आलेख: हिन्दी कविता में आदिवासी जीवन/डॉ. अभिषेक कुमार पाण्डेय - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

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आलेख: हिन्दी कविता में आदिवासी जीवन/डॉ. अभिषेक कुमार पाण्डेय

  हिन्दी कविता में आदिवासी जीवन

      
उत्तर औपनिवेशिक विमर्शों में स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के साथ ही साथ आदिवासी विमर्श भी आज साहित्य एवं समाज के लिए चर्चित विषय बना हुआ है। सदियों से आदिवासी समाज को एक पिछड़ा समाज माना गया। उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया गया। किन्तु भूमंडलीकरण के दौर में आज शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने से आदिवासी समाज में भी जागृति आई है। आज वे अपने जीवन एवं साहित्य को प्रमुख रूप से जनता के समक्ष लाना चाहते हैं। आदिवासी समाज के लोगों का अन्य समाज के लोगों से मिलना-जुलना बढ़ा है। आज आदिवासी साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है, जिससे आदिवासियों के प्रति लोगों का नजरिया बदल रहा है। साहित्य समाज का दर्पण होता है' इसलिए जैसा समाज होगा उसी प्रकार का साहित्य रचा जाएगा। आदिवासी साहित्य जीवन का साहित्य है। वह प्रकृति का सहयोगी, सहअस्तित्व का अभ्यस्त, ऊँच-नीच, भेदभाव छल कपट से दूर है। वह जमाखोरी या सम्पत्ति जुटाने की भावना से मुक्त है। वह अन्याय का विरोधी और सामाजिक न्याय का पक्षधर है। उसके साहित्य में इन्हीं सबकी अभिव्यक्ति है। जीवन की समस्याएँ और प्रकृति से लगाव उसके साहित्य का आधार है।[1]
      आदिवासी जीवन और साहित्य पर साहित्य की हर विधा में लेखन कार्य हो रहा है। किन्तु साहित्य की सबसे प्राचीन विधा कविता में आदिवासी स्वर की व्यापकता प्रमुख रूप से देखी जा सकती है। वर्तमान समय में बहुत से कवियों/कवयित्रीयों ने अपने काव्य का विषय आदिवासी जीवन को बनाया है, उनमें से कुछ नाम प्रमुख हैं- वाहरू सोनवणे, महादेव टोप्पो, ग्रेस कुजूर, निर्मला पुतुल, अनुज लुगुन, मधु कांकरिया, रमणिका गुप्ता, हरिराम मीणा, वामन शेलके, विनायक तुकाराम, भुजंग मेश्राम आदि। आदिवासी लेखन की उभरती चेतना का सबसे सटीक और सही चित्रण हमें वाहरू सोनवणे की स्टेजनाम की कविता की इन पंक्तियों में मिलता है-
हम स्टेज पर गए ही नहीं/जो हमारे नाम पर बनाई गई थी/
हमें बुलाया भी नहीं गया/ऊँगली के इशारे से/हमारी जगह दिखा दी गई/हम वहीं बैठ गए/हमें खूब शाबासी मिली/और वे स्टेज पर खड़े होकर/हमारा दुःख हमें ही बताते रहे हमारा दुख अपना हीं रहा/जो कभी उनका हुआ नहीं‘/ हम बड़बड़ाए, अपनी शंकाएं जताई/वेकान देकर सुनते रहे और हुंकारे..../हमारे कान पकड़कर हमें धमकाया/माफी माँगो- नहीं तो....‘’[2]
      इस कविता में आदिवासी कवि ने अपने उस अहसास को चिन्हित किया है जिससे उसका लेखन फूटा है। यह कविता आदिवासी लेखन में उभर रही चेतना को परिभाषित और उस लेखन की जरूरत को रेखांकित करती है। आदिवासी साहित्य क्यों? यह कविता इस प्रश्न का जवाब भी देती है।
      आदिवासी जीवन को महादेव टोप्पो की त्रासदीशीर्षक कविता में खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया गया है-
इस देश में पैदा होने का/मतलब क्या है/जानते हो भाई?
नहीं?/देश में पैदा होने का मतलब है/ आदमी का
जातियों में बँट जाना/और गलती से अगर तुम हो गए पैदा जंगल में/
तो तुम कहलाओगे/आदिवासी-वनवासी-गिरीजन वगैरह-वगैरह/
आदमी तो कम से कम कहलाओगे नहीं।[3]
(महादेव टोप्पो की त्रासदीशीर्षक कविता से, आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी, संपादक-रमणिका गुप्ता, पृ. 49)
      आदिवासी कवयित्रियों में ग्रेस कुजूर की कविताएँ विद्रोह की ज्वालाग्नि उगलती हैं। हजारों वर्षों के अपने प्राकृतिक आवास जंगल को उजड़ते देख उनकी वाणी कह उठती है-
हे संगी/क्यों घूमते हो/झुलाते हुए खाली गुलेल/....../
क्या तुम्हें अपनी धरती की/सेंधमारी सुनाई नहीं दे रही?/क्या
अब भी निहारते हो/अपने को/दामोदर और स्वर्ण रेखा के/कालेजल
में/किसने की है चोरी/भिनसरिया में ठेकी के संगीत की/
और उखाड़ी है किसने/आजी के जाने की कील?/ पुटुस तक को/
उखाड़ कर ले जाएँगे लोग/और धन/तुम खोजोगे उसकी बची
हुई जड़ों में/अपना झारखंड/हंडिया और दारू से सींचकर/क्या किसी ने उगाया है-/कोई जंगल?”[4]
      जंगल की रक्षा से ही आदिवासियों का अस्तित्व बचा रह सकता है। उनके पूर्वजों ने हजारों वर्षों से अपने साथ जंगल को और जंगल के साथ अपने को सुरक्षित रखा किन्तु अब दोनों के अस्तित्व का प्रश्न निर्माण हो गया है, इस कारण ग्रेस कुजूर आदिवासी नवयुवकों को ललकारते हुए कहती हैं-

      तानों अपना तरकस।
      नहीं हुआ बोथरा अब तक
      बिरसा आवा का तीर
      सूरज के लाल गोढ़ाको
      गला दो अपनी हथेलियों की
      गर्मी से।[5]
      कवि विनायक तुकाराम ने अपने आपको कर्ण और एकलव्य की परम्परा से जोड़ते हुए आदिवासियों पर अनादि वर्षों से होने वाले अत्याचार की बात कही है। इसी अत्याचारी प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए उनका कवि मन कह उठता है-
मैं जला डालूँगा प्रस्थापितों के
निर्लज्ज दर्शन को
जो दर्शन मेरी आयु की
जात पूछता है।[6]
      आदिवासी साहित्यकारों में भुजंग मेश्राम एक चर्चित नाम है, जिनके प्रथम काव्य संग्रह उलगुलानको राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इसी काव्य संग्रह की ग्रांड फादरकविता में खिश्चन पादरियों की पोल खोलते हुए कहते हैं-
वे आए तब
उनके हाथ में था बायबल
और हमारे हाथों में जमीन
वे बोले ईश्वर के पास भेद नहीं है
कोई काला या गोरा, करो प्रार्थना
बंद करो आँखें, हमने बंद की आँखें
जब आशा से आँखें खोली तो देखा
उनके हाथ में जमीं थी
और हमारे हाथ में बायबल।[7]
      भूमंडलीकरण के इस दौर में आदिवासियों की स्थिति ना घर की ना घाट की हो गई है। एक ओर भारत सरकार के सुनहरे सपने और दूसरी ओर अपनी मुठ्ठी से खिसकती जमीन के बीच यह पिसते जा रहे हैं। वामन शेलके आदिवासी की इस स्थिति को अपनी कविता में इस प्रकार दर्शाते हैं-
सच्चा आदिवासी
कटी पतंग की तरह भटक रहा है.........
कहते हैं हमारा देश
इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ रहा है।[8]
      अनुज लुगुन आदिवासी कविता के एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविताएँ ज्यादा संख्या में प्रकाशित नहीं हुई हैं परन्तु जितनी भी कविताएँ सामने आयी हैं उनसे उनकी सजग संवेदनशील प्रश्नाकुल प्रतिरोधी कवि-संवेदना का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। पूँजीवादी विकास-प्रक्रिया से पैदा हुए अमानवीय-विस्थापन, आदिवासी राजनीति के बुर्जुआकरण, धर्मांतरण की राजनीति जैसे सवालों को एक साथ उठाते हुए वे हमारे समय में आदिवासियों द्वारा अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किये जा रहे प्रयासों को अघोषित उलगुलानकी संज्ञा देते हैं। पूँजीवादी लूट-तंत्र में यह उलगुलान उन साधारण और बेबस आदिवासियों द्वारा लड़ा जा रहा है..
कंक्रीट से दबी पगडंडी की तरह/दबी रह जाती है जिनके जीवन
की पदचाप/बिल्कुल मौन।[9]
      मशहूर कवि हरिराम मीणा अपनी कविता में आदिवासियों की समस्याओं को चित्रित करते हुए लिखते हैं कि, उन्होंने अब तब अपने लिए कोई घर बनाया है और उन्हें इस बात का कोई अफसोस भी नहीं है-
हमें पता नहीं
हम बन्दर की औलाद हैं
या भगवान की मंसा
मगर पैदा आदम-जात हीं हुए
नहीं छेड़ी हमने हिफाजती मुहिम
मौसमों के खिलाफ
घर नहीं बनाये
मगर बेघर महसूस नहीं किया
रहे अपरिग्रही फिर भी धनी....[10]
      आदिवासी स्त्रियों की पीड़ा का बहुत ही सुन्दर तथा बेबाक वर्णन निर्मला पुतुल की कविताओं में दिखाई पड़ता है। आदिवासी लड़की की पीड़ा को मुखर करती हुई निर्मला पुतुल कहती हैं कि कोई भी आदिवासी लड़की किसी शहरी लड़के से ब्याहना पसंद नहीं करती, इसके कई कारण हैं- जैसे वह शहरों में बसता है, बाँसुरी की धुन से अपरिचित है, घर के सामने आँगन नहीं आदि-आदि पर इन सबमें एक कारण अहम है- जो उसकी दशा और मनोदशा की कहानी कह सकता है-
बापू! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
वहाँ मुझे मिलने आने की खातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें।[11]
      इतना ही नहीं शहरी लोगों की मानसिकता को बेनकाब करती हुई निर्मला पुतुल लिखती हैं- ये इनके कालेपन से घृणा करते हैं, अनपढ़ होने पर व्यंग्य करते हैं, भाषा का मजाक उड़ाते हैं, हिकारत से देखते हैं, उनके हाथों से पानी नहीं पीते हैं, उनकी नजरों में इनका सब कुछ अप्रिय है किन्तु-
प्रिय है तो बस मेरे पसीने से पुष्ट हुए अनाज के दाने,
जंगल के फूल, फल, लकड़ियाँ
खेतों में उगी सब्जियाँ/घर की मुर्गियाँ
उन्हें प्रिय है
मेरी गदराई देह/मेरी मांस प्रिय है उन्हें।[12]
      प्रत्येक समाज को आगे बढ़ने के लिए केवल बाहरी बुराइयों से हीं नहीं लड़ना पड़ता बल्कि उसे अपने अन्दर की बुराईयों से भी लड़ना होता है। आदिवासी समाज भी इन बुराईयों से लड़ रहा है। आदिवासियों की जीवन चर्या में शराब से होने वाले दुष्परिणाम भी यहाँ व्यक्त किए गए हैं, अपने ही समाज के प्रधान या मुखिया की प्रवृत्ति को व्यक्त करती हुई निर्मला पुतुल कहती हैं-
कैसा बिकाऊ है
तुम्हारी बस्ती का प्रधान
जो सिर्फ एक बोतल विदेशी दारू में
रख देता है
पूरे गाँव को गिरवी
और ले जाता है
लकड़ियों के गठ्ठर की तरह
लादकर अपनी गाड़ियों में
तुम्हारी लड़कियों को
हजार पाँच-सौ
हथेलियों पर रखकर
..........................................
कहाँ गया वह परदेशी
जो शादी का ढ़ोंग रचाकर
तुम्हारे हीं घर में
तुम्हारी बहन के साथ
साल-दो-साल रहकर अचानक गायब हो गया?” [13]
      इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आदिवासी जन-जीवन को हिन्दी कविता में महत्वपूर्ण स्थान मिला है। आज आदिवासियों ने अपनी मुक्ति के लिए अपने पारम्परिक हथियार तीर और कमान को छोड़कर कलम उठा ली है। आगे आने वाला समय इस समाज का होगा। आदिवासी समाज भी अन्य समाज की भाँति अपनी संस्कृति एवं परम्पराओं को सुरक्षित रखते हुए उन्नति के मार्ग पर निरंतर अग्रसर है।


डॉ. अभिषेक कुमार पाण्डेय
सहायक आचार्य
भाषाएँ एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग
पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय
बठिंडापंजाब
सम्पर्क
7607586139



[1] आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति, संपादक विशाला शर्मा/दत्ता कोल्हारे, पृ. 21
[2]आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति, संपादक विशाला शर्मा/दत्ता कोल्हारे, पृ. 22

[4]आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 23
[4] आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 36-37
[5] आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 37
[6] आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 37
[7] आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 41
[8] आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 41
[9] आदिवासी विमर्श और हिन्दी साहित्य, कुमार विरेन्द्र, पृ. 206
[10] आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 47
[11] इक्कीसवीं सदी की हिन्दी स्त्री कविता: आशय और अभिव्यक्ति, संपादक, संतोष टेलकीकर/डॉ. ज्योति मुंगल, पृ. 91
[12] इक्कीसवीं सदी की हिन्दी स्त्री कविता: आशय और अभिव्यक्ति, संपादक, संतोष टेलकीकर/डॉ. ज्योति मुंगल, पृ. 91

[13] आदिवासी साहित्य: विविध आयाम, सम्पादक डॉ. रमेश संभाजी कुरे/डॉ. मालती घोड़ोपंत शिंदे/प्राचार्य प्रवीण अनंतराव शिंदे, पृ. 40-41

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)         वर्ष-4,अंक-26 (अक्टूबर 2017-मार्च,2018)          चित्रांकन: दिलीप डामोर 

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