Latest Article :
Home » , , , , » दलित विमर्श:सरहपा और दलित चिन्तन – हनुमान सहाय मीणा

दलित विमर्श:सरहपा और दलित चिन्तन – हनुमान सहाय मीणा

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
-------------------------

दलित विमर्श:सरहपा और दलित चिन्तन – हनुमान सहाय मीणा 

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सरहपा पहले बौद्धसिद्ध हैं जिन्होंने चर्यागीतों और दोहाकोश की रचना की। उन्होंने सरहपा का समय 8 वीं शताब्दी ईस्वी ठहराया है। इन्हें सहोरुपाद, सरोज वज्र, राहुल वज्र भी कहा जाता था। राहुल सांकृत्यायन ने सरह का समय (770-815 ई.) निर्धारित किया है। उन्होंने अपने संपादकत्व में लिखे ग्रंथ ‘दोहाकोश’ में यह भी बताया है कि सरहपा राजा धर्मपाल के समकालीन थे। राजा धर्मपाल का शासन काल 764 -809 ई. तक था। कुछ अन्य विद्वानों ने भी सरह का समय आठवीं शताब्दी ही माना है।

       धर्म के बाह्याडंबर का विरोध तो सभी सिद्धों ने किया पर सरहपा के स्वरों में जो आक्रामकता, उग्रता और तीखापन था वह बाद में चलकर कबीर में सुनाई पड़ता है। आक्रोश की भाषा का पहला प्रयोग सरहपा में ही दिखाई देता है। सामाजिक और धार्मिक जीवन की कृत्रिमता, घुटन और रुढिग्रस्तता के विरूद्ध कितना तीखा व्यंग्य है। जिस समय और पंडित लोग शास्त्रज्ञान के प्रकाश में परमतत्व का ज्ञानदान कर रहे थे, उस समय उसका मखौल उड़ाते हुए देहस्थ बुद्ध को पहचानने पर जोर दे रहे थे। शास्त्रज्ञ एक विशेष वर्ग तक सीमित था जिससे वास्तविक नहीं हो सकता था। देहस्थ बुद्ध की पहचान सहज मार्ग से ही हो सकती थी - 

‘पंडिअ सअल सत्य वक्खाणअ ।
   देहहि बुद्ध वसन्त ण जाणअ ।।1 

इसकी प्रतिध्वनि कबीर में सुनाई पड़ती है – पोथि पढि - पढि  जग मुआ पंडित भया न कोय । शास्त्रवाद से हटकर लोकवाद की ओर जाने की प्रक्रिया अपभ्रंश काल से ही शुरू हो गई थी ।  

        हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल का आरंभिक चरण सिद्ध–नाथों का ही है। इतिहास में चौरासी सिद्ध और नौ नाथों की चर्चा आती है, जिनमें अधिकांश निम्न जाति के थे। ये वज्रयानी सिद्ध अपने वामाचारों के लिए बदनाम हैं किन्तु यदि उनके आचार इतने ही अगर्हित थे, तो वे विश्वप्रसिद्व नालंदा और विक्रमशिला के शिष्य और आचार्य कैसे हो गये? सच तो यह है कि सिद्ध–नाथों की इस परम्परा ने दलित और स्त्रियों के लिए जितना कुछ किया, उतना किसी ने नहीं। धार्मिक कर्मकांड, अंधविश्वास और रुढियों का विरोध करके इन सिद्ध–संतों ने मानवीय समानता की जो उच्च भूमि तैयार की, उसी पर बाद में कबीर आदि संतों के समानतावादी दर्शन खड़े हुए। इसी परम्परा ने स्त्रियों ओए दलितों की मुक्ति के दरवाजे खोले। तमाम विद्वानों ने सिद्धों का सम्बन्ध शूद्र आदि दलित जातियों से बताया है, किन्तु सिद्ध चाहे किसी भी जाति के रहे हों, उनके कुक्कुरिप्पा, चमरिप्पा, कन्हाप्पा, लुइप्पा आदि तथाकथित सभ्य समाज को चिढाने के लिए काफी हैं।2

         साहित्य के क्षेत्र में सिद्धों ने चर्यापद और दोहे जैसे छन्द दिये, जिनमें वैदिक आचारों के खंडन – मंडन और ब्राह्मणवादी विचारधारा का विरोध मिलता है। दोहकोशों के माध्यम से समाज में प्रचलित रुढियों, बाह्य विधानों और ब्राह्मणवादी आडम्बरों का खंडन किया है तथा चर्यापदों के माध्यम से जनमानस को प्रबोधित करते हुए अपने उपदेश दिए हैं। यहाँ सरहपा के कुछ पदों के उदाहरण दिए गये हैं ; पानी और कुश लेकर संकल्प करने–कराने वाले, रात–दिन अग्निहोत्र में निमग्न रहने वाले, घड़ी–घंटा बजाकर आरती उतारने वाले, मुंड–मुंडाकर संन्यासी बनने वाले, नग्न रहने वाले, केशों को लुंचित करने वाले, झूठे साधकों की लानत–मलामत करने वाले में वे समूचे बौद्ध साधकों के अद्वितीय थे। इस संदर्भ में लिखा है –

‘जइ रागग्गा बिअ होइ मुत्ति ता सगुणह णिअम्बइ ।
लोमुपाटणें अत्थि सिद्वि ता जुबइ णिअम्बइ  ।।
पिच्छी गहणे दिट्ठ मोक्ख तो मोरह चमरह ।
उच्छे भोअणे होइ जाण ता करिह तुरंगह ।।

          एक दूसरे स्थान पर ब्राह्मणों की भत्सर्ना करते हुए वे लिखते हैं – ‘यह कथन कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए थे, कुछ चतुर और धूर्त लोगों द्वारा गढ़ी गयी कपोल कल्पना है। जिस समय सिद्धों की वाणियाँ उत्तर–पूर्वी भारत को खंडन–मंडन द्वारा ब्राह्मणवादी आचारों का निषेध कर रही थीं, लगभग उसी समय उत्तर–पश्चिम भारत में नाथों का उदय हो रहा था। नाथपंथ के प्रवर्तक बाबा गोरखनाथ को अधिकांश विद्वान ब्राह्मण मानते हैं, किन्तु ब्राह्मण होने पर भी ब्राह्मणवादी पाखंडो का विरोध करके उन्होंने भक्ति का एक नया मार्ग सुझाया, जो सबके लिए ग्राह्य था। इसलिए डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं – भक्ति आन्दोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आन्दोलन गोरखनाथ का भक्तिमार्ग ही था। गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे।

इस प्रकार जाति–प्रथा का विरोध, अन्धविश्वाश और कर्मकांडों का खंडन, मानवीय समानता, परम सत्ता में विश्वास आदि नाथपंथियों की देन है। इसके अतिरिक्त इस काल में प्रचुर संख्या में जैन और बौद्ध साहित्य मिलते हैं, जिनकी शिक्षाएं दलित चेतना के करीब है। सरहपाद आज भी उतने ही सार्थक हैं, जितने कि वे अपने युग में थे। यह बात इसी आधार पर कही जा सकती है कि उस युग में और आज के युग में बहुत सी बातें समान है। बहुत से सामाजिक प्रश्न जो उस युग में चर्चित थे, वे आज भी चर्चित हैं। वर्ण–व्यवस्था, अन्ध-विश्वास, धार्मिक पाखण्ड आदि पर उन्होंने पूरी चोट की है।

        वर्णव्यवस्था के बारे में सरहपाद बहुत स्पष्ट थे । वे स्वयं ब्राह्मणकुल में उत्पन्न थे, फिर भी जातिगत उच्चता के हामीं नहीं थे। यही कारण है कि अपनी जाति पर उन्होंने वैसा ही प्रहार किया, जैसा कि कोई ब्राह्मणेतर कर सकता है। इस अर्थ में सरहपाद अपने युग के तमाम विद्वानों से आगे थे। यद्धपि सरहपाद पहले व्यक्ति नहीं थे, जिन्होंने ऐसा कदम उठाया हो। बौद्ध व जैन साहित्य के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि बुद्ध व महावीर के युग में और बाद के युगों में भी ऐसे अनेक विद्वान व साधक थे।

        अंधविश्वास पर सरहपाद ने वैसा ही प्रहार किया है जैसा कि स्वयं भगवान बुद्ध ने किया था। धार्मिक पाखण्ड के सरहपाद वैसे ही विरोधी थे जैसा कि अन्य तर्क–विपरीत बातों के। उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके युग में यह दोष और भी नुमायाँ था। यही कारण है कि सरहपाद ने उस पर पूरी शक्ति से प्रहार किया है। इस प्रकार सरहपाद के समूचे साहित्य के अवलोकन से स्पष्ठ होता है कि वे बहुत बड़े विद्वान भी थे और साधक भी। अपने युग की मान्यताओं को बदलने के लिए उन्होंने लेखनी का प्रयोग किया। इस अर्थ में सरहपाद पूरे क्रांतिकारी थे।

       सरहपा ने वैदिक या ब्राह्मणवादी विचारधारा के विरुद्ध नागार्जुन के शून्यवाद घोर- असंग और बसुबंधू के आलय–विज्ञान को मान्यता दी थी और उसके आधार पर सरहपा ने ब्रह्म, ईश्वर, आत्मा और जगत की सत्यता का खंडन किया था। यह दार्शनिक संघर्ष यह सिद्ध करता है कि आस्तिक विचारधारा के विरुद्ध सिद्धों ने नास्तिक बौद्ध दार्शनिकों नागार्जुन-असंग, दिड्.नाग और धर्मकीर्ति आदि का समर्थन किया था अर्थात् बौद्ध सिद्ध साहित्य में वैदिक ब्राह्मणवादी विचारधारा के समानांतर स्वतंत्र विचार प्रवाह की स्थापना हुई थी जो सामाजिक दृष्टि से भेदभाव और विषमता के विपरीत सहज मानवीय व्यवस्था की पक्षधर थी।

          यदि तात्कालिक सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से देखा जाए तो सिद्ध साहित्य और साधना प्रचलित वैदिक या ब्राह्मणवादी विचारधारा के विरोध में जाती हैं। सिद्ध साधक वर्ण–जाति–कुलगत भेद और तज्जन्य अलगाव के विरुद्ध समता, एकता, करुणा और सामंजस्य के पक्षधर थे। दार्शनिक दृष्टि से भी उन्होंने वैदिक परम्परा से विद्रोह किया था और ब्रह्म, आत्मा और जगत के विषय में नास्तिक दर्शन या स्वतंत्र विचार-प्रवाह प्रस्तुत किया था।
         यह स्थिति सिद्ध परम्परा के योग और साधना को विशेष स्थान देती है। अतएव जो वामपंथी समाज-सुधारक हैं वे सिद्धों के साधना काल को उसके रहस्यवाद के कारण नहीं मानते तथापि उनके माध्यम से जो भारतीय समाज व्यवस्था के वैषम्य का विरोध हुआ है और उसमें दमित नारी, शुद्र या दलित समुदायों का जो पक्ष समर्थन है, उसे न्यायपूर्ण माना गया है या माना जाना चाहिए। 

          सरह स्वयं सरल जीवन बिताते थे क्योंकि उन्हें आडम्बर पसंद न था। यह बात सत्य थी कि वे इहलोकवादी, भौतिकवादी थे परन्तु यह बात भी सत्य है कि सामाजिक से सरहपा अति दुखी थे, इसलिए तो सरहपा ने अपने से बाहर मोक्ष को ढूँढने वाले तथा ज्ञान-विडंबित वेश वाले णपकी मोक्ष की खूब खिल्ली उड़ाई है। डॉ. नामवर सिंह इस सम्बन्ध में कहते हैं – सरह की इस इच्छा को अभिधा में नहीं लेना चाहिए, इसे तो सामाजिक आडम्बर की तीव्र प्रतिक्रिया समझना चाहिए। साथ ही इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सरह के दिल में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष था।  

          वस्तुतः सरह उस युग के निराला थे, जिन्होंने खुलकर सिर्फ विचारों की दुनियाँ में ही परिवर्तन नहीं किया, बल्कि सामाजिक पाखंड व रुढ़िवादिता के विरुद्ध भी जबरदस्त संघर्ष किया, इसलिए तो दोहाकोश गीति के कुछ दोहों में अपने समय के धार्मिक सम्प्रदायों और उनके विचारों का खंडन करते हुए उन्होंने कहा है – ये शिव के भक्त रंडी–मुंडी के वेश धारण कर भीख माँगने के उद्देश्य से इधर-उधर दिखाई पड़ते हैं। इस तरह वे समाज को, दुनिया के मानवों को उत्कृष्ठ रूप में देखना चाहते थे। यही कारण था कि वेद-शास्त्र की, वे निंदा करते हैं। उन्होंने निंदा करने का कारण नहीं बताया है, परन्तु यह संभव है कि वे तपोमय जीवन का आदेश देने वाले वेद तथा शास्त्र के दर्शन को सहज जीवनयापन में बाधा समझते हो । 


संदर्भ ग्रंथ सूची 
  1. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास – बच्चन सिंह ,पृ. सं. –30–31  
  2. दलित साहित्य का समाजशास्त्र – हरिनारायण ठाकुर , पृ.सं.-206 
  3. वही, पृ.सं. - 40 
  4. युगप्रवर्तक सरह और दोहाकोश – डॉ. रमाइन्द्र कुमार पृ.सं.-1
  5. वही, पृ.सं - 45
  6. सिद्ध सरहपा – डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय 
  7. युगप्रवर्तक सरह और दोहाकोश – डॉ. रमाइन्द्र कुमार पृ.सं.- 36 
  8. वही, पृ.सं.-28


हनुमानसहाय मीणा
    (पी.एच.डी.शोधार्थी),हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
   सम्पर्क:hanumanjnu09@gmail.com,9079419050
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template