शोध: वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में साम्प्रदायिकता के प्रश्न/पूनम मीणा - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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शोध: वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में साम्प्रदायिकता के प्रश्न/पूनम मीणा

 वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में साम्प्रदायिकता के प्रश्न

साम्प्रदायिकता एक जटिल समस्या के रूप में हमारे सामने उपस्थित है। इसी साम्प्रदायिकता के कारण भारतीयों ने बंगभंग सन् 1905 तथा पाक विभाजन सन् 1947 जैसी घटनाओं को झेला है। साम्प्रदायिकता को किसी एक परिभाषा में बाँधा नहीं जा सकता। अतः अलग-अलग दृष्टिकोण से विचारकों ने इसे परिभाषित किया है अथवा इस पर अपने विचार अभिव्यक्त किए हैं। साम्प्रदायिकता पर विचार करने से पहले इसी से जुड़े सम्प्रदाय, साम्प्रदायवाद तथा साम्प्रदायवादी शब्दों का अर्थ जानना आवश्यक है। सम्प्रदाय का शाब्दिक अर्थ है-‘‘परम्परागत विश्वास या प्रथा, विशेष धार्मिक मत (सेक्ट) या सिद्धान्त, किसी मत के अनुयायियों का समूह (स्कूल)।’’1 साम्प्रदायवाद ‘‘केवल अपने सम्प्रदाय को ही विशेष महत्व देना और अन्य सम्प्रदायवालों से द्वेष करना, जातिवाद (सेक्टेरियनिज्म)’’2

साम्प्रदायवादी-‘‘वह कट्टर विचारोंवाला व्यक्ति जो केवल अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठता प्रदान करे तथा अन्य सम्प्रदायवालों को हेय समझे।’’3

उपर्युक्त अर्थ से स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता में समूह या संगठन की विचारधारा महत्वपूर्ण रहती है। इस समूह या संगठन के आधार अलग-अलग हो सकते हैं जैसे-भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र, राष्ट्र, संस्कृति आदि। ‘‘साम्प्रदायिकता का आरंभ इस धारणा से होता है कि किसी समुदाय विशेष के लोगों के एक सामान्य धर्म के अनुयायी होने के नाते राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक हित भी एक जैसे ही होते हैं। इस मत के अनुसार भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख तथा ईसाई अलग-अलग सम्प्रदायों से संबंधित हैं। इनके गैर-धार्मिक हित भी उस सम्प्रदाय के सदस्यों के बीच समान हैं तथा भारतीय लोगों में सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक मामलों में भेद ऐसी धार्मिक इकाइयों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।’’4

बिपन चंद्र के अनुसार भारत में समाज की मूलभूत इकाई धार्मिक सम्प्रदाय है। ‘‘यद्यपि साम्प्रदायिक की शुरुआत हितों की पारस्परिक भिन्नता से होती है किंतु सामान्यतया इसका अंत विभिन्न धर्मानुयायियों में पारस्परिक विरोध तथा शत्रुता की भावना में होता है।’’5 साम्प्रदायिकता को व्यापक रूप में स्पष्ट करती हुई मुंजला राणा लिखती है, ‘‘साम्प्रदायिकता तरह-तरह की खाल ओढ़कर सामने आती है, कभी वह धर्म और संस्कृति की खाल ओढ़े हुए आती है तो कभी राष्ट्रवाद की। कभी वह धर्मनिरपेक्षता के खोखले दावे करते हुए हमसे मुखातिब होती है तो कभी समाजवाद की बात भी करती है। जहाँ तक धर्म और संस्कृति का संबंध है, साम्प्रदायिकता का उससे जुड़ा हुआ रूप आधुनिक भारत में अधिक उजागर हुआ हैयद्यपि धर्म और संस्कृति उसका मुखौटा ही रहे हैं, उसकी बुनियादी हकीकत नहीं।’’6 इस तरह हम देख सकते हैं कि साम्प्रदायिकता की विचारधारा में किसी वर्ग विशेष द्वारा स्वयं को भिन्न तथा श्रेष्ठ मानने की विचारधारा काम करती है।

‘‘साम्प्रदायिक विचारधारा बिना हिंसा के भी पनप सकती है लेकिन साम्प्रदायिक हिंसा बगैर साम्प्रदायिक विचारधारा के प्रचार के घटित नहीं हो सकती। साम्प्रदायिकता को एक विचारधारा के तौर पर देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि इसे ताकत से नहीं दबाया जा सकता क्योंकि ताकत से या, सरकारी प्रतिबंधों आदि के जरिये कोई विचारधारा नहीं मारी जा सकती।’’7

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के द्वारा भारतीय राष्ट्रीय एकता के खिलाफ एक अस्त्र के रूप साम्प्रदायिकता का प्रयोग किया गया। उन्होंने फूट डालो शासन करोकी नीति के तहत भारतीय जनता में विभाजन कर राष्ट्रीय आन्दोलन को कमजोर बनाने का प्रयास किया। अतः आधुनिक भारत के इतिहास में हम 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में साम्प्रदायिक आधार पर वैमनस्य, हिंसा, मतभेद, संगठन निर्माण आदि घटनाओं को देखते हैं। इसी साम्प्रदायिकता को हम बंगभंग सन् 1905 तथा पाक विभाजन सन् 1947 के विकट रूप में देखते हैं।

वृन्दावनलाल वर्मा का साहित्य लेखन काल भारतीय नवजागरण तथा राष्ट्रीय आन्दोलन का काल था। वर्मा जी उन साहित्यकारों में से जिन्होंने युगीन समस्याओं तथा प्रश्नों को अपने साहित्य में जगह दी। उनके उपन्यासों में मुख्यतः चार उपन्यासों को देखा जा सकता है जिनमें साम्प्रदायिकता के प्रश्न को उठाया गया है। ये उपन्यास है- प्रत्यागतसन् 1927, ‘झाँसी की रानी लक्ष्मीबाईसन् 1946, ‘अचल मेरा कोईसन् 1947 तथा सोती आगसन् 1948प्रत्यागतउपन्यास में वर्मा जी द्वारा ‘‘मलाबार के मोपला मुसलमानों के द्वारा किये गये दंगे को इस उपन्यास का आधार बनाया गया है। उनके द्वारा की गई लूटपाट, हत्याओं और बलात् धर्म परिवर्तन कराना ऐतिहासिक घटना है। हिंदी में केवल मोपला मुसलमानों के अत्याचारों पर लिखा गया शायद यह अकेला उपन्यास है।’’8 उपन्यास में वर्मा जी ने 1921 में हुए मोपला मुस्लिम उपद्रव को सामने रखते हुए दंगों में शामिल हुए लोगों की संकुचित मानसिकता का चित्रण किया है। मस्जिद में एकत्रित लोगों द्वारा कहा जाना, ‘‘मुसलमानों के सिवा हमारे सब दुश्मन हैं।’’9 साम्प्रदायिकता की संकुचित व कट्टर विचारधारा का द्योतक है। इस साम्प्रदायिकता की भावना में हिंसा फैलाने वाले लोग अन्य धर्म या सम्प्रदाय के लोगों को अपना दुश्मन समझते हैं। उपन्यास में रहमतुल्ला, नवलबिहारी ऐसे पात्रों के रूप में सामने आये हैं जो धार्मिक कट्टरता के प्रतीक हैं। मंगल व रहमतुल्ला की पत्नी मानवता को ही सर्वोपरि मानने वाले पात्रों के रूप में चित्रित हुए हैं। ये पात्र जहाँ धार्मिक आधार पर संकुचित भावना पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं वहीं मानवीय धर्म की सर्वोच्चता भी सिद्ध करते हैं। रहमतुल्ला का मंगल से कहना ‘‘घुटने टेक लो और जैसे हम लोग करें वैसा करते जाओ वरना तुरन्त बाहर जाओ, नहीं तो मारे जाओगे।’’10 मंगल को छल-बल से मुस्लिम बनाना। मंगल के चोटी व जनेऊ हटाकर मंगल खाँ उर्फ पीर मुहम्मद नाम रखना, साम्प्रदायिकता की भावना से ग्रसित घटनाएँ हैं। धर्म परिवर्तन के बाद मंगल का सोचना ‘‘ऐसी जल्दी सब बंधन टूट गया। थोड़े से पानी पी लेने से मेरा हिन्दुत्व चला गया। अवश्य चला गया। क्या कोई हिन्दू अब मुझको हिन्दू कहेगा? और क्या मुसलमान हूँ।’’11 यहाँ वर्मा जी मंगलदास के इस कथन के माध्यम से इस सत्य की स्थापना करते हुए दिखाई देते हैं कि धर्म व्यक्ति की आत्मा से जुड़ा हुआ है न कि बाह्याडम्बर व कर्मकाण्ड से। जबरन धर्मभ्रष्ट किए हुए लोगों के बारे में नवलबिहारी का कथन-‘‘वे हिन्दुओं के किस काम के रहे? उनके भाग्य में यही बदा होगा।’’12 उन लोगों की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने आपको धर्म का ठेकेदार समझ, स्वार्थों की सिद्धि में लगे रहते हैं। उपन्यास में कई ऐसे पात्र व स्थल हैं जो साम्प्रदायिकता की संकीर्ण विचारधारा से ऊपर उठकर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं। धर्म परिवर्तन की हीन भावना से ग्रस्त मंगल क्रोध के आवेग में सोचता है ‘‘मार डालूँ और मर जाऊँ? किसको मारूँ? भीड़ में हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं। पुलिसवाले पर तलवार चलाऊँ तो वह भी निरपराध दिखता है।’’13 यहाँ वर्मा जी द्वारा मंगल के माध्यम से क्रोध के आवेग में उत्पन्न होने वाली हिंसक भावना की निरर्थकता को रेखांकित कर मानवीय भावना अपनाने पर बल दिया गया है। रहमतुल्ला की पत्नी द्वारा मंगल को उपद्रवियों से बचाना।14 रहमतुल्ला के बीबी-बच्चों के सम्मान के लिए मंगल का पुलिस अफसर के सामने तनकर खड़ा होकर कहना, ‘‘मुझे मार कर भीतर जाने पाओगे।’’15 घटनाएँ मानव धर्म की सर्वोच्चता सिद्ध करती हैं।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाईउपन्यास में वर्मा जी द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन में हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते हुए साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया गया है। रानी द्वारा अपने राज्य संचालन तथा अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में दोनों धर्मों के लोगों को समान रूप से महत्व देना तथा उन पर विश्वास रखते हुए रणनीति का संचालन करना आदि घटनाएँ भारतीयों में धार्मिक आधार पर एकता व सौहार्द बनाए रखने का संदेश देती है। ‘‘हमारी फूट ने हमें खा लिया। नहीं तो क्या मुगल, पठान, राजपूत, मराठा वग़रैह के एक होते ये (अंग्रेज) एक घड़ी भी हिन्दुस्तान में ठहर सकते थे।’’16 यहाँ वर्मा जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन की सफलता के लिए भारतीय जन की एकता पर बल दिया है। ‘‘देश की स्वतंत्रता के लिये होने वाले संघर्षों के युग में हिन्दू मुसलमानों का पारस्परिक वैमनस्य सबसे बड़ा रोड़ा था। झाँसी की रानीके हिन्दू-मुसलमान पात्र एक स्थान पर ही अपने रक्त को बहाकर यह सिद्ध कर देते हैं कि उनमें विरोध नहीं है, कोई भेद नहीं है, वे एक हैं। झाँसी की रक्षा में यदि बख्शिन, देशमुख आदि अपना रक्त बहाते हैं तो गौसखाँ भी झाँसी की रक्षा में अपने प्राणों की बलि दे देता है। रानी के साथ लड़ते-लड़ते यदि काशीबाई, सुन्दर और मुन्दर अपने प्राण छोड़ती हैं तो जूही और मोतीबाई भी उसी रानी के लिये अपने प्राणों की बलि देती हैं। हिन्दू मुसलमानों की एकता का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है।’’17

अचल मेरा कोईउपन्यास की रचना सन् 1947 में उस समय की गई जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने उत्कर्ष पर था। साथ ही साम्प्रदायिक दंगों व हिंसा को सामान्य जन झेलने के लिए मजबूर था। इस उपन्यास में वर्मा जी द्वारा साम्प्रदायिक दंगों का जिक्र मात्र किया गया है उपन्यास की कथा को आगे बढ़ाने के लिए। निशा का पति लवकुमार बलवे में मारा जाता है।18

सोती आगउपन्यास का लेखन 1948 में भारत-पाक विभाजन की घटना के बाद किया गया। सोती आगउपन्यास का केन्द्र साम्प्रदायिकता है। उपन्यास का आधार सन् 1729 में दिल्ली में होने वाले दंगे है। उपन्यास के माध्यम से साम्प्रदायिकता के अनेक रूपों की गम्भीरता से जाँच-पड़ताल की गई हैं। साथ ही वर्मा जी द्वारा भारत के वर्तमान सन्दर्भ में इस समस्या से जूझने तथा मानवीय धर्म की स्थापना की ओर संकेत किया गया है। दिल्ली में तूरानी मुसलमान (विदेशी मुसलमान) तथा भारतीय हिंदू मुसलमान में होने वाले साम्प्रदायिक दंगों का चित्रण उपन्यास में मुख्यतः किया गया है। उपन्यास में गुलाब खाँ द्वारा जूताफरोश की भीड़ को उकसाना, शुभकर्ण की हवेली को लूटना, ध्वस्त करना तथा उसी जगह हाफिज खाँ की लाश को दफनाया जाना। मस्जिद में जूताफरोशों का उपद्रव, हिंसा आदि साम्प्रदायिकता की भावना से ग्रसित घटनाएँ हैं। उपन्यास में वजीर कमरुद्दीन का काईयापन, कोकीजू की चालाकी तथा मुगल बादशाह मुहम्मदशाह की दंगों के प्रति उपेक्षा राजनैतिक व निजी स्वार्थों की सिद्धि का परिचायक है। ऐसे लोगों की स्वार्थ लोलुपता के कारण आम जनता दंगों की आग में जलने के लिए अभिशप्त है। साम्प्रदायिकता की भावना की विदू्रपता को दर्शाते हुए मानवीय धर्म को अपनाने का संदेश दिया है। शबनम का देवकी के प्रति स्नेह तथा रक्षात्मक भावना, रौशनुद्दौला का शुभकर्ण को शरण देना जैसी घटनाएँ मानवीय धर्म की सर्वोच्चता सिद्ध करती हैं।

पूनम मीणा
सहायक प्राध्यापिका
हिन्दी विभाग,
एल.एस.आर. कॉलेज
नई दिल्ली
शबनम और देवकी का एक साथ होली खेलना धार्मिक सौहाद का प्रतीक है।19 शरण देने पर देवकी शबनम के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करती है। इस पर शबनम का कथन-‘‘दीदी, इसमें जस किस बात का? आप मेरी बड़ी बहिन हैं। हम लोगों ने थोड़ा-सा फर्ज अदा किया तो कौन-सा बड़ा काम किया?’’20 मानवता के कर्तव्य  का बोध करवाता है। उपन्यास के अंत में दंगों के बाद एक दुकानदार का दूसरे दुकानदार से कहना- ‘‘इतनी खूनखराबी बेकार हुई। मुफ्त ही बहुत लोग मारे गए। उनसे ज्यादा तादाद घायलों की है जो अब तक कराह रहे हैं। दुकानदारी का नुकसान अलग हुआ।... अफसोस के सिवाय और कुछ हाथ न लगा।... फायदा वजीरुद्दौला और उनके खासगतों को हुआ, बादशाह सलामत की निगाह में चढ़ गए। वजीर के आदमियों ने हम लोगों को अपने हाथ का खिलौना बना डाला। ... आगे कभी किसी बड़े आदमी या बड़े आदमियों के गिरोह का कठपुतला बनकर बवाल में नहीं पड़ेंगे। हम लोगों को बेवकूफ बनाकर असली फायदा ये बड़े आदमी उठाते हैं।’’21 उपरोक्त उद्धरण में साम्प्रदायिकता को परत दर परत जाँचते हुए आम जन को अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेने का सुझाव दिया गया है तथा यह भी संदेश दिया गया कि हिंसा किसी भी सूरत में समाज व जनता के लिए हितकर नहीं है। साम्प्रदायिकता पर अपने विचार प्रकट करते हुए वर्मा जी उपन्यास के परिचय में लिखते हैं‘‘मानव की अन्तर्निहित हिंसा जरा-सी रगड़ खाने पर कितनी अनियंत्रित हो जाती है और राजनैतिक दलबंदी की भँवर में पड़कर कितनी प्रचंड और नृशंस! वह सब दिल्ली के 1729 वाले भीषण दंगे से प्रकट हैं। दबी चिनगारी को फूंककर लोग जिस आग को प्रज्ज्वलित करते हैं| वह दावानल का भयानक रूप पकड़ती है, ऐसा कि फिर उनके ही बस की नहीं रहती। उस भयानक धाँय-धाँय, साँय-साँय में गुलाब खाँ और शेर अफगन सरीखे व्यक्तियों का त्याग और शौर्य इस बात की याद दिलाते हैं कि मानव की मानवीयता और संस्कृति आग की भीषण लपटों तक की उपेक्षा करके ऊपर आती है और आती रहेगी।’’22

अतः हम देख सकते हैं कि प्रत्यागतमें साम्प्रदायिकता एक समस्या के रूप में उभरकर सामने आई है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाईउपन्यास में साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित कर राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया है। अचल मेरा कोईउपन्यास में साम्प्रदायिक दंगों का जहाँ उल्लेख मात्र किया गया है वहीं सोती आगउपन्यास में साम्प्रदायिकताकी सूक्ष्मता से जाँच-पड़ताल की गई है। वृन्दावनलाल वर्मा अपने उपन्यासों के माध्यम से जहाँ साम्प्रदायिकता के प्रश्न को उठाते हैं वहीं मानवीय धर्म की सर्वोच्चता को भी स्थापित करते हैं।

संदर्भ

1. कालिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दी लाल श्रीवास्तव (संपा) बृहत् हिन्दी कोश, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी, पृ. 1168
2.   वही, 1168
3.   वही, 1168
4.  डॉ. सत्या एम.राय. (संपा)- भारत में उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद, बिपन चंद्र का लेख,आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता का विकास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 2013, पृ. 588
5.   वही, पृ. 588
6.   मंजुला राणा- दसवें दशक के हिन्दी उपन्यासों में सांप्रदायिक सौहार्द, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्र.सं. 2008, पृ. 71
7.  डॉ. अमरनाथ-हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्र.सं. 2009, पृ. 525
8.  डॉ. विश्वनाथ प्रसाद (संपा)- वृन्दावनलाल वर्मा समग्र भाग-1, समीक्षा से, प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, वाराणसी, प्र.सं. 1991, पृ. 259.            वृन्दावनलाल वर्मा- प्रत्यागत, प्रभात प्रकाशन नई दिल्ली, 2011, पृ. 9
10.   वही, पृ. 30
11.   वही, पृ. 39
12.   वही, पृ. 36
13.   वही, पृ. 39
14.   वही, पृ. 42
15.   वही, पृ. 56
16.   वृन्दावनलाल वर्मा-झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 109
17.   शिवकुमार मिश्र-वृन्दावन लाल वर्मा: उपन्यास और कला, रवि प्रकाशन, कानपुर, 1956, पृ. 287
18.   वृन्दावनलाल वर्मा-अचल मेरा कोई, प्रभात प्रकाशन नई दिल्ली, 2011, पृ. 184
19.   वृन्दावनलाल वर्मा- सोती आग, प्रभात प्रकाशन, 2011, पृ. 23
20.    वही, पृ. 62
21.    ही, पृ. 102
22.    वही, पृ. 8

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)         वर्ष-4,अंक-26 (अक्टूबर 2017-मार्च,2018)          चित्रांकन: दिलीप डामोर 

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