कविताएँ विनोद कुमार दवे - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

नवीनतम रचना

कविताएँ विनोद कुमार दवे

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
कविताएँ विनोद कुमार दवे

मैं तुमसे प्यार करता था
वे आवाज़ें जो कभी सुनी नहीं गई

कहानियां जो अनकही रह गई

कविताएँ जो किताबों में सदियों से दफ़न है

उन सब की कसम

मैं तुमसे प्यार करता था।



तुम नीम की शाखा पर बैठी गौरैया

मैं पिंजरे में कैद तोता

तुम बगीचे में खुली हवा में सांस लेती तितली

मैं शहद के लिए पाली गई मधुमक्खी

इतने फासलों के बावजूद

मैं तुमसे प्यार करता था।



पहाड़ों से फिसलती नदी की तरह बहती रही तुम

मैं किनारों पर बाट जोहता रहा

और तुम मिली किसे?

खारे समन्दर को

क्या तुम जानती भी थी?

मैं तुमसे प्यार करता था।



पूनम लाख चांदनी बिखेरती रही

अमावस की भी कुछ कीमत रही होगी

अंधेरों को ख़तरा किस से था

मेरी राह में उजाला लिए दीपिका

मैं तो अँधेरा था घनघोर काली रात का

उजालों की कसम

मैं तुमसे प्यार करता था।



तुम मिलोगी
तुम मिलोगी फिर कभी

वक़्त के दरख़्त पर

सूखी हुई वो तहरीरें

जिनमें तुम्हारा नाम

मेरे नाम से मिलकर

हमारा हो गया

पर तुम और मैं

हम न हो सके

आओ इस दरख़्त की छाँव में

कुछ देर गुनगुना ले

वो गीत जो हमने

हवाओं की धुन पर लिखे थे

पत्तियों की सरसराहट

घोल रही है मधुर संगीत

और गीत?

तुम गाना शुरू तो करो

मैं तुम्हारे सुरों पर

अपने होंठ रख दूंगा

गीत तो प्रेम में है

शब्दों में कहाँ?



कविता
उनका सवाल था

मैं ग़ज़ल क्यों लिखता हूँ

जबकि उनके अनुसार

कविता लिखना आसान है

नई कविता

ग़ज़लों में तुकबन्दी नहीं हो पाती उनसे

और वे सोचते हैं

कविता ऐसी वैसी भी चल जाती है

और मेरा जवाब होता है

मैं कविता से प्यार करता हूँ

और उसे टूटते हुए नहीं देख सकता।


संघर्ष
दीपक जलना चाहता था

अँधेरे से लड़ना चाहता था

आंधियों से जूझता रहा

लड़ता रहा जलता रहा

इसकी राख को माथे पर लगा दे

संघर्ष ने इसे हौसला दिया है

संघर्ष ने इस राख को

चंदन बना दिया है।

पत्ता शाख से गिरा

उड़ना चाहता था

तूफ़ान से लड़ना चाहता था

संघर्ष करता गिर गया

माटी में मिला, माटी बना

इस माटी को माथे पर लगा दे

इस संघर्ष के रास्तों पर जो चला हैं

उनके डर से ही

तूफानों ने अपना रास्ता बदला है।


मेरा नहीं होना
मैं ‘होने के लिए’

यहां नहीं हूँ

मैं यहां हूँ तो ‘नहीं होने के लिए’

क्यों कि अगर मैं

‘होने के लिए’ होता

तो कभी नहीं हो पाता यहां

और ये तुम तब ही समझ पाओगी

जब मैं नहीं होऊँगा।



विनोद कुमार दवे 
206,बड़ी ब्रह्मपुरी, मुकाम पोस्ट- भाटून्द, तहसील -बाली
जिला- पाली, राजस्थान  306707,
संपर्क:9166280718,davevinod14@gmail.com

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