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आन्ध्र-प्रदेश के किसान ताताराव से सुरेन्द्र की बातचीत

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on शनिवार, नवंबर 11, 2017 | शनिवार, नवंबर 11, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)

किसान विशेषांक
              आन्ध्र-प्रदेश के किसान ताताराव से सुरेन्द्र की बातचीत
        (सरकारी अधिकारी की तरह सरकारी किसान भी होना चाहिए।)

आन्ध्र-प्रदेश के विशाखापट्टणम जिले के एक गाँव के किसान ताताराव जी से सुरेन्द्र ने आंध्रप्रदेश के किसानों की समस्याएँ जाननी चाही। समुद्र तटवर्ती जिला होने के कारण व्यापार के मामले में समृद्ध इस जिला के किसानों के हालात भी खस्ता हैं। नौकरी, व्यापार आदि पेशे के समान सिर्फ किसानी के भरोसे परिवार चलाना आर्थिक-सामाजिक रूप से समृद्ध आंध्रप्रदेश के किसानों के लिए भी संभव भी नहीं है। किसान ताताराव मानते हैं कि, क्यों न सरकारी नौकरियों के समान किसानी भी सरकारी नौकरी हो। पेश है, इनकी बातचीत।  - सम्पादक।

नमस्कार! सबसे पहले निवेदन है कि आप अपना परिचय दें
ताताराव :    जी नमस्कार! मेरा नाम ताताराव है, मै आन्ध्रप्रदेश राज्य के विशाखापट्टनम के बन्टुपल्लिकल्ला गाँव का रहने वाला हूँ।

आपके घर में कितने सदस्य हैं?
ताताराव :    जी मेरे परिवार में मेरी पत्नी के अलावा दो बेटीयां और एक बेटा है। और वह सब शादी-शुदा हैं। अब मैं अपनी पत्नी रामय्यम्म के साथ गाँव में रह रहा हूं।

परिवार की आय का मुख्य साधन क्या हैं?
ताताराव  :   आय का मुख्य साधन खेती ही है और खेती करके ही बच्चों का पालन-पोषण किया है और उनकी शादी भी की।

आपके पास कुल कितनी जमीन है?
ताताराव  :   सिर्फ 1 एकड़ जमीन है।
क्या इतनी जमीन आपके परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है?
ताताराव :    नहीं! दिक्कत तो होती थी पहले मेरे पास 2 एकड़ जमीनें थी जो मुझे अपने पूर्वजों से मिली थी। खाद के लिए, बीज के लिए पैसों की जरूरत तो पड़ती थी तब उधार लेना ही पड़ता था। बेटे की नौकरी नहीं थी उस समय बच्चे छोटे थे। परिवार का पालन-पोषण, बच्चों के पढ़ाई सब का बोझ था। कभी-कभी अकाल भी पड़ जाता था बारिश में फसल भीग जाती थी तब कम दाम में ही फसल बेचनी पड़ती थी।बाद में दोनों बेटियों की शादी के लिए,बेटे की पढ़ाई के लिए, 1 एकड़ जमीन थोड़ा-थोड़ा करके बेचना पड़ा। अब तो बची हुई 1 एकड़ जमीन में ही खेती कर रहा हूं। जरूरत पड़ती तो बेटा सहयोग करता है, कुछ पैसा भेज देता है तो उधार लेने की नौबत नहीं आती।

क्या खेती के अलावा आय के अन्य साधन भी है?
ताताराव जी : नहीं! खेती के अलावा आय का कोई मार्ग नहीं है।

सिंचाई व्यवस्था के साधन क्या हैं? मौनसून या बोरवेल?
ताताराव जी : हाँ अभी तो बोरवेल ही है|

आपके खेत किस तरह के हैं? टुकड़ों में बँटे हुए छोटे-छोटे प्लॉट या एक जगह बड़ा प्लॉट?
ताताराव जी : हमारा खेत 4 भागों में विभाजित है। गाँव में अलग-अलग,जगहों में है।
पानी लंबे पाईप के द्वारा सींचते हैं|

आजकल मौनसून का संतुलन बिगड़ रहा है? इसका खेती पर क्या असर पड़ रहा है?
ताताराव जी : मै ज्यादा मानसून के बारे में नहीं जानता हूँ लेकिन इतना तो मालूम है कि मानसून का सन्तुलन बिगड़ने का कारण प्रदूषण ही है। जमीनें निस्सार होती जा रही हैं, वृक्ष की कितनी जातियां नष्ट होती जा रही हैं, इन्हीं कारणों से बारिश भी समय पर नहीं हो रही है। कहीं तो अतिवृष्टि होती है या तो अनावृष्टि हो रही है। आंध्र-प्रदेश राज्य के कुछ क्षेत्रों में जैसे रायलसीमा प्रांत में पानी की कमी है। वहां के किसानों ज्यादा से ज्यादा मानसून पर आधारित खेती करते हैं।

आप किस प्रकार की खेती करते हैं? पारंपरिक या आधुनिक।
ताताराव जी : पहले मेरे बचपन में पारंपरिक पद्धति में खेती होती थी, लेकिन अब तो आधुनिक पद्धति को ही अपनाना पड़ा। पहले यूरिया में हाथ डालते थे तो हाथ में जलन होती थी, लेकिन अब तो यूरिया में भी मिलावट हो रही है। खाद, बीज सब में मिलावट हम तो कंपोस्ट बनाना ही छोड़ दिए। यही तो हमारी विडंबना है।

साल भर में आप कितने फसल पैदा कर लेते हैं?
ताताराव जी : हम तो साल भर में 3 फसल उगाते हैं फूल,सब्जी आदि|

सरकार किसानों के लिए कई तरह की सुविधाएँ जैसे कि बीज, खाद, ट्रेक्टर, थ्रेसर आदि सब्सिडी के साथ उपलब्ध करवा रही है तथा कृषि में सुधार के लिए कई योजनाएँ चला रही है। आपको इन सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिल रहा है?
ताताराव जी : एक छोटा किसान होने के कारण ज्यादा कुछ मुझे नहीं मिला, यहाँ भी राजनीति बहुत होती हैं। बड़े-बड़े किसानों को यह सभी सुविधाएं मिलती हैं। मुझे बीज के लिए सबसिडी मिलती है।

क्या आप किसान क्रेडिट कार्ड से लाभान्वित हो रहे हैं?
ताताराव जी : किसान क्रेडिटकार्ड का नाम सुना था, लेकिन वो क्या है, उससे क्या लाभ होता है, मुझे पता नहीं है। वो मेरे पास ही नहीं मेरे जान-पहचान वालों में किसी के पास नहीं हैं। 

बैंक से किसानों को कम ब्याज दरों पर ऋण दिया जाता है, क्या आपको इसका लाभ मिला है
ताताराव जी : हाँ मुझे लाभ मिला है। जमीन के हिसाब से ऋण दिया जाता है। 

कृषि अधिकारी और मौसम विभाग आपलोगों को किस प्रकार सहायता करता है?
ताताराव जी : 2-3 गाँवों के लिए 1-1 अधिकारी हैं लेकिन ज्यादा कुछ नहीं बताते हैं। एक बार रायपुर ले के गए थे। वहाँ की पद्धतियां दिखाने के लिए।

वर्तमान समय में किसानों की आत्महत्याएँ बढ़ी हैं, इसके क्या कारण हैं?
ताताराव जी :आत्महत्या करना कोई नही चाहता है। लेकिन परिस्थितियां ऐसे हो जाते हैं कि आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता ही नहीं होता है। छोटे–छोटे किसानों की ही आत्महत्याएं आज-कल बढ़ रही हैं, जो लोग अकाल के मार्फत ऋण नहीं चुका सकते हैं, जिन लोगों के पास आय का साधन खेती के अलावा कोई दूसरा मार्ग ही नहीं होता हैं। बैंकों से समय पर ऋण नहीं मिलने के कारण बाहर साहूकारों से ब्याज लेना पड़ता हैं। फसल कभी-कभी बाढ़ के कारण नष्ट हो जाता है इसी लिए ज्यादा से ज्यादा आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। जैसे सरकारी अधिकारी लोग होते हैं ठीक वैसा ही सरकारी किसान भी होना चाहिए। हम को भी तनखाह मिलनी चाहिए, फसल सरकार को ही लेना चाहिए, खेती के अलावा अलग-अलग मार्ग होने आवश्यक हैं।

देशभर में किसान आन्दोलन हो रहे हैं, इसके बारे में आपकी क्या राय है?
ताताराव जी : देश भर में अनेक प्रान्तों में किसान आन्दोलन हो रहे हैं। यह तो मैं जानता हूं। किसानों की समस्याएं सरकार को ही पूरी तरह दूर करनी चाहिए जैसे कुछ कंपनियों को सरकार पैसा दे रही है तो किसान को भी देना जरूरी है। अगर किसान ही नहीं रहेगा तो लोग क्या खाएंगे?

क्या सरकार के द्वारा किया जानेवाला ऋण-माफी किसान समस्या का स्थायी हल है?
ताताराव जी : बिलकुल नहीं। ऋण माफी के कारण थोड़ा बोझ कम होता है। ये स्थायी सुधार नहीं हैं। इलक्ट्रोनिक वस्तु के लिए गारंटी होती है तो एक किसान के फसल के लिए क्यूं नहीं?

धन्यवाद! आपने अपना महत्वपूर्ण समय हमें दिया और इतनी जानकारी दी।
 तातारावजी : धन्यवाद!

                                     सादी सुरेंद्र
शोध-छात्र, हिंदी विभाग,अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा, विश्वविद्यालय, हैदराबाद
संपर्क: (+91)8522077060,ई.मेल : surendramelodies@gmail.com
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