कविताएँ: बिपिन कुमार पाण्डेय - अपनी माटी

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रविवार, मार्च 26, 2017

कविताएँ: बिपिन कुमार पाण्डेय

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
कविताएँ: बिपिन कुमार पाण्डेय 

जय जवान जय किसान 
जय जवान, जय जवान
जय किसान, जय किसान
हिन्दू, हिन्दू
मुसलमान
खास, आम
पाकिस्तान
स्कूल , मदरसा
और विज्ञान
जुमला, जुमला
राम भगवान
टोलरेंस, इनटोलरेंस
गाय महान
बीच में आया बलूचिस्तान
देशभक्ति, देशद्रोह
दुनियाँ भर का माया मोह
56 इंची सीना तान
हो रहा है चारण गान
जय जवान, जय जवान
जय किसान, जय किसान 


आदमी
आदमी का क्या ?
पैदा हुआ है तो मरेगा ही
अब चाहे तो धर्म मार दे
या मार दे पेट की भूख
चाहे तो कोई वाद मार दे
या मार दे अपनों का दुःख
चाहे तो सूखी खेती मार दे
या मारे साहूकार का डंडा
 चाहे चिलचिलाती धूप मार दे
या फिर मार दे मौसम का ठंडा
आदमी का क्या
पैदा हुआ है तो मरेगा ही
कभी ईमान के नाम पर
कभी ईनाम के नाम पर
कभी-कभी राष्ट्रद्रोह
और कभी ईशनिंदा
जब कोई चाहे तभी मार दे
मिले जो कोई जिन्दा
आदमी का क्या
पैदा हुआ है तो मरेगा ही


खाली स्थान 
विज्ञान कहता है
कोई भी स्थान, कभी खाली नहीं रहता
अगर कोई स्थान खाली हो जाए  
तो बाहरी चीज़े आने लगती है उसे भरने के लिए
खाली गड्ढे में पानी भर जाता है, मच्छर और बीमारियाँ पनपती हैं
पहाड़ों की दरारों में बने खाली स्थान में
पानी भरता जाता है ,जो उसके टूटने का कारण बनता है
और जब हवा खत्म होती है किसी जगह से, दौड़ी चली आती है बाहर से कोई दूजी अनजानी हवा
उस जगह को भरने के लिए
और नतीजे में चक्रवात आता है
जितना ज्यादा खाली स्थान, उतनी बिमारी, उतनी टूटन और उतना ही तीव्र चक्रवात
ठीक यही होता है मानव जीवन में
जैसे ही दिमाग या दिल खाली होता है, भावनाओं से, रिश्तों से
उतनी ही बढती है उसमे टूटन
व्यक्तित्व की टूटन, भावनाओं की टूटन
और बाहर से आकर भर लेती हैं उस खाली स्थान को
निराशा, दुःख, कर्तव्यविमूढ़ता जैसी बाहरी हवाएं
और फिर तोड़ती रहती हैं धीरे-धीरे मानव मन को
ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ की दरारों में भरा पानी
तोड़ता रहता है उसे धीरे-धीरे 



बादल और बारिश
अभी कुछ देर पहले आसमान में बादल आये थे
वही काले-काले मोटे-मोटे, अलग-अलग आकार के
वही जिनको देखकर दादी कहती थी आज बारिश होगी
वही जिनको देखकर मेढ़क टर्राने लगते थे
बादलों ने किसी का भरोसा नहीं तोड़ा
ना दादी का, ना मेरा, ना उस टर्राने वाले मेढ़क का
अभी झूम कर बरसे हैं, आसमान के काले बादल
अभी-अभी तेज हवा से उड़ती धूल, सो गयी है धरती को गोद में
पत्ते कुछ ज्यादा हरे लगने लगे हैं
मोर कुछ ज्यादा कूकने लगे हैं
बगल वाले घर से बच्चे ने छोड़ी है
उफनाई नाली में कागज़ की नाव
अभी-अभी भली लगने लगी है
काली छतरी की छांव
वही दूर टपरे के नीचे, दुकानदार तल रहा है पकौड़ियाँ, बना रहा है चाय
अभी-अभी बूंदों से सिहरकर, रंभाने लगी है गाय
अभी-अभी उसकी हरी चुन्नी, उड़कर जा फंसी है डाल पर
बारिश की कुछ शीतल बूंदे, चमक रही उसके भाल पर
तन भी आज खुले मन से भीगने को है तैयार
अभी-अभी मुझे खुद पर, खुद से आने लगा है प्यार.

हम हैं सरकार 
हम है सरकार
नहीं किसी के विचारों की
है हमे दरकार
जो मेरे साथ साथ चले
बस वही साथी है
मुझसे उलट चलने की सजा
गोली और लाठी है
जो जी में आएगा
हम वही करेंगे
लूटेंगे इस देश को
साथियो के घर भरेंगे
लूट डकैती भ्रष्टाचार
ये सब है मेरे सहचर
अनीति,बेशर्मी का हमने,प्रभु से
माँगा है वरदान कहकर
भूल के भी मेरे खिलाफ
कोई बात न कहना, सुन लो
जो हम कहे वही नियम है
इन बातो को हृदय में बुन लो
कहने को नक्सलवाद ,भाई भतीजावाद
हम मिटाते है
पर परोपकार के चलते
फिर से इन्हे जिलाते है
खत्म होगा हर विचार
खिलाफत करेगा जो हमारी
मत आना सामने कभी
आखिर क्या औकात है तुम्हारी
पक्ष विपक्ष हम भाई भाई
इधर न देखो
तुम हो आम जन
मनमर्जी करने दो हमको
नहीं तो
लाठिया पड़ेंगी दनादन
गरीबो को मिटाकर करेंगे
अमीरों से प्यार
क्योंकि 
हम है सरकार
नहीं किसी के विचारों की
है हमे दरकार

                                    बिपिन कुमार पाण्डेय
                           शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत,बाड़मेर,राजस्थान
             संपर्क 09799498911,bipin.pandey@azimpremjifoundation.org

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