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आलोचकीय:हिंदी लघु उपन्यासों में महानगरीय जीवन – डॉ. अभिषेक रौशन

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आलोचकीय:हिंदी लघु उपन्यासों में महानगरीय जीवन – डॉ. अभिषेक रौशन

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
किसी भी नयी साहित्यिक विधा या प्रवृत्ति के आरंभ के पीछे अपने समय एवं समाज का सच एवं उनकी बदली हुई स्थितियाँ होती हैं जो उस नयी विधा या प्रवृत्ति की सृजनात्मकता के लिए भूमि एवं भूमिका का निर्माण करती हैं। यह लेखक के द्वारा सिर्फ नए या कुछ अलग करने की ललक से पैदा नहीं होती, बल्कि बदली हुई सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियों के वे दबाव होते हैं जो उस नई साहित्यिक विधा या प्रवृत्ति को आकार देने में मददगार होते हैं। इसके प्रमाण में यहाँ यह प्रश्न लाजिमी है कि आज क्या कारण है कि रामायण या महाभारत जैसे महाकाव्य नहीं लिखे जाते? इसके जवाब में कहा जा सकता है कि ऐसे महाकाव्य जिन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक स्थितियों की उपज थे, वैसी स्थिति एवं परिस्थिति आज के समय में रह ही नहीं गई है। इस संदर्भ में आलोचक एवं चिंतक मैनेजर पाण्डेय ने सही कहा है कि आज रामायण या महाभारत जैसे महाकाव्यों का टी.वी. सीरियल बनाकर सिर्फ़ उसका ‘व्यापार’ किया जा सकता है।

हिन्दी साहित्य में लघु-उपन्यास विधा के आरंभ के पीछे यही कारण है। यह अपने समय एवं समाज की स्थिति एवं परिस्थिति की उपज है। नामवर सिंह ने कहानी विधा के बारे में कहा है कि ‘यह छोटे मुँह बड़ी बात कहती है’। लघु-उपन्यास के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। लघु-उपन्यास विधा मात्र आकारगत लघुता के कारण एक नई साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित नहीं है। इसके अपने कुछ गुण हैं जो इसे कहानी और उपन्यास से अलग करते हैं। यह सही है कि कहानी, उपन्यास और लघु-उपन्यास के केन्द्र में कथा होती है, पर इन तीनों विधाओं का अपना अलग-अलग अस्तित्व है। घनश्याम ‘मधुप’ ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी लघु-उपन्यास’ में इस बात को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “हिन्दी लघु-उपन्यास समय की माँग को लेकर उद्भूत हुआ है। कहानी की सघनता और सुगमता लेकर तथा उपन्यास की संरचना एवं जीवन यथार्थ को आत्मसात् करते हुए इस विधा का जन्म हुआ है। उपन्यास और कहानी से उत्पन्न इस विधा में उन दोनों के सभी गुण विद्यमान हैं। दोनों के गुण इसलिए कि कहानी या उपन्यास यदि दोनों में से किसी एक में भी लघु-उपन्यास की संभावना निहित होती तो इस विधा का जन्म ही नहीं होता।”1 हर साहित्यिक विधा का अपना महत्व है। कोई भी साहित्यिक विधा जीवन को नकार कर अपने अर्थ को नहीं पा सकती। उनके भीतर एक आंतरिक एकता तो होती ही है जो उनमें विधागत अंतर होने के बावजूद उन्हें एक सूत्र में जोड़ती है। हिन्दी के लघु-उपन्यास पर बात करते सहसा रहीम याद आते हैं –

“रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहाँ करे तलवारि।।”

तो सवाल लघुता का या विशालता का नहीं है, सवाल उसमें समाहित उस जीवन-दृष्टि का है जो किसी रचना के आकार के कारण बनते हैं और वे शब्दों के सहारे हमारे सामने उपस्थित होते हैं। इसलिए लघु-उपन्यास में चित्रित महानगरीय जीवन का मतलब यह कतई नहीं है कि वहाँ जीवन लघु है। जीवन लघुता या विशालता से संचालित नहीं होता है। जीवन तो जीवन होता है। वहाँ लघु या विशाल का क्या वजूद! साहित्य अंततः जीवन का ही उद्घाटन है और वह जीवन के एक नितांत अकेले या अटूट या कहें तो अजनबीपन और इसमें फँसे एक मनुष्य के जीवन को ‘लघु’ शब्द में व्यक्त करता है तो इससे उसकी व्यापकता कम नहीं हो जाती है। इसलिए लघु या विशालता के व्याकरणिक या साहित्यिक खाँके में न पड़ते हुए यह ध्यान रखना जरूरी है कि लघु-उपन्यास में जो जीवन आए हैं, या अपनी परिस्थितिवश उस तरह जीने को विवश हैं, वह लघु है या विशाल...
हिन्दी साहित्य में लघु-उपन्यास लेखन की व्यवस्थित शुरुआत जैनेन्द्र से होती है। इन्होंने लघु-उपन्यास लेखन की भूमि का निर्माण किया है। जैनेन्द्र के लघु-उपन्यास व्यक्ति-केन्द्रित हैं। व्यक्ति भी आखिर समाज से ही निर्मित होता है और समाज अंततः व्यक्ति से। इसलिए व्यक्ति को नकार कर किसी सामाजिक सरोकार की बात करना बेमानी हो जाती है। एक व्यक्ति के जीवन में जो उथल-पुथल होती है, उसी को जैनेन्द्र ने अपने लघु-उपन्यासों का विषय बनाया है। यहाँ प्रेमचन्द की तरह व्यापक सामाजिक भूमि और उसकी भूमिका को लेकर चिंतन-मनन कम, एक व्यक्ति के निर्माण की भूमिका और भूमि को लेकर ज्यादा उथल-पुथल दिखाई देता है। हिन्दी में लघु-उपन्यास लेखन की परंपरा में जैनेन्द्र ‘परख’, ‘सुनीता’, ‘त्यागपत्र’, ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’, ‘विवर्त’ और ‘व्यतीत’ को लेकर सामने आते हैं।

लघु-उपन्यासों की परंपरा में क्रांतिकारी कवि नागार्जुन का भी विशिष्ट स्थान है। इनके लघु-उपन्यासों की कथा-भूमि मिथिला-अंचल से उपजी है और किसी वर्ग-विशेष के जीवन की समस्याओं को यथार्थ के धरातल पर सफलता पूर्वक प्रस्तुत करने में समर्थ होती है। इनके लघु-उपन्यासों में ‘रतिनाथ की चाची’, ‘बलचनमा’, ‘नई पौध’, ‘बाबा बटेसरनाथ’, ‘वरुण के बेटे’, ‘दुखमोचन’, ‘कुम्भीपाक’, ‘हीरकजयन्ती’, ‘उग्रतारा’, ‘इमरतिया’ एवं ‘जमुनिया का बाबा’ प्रमुख हैं।

लघु-उपन्यासों की चर्चा कमलेश्वर के बगैर अधूरी है। इनके लघु-उपन्यासों में जीवन की विसंगतियों से ताल-मेल बैठाने की जद्दोजहद साफ़ झलकती है। इनके लघु-उपन्यासों में युग-सत्य का उद्घाटन भी अत्यंत मार्मिकता के साथ किया गया है। इनके लघु-उपन्यासों में ‘एक सड़क सत्तावन गलियाँ’, ‘लौटे हुए मुसाफिर’, ‘डाक बंगला’, ‘तीसरा आदमी’, ‘समुद्र में खोया आदमी’ आदि प्रमुख हैं। लघु-उपन्यास-लेखन में राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी और ममता कालिया का भी उल्लेखनीय स्थान है। खासकर ‘सारा आकाश’, ‘आपका बंटी’ और ‘लड़कियाँ’ महानगरीय जीवन की कई परतों को खोलती हैं।

हिन्दी लघु-उपन्यास में महानगरीय जीवन के विभिन्न ऊहापोह और उलझनों और उसमें फँसी मनुष्य की जिन्दगी से रू-ब-रू होते हुए कमलेश्वर के दो लघु उपन्यास ‘समुद्र में फँसा हुआ आदमी’ और ‘तीसरा आदमी’ केन्द्र में हैं। हिन्दी लघु-उपन्यास में चित्रित महानगरीय जीवन पर चिंतन-मनन एक त्रासदी से गुजरने जैसा है जहाँ विकास के तमाम ककहरे झूठे साबित हो जाते हैं। महानगरों की चकाचौंध, ऊँची-नीची इमारतों में मनुष्य किस तरह बौना और एक हद तक अप्रासंगिक हो गया है, वह किस तरह जिंदा लाशों के समंदर में तब्दील हो गया है, इसे हिन्दी लघु-उपन्यास बखूबी उद्घाटित करते हैं। दरअसल भारत में कई भारत हैं। एक भारत महानगरों में बसता है, एक भारत नगरों में बसता है, एक भारत गाँवों और कस्बों में बसता है। आज जिस समय एवं समाज में हम जीने को अभिशप्त हैं वहाँ गाँवों में रहना, खेती करना या स्थानीय शहरों में रहकर छोटे-मोटे रोजगार करना लगभग अप्रासंगिक हो गया है। बेहतर जीवन की आशा-आकांक्षा हमें महानगरों को ओर खींचती है और अपने ही देश में हम अप्रवासी हो जाते हैं। बाबा नागार्जुन की एक कविता है –

“घोर निर्जन में परिस्थिति में दिया है डाल,
याद है तुम्हारा सिन्दूर तिलकित भाल।”

परदेस या महानगर में रहने की विवशता, जहाँ किसी चीज की कमी हो सकती है, पर वहाँ एक चीज की कमी नहीं हो सकती है और वह मनुष्य, और वहाँ निर्जनता... मनुष्यों के बीच निर्जन होने की व्यथा और विकरालता... मनुष्यता के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है! कमलेश्वर के लघु-उपन्यास ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ में चित्रित दिल्ली महानगर की तस्वीर सिहरन पैदा करती है, सब कुछ टूटा हुआ और बिखरा-सा लगता है, मनुष्यता अपने अर्थ को खोती नज़र आती है, विकास की चकाचौंध स्याह पड़ती-सी दिखती है। दिल्ली महानगर का चित्र खींचते हुए कमलेश्वर ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ में लिखते हैं, “कितना वीरान है यह जन-समुद्र!... ये कोलाहल से भरी सड़कें... आदमी पर जीता हुआ आदमी... ये कारें, बसें, मोटरें, शोर करते हुए स्कूटर... इमारतें और इमारतों में अपना खून चुसवाते हुए निरीह लोग... जिनके पास अपनी कोई जिन्दगी नहीं है। न अपनी आकांक्षाएँ... और सपने। न अपने फैसले... और न अपनी आजादी! धरती से आसमान तक एक लम्बी मीनार है, जिसके तल में करोड़ों, अरबों, खरबों आदमी खड़े हैं और उनकी गर्दनों पर दूसरे सवार हैं... उन दूसरों पर तीसरे सवार हैं... उन तीसरों पर चौथे सवार हैं... और आसमान तक यही सिलसिला चला गया है।”2 

कमलेश्वर ने महानगर का जो चित्र खींचा है, वह आज के समय का क्रूर यथार्थ है। यह एक ऐसी हत्या है जहाँ खून की जगह सपने बहते हैं, गोली की ठनक की जगह रिश्तों के दरकने की आवाज सुनाई देती है। कोलाहल और भीड़-भाड़ की ऊपरी परत के नीचे संवादहीनता, संवेदनहीनता और स्वार्थपरकता की अनुगूँज सुनाई देती है। जहाँ मनुष्य करोड़ों की भीड़ में अपने होने के अर्थ को पूछता है। “भीड़ जो सिर्फ़ भीड़ है। जिसमें कोई किसी को नहीं पहचानता। वे सिर्फ़ एक-दूसरे को ऐसी नज़रों से देखते हैं, जैसे पूछ रहे हों, ‘तुम्हारे होने का मतलब? क्यों... किसलिए?’ ”3

महानगर का मतलब सिर्फ़ चकाचौंध नहीं है, भागती हुई गाड़ियाँ, बार या पब नहीं है। महानगर एक संस्कृति है जहाँ ताकतवर जीते हैं और कमजोर अपनी लाचार, विवश जिन्दगी की जिजीविषा को अपने खून से सींचते हैं। कमलेश्वर ने अपने इस लघु-उपन्यास ‘समुद्र में खोया आदमी’ में महानगर का ऐसा चित्र उकेरा है, जो प्रायः हमारी नज़रों से ओझल ही रहता है। उन्होंने समुद्र की लहरों का नहीं, बल्कि इन लहरों के अंदर छिपे उन लाखों चेहरों की ‘मौनमधि पुकार’ को सामने लाया है जो प्रायः विकास और गति के पहिये के नीचे दब जाते हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने ‘अनसर्टेन ग्लोरी’ में सही कहा था कि ‘हमने शहरों को रहने लायक बनाया नहीं और गाँवों को रहने लायक छोड़ा नहीं’। ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ का मुख्य पात्र श्यामलाल अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बेहतर रोजगार की तलाश में दिल्ली आता है।... “यह कमरा था जो उन्हें सबसे अलग करता था। कीलों पर मैले कपड़े, कोने में ट्रंक और उनके ऊपर तमाम घरेलू सामान। खिड़की पर भरी हुई खाल की तरह झूलता हुआ पर्दा। बल्ब के आस-पास पड़ा हुआ जाल।... और दीवार पर पं. जवाहरलाल नेहरू की एक तस्वीर...।”4 राजनीति जनता को बेहतर जीवन देने का नाम है पर समय का नंगा सच किसी से छुपा नहीं है। आज हम महानगर से ‘स्मार्ट सिटी’ की ओर बढ़ रहे हैं। हमारी इस ‘स्मार्ट’ भरी यात्रा में कमजोर और आम मनुष्य के लिए कोई जगह या सपने हैं? यह प्रश्न हमारे सामने घड़ियाल की तरह मुँह बाये खड़ा है। लघु-उपन्यास ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ इस प्रश्न को और भयावह और विकराल बनाता है, जहाँ आर्थिक मजबूरी कुछ ऐसा खेल दिखाती है कि श्यामलाल का पूरा परिवार अलग-अलग रहने को विवश हो जाता है। साथ में रहती है तो मात्र जिन्दगी की गाड़ी को खींचने की एक लाचार आशा...। और कसक भरा यह सवाल कि “अपना टापू छोड़कर घरवाले समुद्र में क्यों उतर पड़े हैं? क्या खोजने और पाने के लिए वे दिल्ली चले आए हैं।”5 इस लघु-उपन्यास के पात्र श्यामलाल के बेटे बीरेन का यह सवाल कई सवालों को खड़ा करता है। वह कौन-सी मजबूरी है जहाँ मनुष्य जीवन के लिए ‘जीवन’ को छोड़ने को विवश है। महानगर आकर श्यामलाल को महसूस होता है कि “जैसे वह डूबते जहाज में घिर गए हैं। चारों तरफ से ऊँची-ऊँची लहरें पछाड़ खाती हुईं बढ़ती आ रही हैं और वह अब कुछ नहीं कर सकते। धीरे-धीरे सब कुछ इन लहरों में डूबता जाएगा और फिर एक झटके में यह जहाज अतल गहराइयों में समा जाएगा... और वह ऊब-ऊबकर मर जाएँगे। चारों तरफ सूनापन छा जाएगा और कुछ भी बाकी न बचेगा।”6 महानगरीय जीवन का यह विरोधाभास, जहाँ कुछ ज्यादा पाने की आकांक्षा से मनुष्य आता है, पर यहाँ वह कुछ ऐसे चक्रव्यूह में फँसता है कि जिन्दगी ही बेमानी हो जाती है। जिन्दगी के इस बेमानी हो जाने की करुण और झकझोर देने वाली गाथा को अपने लघु काया में उपन्यास ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ बड़े गहरे और यथार्थ तरीके से अभिव्यक्त करता है।

महानगरीय जीवन से संबंधित कमलेश्वर के लघु-उपन्यास एक त्रासद घटना की तरह उपस्थित होते हैं। उनके लघु-उपन्यास ‘तीसरा आदमी’ में एक नए शादी-शुदा दम्पत्ति आर्थिक दबाव और महानगर के ताने-बाने में कुछ इस तरह उलझ जाते हैं कि सब कुछ बचा रह जाता है। नहीं बचता है तो उनमें एक-दूसरे के रिश्ते। दाम्पत्य-जीवन को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए जिस आपसी विश्वास और प्रेम की प्रगाढ़ता की जरूरत होती है, वही खत्म हो जाती है। इस उपन्यास के कथानक के बारे में कमलेश्वर ने खुद लिखा है कि “महानगर में संघर्षरत एक मध्यमवर्गीय परिवार। परिवार क्या, पति, पत्नी और पति का एक मित्र। संत्रास, घुटन और उमस वाली भीड़-भरे इस महानगर के एक छोटे-से कमरे में इन तीनों का रचाव, बसाव, मनमुटाव, द्वंद्व, संशय और स्पर्धा, इस संशय की कथा है – जिसमें पति अपनी पत्नी पर शंकालु निगाह रखने को विवश होता है। उसका अज़ीज़ दोस्त एक वक्त उसके लिए ‘तीसरा आदमी’ का प्रतीकार्थ बन जाता है। यह कथा वक्त की नज़ाकत है।”7

इस लघु-उपन्यास में नरेश और चित्रा नए शादी-शुदा दंपत्ति हैं। बेहतर भविष्य का सपना उन्हें दिल्ली महानगर लाकर बसा देता है। वक्त की मजबूरी यह है कि वे अलग कमरा लेकर रह नहीं सकते। उनकी यह मजबूरी अपने एक रिश्तेदार और मित्र के एक कमरे वाले किराये के घर में रहने को विवश कर देती है। आर्थिक दबाव जीवन की नैसर्गिक अनुभूतियों और इच्छाओं का गला घोंट देता है। एक पति-पत्नी जिसकी नई-नई शादी हुई है, वे महानगर में ऐसे कमरे में रहने को विवश हैं, जहाँ सड़ांध, उमस और सीलन के सिवा कुछ नहीं है और त्रासदी यह है कि यह कमरा भी एकांत नहीं है। इस कमरे में उसका रिश्तेदार दोस्त भी रहता है। एक शादी-शुदा दंपत्ति पर इससे बड़ा अत्याचार और क्या हो सकता है! दोनों में आपसी प्रेम विकसित होने के लिए जिस एकांत और खुले माहौल की जरूरत थी, वह परिस्थितिवश उनके पास नहीं हैं। कहीं खुला माहौल है भी तो वहाँ शक, आते-जाते घूरना और पुलिस का पहरा है। पता नहीं क्यों, इस ‘तीसरा आदमी’ पर चिंतन-मनन करते हुए निराला याद आ रहे हैं। उनकी कविता ‘तुलसीदास’ का एक अंश है –

‘छोटे-से घर की लघु सीमा में
बँधे हैं क्षुद्र भाव
यह सच है प्रिये!
प्रेम का पयोनिधि तो उमड़ता है
सदा ही निःसीम भू पर।’

महानगरीय वातावरण और आर्थिक मजबूरी में नरेश और चित्रा के बीच नजदीकी कम और दूरियाँ बढ़ती जाती हैं। और चित्रा अपने पति के दोस्त सुमंत के क्रमशः करीब होती जाती है। महानगर में रहते हुए एक पति अपनी पत्नी के लिए ‘तीसरा आदमी’ बन जाता है। महानगर में रहने की मजबूरी एक आम संघर्षशील इंसान के बाहरी दुनिया में तो भूचाल लाती ही है, साथ ही भीतरी दुनिया में ऐसा घाव कुरेदती है, जिसका उपचार जीवन के अंत से होता है। पति-पत्नी के रिश्ते में इस बड़ी विडंबना और हिंसा क्या होगी, जब पत्नी पति से परदा करने लगे। सच में “पति-पत्नी के संबंधों का आधार ही दूसरा है – इस सम्बन्ध में एक नैसर्गिक कोमल-पशुता है। यह सम्बन्ध बुद्धि से उतना संतुलित नहीं होता जितना कि हृदय से... इस सम्बन्ध के बारे में तर्क हो ही नहीं सकता...।”8

कमलेश्वर ने अपने इस लघु-उपन्यास ‘तीसरा आदमी’ में महानगरीय जीवन के भीतर एक ऐसी कथा का ताना-बाना बुना है जहाँ विवाह संस्था ही अप्रासंगिक होने लगती है। इस उपन्यास में चित्रा का पति यह सोचने को विवश होता है कि “छल के सिवा अब इस रिश्ते में बाकी क्या बचा है? यही कि व्यक्ति स्वयं को छलता रहे और दूसरे द्वारा छला जाता रहे।... वैवाहिक अपेक्षाओं की पूर्ति में संलग्न व्यक्ति कितना भद्दा और बेहूदा लगता है। शायद इसलिए और भी ज्यादा कि विवाह का वह परम्परागत स्वरूप अब नष्ट हो चुका है... उसकी सामाजिक अपेक्षाएँ बदल गई हैं।”9

एक छोटे शहर से महानगर आए एक रिश्ते के मायने एवं सरोकार का बदल जाना, पति-पत्नी के कोमल रिश्ते का अजनबी में परिणत हो जाना और रिश्तों को लेकर मनुष्य के भीतर ऊहापोह और उधेड़बुन का समुद्र की लहरों की तरह उफनना, इस उपन्यास को ट्रेजडी कथा में परिणत कर देते हैं। जीवन की डोर को सँजोने और उसे सँवारने महानगर आया एक दम्पत्ति के बीच कब और कहाँ वह ‘डोर’ ही छूट जाती है, इसका पता ही नहीं चलता, और जब चलता है तो सब कुछ बेमानी और अर्थहीन हो जाते हैं। कमलेश्वर का यह लघु-उपन्यास कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ की याद दिलाता है। वहाँ जगपती और चंदा है, और यहाँ नरेश और चित्रा है पर सबकी नियति एक ही है – आपसी रिश्तों में टूटन और बिखराव, और इससे पैदा हुई एक त्रासद स्थिति जहाँ पति-पत्नी के रोमानी और कोमल रिश्ते परिस्थितिवश बेमानी हो जाते हैं।

हिन्दी लघु-उपन्यास में महानगरीय जीवन की सच्चाइयों की पड़ताल के क्रम में बशीर बद्र याद आते हैं। उनका एक शेर है –

‘कोई हाथ भी नहीं बढ़ाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
यह नए मिजाज का शहर है, जरा फ़ासलों से मिला करो।’

किसी नगर या महानगर का अर्थ तभी सार्थक हो सकता है जब वहाँ जीवन को जीने का समान अधिकार हो। जहाँ मनुष्य एक यंत्र की तरह नहीं, बल्कि मनुष्य की तरह रहे। महानगर आधुनिक समाज का एक यथार्थ है, पर वह सबके लिए सुनहरा रहे, किसी के लिए वह यथार्थ स्याह साबित न हो। नहीं तो हम महानगर से ‘स्मार्ट सिटी’ की ओर बढ़ते रहेंगे और मनुष्य पीछे छूटते जाएँगे। गाँव की कीमत पर नगर और नगर की कीमत पर महानगर, इस अंधी यात्रा में कहीं न कहीं ऐसा तो लगता है कि हम अपने देश को छोड़कर ही बहुत आगे बढ़ गए हैं, पीछे छूट गए हैं हमारे कुछ अपने... वे अपने जो इस देश को सींचते हैं पर पता नहीं क्यों वे परीक्षाओं के ‘निबंध’ में सिमटकर रह गए हैं। उनके बिना इस देश की मूल आत्मा को बचाए रखना असंभव है। जो जीवन को अपने जीवन के पसीनों से सींचता है और दूसरों के लिए अपना ही जीवन दाँव पर लगा देता है। वह पसीना और जीवन बेमानी हो जाता है, सत्ता के निरंकुश हाथापाई, जहाँ जीवन का उत्पादक ही हाशिये पर चला जाता है, जिसे कवि राजेश जोशी यूँ व्यक्त करते हैं –

“देश के बारे में लिखे गये हजारों निबन्धों में लिखा गया
पहला अमर वाक्य एक बार फिर लिखता हूँ
भारत एक कृषि प्रधान देश है
दुबारा उसे पढ़ने को जैसे ही आँखें झुकाता हूँ
तो लिखा हुआ पाता हूँ कि पिछले कुछ वर्षों में डेढ़ लाख से अधिक किसानों
ने आत्महत्या की है इस देश में।”

                (‘इस आत्महत्या को कहाँ जोड़ूँ’ कविता से)...

यहाँ हिन्दी में जिन लघु-उपन्यासों पर विचार किया गया है, वहाँ एक हत्या हर जगह दिखती है। वह चाहे प्रेम की हत्या हो, या पति-पत्नी के संबंधों की हत्या हो, या आर्थिक दबाव और मुश्किलों के बीच पूरे परिवार के साथ अपनी हत्या हो... महानगरीय जीवन से संबंधित कमलेश्वर के लघु-उपन्यास एक ‘हत्या’ के ही तो दस्तावेज़ हैं! यह हत्या किसलिए और क्यों, ये सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। विकास का कोई विरोधी नहीं होता है, पर वह विकास का खाँका अपनी जमीन और उस जमीन पर रहने वाले हर मनुष्य के जीवन की स्थितियों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया हो!

युवा कवि निशांत की कविता है –
“जल ही जीवन है
जब चारों ओर जीवन ही जीवन दिखने लगे
समझिए बाढ़ आ गई है।”
                (‘जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा’ कविता-संग्रह से)


संदर्भ सूची :-
  1. घनश्याम ‘मधुप’, हिन्दी लघु-उपन्यास, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली;1971,पृ. 47
  2. समग्र उपन्यास : कमलेश्वर के दस उपन्यास, राजपाल एण्ड सन्ज़ प्रकाशन, दिल्ली; 2011, पृ. 33
  3. वही, पृ. 298
  4. वही
  5. वही, पृ. 311
  6. वही, पृ. 298
  7. वही, पृ. 157
  8. वही, पृ. 183
  9. वही, पृ. 189


डॉ. अभिषेक रौशन
सहायक प्राध्यापक (हिंदी विभाग),अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद,संपर्क-सूत्र – 9676584598,

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1 टिप्पणी:

  1. बहुत खूबसूरत, सार्थक, अपने में सम्पूर्ण और सटीक शोधपत्र । जैनेन्द्र से आज तक की यात्रा । बधाई । कृष्णा सोबती के 'यारों के यार' या 'ऐ लड़की' भी महानगरीय जीवन के कुछ और अनछुए द्वार खटखटाते हैं।

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