हिन्दी उपन्यासों में गाँव और किसान/अनन्त कुमार मिश्र - अपनी माटी

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शनिवार, नवंबर 11, 2017

हिन्दी उपन्यासों में गाँव और किसान/अनन्त कुमार मिश्र

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)
किसान विशेषांक
                    
हिन्दी उपन्यासों में गाँव और किसान/अनन्त कुमार मिश्र
(1990-2000 ई. के बीच प्रकाशित उपन्यासों के सन्दर्भ में)
                   
हिन्दी उपन्यासों में किसान जीवन पर आधारित व्यवस्थित लेखन की शुरुआत प्रेमचंद के उपन्यास गोदानसे होती है । गोदानमें लेखक ने किसानों के आर्थिक विपन्नता का वर्णन किया है। होरी जैसे कृषकों की स्थिति कितनी मर्मस्पर्शी है उसे इस रूप में देखा जा सकता है, “माघ के दिन थे। महाघट लगी हुई थी। घटाटोप अँधेरा छाया हुआ हुआ था। एक तो जाड़ों की रात, दूसरे माघ की वर्षा। मौत का-सा सन्नाटा छाया हुआ था। अँधेरा तक न सूझता था। होरी भोजन करके पुनिया के मटर के खेत की मेड़ पर अपनी मड़ैया में लेटा हुआ था। चाहता था, शीत को भूल जाय और सो रहे; लेकिन तार-तार कम्बल और फटी हुई मिर्जई और शीत के झोकों से गीली पुआल इतने शत्रुओं के सम्मुख आने की नींद में साहस न था। आज तमाखू भी न मिला कि उसी से मन बहलाता। उपला सुलगा लाया था, पर शीत में वह भी बुझ गया। बेवाय फटे पैरों को पेट में डालकर और हाथों को जाँघों के बीच में दबाकर और कम्बल में मुँह छिपाकर अपनी ही गर्म साँसों से अपने को गर्म करने की चेष्टा कर रहा था। पाँच साल हुए यह मिर्जई बनवाई थी। धनिया ने एक प्रकार से जबरदस्ती बनवा दी थी, वही जब एक बार काबुली से कपड़े लिए थे, जिसके पीछे कितनी साँसत हुई, कितनी गालियाँ खानी पड़ीं और कम्बल उसके जन्म से भी पहले का है। बचपन में अपने बाप के साथ वह इसी में सोता था, जवानी में गोबर को लेकर इसी कम्बल में जाड़े कटे थे और बुढ़ापे में आज वहीं बूढ़ा कम्बल उसका साथी है, पर अब वह भोजन को चबाने वाला दाँत नहीं, दुखने वाला दाँत है। जीवन में ऐसा तो कोई दिन ही नहीं आया कि लगान और महाजन को देकर कभी कुछ बचा हो।”1 

प्रेमचन्द ने जिस स्थिति का वर्णन यहाँ किया है वे उनके स्वयं के भोगे हुए सुख तथा दुख थे। यह अनुभूतियाँ स्वऔर परकी स्थिति से ऊपर उठकर आम जनता की अनुभूतियाँ बन गयी हैं। प्रेमचन्द के उपन्यासों का मुख्य विषय ग्रामीण जीवन से संबंधित है। होरी जैसे किसान को आधार बनाकर प्रेमचन्द ने सम्पूर्ण भारत के किसानों की त्रासद स्थिति को दिखाने की कोशिश की है।

भारत के लगभग 70 प्रतिशत आबादी आज भी गाँवों में निवास करती है। यहाँ के लोगों के आजीवका का आधार कृषि है। महात्मा गांधी का भी मानना था कि भारत की आत्मा भारत के गाँवों में बसती है, आज भी हम कह सकते हैं कि गाँव हमारी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन की पृष्ठभूमि है। के. एल. शर्मा का भारतीय समाज के बारे में कहना है कि, “भारत के सामाजिक जीवन की तीन निर्णायक संस्थाएँ गाँव, जाति और संयुक्त परिवार है। इन्होंने न केवल विदेशी आक्रमण और आंतरिक आघातों को झेला है बल्कि सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तनों की ताकतों को आत्मसात किया है और सम्मुख आई हुई आवश्यकताओं और चेतावनियों के अनुसार अपने आप को ढाल भी लिया है।”2

किसानों और खेतिहर मजदूर की आत्महत्याओं की घटना जिन राज्यों में अधिक घटी है वे राज्य कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल हैं। इन आत्महत्याओं का कारण किसानों की ऋणग्रस्तता बतायी गई है। भारत में शोषण और गरीबी के खिलाफ संघर्ष ने नक्सलवादी आंदोलन को जन्म दिया। 1967 में हुए नक्सलवादी आंदोलन ने देश के कई हिस्सों को प्रभावित किया। इस आंदोलन की शुरुआत नक्सलवाड़ी गाँव से हुआ। यह गाँव भारत, नेपाल और बांग्लादेश की सीमा पर स्थित है। यहाँ पर 1967 में आदिवासियों ने जमींदारों के विरूद्ध हथियार उठाये थे। इसके बाद यह आन्दोलन आग की तरह देश के कोने-कोने में अन्याय के खिलाफ फैलता गया। किसानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए 1990-2000 ई. के बीच प्रकाशित उपन्यासों के लेखकों ने ग्रामीण समाज में शिक्षा के कारण मजदूर, किसान और उपेक्षित तबकों की बदलती स्थिति को दिखाया है। पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण लागू होने के बाद ग्रामीण समाज के दलितों और पिछड़े वर्ग के बीच एकजुटता आयी जिसके कारण ये संगठित होकर अपने अधिकारों की मांग करने लगे। एकजुटता, राजनीति में भागीदारी और अधिकारों की मांग ने पारंपरिक ग्रामीण संरचना को परिवर्तित किया जिसे उपन्यास के माध्यम से देखा जा सकता है। कमलाकांत त्रिपाठी के उपन्यास पाहीघरमें जमींदारी व्यवस्था के यथार्थ स्वरूप को रेखांकित किया गया है। शंकर द्वारा जैकरन को दिया गया खेत ही उसका सहारा था उसे शंकर द्वारा छीने जाने पर पहले वह अनशन करता है फिर जब उसकी माँग पूरी नहीं होती है तब वह जहर खाकर अपनी जान दे देता है। जैकरन कहता है- देखो भैया, मैं जा रहा हूँ...यह चोला छोड़कर जा रहा हूँ। पाहीघर के ऊपर। उस बाभन के ऊपर। पहले बेटी की जान ली, फिर खेत छीन लिया।....देखना, निपात हो जाएगा उसका । डीह हो जाएगा पाहीघर। मेरी बात मानना। पाहीघर के बाभनों से कोई नाता न रखना। खान-पान, आना-जाना, पैलगी-असीस कुछ नहीं। उनके खेत की घास, पेड़ की पत्ती तक न छूना। जहर खाकर मर रहा हूँ। मालूम है, परेत बनूँगा। हमेशा यहीं, पाहीघर के आस-पास मँडराऊँगा।.... बिरादरी में जो मेरा कहना नहीं मानेगा....देखना क्या करता हूँ उसका.... ।”3 इतना कहने के बाद उसका आवाज धीरे-धीरे बंद हो जाता है और सुबह उसकी मृत्यु भी हो जाती है। इस तरह वह मरते-मरते समय तक अपने समाज के लोगों में संघर्ष के नए बीज बोता हुआ गरीब मजदूरों और किसानों के जीवन की कहानी कह जाता है।

आज भी गाँवों में कई ऐसे किसान हैं जो भूख और कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद भी गरीब किसानों की स्थिति में कुछ ख़ास बदलाव नहीं आ पाया है। डूबवीरेन्द्र जैन का ग्रामीण किसानों के जीवन पर लिखा गया महत्वपूर्ण कृति है। इसमें ग्रामीणों की यथार्थ स्थिति एवं सरकारी अधिकारी एवं राजनेताओं की स्थिति को निरुपित करते हुए सामाजिक विसंगतियों को देखने की कोशिश की गयी है। केन्द्रीय योजनाओं द्वारा मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को जोड़ने हेतु राजघाट नाम से बाँध बनाये जाने की घोषणा की जाती है। इसके आस-पास के क्षेत्र को सरकार द्वारा डूब क्षेत्र घोषित की जाती है जिसमें लड़ैई, चंदेरी, पानिपुरा और सिदौर गाँव को खाली करवाकर सरकार लोगों को विस्थापित करना चाहती है। इन गाँवों के आस-पास के सरकारी मदरसे को बंद कर दिया जाता है। सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाएँ भी कम कर दी जाते हैं। यहाँ तक की शहर से गाँव में आने वाले मुख्य मार्ग को भी बंद कर दिया जाता है। इन सब चीजों के कारण गाँव के लोग अन्य क्षेत्रों से एवं सुविधाओं से कट जाते हैं।

बाँध के नाम पर किसान खुश होते हैं कि मजदूर के रूप में उन्हें काम मिलेगा लेकिन ग्रामीण मजदूरों को काम पर नही रखा जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि, “यहाँ के स्थानीय आदमी मन लगा कर पूरे समय काम नहीं करेंगे क्योंकि वे अपने तीज-त्योहार मनाना नहीं छोड़ेंगे। घर-परिवार के शादी ब्याह में शामिल होना भी नहीं त्यागेंगे। कोई बीमार-दुखी हुआ तो उसकी तीमारदारी में जुटना भी नहीं छोड़ेंगे। ठेकेदार के मुँह से कोई ऊँच-नीच बात निकल गई तो उससे झगड़ने से बाज भी नहीं आएँगे।”4 इस तरह गाँव के स्थानीय लोगों मजदूरों और किसानों की स्थिति दिन-प्रतिदिन दयनीय होती जाती है।सरकार द्वारा ग्रामीणों के रहने के समुचित व्यवस्था किये बिना विस्थापित किया जाता है। गाँव के पूँजीपति वर्ग के लोग निर्मल साव, मोती साव और ठाकुर सब आपस में मिलकर गाँव के किसानों का शोषण करते हैं। 

गाँव के किसान और मजदूर वर्ग के लोग इन्हीं सब पूंजीपतियों के कर्ज के जाल में फंसते जाते हैं। सरकार जब इन मजदूरों और किसानों की जमीन का मुआवजा देती है तो अधिकारियों और पूंजीपतियों से मिलीभगत होने के कारण मुआवजे का रुपया उनके हाथ में न देकर पूंजीपतियों के माध्यम से उन्हें मिल पाता है। ये पूंजीपति वर्ग के सहकार लोग अपने द्वारा दिए गए कर्ज के रूपये काटकर उन्हें देते हैं। जब मजदूरों द्वारा नकद मजदूरी की माँग की जाती है तो उनके घर परिवार के लोगों को ठाकुर प्रताड़ित करता है। लेखक के शब्दों में कहें तो, “ठाकुर टपरा में घुसे और सकुशल निकल भी आए। इस बीच टपरा के बाहर तक आई मांसहीन हाड़ों पर तड़ातड़ बजती ठाकुर की लाठी की आवाजें और टपरा में मौजूद कृशकाया के चीखने-चिल्लाने, रोने-गिड़गिड़ाने की आवाजें, जिन्हें सुनने वाला वहाँ एकमात्र व्यक्ति था खुद ठाकुर देवीसिंह या फिर थे पेड़ों पर बैठे चिल-परेवा (कबूतर) ।”5 रास्ते में लौटते समय ठाकुर देवीसिंह घुमा के भाई को मारते हैं यह देख घुमा ठाकुर पर टूट पड़ता है तब वे अपनी शक्ति कम होता देख भाग जाते हैं। यहाँ हम देखते हैं कि निम्न जातियों द्वारा ठाकुरों के खिलाफ आवाज उठाया जा रहा है। घुमा दलित जाति का है लेकिन जब ठाकुर के मार के कारण उसके भाई की मृत्यु हो जाती है तब वह अपने अधिकारों के प्रति सजग होता हुआ ठाकुर देवीसिंह के विरुद्ध थाने में रिपोर्ट लिखवाता है। ठाकुर देवीसिंह अपने आप को पुलिस के हवाले करता है। बाद में ठाकुर आत्महत्या कर लेता है।

पारउपन्यास में वीरेन्द्र जैन सरकार द्वारा भारत में चलाई गई नसबंदी योजनाओं की असफलताओं का वर्णन किया है जो योजना ग्रामीणों को प्रतिलोभन देकर सफल होना चाहती थी लेकिन इससे काफी संख्या में गरीब किसानों एवं मजदूरों की जानें गईं। ग्रामीण स्त्रियों की व्यथा का भी वर्णन यहाँ किया गया है। जीरोन खेरे में निर्मल साव उर्फ़ घूरे साव आते रहते हैं। गाँव की स्त्रियों को जंगलों में बुलाकर उन्हें  शहर ले जाकर बेचने का कार्य करते हैं। गाँव में लौटकर जब वे आते हैं तब वे डाकुओं द्वारा स्त्रियों को उठा लिए जाने की बात करते हैं। इस सन्दर्भ में जीरोन का गुनिया सोचता है- डाकुअन के, भंड़यन के आने का राज़ क्या था? हमरी मौढ़ीं के जनीं के हिरा जाने का राज़ क्या था? कि जब तक घूरे साव खेरे में आता रहा तभी तक क्यों आए डाकू ? जब तक घूरे साव आता रहा तभी तक क्यों हिराईं हमरी जनीं ? तो क्या घूरे साव की खातिर आते रहे डाकू? या घूरे साव लाता रहा डाकू? या डाकू और घूरे साव एक ही जन के दो स्वाँग हैं? गुनता रहा गुनिया।”6 जब मुनिया कहती है कि, “डाकू-भंड़या नईं, मोए घूरे साव भगा ले गओ थो रे गुनिया।”7 इस तरह गुनिया के माध्यम से अन्याय का प्रतिवाद किया गया है। गुनिया की बात जब पुलिस मानने से इनकार करती है तब वह खुद घूरे साव के गले को दबा कर हत्या कर देता है।

 ‘भीम अकेलामें विद्यासागर नौटियाल ने उतराखंड के गाँवों के किसानों की समस्याओं को दिखाया है। धारी गाँव के आस-पास के गाँव जो पहाड़ पर बसे हैं वहाँ के लोगों को सरकार पानी उपलब्ध नही करवा पायी जिसका वर्णन करता हुआ लेखक कहता है- यहाँ की बस्ती में रहने वाले लोगों को पानी अलकनंदा से लाना होता है। नदी नीचे बहती है और वहां से ऊपर आने में सीधी, खड़ी चढ़ाई पड़ती है। यहां से नदी तट तक आना-जाना करीब डेढ़ किलोमीटर पड़ेगा। इस पानी के लिए सभी मंत्री, राजनेता, ऑफ़िसर वादा करते हैं। पर योजना बनती नहीं नजर आती।”8  सिंचाई की प्रयाप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं होने के कारण यहाँ कृषि कार्य भी नहीं हो पाता है जिसके कारण यहाँ के अधिकांश लोग बेरोजगार होते नजर आते हैं। कई लोग गाँव छोड़कर शहरों में कार्य करने हेतु चले गये हैं।

 ‘बीस बरसमें रामदरश मिश्र ने ग्रामीण क्षेत्रों में आजादी के बाद आये बदलाब को बहुत ही बारीकी के साथ देखने का प्रयास किया है। गाँवों में बाहरी संस्कृति के प्रवेश से लोगों में आपसी भाईचारा दिन-प्रतिदिन समाप्त होकर राग-द्वेष में बदलता जा रहा है। इसके साथ ही गाँवों से कई लोग घर से बाहर कार्य करने के लिए चले गए हैं जिसके कारण भी ग्रामीण संस्कृति काफी हद तक प्रभावित हुई है। लेखक ने ग्रामीण विकास योजनाओं जैसे-जवाहर योजना आदि के नाम पर आने वाले पैसे से गाँवों का कितना विकास हुआ है या नहीं हो पाया है, इसके पीछे किन लोगों का हाथ है, इसे देखने की कोशिश की है। गाँवों के सरकारी स्वास्थ्य केन्दों की दयनीय स्थिति एवं वहाँ कार्य कर रहे भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों की स्थिति का वर्णन किया गया है। सुमेर बाबा की पुतोहू को जब प्रसव-पीड़ा होती है तो वंदना अपने पति को नर्स को बुलाने भेजती है। जब वह नही आती है तब वह खुद बुलाने जाती है। वहाँ जाकर देखती है कि नर्स रेडियों सुनते हुए लोगों से बात कर रही है। पूछे जाने पर वह कहती है- अरे कोई एक गाँव और एक घर ही तो मेरे जिम्मे नहीं है। देख रही हैं न इतने लोग बैठे हैं। अभी-अभी एक केस से लौटी हूँ।”9 इतना सुनकर प्रतिवाद करते हुए वंदना कहती है कि, “हाँ देख तो रही हूँ कि इतने लोग अनुनय की मुद्रा में बैठे हैं और आप उन्हें बाज़ार से दवा खरीदने के लिए नुस्खा देकर बैठी हँसी-ठट्ठा कर रही हैं और रेडियों सुन रही हैं।”10 जब गाँव के अस्पताल के मरीजों से अस्पताल की स्थिति के बारे में दामोदर जी पूछते हैं तो वे कहता है- अरे ये साहब, सरकार सारी दवाएँ भेजती हैं लेकिन ये सब दुकान में बेच देते हैं और हमें ये ही दवाएँ खरीदने के लिए कहते हैं। दुकानदारों और इनकी मिलीभगत चलती रहती है। साहब जो असरदार लोग हैं उन्हीं को मुफ्त दवाएँ भी मिलती हैं, उन्हीं के यहाँ नर्स जाती है। हम गरीब लोगों को कोई नहीं पूछता।”11 यहाँ लेखक ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों की यथार्थ स्थिति का वर्णन करता है।

गाँव में सरकारी जवाहर योजनाएँ किस तरह कार्य कर रही हैं इसे भी यहाँ देखा गया है। ग्रामीणों के घर के आस-पास वाले जगह में मिट्टी इसलिए नहीं भराया जाता है क्योंकि ग्राम पंचायत के लोग मछ्ली पालकर पैसा कमाना चाहते हैं। इस संदर्भ में लच्छू दामोदर जी से कहता है- अब देखिए यह गड्ढा है न पानी बरसता है तो भर कर चारों ओर फैल जाता है और पानी हमारे घरों की दीवारों में लग जाता है। रास्ते तो बजबजा उठते ही हैं हमारे घरों को भी खतरा हो जाता है। कितनी बार हमलोगों ने परधान जी से कहा कि इसे पटवा दीजिए और नहीं तो इसके और हमारे घरों के बीच मिट्टी के बाँध बँधवा दीजिए। लेकिन वे सुनते ही नहीं।”12

लच्छू के गाँव के सब लोग मिलकर गड्ढा को इसलिए नहीं भरते क्योंकि ग्राम परधान के कमाई का जरिया होता है गड्ढा। इस सन्दर्भ में लच्छू दामोदर जी से कहता है- यह गड्ढा गाँव सभा का है। इसमें मछली पलती है। पलती है तो गाँव सभा को आमदनी होती है, हम कैसे पाट सकते हैं?”13 यहाँ गाँव के परिवेश का वर्णन करते हुए गरीब किसानों, मजदूरों की दशा का वर्णन किया है। हमारे देश के गाँवों के लोगों का विकास इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि कही सरकारी तंत्र इसके जिम्मेदार हैं तो कहीं राजनेता।

बेदखलउपन्यास में कमलाकांत त्रिपाठी ने उत्तर प्रदेश के गांव के लोगों के संघर्ष को दिखाया है। ग्रामीणों के बीच एकता स्थापित कर अंग्रेजी कानून के खिलाफ एवं जमींदारी प्रथा के विरोध में आन्दोलन चलाने के लिए बाबा रामचंद्र किसान सभाओं का आयोजन अलग-अलग गांवों में करते हैं। इस आन्दोलन में पंडित जवाहरलाल नेहरु और महात्मा गांधी ने भी अपना योगदान दिया। इसमें कई किसानों की जाने भी गईं। रायबरेली की घटना के बारे में जब बाबा पूछते हैं तब उन्हें बताया जाता है- क्या नहीं हुआ बाबा?....आन्दोलन का सारा नक्शा ही बदल गया। हमने क्या सोचा था और क्या हो गया। कितने किसान मारे गए। रातों-रात कितनी लाशें गंगा में बहा दी गई।....जो वहाँ हुआ वही अब फैजाबाद में होनेवाला है। आपका नाम लेकर लोग लूटपाट कर रहे हैं। कितने ही नकली बाबा रामचंद्र निकल आए हैं।...और हम भकुआ बने देख रहे हैं।”14 इस तरह उत्तर प्रदेश के गांवों में किसान अपने अधिकारों के मांग हेतु काफी एकजुटता के साथ अपनी जान के परवाह किये बिना काफी संख्या में किसान सभाओं में एकत्रित होकर अपने अधिकारों की मांग करते हुए अपने प्राण तक त्याग देते हैं।

बिश्रामपुरका संतश्रीलाल शुक्ल का ग्रामीण और शहरी परिप्रेक्ष्य में लिखा गया उपन्यास है। इस उपन्यास की कथा बिश्रामपुर गाँव के आश्रम के इर्द-गिर्द घूमती हुई दिखाई देती है। इस उपन्यास की कथा आत्मकथात्मक अधिक जान पड़ती है। इसमें लेखक राज्यपाल कुँवर जयंतीप्रसाद सिंह के जीवन अनुभव की कहानी कहता हुआ ग्रामीण परिवेश की सरकारी एवं सहकारी योजनाओं की विसंगतियों की ओर संकेत ही नहीं करता बल्कि समस्याओं को सुलझाने हेतु प्रयास भी करता है। इसमें विनोबा भावे द्वारा चलाया गया भूदान आन्दोलन के स्वरूप को दिखाया गया है। लेखक भारतीय गरीब किसानों एवं मजदूरों की दयनीय स्थिति का वर्णन करता है। किसानों द्वारा अपने अधिकारों के मांग के लिए पूँजीपतियों एवं जमींदारों के विरुद्ध आन्दोलन किया गया। इस तरह के आन्दोलन में गरीब मजदूरों और किसानों को परेशानी नहीं हो इसलिए आचार्य विनोबा भावे द्वारा भूदान हेतु कार्यक्रम देश के कई भू-भागों में चलाया गया। इस आन्दोलन से प्रभावित होकर कई लोग अपनी भूमि दान किये। लेखक के शब्दों में कहें तो, “भूदान यज्ञ की चर्चा शास्त्रों, स्मृतियों, पुरानों आदि में न मिलेगी। आचार्य विनोबा भावे उसके आदि प्रस्तोता थे, वही उसके पहले अधिष्ठाता, वही ऋत्विक् वही यजमान। इस यज्ञ के बारे में उनका सार्वजनिक सन्देश बड़ा सीधा था। उन्होंने कहा: हवा और धूप एक की नहीं, सबकी है। वैसे ही ज़मीन भी।”15

इस तरह आचार्य विनोबा भावे सामाजिक समानता स्थापित करना चाहते थे। इसके लिए भारत के कई संस्थाओं के संगठनों द्वारा भूदान करने हेतु लोगों को प्रेरित किया गया। इसका प्रभाव अपने देश तक ही सीमित न रहकर विदेशों में भी पड़ा। यहाँ के लोगों को विदेशों में भी बुलाया जाने लगा। रामलोटन जैसे किसानों को दिखाया गया है जो सामाजिक एकता स्थापित करते हुए अपने जमीन को दुबे महाराज के चंगुल से छुड़ाने के लिए हिंसा का सहारा लेता है। इस सन्दर्भ में मंत्री जी का कहना है कि, “रामलोटन और उसके साथी किसानों ने आज अपने खेतों में हल चलाया है। उन पर पिछले तीन-चार साल से दुबे महराज खेती कर रहा था। थाने से छूटने के बाद वह कुछ दिन के लिए शहर चला गया है। उसकी गै़रमौजूदगी में किसान ने अपने खेत पर कब्जा कर लिया है। दुबे महराज के आदमियों ने उन्हें रोकना चाहा था, इसी झगड़े में दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट हुई है। कोई मरा नहीं है पर कई लोग घायल हुए हैं। थाने में दोनों ओर से रिपोर्ट हुई है। पुलिस ने अभी किसी को गिरफ्तार नहीं किया है पर कई लोगों को थाने पर बैठा रखा है।”16 इस तरह निम्न जाति के लोग भी सामाजिक एकता स्थापित कर अपने अधिकारों की माँग हेतु आन्दोलन करते नजर आ रहें हैं। आजादी के बाद हमारे देश से तो जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी गई लेकिन आज भी पूंजीपतियों का वर्चस्व समाज में बना हुआ है। जिन गांवों में आज तक सिंचाई का समुचित प्रबंध नहीं हो पाया है उन क्षेत्रों का विकास नहीं हो पाया है। किसानों द्वारा बैंक से ऋण नहीं लिए जाने के कारण भी उनकी स्थिति खराब होती जा रही है। पूंजीपतियों द्वारा किसानों को कर्ज के जाल में फँसाया जा रहा है। किसान पूंजीपतियों के चंगुल में इसलिए फँसते हैं क्योंकि सरकारी बैंकों द्वारा किसानों से इतने कागजादों की माँग की जाती है कि वे परेशान होकर किसी महाजन से कर्ज ले लेते हैं। अगर किसान की लागत मूल्य से अधिक फसल से प्राप्त न हो तो उनके द्वारा ली गई ऋण को माफ़ कर दिया जाय। सरकार द्वारा जितने भी किसानों से संबंधित योजनाएं हैं उनका समुचित लाभ किसानों को प्राप्त हो इसके लिए गांवों में किसानों के लिए सूचनाओं को प्रसारित किया जाय। इससे हमारे देश के किसानों के अन्दर एक नयी चेतना जागृत होगी जिससे वे परेशान होकर आत्महत्या नहीं करेंगे।

सन्दर्भ ग्रंथ
1.गोदान, प्रेमचन्द, सुमित्र प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण, 2008, पृष्ठ, 101-102 
2. के.एल. शर्मा, भारतीय समाज, एनसीईआरटी, 12 वीं कक्षा, पृष्ठ, 53
3.पाहीघर, कमलाकांत त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पेपरबैक्स प्रथम संस्करण, 1994, पृष्ठ, 326                                                            
4. डूब, वीरेन्द्र जैनवाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 2014, पृष्ठ, 191                   
5.वही, पृष्ठ, 70
6. वही, पृष्ठ, 81
7. वही, पृष्ठ, 147
8.भीम अकेला, विद्यासागर नौटियाल,पेंगुइन बुक्स द्वारा प्रकाशित, गुड़गाँव हरियाणासंस्करण, 2008, पृष्ठ,19-20
9. बीस बरस, रामदरश मिश्र, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 2012,                                             पृष्ठ, 104                                                            
10. वही,पृष्ठ, 104                                                             
11. वही,पृष्ठ,105
12. वही,पृष्ठ,109
13. वही,पृष्ठ,109
14.बेदखल, कमलाकांत त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1997, पृष्ठ,180
15. विश्रामपुर का संत, श्रीलाल शुक्लराजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पेपरबैक्स संस्करण, 2015, पृष्ठ, 22                                                                                                         
16. वही,पृष्ठ,149

अनन्त कुमार मिश्र
पीएच.डी.(हिन्दी) शोधार्थी
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय सेक्टर-29,गांधीनगर: 382030
मो. 9377226316,ई-मेल mishrahcu@gmail.com

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