्बिखर गई थी मेरी ज़िन्दगी ख़लाओं में ध् समेटती हूँ तो नाराज़ यह जहाँ क्यूँ है। श् महाश्वेता चतुर्वेदी वर्तमान समय में घटित हो रही परिस्थितियों के अनुरूप बात करती हैं। साथ ही उनका मानना यह भी है कि स्त्रियों के प्रति हो रहे अत्याचारए व्यभिचार के लिए कहीं न कहीं समाज स्वयं भी जिम्मेदार है दृश्दुरूशासन है अभी ज़िन्दाए निशाचर मुक्त है अबतक ध् हमें संतान को ष्श्वेताष् वही अर्जुन बनाना है। श्सार रूप में यह कहा जा सकता है कि समकालीनता केवल समय.सापेक्षता ही नहीं बल्कि मूल्य.सापेक्षता की भी बात करती है। किसी भी कृति में युगीन यथार्थ की बात ही उसे समकालीनता की श्रेणी में लाती है। श्समकालीन बोध का अर्थ जीवन की बाह्य परिस्थितियों के बोध तक सीमित न होकर उस यथार्थ की पहचान करना है जिसके सारे अंतर्विरोधों और द्वंदों के बीच से गुजरता हुआ मनुष्य अपने विकास के पथ पर अग्रसर होता है। 


इस प्रकार हम देखते हैं कि समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में स्त्री के परम्परागत सौन्दर्यात्मक रूप  का वर्णन करने की अपेक्षा उसके जीवन के कटु सत्यों और अन्य अनेक पहलूओं को लेकर भी ग़ज़लकारों ने बात की है। कुछ एक ग़ज़लकार इसका अपवाद हो सकते हैं जो आज भी स्त्री के केवल दैवीय एवं भोग्य रूप को ही अपनी ग़ज़लों में अपनाते हैं। आज स्त्री अपनी अस्मिता की तलाश में पुरुष वर्चस्व के सामने चुनौती खड़ी कर रही है। आज के दौर में नारी के प्रति लोगों के दृष्टिकोण के साथ.साथ परिस्थितियों में भी परिवर्तन हो रहा है नारी की स्वतंत्रताए सुरक्षा और उसके अस्तित्व के लिए आज लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है लेकिन एक बात तो निश्चित है कि नारी को स्वयं पुरुष के साथ अपने सहधर्मिणी होने की प्रमाणिकता सिद्ध करनी होगी। समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में स्त्री.अस्मिता तथा अस्तित्ववादी चिंतन पर विचार करने के बाद यह तथ्य सामने आते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल ने नारी के प्रति अपना दृष्टिकोण तो बदला है परन्तु अभी भी स्त्री जीवन के कई ऐसे पक्ष हैं जिन्हें ग़ज़ल को अपनी संवेदना के माध्यम से आमजन को साक्षात्कार करवाना है। 

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