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शोधमाला:वृद्धों का अलगाव और एकाकीपन – रोशन कुमार ‘झा’

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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शोधमाला:वृद्धों का अलगाव और एकाकीपन – रोशन कुमार ‘झा’  

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
अवांछित एकांत का अनुभव करना अकेलापन है, जिसमें लोग तीव्रता से खालीपन और निरसता का अनुभव करते हैं। भीड़ भरे स्थानों एवं समूह में रह रहा व्यक्ति भी अकेलेपन का शिकार हो सकता है। व्यक्ति में अकेलापन प्रेमी से विछोह, अस्वीकृति, चिंता, असफलता, असुरक्षा, शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक समस्या, आत्मसम्मान इत्यादि में कमी आदि के कारण होता है। व्यक्ति में अकेलापन बहुत सारे कारणों से लगभग हर अवस्था एवं काल में देखने को मिल जाता है, जिसे मनोवैज्ञानिकों ने समस्या के रूप में देखा है। विक्रम सिंह जाखड़ भी अकेलेपन को सभी अवस्था में देखते हैं और अकेलेपन के कारणों को स्पष्ट करते हुए कहते हैं - “मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अकेलेपन को सभी कालखण्डों में एक समस्या माना गया है चाहे वह शैशवकाल हो या युवावस्था एवं वृद्धावस्था हो, किन्तु वृद्धजनों में एकाकीपन का भाव अत्यधिक गहन होता है। इसका कारण यह है कि या तो उनके जीवन साथी की मृत्यु हो गई, उनके मित्र भी बिछुड़ गये हों अथवा उनके पुत्रादि उन्हें छोड़कर अन्यत्र बस गये हों या वे स्वयं रोगग्रस्त हो गये हों। जीवन में अकेलेपन के कारण वृद्धजनों में स्वयं को अवांछित मानने तथा सामाजिक सम्बन्धों, आत्मीय सम्बन्धों, आत्म सम्मान एवं विश्वास में कमी जैसी समस्याओं का प्रादुर्भाव हो जाता है। इस प्रकार वृद्धजनों का एकाकीपन उनके लिए विषाद का विषय बन जाता है तथा उनमें जीवन की निरर्थकता की भावना प्रबल होने के साथ ही मृत्यु का भय भी व्याप्त हो जाता है।”1 व्यक्ति युवावस्था का अधिकांश समय घर के सदस्यों की देखभाल में लगा देता है। उस समय वे आर्थिक रूप से समृद्ध एवं शारीरिक रूप से मजबूत होता है। लेकिन जैसे ही वह 60 या 65 वर्ष में रिटायर्ड होता है। उसके सामने सबसे बड़ी समस्या धन की आती है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन भर की कमाई परिवार पर खर्च कर दी होती है। अब उनके पास जमापूंजी रहती भी है तो बहुत सीमित मात्रा में। इस तरह वे आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं लेकिन खर्चें दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं। बच्चों का बेरोजगार रहना, उनके विवाह का खर्च, अपनी बीमारी इत्यादि खर्चे जब उनके सम्मुख आते हैं तब उनका मानसिक रूप से तनावग्रस्त होना स्वभाविक ही है। 
अनेक वृद्ध ऐसे भी हैं जो धन के अभाव में अच्छे अस्पताल में इलाज़ न करा पाने के कारण शारीरिक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं। यदि एकाध वृद्ध आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं तो उनकी पूँजी पर बेटे-बहू का शासन रहता है और न भी हो तब भी जब शरीर ही कमजोर हो गया है तो कितना इलाज़ कराये? अस्वस्थ रहना तो स्वाभाविक ही है। अब जब वे स्वस्थ नहीं हैं तो समाज के लोगों के साथ मिलजुल नहीं सकते और न ही हँस-बोल सकते हैं। इस तरह सामज के लोगों के साथ उनका सम्पर्क घटता जाता है। लोग भी इनसे कतराने लगते हैं जिसके कारण उनका अकेलापन दिनोंदिन बढ़ता जाता है। अब उनके पास समय तो बहुत होता है लेकिन करने के लिए कुछ नहीं और करें भी तो क्या? वे शारीरिक रूप से इतने समर्थ ही नहीं हैं कि कुछ करें? इसलिए अधिकांश समय शारीरिक व्याधियों, परिवार, धन की कमी आदि के बारे में चिंतन-मनन करते रहते हैं, जिसके कारण ‘वृद्धावस्था में मानसिक स्थिति को भावनात्मक ग्रन्थि प्रभावित करने लगती है, जिसके कारण हीनता की भावना एवं असहायता जैसे अलग-अलग तरह के लक्षण देखे जा सकते हैं, जिसमें व्यक्ति को किसी न किसी मनोग्रन्थि का शिकार हो सकने का खतरा रहता है। इस तरह से कई मनोवैज्ञानिक समस्याएँ भी हो सकती हैं - विचारधारा, पसंद, दृष्टिकोण इत्यादि में स्थिरता आ जाने से भी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।’2 जिसके चलते उनमें चिड़चिड़ापन या नकारात्मक प्रवृत्ति आ जाती है, जिसके कारण परिवार में उनके सम्बंध अच्छे नहीं बने रह पाते हैं। सम्बन्धों में यह तनाव उस समय उभरता है जब नैतिकता, स्नेह, जीवनमूल्य, मनोवृत्तियाँ, आकांक्षाएँ, आवश्यकताएँ मेल नहीं खातीं हैं।             

प्रौद्योगिक प्रगति के कारण ग्रामीण नवयुवकों का रुझान शहर की ओर हुआ, जिससे  संयुक्त परिवार एकल परिवार में परिवर्तित हुआ, जिससे वृद्धों को जो सुविधाएँ संयुक्त परिवार में मिली थीं उससे वंचित हो गए और अकेले रहने पर मजबूर हुए। साथ ही जब गांवों से नवयुवकों का पलायन हुआ तो घर पर वृद्ध ही रह गये अब जब उनके बच्चे शहर में बस गये तो वे अकेलेपन में अपना जीवन व्यतीत करने लगे।

शहरों में अकेलापन तो और भी ज्यादा भयावह रूप में है। स्वयं को स्थापित करने एवं भौतिक सुविधाओं को जुटाने में नई पीढ़ी के लोग लगे रहते हैं, जिसके कारण उनके पास इतना भी समय नहीं होता कि वे अपने वृद्धों के साथ समय गुजार सके उनका कुशल-क्षेम भी पूछ सके। इस तरह युवा वर्ग का वृद्धों के साथ संवाद एवं सम्पर्क घटता जाता है और वृद्ध स्वयं को अकेला महसूस करने लगते हैं। अब यह जानना प्रासंगिक हो जाता है कि वृद्ध परिवार में किस के साथ रहते हैं, जिसे राज्य स्तर पर निम्न चार्ट में देखा जा सकता है –



सारणी-संख्या – 1

उपर्युक्त तालिका में राज्य एवं उनकी राजधानी तथा केन्द्रशासित प्रदेश में 60 वर्ष और उससे अधिक वृद्धों की रहने की स्थिति के बारे में बताया गया है। इनमें दमन और दीप (21.3), तमिलनाडु (10.9), उत्तरांचल (9.2) आदि राज्यों में सबसे अधिक वृद्ध अकेले रहते हैं। पति-पत्नी एकसाथ रहने वालो में आंध्रप्रदेश (20.9), तमिलनाडु (18.9), चण्डीगढ़ (18.6) आदि राज्य अग्रणीय हैं। पति/पत्नी और दूसरे सदस्यों के साथ रहने वाले वृद्धों में नागालैंड (75.6), दादर और नागर हवेली (64.7), हरियाणा (58.1) आदि राज्यों का अग्रणीय स्थान है। बच्चे के साथ रहने वाले वृद्धों में लक्षद्वीप (45.4), पाण्डिचेरी (41.3), दमन और दीप (40.3) आदि राज्यों का स्थान सर्वोच्च है। अन्य सम्बन्धों और बिना समन्बंधों के साथ रहने वाले वृद्धों में अत्यधिक प्रतिशत लक्षद्वीप (12), गोआ (11.4) ,तमिलनाडु (6.6) आदि राज्यों का है।

इनमें सबसे अधिक समस्या उन वृद्धों के साथ उत्पन्न होती हैं जो अकेले या बिना सम्बन्धों के साथ रहते हैं इसका ये मतलब नहीं है कि जो परिवार में रहते हैं वे अकेलेपन के शिकार नहीं होते। इस अवस्था में ‘अकेले’ रहने की जगह परिवार के ‘साहचर्य’ की आवश्यकता होती है, जिससे वे अपना अंतिम समय हँसी-खुशी से व्यतीत कर सकें लेकिन अपनों की अनुपस्थिति में उनका जीवन बहुत ही नीरस और एकाकी हो जाता है, और उन्हें घर के एकांत में घुटन महसूस होने लगती है, जिसके कारण वृद्ध बार-बार अपने अतीत को याद करने लगते हैं और वर्तमान समय से उसकी तुलना करने लगते हैं, जिसके कारण उन्हें सरदर्द, जकड़न, बदहजमी, तनाव, ब्लड-प्रेशर आदि की शिकायत हो जाती हैं। 

चिंता का विषय यह है कि वृद्ध किन कारणों से अकेलेपन के शिकार होते हैं। क्या इसके लिये नई पीढ़ी के लोग ज़िम्मेदार हैं या बदलता हुआ परिवेश, या कुछ और जिनके कारण वृद्ध अकेला महसूस करते हैं। समाज और साहित्य में द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है यहाँ साहित्य के माध्यम से वृद्धों के अकेलापन को जानने का प्रयास किया गया है। 

कृष्णा सोबती ‘दादी-अम्मा’ कहानी में दादी-अम्मा के अकेलेपन के कारणों के बारे में बताती हैं - “दादी-अम्मा चारपाई की बाँहों से उठीं और लेट गईं। अब तो इतनी-सी दिनचर्या शेष रह गई है। बीच-बीच में कभी उठकर बहुओं के कमरों की ओर जाती हैं तो लड़-झगड़कर लौट आती हैं। कैसे हैं उसके पोते जो उम्र के रंग में किसी की बात नहीं सोचते? किसी की ओर नहीं देखते? बहू और बेटा, उन्हें भी कहाँ फुर्सत है?”3 यहाँ दादी-अम्मा के व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ गया है, जिसके कारण वे बहुओं से लड़ती-झगड़ती है और यह चिड़चिड़ापन इसलिए है कि बेटे-बहू, पोते कोई भी उनका हाल-चाल पूछने नहीं जाते। किसी के पास समय नहीं है कि उनके साथ बातचीत करें। इसलिए उनकी दिनचर्या में अब चारपाई पर लेट कर एकांत में जीना ही शेष रह गया है। अंतत: दादी-अम्मा की मृत्यु हो जाती है। उनके अभाव में दादा किस तरह का अकेलापन महसूस करते हैं, उसे लेखिका ने कुछ इस तरह व्यक्त किया है -“अम्मा की कोठरी में अँधेरा था। बापू उसी कोठरी के कोने में अपनी चारपाई पर बैठे थे। नजर दादी-अम्मा की चारपाई वाली खाली जगह पर गड़ी थी। बेटे को आया जान हिले नहीं। “बापू, उठो, चलकर बच्चों में बैठों, जी सँभलेगा।” बापू ने सिर हिला दिया। मेहराँ और बेटे की बात बापू को मानो सुनाई नहीं दी। पत्थर की तरह बिना हिले-डुले बैठे रहे।”4 यहाँ उनके अकेलेपन का कारण परिवार से कटाव और जीवन-साथी की मृत्यु से उपजा है, जिसके अभाव में उन्हें अपना जीवन निर-उद्देश्य लगता है । 
रवीन्द्र कालिया की ‘बुढ़वा मंगल’ कहानी में बूढ़ा जब ए.सी. डब्बे में बेटे के आमंत्रण पर बंगलौर जा रहा होता है तब उसे अपने जीवन साथी की याद आती है - “उसे लगा कि वह अब तक कोल्हू के बैल का जीवन बिता रहा था। इस आरामदेह गाड़ी में उसे अपनी बुढ़िया की बहुत तेज याद आई – वह साथ में होती तो कितना खुश होती।”5 यहाँ उसे अपने जीवन साथी की याद इसलिए आई होगी कि उसने अपने जीवन साथी को कभी भी ए.सी. डब्बे में यात्रा नहीं करवा पाया होगा। वे स्वयं भी ए.सी. डब्बे में यात्रा इसलिए कर रहे हैं कि बेटे ने पत्र के साथ वातानुकूलित रेल यात्रा का टिकट साथ में भेजा था, जिस कारण उसे अपनी जमापूँजी खर्च करनी नहीं पड़ी। अब जब उसे बिना पैसे के वातानुकूलित डब्बे में यात्रा करना सहज सुलभ हो रहा है तो इस सुखद क्षण में अपने जीवन साथी का याद आना स्वाभाविक ही है।  

हरेक व्यक्ति के अपने जीवन के कुछ सुखद एवं दुखद क्षण होते हैं, जिसकी याद उसकी स्मृति में दीर्घकालीन तक बनी रहती है। जब भी वह अकेला महसूस करने लगता है तो उसकी याद उसके मन में प्रत्यक्षत: आकर सताने लगती है। उसकी यह याद किसी वस्तु, स्थान, विचार आदि से जुड़ी होती है। ‘बुढ़वा मंगल’ कहानी में बूढ़ा जब भी ‘पेशंस’ खेलता है तो उसे जूली की याद आती है - “आज भी बूढ़ा जब अकेले में ‘पेशंस’ खेलता है तो उसे जूली की बरबस याद आ जाती है। जाने जूली का क्या हुआ। पीटर भी जिन्दा है या मर गया, उसे नहीं मालूम। उसे सिर्फ यह याद है कि जूली कभी-कभी उसके कमरे में आती या शाम के खाने पर बुला लेती...।”6 वृद्धावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें वृद्धों को पारिवारिक लोगों के स्नेह की आवश्यकता होती है। उसकी यह इच्छा रहती है कि बेटे-बहू, नाती-पोते उनके साथ कुछ पल हँसी-खुशी से साथ बिताए, लेकिन आज नई पीढ़ी के लोगों के पास समय ही नहीं है और है भी तो वे उन चीजों पर अपना वक्त जाया करना चाहते हैं, जिससे उन्हें फ़ायदा हो क्योंकि आज का दौर ही ऐसा है कि जहाँ हर चीज को ‘उपयोगिता’ के तराजू पर तौला जाता है, जिसके कारण नई पीढ़ी के लोग जो इस तरह की मानसिकता रखते हैं उनके लिये वृद्ध फ़ालतू वस्तु की तरह है, जिसे जहाँ जब भी उनकी मर्जी होती है फेंक देते हैं। कई बार तो उन्हें शारीरिक कष्ट भी देते हैं। ‘बुढ़वा मंगल’ कहानी में वृद्ध बेटे की इसी तरह के व्यवहार से चिंतित होकर अपनी मृत्यु के सुखद सपने देखा करता है- “बेटे का व्यवहार देखकर बूढ़ा अपनी मौत को लेकर बहुत असुरक्षित अनुभव करता था।.....उसकी योजना थी कि उसे यदि हार्टअटैक हुआ तो वह शहर के सबसे खुबसूरत नामी और महँगे नर्सिंगहोम में भर्ती हो जाएगा। खुदा न खास्ता अगर फॉलिज मार गया तो वह उनकी देखभाल के लिये बहुओं पर आश्रित न रहेगा.....वह अपनी बहुओं के गुस्सैल, एहसान फरामोश और मजबूरी में फर्ज निभानेवाले मनहूस चेहरे देखते हुए नहीं मरना चाहता था। मौत बार-बार नहीं आती, एक ही बार आती है और इस मौके का भरपूर आनन्द उठाना चाहिए। वह कुछ ऐसी मौत के सपने लिया करता था कि उसकी कलाई नर्स के हाथ में है....अपने खाली समय में वह कई बार अपनी शवयात्रा में भी शामिल हो चुका था। उसने अनेक बार अपनी चिता धू-धू जलते देखी थी। उसकी चिता जल रही होती और वह पाता कि चिता भी उसी की है और शोकाकुल मित्रों के बीच भी वही खड़ा है। वह अपने जीवन में बीसियों बार शमशान घाट गया है।...यह बूढ़े का एक हसीन सपना है। अपना अन्तिम संस्कार करने के बाद भी बूढ़े का समय न कटता तो वह एक पुरानी गुत्थी सुलझाने में मशगूल हो जाता कि एक दीवार दूसरी दीवार से क्या कहती है।”7 इस तरह देख सकते हैं कि वृद्ध क्यों मृत्यु के हवाई ख्यालात बनाता है, जिसका जिम्मेदार वे स्वयं भी हैं और बेटे-बहू का बरताव भी है, क्योंकि उसी ने बेटे की शादी तिक्करम से उसकी क्लास फ़ेलो जिसे उसका बेटा प्रेम करता था से न करवाकर भ्रष्ट इंजीनियर की भ्रष्ट बेटी से करवाया था। अब घर में सभी के रहते हुए भी बूढ़ा इतना अकेला हो गया है कि वह बन्दर, बिल्ली, पक्षियों आदि से दोस्ती कर अपना अकेलापन मिटाने की कोशिश करता है - “बच्चे तक उसके कमरे की तरफ रुख ने करते थे। बूढ़े ने निराश होकर परिन्दों से दोस्ती कर ली थी।....एक बिल्ली से भी बूढ़े की दोस्ती थी।”8 लेकिन जेठ की दोपहरी में जब परिन्दे तक पेड़ों में दुबक जाते थे तब उस समय अकेलापन मिटाने के लिये खिड़की से कोंचिया नामक औरत को घूरते हुए बिताता है और जिसे अब वे प्रेम भी करने लगे थे - “खिड़की खोलते ही बूढ़े का दिल बाग-बाग हो गया, सामने उसकी प्रेमिका बैठी थी। बूढ़े की तरफ उसकी पीठ थी।....बूढ़ा इस दृश्य में ऐसा रम गया कि उसे किसी से न कोई शिकवा रहा न शिकायत।.....अभी कुछ पल पहले वह गरमी से बेहाल हो रहा था। प्रेमिका को देखकर वह सब कुछ भूल गया था....।”9 इस तरह देखते हैं कि वृद्ध अपना अकेलापन दूर करने के लिये क्या-क्या करते हैं। भारतीय संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था में एक वह समय था जब परिवार के समस्त लोग बुजुर्गों के इर्द-गिर्द घूमते रहते थे और एक आज का वह समय है जहाँ वृद्धों के साथ समय व्यतीत करने के लिए नई पीढ़ी के पास समय ही नहीं है। दरअसल ऐसी स्थिति में वृद्धों का पशु-पक्षियों के साथ समय व्यतीत करना या अन्य गतिविधियों में तल्लीन होना स्वभाविक ही है।

        शशि भूषण द्विवेदी की ‘एक बूढ़े की मौत’ कहानी में जानकी बाबू अकेलेपन में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे घर में अकेले रहते हैं, जिसके कारण उन्हें अकेलापन सताता रहता है - “....जानकी बाबू अकेले थे।....वे अकेले हैं और अकेलापन उन्हें सालता है। नाते-रिश्तेदार और मित्रों से कटे जानकी बाबू की दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू होती जब उठकर वे नहाते-धोते, पूजा-पाठ करते और फिर घूमने निकल जाते।....हर वक्त उन्हें यही शक रहता कि कहीं-न-कहीं, कोई-न-कोई उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रहा है।....शायद अपनी शादी भी उन्होंने इसीलिए नहीं की वरना जानकी बाबू में कमी क्या थी?”10 यहाँ देख सकते हैं कि वे अकेलापन मिटाने के लिये ही घर से बाहर घूमने निकल जाते हैं। शादी न हो पाने के कारण उनका अकेलापन और बढ़ जाता है, जिसके कारण वे मृत्यु को जरूरी मानते हैं और उनके विचार में रहस्यात्मकता के भाव दिखते हैं - “जानते हो...जिन्दगी में मृत्यु का आना कितना जरूरी है।.....उस फूल को देखो और मेरी बात ध्यान से सुनों।” जानकी बाबू ने गमले में लगे एक गुलाब के फूल की ओर इशारा किया और एक गहरी साँस छोड़ी (यहाँ जानकी बाबू ने शायद महाकवि टेनीसन का सन्दर्भ दिया था जिनका कहना था कि यदि मैं फूल को उसके स्वयं में जान जाऊँ तो जान जाऊँ कि मनुष्य क्या है और ईश्वर क्या है!)।”11 अंतत: एक रात अपने एकांत से तंग आकर रात के नौ बजे बाँसुरी के माध्यम से उस स्वर को पकड़ने लगे जो उस बुढ़िया ने सरयू किनारे बजाया था। उनकी बाँसुरी की आवाज से पड़ोसी दरवाजा पीटने लगे जिनके बारे में वे सोचते हैं – ““लगता है, मानव क्लोन आ गए हैं। अब लड़ाई अपने अंतिम दौर में है ।””12 लोग वहाँ आकर उनकी बाँसुरी के दो टुकड़े कर देते हैं, जिससे वे इतने दुखी और मायूस हो जाते हैं कि आत्महत्या कर लेते हैं। इस तरह यहाँ वृद्ध जानकी बाबू का अकेलापन ऐसा उग्र रूप धारण कर लेता है कि उनकी मृत्यु का कारण बनता है। अभी तक उनके अकेलेपन से निपटने का एकमात्र साधन बाँसुरी थी लेकिन जब वह टूट जाती है, तो उनकी जिजीविषा खत्म हो जाती है, जिसके कारण वे आत्महत्या कर लेते हैं।

         आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य की भावनाएँ और संवेदनाएँ विखंडित हो गई हैं, जिसके कारण वृद्ध भरे-पूरे परिवार में भी स्वयं को अकेला महसूस करते हैं। उनकी इच्छा रहती है कि बेटे-बहू, पोते-पोती उनके साथ हँसी-खुशी से जीवन बिताए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। उनके बेटे-बहू जीवन की आपाधापी या कहें भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने में इतना व्यस्त रहते हैं कि उनके पास वृद्धों के लिए समय बच नहीं पाता है और बचे भी कैसे जब घर में उनकी कोई उपयोगिता ही नहीं रह गई हो! आज का समाज हर चीज को उपयोगिता के तराजू पर तौलता है और जो उस तराजू पर फिट नहीं बैठता उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। वृद्धों की स्थिति भी कुछ इसी तरह की हो गई है इसलिए उनका होना या ना होना कोई मायने नहीं रखता। इस तरह वृद्ध घर में अकेले होने या भरे-पूरे होने पर भी अकेलेपन से जूझते हुए नजर आते हैं। ऐसी स्थिति में वृद्ध अकेलेपन को मिटाने के लिये अतीत, मृत्यु, या इजूल-फिजूल की बात सोचने में गुजारते हैं। दरअसल इनके पास समय तो बहुत होता है लेकिन काम कम। ऐसी स्थिति में पारिवारिक लोगों का इनके प्रति उपेक्षा भाव इन्हें अकेलेपन में जीने के लिये मजबूर कर देता है, जो वृद्ध अकेलेपन के जीवन से तंग हो जाते हैं वे जानकी बाबू की तरह आत्महत्या कर लेते हैं। यह अलग बात है कि उनकी मृत्यु गुमनाम रहस्य या स्वाभाविक मान ली जाती है!

                       
संदर्भ -
जाखड़, विक्रम सिंह, वृद्धावस्था एवं बदलते सामाजिक मूल्य, उपर्युक्त, पृष्ठ – 21
तिवारी, स्वाति, अकेले होते लोग वृद्धावस्था पर केन्द्रित मनोवैज्ञानिक दस्तावेज , वाणी प्रकाशन, 
नई दिल्ली, प्रथम संस्करण – 2012, पृष्ठ – 61
प्रियदर्शन, संपादक, बड़े-बुज़ुर्ग, उपर्युक्त, पृष्ठ – 30
वही, पृष्ठ संख्या – 34 
वही, पृष्ठ संख्या – 51-52
वही, पृष्ठ संख्या – 55
 वही, पृष्ठ संख्या –57-58
वही, पृष्ठ संख्या –58-59
वही, पृष्ठ संख्या – 60
 वही, पृष्ठ संख्या – 118
 वही, पृष्ठ संख्या – 119
 वही, पृष्ठ संख्या – 127

सारणी -
1. Sourse : elderly_in_india_AdobeReader, Situation Analysis of The Elderly in India , June 2011, Central statistics Office Ministry of Statistics & Programme Implementation Government of India.  

रोशन कुमार झा
शोधार्थी (हिन्दी)
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय,गाँधीनगर, गुजरात
    संपर्क: roshankr.jha2011@gmail.com,7048384620.
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