धरोहर:हतभागो किसान / प्रेमचंद - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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धरोहर:हतभागो किसान / प्रेमचंद

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)
किसान विशेषांक
धरोहर:हतभागो किसान / प्रेमचंद
(जागरण - 19 दिसम्बर, 1932)

               
  भारत के अस्सी फीसदी आदमी खेती करते हैं। कई फीसदी वह हैं जो अपनी जीविका के लिए किसानों के मुहताज हैं, जैसे गाँव के बढ़ई, लुहार आदि। राष्ट्र के हाथ में जो कुछ विभूति है, वह इन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत का सदका है। हमारे स्कूल और विद्यालय, हमारी पुलिस और फौज, हमारी अदालतें और कचहरियाँ, सब उन्हीं की कमाई के बल चलती हैं, लेकिन वही जो राष्ट्र के अन्न और वस्त्रदाता हैं, भरपेट अन्न को तरसते हैं, जाड़े-पाले में ठिठुरते हैं और मक्खियों की तरह मरते हैं। कई जमाना था जब गाँव के लोग अपने डील-डौल, बल-पौरुष के लिए मशहूर थे। जब गाँवों में दूध-घी की इफरात थी। जब गाँव के लोग दीर्घजीवी होते थे। तब देहात की जलवायु स्वास्थ्यकर और पोषक थी, लेकिन आज आप किसी गाँव में निकल जाइए, आपको खोजने से भी हृष्ट-पुष्ट आदमी न मिलेगा, न किसी की देह पर मांस है न कपड़ा। मानों चलते-फिरते कंकाल हों। और तो और उन्हें रहने को स्थान नहीं है। उनके द्वारों पर खड़े होने तक की जगह नहीं, नीची दीवारों पर रक्खी हुई फूस की झोपड़ियों के अन्दर वह, उसका परिवार, भूसा, लड़की गाय बैल सब के सब पड़े हुए जीवन के दिन काट रहे हैं। कोई समय था जब भारत के धन का संसार में शोहरत थी। यहाँ के सोने और जवाहरात की चमक दूर-दूर के कवियों की आँखों में चकाचौंध हो जाती थी, विजेताओं के मुँह में पानी भर आता था, मगर आज वह कपोलकथा मात्र है। आज भारत दरिद्रता और अज्ञान के ऐसे गहरे गढ़े में गिरा पड़ा है कि उसकी थाह भी नहीं मिलती। लार्ड कर्जन ने 1901 में यहाँ की व्यक्तिगत आय का अनुमान तीस रुपया साल किया था। 1915 में एक दूसरे हिसाबदाँ ने इस हिसाब को पचास रुपये तक पहुँचाया, और 1915 में वह समय था जब योरोपीय महाभारत ने चीजों का मूल्य बहुत बढ़ा दिया था। 1930 में वही हालत फिर हो गयी जो 1901 में थी और हिसाब लगाया जाय तो आज हमारी व्यक्तिगत आय शायद पच्चीस रुपये से अधिक न हो, पर आज तक किसी ने किसानों की दशा की ओर ध्यान नहीं दिया और उनकी दशा आज भी वैसी है जो पहले थी। उनके खेती के औजार, साधन, कृषि-विधि, कर्ज, दरिद्रता सब कुछ पूर्ववत् है। नहीं यह कहना गलती होगी कि उनकी दशा की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। सरकार ने समय-समय पर उनकी रक्षा करने के लिए कानून बनाये हैं, और शायद इस तरह के कानून अब तक और ज्यादा बन गये होते यदि जमींदारों की ओर से उनका विरोध न हुआ होता। अब की बार ही छूट के विषय में जमींदारों ने कम रुकावटें नहीं डालीं। लेकिन अनुभव से मालूम हो रहा है कि इस नीति से किसानों का विशेष उपकार नहीं हुआ। इन कानूनों के बगैर सम्भव था, उनकी हालत इससे भी खराब होती। इनसे फायदा तो जरूर हुआ कि उनकी पतनान्मुखी प्रगति रुक गयी लेकिन उन्नति के लिए दशाएँ अनुकूल न हो सकीं। हमें तो उन्नति के लिए विधानों की जरूरत है जो समाज में विप्लव किये बिना ही काम में लाये जा सकें। हम श्रेणियों में संग्राम नहीं चाहते। हाँ, इतना अवश्य चाहते हैं कि सरकार और जमींदार दोनों ही इस बात को न भूल जायँ कि किसान भी मनुष्य है, उसे भी रोटी और कपड़ा चाहिए, रहने को घर चाहिए, उसके घर में शादी-गमी के अवसर आते हैं, उसे भी अपनी बिरादरी में अपने कुल के मर्यादा की रक्षा करनी पड़ती है। बीमारी-आरामी औरों की तरह उस पर भी व्याप्त होती है। इसलिए लगान बाँधते समय इस बात का खयाल रखें कि किसान को कम से कम खेती में इतनी मजूरी तो मिल जाय कि वह अपने बाल-बच्चों का पालन कर सकें। हमारे प्रान्त में अधिकतर किसान ऐसे हैं जिनके पास तीन-चार एकड़ से ज्यादा भूमि नहीं है। बहुत बड़ा हिस्सा तो ऐसों का है जिनके पास इसकी आधी जमीन भी नहीं है। और काश्तें जितनी ही छोटी होती हैं, उन पर खेती का खर्च उतना ज्यादा बैठता है। इसलिए जमीन के लगान के दर में नये सिरे से तरमीम होनी आवश्यक है। बेशक उससे जमींदारों की आमदनी कम हो जाएगी, और सरकार को अपने बजट बनाने में बड़ी कठिनाई पड़ेगी, लेकिन किसान के जीवन का अन्य सभी हितों से कहीं ज्यादा मूल्य है।

                किन्तु परिस्थितियों को देखते लगान में निकट भविष्य में विशेष कमी नहीं की जा सकती। वास्तव में हालत तो यह है कि छोटे-छोटे किसानों का खेती पर जो खर्च पड़ रहा है वह भी वसूल नहीं होता, लगान तो दूर की बात है। और मान लिया किसी तरह एक या दो साल डंडे के जोर से वसूल कर लिया गया भी तो क्या। जब किसान भूखों मर रहा है तो वह दुर्बल और रुग्ण होगा, खेती में ज्यादा मेहनत न कर सकेगा और इसलिए उसकी पैदावार भी अच्छी न होगी। हमें तो परिस्थिति में कुछ ऐसा परिवर्तन करने की जरूरत है कि किसान सुखी और स्वस्थ रहे। जमींदार, महाजन और सरकार सबकी आर्थिक समृद्धि किसान की आर्थिक दशा के अधीन है। अगर उसकी आर्थिक दशा हीन हुई तो दूसरों की भी अच्छी नहीं हो सकती। किसी देश के सुशासन की पहचान साधारण जनता की दशा है। थोड़े से जमींदार और महाजन या राजपदाधिकारियों की सुदशा से राष्ट्र की सुदशा नहीं समझी जा सकती।

                किसानों के लिए दूसरी जरूरत ऐसे घरेलू धंधों की है जिनसे वह अपनी फुरसत के वक्त कुछ कमा सकें।
                यह काम असंगठित रूप से सफल नहीं हो सकता। इसे या तो सरकारी सोसाइटियों के हाथ में दिया जाना चाहिए या सरकार को खुद अपने हाथ में रखकर व्यापार और उद्योग विभाग के द्वारा इसका संचालन करना चाहिए। एक प्रान्त में बाज ऐसी चीजें हैं जिनकी खपत नहीं है, मगर दूसरे प्रान्तों में उनकी अच्छी खपत है। ऐसे उद्योगों का प्रचार किया जाना चाहिए।

                खेती की पैदावार बढ़ाने की ओर भी अभी काफी ध्यान नहीं दिया गया। सरकार ने अभी तक केवल प्रदर्शन और प्रचार की सीमा के अन्दर रहना ही उपयुक्त समझा है। अच्छे औजारों, अच्छे बीजों, अच्छी खादों का केवल दिखा देना ही काफी नहीं है। सौ में दो किसान इस प्रदर्शन से फायदा उठा सकते हैं। जिनके भोजन का ठिकाना नहीं है, जो नाक तक ऋण के नीचे दबा हुआ है उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह नयी तरह के बीज या औजार या खाद खरीदेगा। उसे तो पुरानी लीक से जौ-भर हटना भी दुस्साहस मालूम होता है। उसमें कोई परीक्षा करने का, किसी नयी परीक्षा का जोखिम उठाने का सामर्थ्य नहीं है। उसे तो लागत के दामों पर यह चीजें कि इतवार अदायगी की शर्त पर दी जानी चाहिए। सरकार के पास इन कामों के लिए हमेशा धन का अभाव रहता है। हमारे विचार में इससे ज्यादा जरूरी सरकार के लिए कोई काम ही नहीं है।

                दूसरी जरूरत जमीन की चकबंदी है। जमीन का बँटवारा इतनी कमरत से हुआ है और हो रहा है कि जिसकी कोई हद नहीं। दक्षिण में सन् 1771 ई. में औसत जमाबन्दी चालीस एकड़ की थी। 1915 ई. में वह केवल सात एकड़ रह गयी। बंगाल में तीन एकड़ है और संयुक्त प्रान्त में केवल डेढ़ एकड़। यह डेढ़ एकड़ भी गाँव के चारों दिशाओं में स्थित है, इसलिए उसमें बहुत परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। चकबन्दी हो जाने से इतना फायदा होगा कि किसान अपने चक को बाड़ से घेर सकेगा, उसमें कुएँ बनवा सकेगा, खेती की निगरानी कर सकेगा। उससे उसकी उपज में कुछ अधिक होने की आशा हो सकती है।

                कीड़ों से भी फसल का अक्सर बहुत नुकसान होता है। पिछले साल चूहों ने कितने ही खेतों का सफाया कर दिया। कभी लाही आती है, कभी माही, कभी गेरूई, कभी पतिंगे। कभई दीमकों का जोर होता है, कभी कीड़ों का। किसानों के पास इन भौतिक बाधाओं की कोई दवा नहीं है। कृषि विभाग ने इस विषय में खोज की है और जरूरत है कि उसकी परीक्षित उपयोग किसानों के कानों तक पहुँचाए जायें। केवल इतना ही नहीं, उनके द्वारों तक पहुँचाए जायें, पर यहाँ पर तो जो कुछ होता है दफ्तरी ढंग से जो इतना पेचीदा और विलम्बकारी है कि उससे किसानों का फायदा नहीं होता। यहाँ दफ्तरी ढंग की नहीं, मिशनरी क्रियान्वयन की जरूरत है। अब तक सरकार ने किसानों के साथ सौतेल लड़के का सा व्यवहार किया है। अब उसे किसान को अपना जेठा पुत्र समझकर उसके अनुसार अपनी नीति का निर्माण करना पड़ेगा।

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