आलेख : तुलसीदास के काव्य में मर्यादा / राज कुमार पाण्डेय - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

आलेख : तुलसीदास के काव्य में मर्यादा / राज कुमार पाण्डेय

 तुलसीदास के काव्य में मर्यादा/ राज कुमार पाण्डेय 
                                              (रामचरितमानस के विशेष सन्दर्भ में)


                       
हिन्दी भक्ति काव्य में गोस्वामी तुलसीदास का महत्वपूर्ण स्थान है। जिस प्रकार राम को किसी क्षेत्र, जाति, धर्म की सीमा में नहीं बाधा जा सकता, उसी प्रकार तुलसीदास को भी हम संकुचित दृष्टि से नहीं देख सकते। तुलसी के पौधे के सदृश तुलसीदास भी समस्त जनमानस को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करने वाले हैं। तुलसीदास का जन्म संवत् 1554 की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन राजापुर, चित्रकूट में हुआ था। उनके प्रमुख ग्रन्थों की संख्या बारह मानी जाती है- रामचरितमानस, विनय पत्रिका, गीतावली, दोहावली, कवितावली, रामाज्ञा प्रश्नावली, श्रीकृष्णगीतावली, जानकी मंगल, हनुमान बाहुक, पार्वती मंगल, वैराग्य संदीपनी और बरवै रामायण।

                        तुलसीदास के द्वादश ग्रन्थों में रामचरितमानसका स्थान सर्वोच्च है, ठीक वैसे ही जैसे भक्त कवियों में तुलसीदास। रामचरितमानस रचना के सम्बन्ध में हनुमान प्रसाद पोद्दार का कथन है- संवत् 1631 का प्रारम्भ हुआ। उस साल रामनवमी के दिन प्रायः वैसा ही योग था, जैसा त्रेतायुग में रामजन्म के दिन था। उस दिन प्रातः काल श्रीतुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने, छब्बीस दिन में ग्रन्थ की समाप्ति हुई। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।“1 रामचरितमानस कालजयी कृति है। यह सात काण्ड में विभक्त है- बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड, उत्तरकाण्ड। यह प्रबन्ध काव्य अवधी भाषा में लिखित है। प्रमुख छन्द दोहा और चैपाई है। इस ग्रन्थ की पहँच जन-जन तक है। इसका एक प्रमुख कारण इसकी भाषा है और इसकी सहजता है। कथाक्रम प्रवाहमान है, बिना किसी बाधा के सम्पूर्ण कथानक सातकाण्ड में अपने उत्कर्ष को प्राप्त करता है। धार्मिक दृष्टिकोण से इसका महत्व बहुत अधिक है, साथ ही साहित्यिक दृष्टिकोण से भी, फलस्वरूप यह पढ़े-लिखे और अनपढ़-गंवार के लिए बराबर महत्वपूर्ण है।

 गोस्वामी तुलसीदास ने अपने काव्य में मर्यादा को अधिक महत्व दिया है। रामचरितमानस में भी हमें अनेक स्थलों पर इसका पालन होते दीख पड़ता है। तुलसीदास के नायक श्रीरामचन्द्र हैं, जिसे उन्होंने मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया है। रामचरितमानस के अन्तर्गत भारतीय समाज में व्याप्त समस्त मर्यादाओं का पालन हुआ है। राम तो मर्यादापुषोत्तम हैं ही साथ ही सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न भी मर्यादा के दृष्टिकोण से स्वयं को स्थापित करते हैं। रामचरित मानस में पशु-पंक्षी भी मर्यादानुकूल कार्य करते हैं।

 रामचरितमानस में गुरु-शिष्य सम्बन्ध पर तुलसीदास ने बखूबी प्रकाश डाला है। राजा दशरथ को गुरु के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा। गुरु विश्वामित्र राजा दशरथ के पास आते हैं। वे दशरथ से राम और लक्ष्मण को माँगते हैं, क्योंकि उन्हें राक्षस यज्ञ नहीं करने देते। प्रारम्भ में दशरथ जी तैयार नहीं होते हैं, किन्तु वशिष्ठ जी के समझाने से तैयार हो जाते हैं। धर्मरक्षा व कुलमर्यादा के लिए दशरथ जी अपने प्राण के सदृश पुत्रों को गुरु-आश्रम की रक्षा हेतु भेजने के लिए प्रस्तुत होते हैं। वे आदर सहित विश्वामित्र को अपने दोनों पुत्र देते हैं-

     अति आदर दोउ तनय बोलाए। 
   हृदय लाइ बहु भाँति सिखाए।।
   मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ।
   तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ।।“2

राम-लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के साधना में बहुत सहायक सिद्ध होते हैं। वे यज्ञ-कार्य में बाधक बने राक्षसों का संहार करते हैं। एक शिष्य के रूप में वे मर्यादानुकूल कार्य करते हैं। ऐसे उदाहरण के कारण ही हमारा समाज गुरु-शिष्य के सम्बन्ध को आदर की दृष्टि से देखता है।
                   
 माता-पिता के प्रति अपार श्रद्धा को तुलसीदास ने राम के चरित्र के   माध्यम से बहुत ऊँचाई पर पहुँचाया है। कैकेयी ने राजा दशरथ से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा था और भरत के लिए राजसिंहासन की माँग की थी। इससे राम थोड़ा भी विचलित नहीं होते हैं। वे अपने माता सदृश कैकेयी के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं। वे कैकेयी से कहते हैं -

    ”सुनु जननी सोइ सुत बड़भागी। 
  जो पितु मातु वचन अनुरागी।
  तनय मातु पितु तोष निहारा। 
  दुर्लभ जननि सकल संसारा।।“3

कैकेयी के प्रति राम का यह दृष्टिकोण उनकी महामानव का पद प्रदान करने के लिए पर्याप्त है। राम मर्यादानुसार अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। राम के लिए माता-पिता देव तुल्य हैं, इसलिए उनके द्वारा कही गयी हर बात का वे सस्नेह पालन करते हैं।
                     
 पति-पत्नी का आदर्श स्वरूप राम-सीता के रूप में देखा जा सकता है। रामचरितमानस में सीता ने मर्यादा के समस्त पक्षों के अनुरूप स्वयं को ढाला। राम को चौदह वर्ष का वनवास मिलता है। वे सीता से अयोध्या में ही निवास करने का आग्रह करते हैं। सीता को बहुत यत्नपूर्वक समझाने पर भी वे असफल होते हैं। राम सीता को वनजीवन की समस्या बताने के साथ ही शीघ्र समय व्यतीत हो जाने का आश्वासन भी देते हैं -

  मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। 
 बेगि फिरव सुनु सुमुखि सयानी।।
 दिवस जात नहीं लागिहि वारा। 
 सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।“4

राम द्वारा लाख समझाने पर भी सीता अपने पतिव्रत से विचलित नहीं होती हैं। वे किसी भी परिस्थिति में अपने पति को संकट में अकेले नहीं छोड़ना चाहती हैं। वे वनगमन में स्वयं को समर्थ बतलाती हैं। अपनी बात को सिद्ध करने के लिए सीता जी व्यंग्य का सहारा लेती हैं। वे राम से कहती हैं-

    मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू।
 तुम्हहि उचित तप मो कहुं भोगू।“5

रामचरितमानस में लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, राम ही हर आज्ञा का पालन करते हैं। वे मर्यादा के अनुकूल अपना व्यवहार करते हैं। लक्ष्मण तो राम के साथ वनगमन करते हैं। वे न सिर्फ राम की आज्ञा का पालन करते हैं, अपितु सीता को अपनी माता सदृश सम्मान देते हैं। भरत, शत्रुघ्न भी राम से बहुत प्रेम करते हैं। लक्ष्मण के साथ ही भरत का यश कम नहीं है। भरत को पिता द्वारा राजसिंहासन प्रदान किया जाता है, लेकिन वे स्वीकार नहीं करते हैं। भरत ने राम के लिए राजसिंहासन का परित्याग किया। वे अपने बड़े भाई का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वन में जाते हैं, उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। राम अपनी चरणपादुका आशीर्वाद स्वरूप भरत को देते हैं -

      सुनि सिख पादू असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।
      सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।“6
                        
          रामराज्य में राजा-प्रजा का सम्बन्ध शासक और शासित का न होकर पिता-पुत्र का था। प्रजा की छोटी-छोटी आवश्यकताओं का भी राजा द्वारा पूरा ध्यान रखा जाता था। यह कहा जा सकता है कि राजा प्रजा के सुख से सुखी व दुःख से दुखी होता था। राम ने प्रजा के लिए मर्यादा का हृदय से निर्वहन किया। उनकी शंकाओं के समाधान हेतु अपनी सती जैसी पत्नी की परीक्षा ली। सीता ने इस कार्य में राम का सहयोग किया। राम के आदेश से वे इस अग्नि परीक्षा के लिए सहर्ष तैयार हो गयी। सीता ने अग्नि परीक्षा में लक्ष्मण से सहयोग माँगा, उनको परीक्षा के लिए अग्नि तैयार करने को कहा। इस प्रसंग पर रामचरितमानस में तुलसीदास लिखते हैं -

 प्रभु के वचन सीस धरि सीता। 
बोली मनक्रम वचन पुनीता।।
लछिमन होहु धरम के नेगी। 
पावक प्रगट करहु तुम्ह वेगी।।“7

 रामचरितमानस में मर्यादा सर्वत्र दिखायी पड़ती है और जहाँ इसका अतिक्रमण होता है, वहाँ स्वयं राम इसके पक्ष में खड़े हो उठते हैं। मर्यादा के लिए वे युद्ध करते हैं और वध भी करते हैं। बालि-सुग्रीव का प्रसंग है। सुग्रीव और बालि दोनों सगे भाई हैं। बालि ने सुग्रीव की पत्नी को छीन लिया है। सुग्रीव अपनी व्यथा राम को सुनाते हैं। राम सुग्रीव को सहायता का आश्वासन देते हैं। वे योजना बनाते हैं और सुग्रीव से कहते हैं कि वह जाकर बालि को ललकारे। सुग्रीव जाकर बालि को चुनौती देता है। प्रथम प्रयास में वह असफल रहता है। राम उसे पुनः ललकारने के लिए प्रेरित करते हैं। सुग्रीव बालि को ललकारता है। इस बार राम बालि का  बध करते हैं। बालि की दृष्टि में वह निरपराध है। वह राम से अपने वध का कारण पूछता है। राम बालि को उसका पाप बतलाते हैं -

  अनुज वधू भगिनी सुत नारी। 
सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
इन्हहि कुदृष्टि विलोकइ जोई। 
ताहि बधे कुछ पाप न होई।।“8

 राम-रावण युद्ध में सत्य की विजय होती है। राम की विजय का सबसे बड़ा कारण यह है कि राम मर्यादा के रक्षक हैं और रावण मर्यादा का भक्षक है। रावण मर्यादा के विपरीत सीता का हरण करता है। अपनी पत्नी मन्दोदरी के बहुत समझाने पर भ्ज्ञी वह सीता को वापस नहीं करता है। रावण अनैतिक मार्ग पर चलता है, जबकि राम सत्य और नैतिकता का निर्वहन करते हैं। रावण बहुत बलशाली होते हुए भी राम से पराजित होता है। रावण वध के पश्चात् समस्त देवतागण अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। तुलसीदास ने इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है -

    वरषहिं सुमन देव मुनिवृंदा। 
जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।“9


रामचरितमानस कालजयीकृति है। यह आज भी समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी है। आम जनमानस सामान्य सी बात पर भी इसके दोहे और चैपाइयों को दृष्टान्त के रूप में प्रयुक्त करता है। तुलसीदास ने मर्यादा को अधिक महत्व दिया है। रामचरितमानस में मर्यादा के विविध पक्ष देखे जा सकते हैं। मर्यादा के ध्वजवाहक स्वयं राम हैं। रामचरित मानस में राम का स्वरूप मर्यादापुरुषोत्तम का है। वे मर्यादा और नैतिकता के रक्षक हैं। साधु, गृहस्थ, भाई, माता-पिता, पति-पत्नी, राजा-प्रजा सबकी मर्यादाएं हैं। रामचरितमानस के अधिकांश पात्र मर्यादा की कसौटी पर खरा उतरते हैं। राक्षसों का आचरण मर्यादा विरूद्ध होता है, इसलिए राम उनसे युद्ध करते हैं और धर्म तथा मर्यादा का पालन करते हैं।
                   
 समाज पर रामचरितमानस का प्रभाव बहुत है और इसमें निरन्तर वृद्धि की आवश्यकता है। शासक वर्ग को रामराज्य से प्रेरणा ग्रहण करने की आवश्यकता है। यदि शासक राम को अपना आदर्श समझेगा तो रामराज्य की स्थापना आज भी सम्भव है। आपसी भाईचारा और सामाजिक सद्भाव बनाने में रामचरितमानस की शिक्षा सार्थक सिद्ध हो सकती है।

 तुलसीदास ने मर्यादा को रामचरितमानस में पूणर्पतः स्थापित किया है। मर्यादा से विरत लोगों को उन्होंने समाज और धर्म की दृष्टि से हानिकारक माना है। जो लोग मर्यादा की सीमा का अतिक्रमण करते हैं, वे राम द्वारा दंडित होते हैं। अतः गोस्वामी तुलसीदास जिस आदर्श की परिकल्पना करते हैं, उसे रामचरितमानस में पूर्णतः स्थापित करते हैं। उनके सृजन शक्ति, कल्पनाशक्ति के कारण ही राम मर्यादापुरुषोत्तमकी उपमा से सुशोभित हो सके हैं। राम के पीछे-पीछे अन्य पात्र भी मर्यादानुकूल आचरण करते हैं। मर्यादा के दृष्टिकोण से रामचरितमानससफल प्रबन्ध काव्य है।

संदर्भ:

1-         श्रीरामचरितमानस: सं0 हनुमान प्रसाद पोद्दार, पृ0सं0-1051.
2-         बालकाण्ड, रामचरितमानस - 207/5.
3-         अयोध्याकाण्ड, रामचरितमानस - 40/4.
4-         अयोध्याकाण्ड, रामचरितमानस - 61/1.
5-         अयोध्याकाण्ड, रामचरितमानस - 66/4.
6-         अयोध्याकाण्ड, रामचरितमानस - 323.
7-         लंकाकाण्ड, रामचरितमानस - 108/1.
8-         किष्किन्धाकाण्ड, रामचरितमानस - 8/4.
9-         लंकाकाण्ड, रामचरितमानस - 102/6.


(राज कुमार पाण्डेय, शोध छात्र, हिन्दी विभाग, शिब्ली नेशनल पी0जी0 कालेज, आज़मगढ़ (उ.प्र.) 
अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-4,अंक-27 तुलसीदास विशेषांक (अप्रैल-जून,2018)  चित्रांकन: श्रद्धा सोलंकी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here