शोध आलेख: रामकथा, तुलसी और कुमाऊँ / कृष्ण चन्द्र - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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शोध आलेख: रामकथा, तुलसी और कुमाऊँ / कृष्ण चन्द्र

                          रामकथातुलसी और कुमाऊँ 

           
गोस्वामी तुलसीदास की गणना भारत के मूर्धन्य कवियों में की जाती है। बाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भास, बाणभट्ट, की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए तुलसीदास जी ने भारतीय जनमानस के बीच व्यापक स्वीकृति प्राप्त की है।  वे न केवल भारतीय बल्कि पाश्चात्य और पौर्वात्य  विद्वानों  के बीच सम्मानीय हैं। यूं तो तुलसीदास को समस्त भारतीय जनता अपना मानती है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और असम से लेकर गुजरात,  राजस्थान तक फैली भव्य भारत भूमि का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करते हैं -  तुलसीदास । किन्तु  भारत भूमि के उत्तरांचल  के बीच बसे कुर्मांचल प्रदेश की संस्कृति पर तुलसीदास जी  कि छाप स्पष्ट देखने  को मिलती है। कुमाऊंनी संस्कृति ना केवल तुलसीदास को सम्मान प्रदान करती है बल्कि उनका अनुकरण भी करती है।

         
उत्तराखंड प्रदेश में रामकथा से संबंधित कई  स्थल है जिनमें से कैलाश मानसरोवर, कैलाश पर्वत, काकभुशुंडि धाम, सीतावनी, लक्ष्मण झूला, बाल्मीकि आश्रम, आदि प्रमुख है। कहते हैं भगवान शिव ने सर्वप्रथम माँ पार्वती को 'रामकथा' कैलाश पर्वत पर सुनाई। और काकभुशुण्डि धाम में आज भी काकभुशुण्डि पक्षियों को राम कथा सुनाते हैं। सीतावनी में ही बाल्मीकि आश्रम था यहीं लव- कुश का जन्म हुआ। आज भी सीता वनी में लव- कुश, माता सीता और बाल्मीकि जी की मंदिर देखने को मिलते हैं। यही नहीं बल्कि लव - कुश और सीता के नाम पर तीन जल स्रोत भी यहाँ विद्यमान हैं।

               
गोस्वामी तुलसीदास के पवित्र ग्रंथ रामचरितमानस ने कुमांउनी समाज के प्रत्येक घर में स्थान पाया हुआ है। रोचक बात यह भी है कि रामचरितमानस को कुमाऊनी समाज के अधिकांश वर्गों में रामायण के नाम से पुकारा जाता है। यहाँ घर में रामचरितमानस का पाठ करने पर  लोग कहते हैं रामायण कर रहे हैं।

             कुमाऊँ के घरों में  प्रत्येक शुभकार्य में पंचनाम देवी-देवताओं सहित राम -सीता को सपरिवार न्यूतने (निमन्त्रण देने)की परम्परा है। इसके लिए आमन्त्रण गीत बने हुए हैं जिन्हें सौभाग्यवती स्त्रियाँ गाती हैं    -

           "सुवा रे सुवा बनखण्डि सूवा,कौ सुवा अपणो गोत।
            हरियो तेरो गात,पिंगलो तेरो ठुना, रतन्यालि आँखि॥
            जा सुवा न्यूत आ -
                             .................
            सीता देई नौं छ जनकपुर गौं छ,
            तैका स्वामी रामीचन्द्र नौंछ
            आघिल आँगन बाड़ि,पछिल फूल बाड़ी,वी घर की नारि न्यूतिए॥"
       कुमांउनी समाज के संस्कार गीतों में बालक के जन्म/ नामकरण से लेकर उसके चूड़ाकर्म, उपनयन, कर्णवेध, यज्ञोपवित्र एवं विवाह संस्कारों में भगवान राम को आदर्श मानकर उस पर राम का आरोप किया जाता है और पूजा का पहला फूल भी राम जी को ही चढ़ता है -

                   "शकूना दे शकूना दे, शुभ काज अति नीको सुरंगीलो

                            पाटल अंचलि कमल को फूल

                 ×××                 ×××             ××××

                    सोई फूल मोलावन्त रामीचंद्र लछीमन भरत चरत।
           सोई फूल परी लीन सीता देवी आयुवन्ती पुत्रवन्ती॥"

        दूल्हे के श्रृंगार की वक्त  सकुनाखर (मंगल गीत) गाने वाली  सौभाग्यवती स्त्रियाँ दूल्हे से कहती हैं-

 "
पैरो हो पैरो रामजी, अपणा लुकुड़ा - मुकुटा" (राम  आप अपने वस्त्र आभूषण धारण करो सिया घर जाना है।

    
आज राम सीता का मिलन होगा गुरु विश्वामित्र मंत्रों  का  वाचन करेंगे और सभी अयोध्यावासी उनके विवाह में शामिल होंगे। कुमाऊं के संस्कार गीतों में वर या कन्या किसी के पुत्र या पुत्री ना होकर राम या सीता माने जाते हैं उन पर जगत माता या जगत पिता का आरोप किया जाता है।
          
कुमांउनी  समाज के गांव गांव  में रामलीला का आयोजन किया जाता है। आज कुमाऊं की रामलीला लगभग पूरे देश में प्रसिद्ध है। कुमाऊँ  क्षेत्र की रामलीला आज मात्र कुमाऊँ की रामलीला ना होकर दिल्ली और समूचे उत्तर भारत में फैल चुकी है। जिसे पर्वतीय रामलीला कहा जाता है। पर्वतीय समाज पर तुलसी के नायक राम का इतना गहरा प्रभाव है कि यहां  राम के नाम से जुड़े हुए कई स्थान हैं। जैसे- रामगढ़, रामनगर, रामपुर, रामेश्वर(सरयू रामगंगा के संगम पर पिथौरागढ़ जनपद में) और रामगंगा नदी।

         तुलसीदास जी को कुमाउंनी समाज में महर्षि  बाल्मीकि से अधिक सम्मान प्राप्त  है। बल्कि यूँ कह लीजिए कुमांउनी समाज में आज भी भावी बहू को रामचरितमानस  का ज्ञान होना आवश्यक माना जाता है।

          कूर्माचली समाज की लोकगाथाओं में भी राम का जिक्र मिलता है विशेषतः 'ऐड़ी' देवता की जागर में  ऐड़ी की उत्पत्ति  रामचंद्र जी के बाणों से मानी जाती है। जिनकी पूजा रात्रि जागरण के माध्यम से की जाती है। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित  द्रोणगिरि गांव के लोग हनुमान की पूजा नहीं करते उनका यह मानना है कि हनुमान द्वारा उनके आराध्य पर्वत 'देव प्रभात' या 'द्रोणगिरि' के दाहिने भाग को उखाड़कर संजीवनी बूटी के लिए लंका ले जाना उचित  नहीं था। आज भी यहां की लोक कथाओं के गायन के समय  जिस व्यक्ति पर लोक देवता 'देवप्रभात' (द्रोणगिरी)  अवतरित होता है  उसका दांयाॅ अंग तब तक सुन्न रहता है जब तक उस पर देवता का प्रभाव (आवेश)  रहता है। इस गाँव की रामलीला में हनुमान की महिमा का बखान नहीं किया जाता और ना ही इस गांव में हनुमान की पूजा की जाती है जबकि यह गांव पूरा राम भक्त है।

        कुर्मांचल के अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र में एक 'दूनागिरी धाम' है। लोक मान्यता के अनुसार त्रेता युग में जब लक्ष्मण की मूर्छा को दूर करने के लिए हनुमान संजीवनी बूटी सहित द्रोणागिरी पर्वत को उठाकर ले जा रहे थे तो उसका एक खंड गिरकर यहां पड़ा। परवर्ती काल में इस पर दूनागिरी माता की मंदिर की स्थापना की गई। यहां भव्य दूनागिरी धाम स्थापित है।

         कुमांउनी समाज में तुलसी के 'रामचरितमानस' का पाठ करना सुख - शांति के लिए अच्छा माना जाता है। रामचरितमानस के 'सुन्दरकाण्ड' का पाठ इस समाज को विशेष प्रिय है।  'हनुमान चालीसा' के पाठ से यहाँ के लोगों की दिनचर्या आरम्भ होती है। यहाँ राम दो रूप में पूजे जाते हैं। एक है राम का शास्त्रीय रूप अर्थात् 'बाल्मीकि रामायण के राम' या 'तुलसी के रामचरितमानस के रामदूसरा रूप 'लौकिक राम' का है। जो कुर्मांचली  समाज की लोक गाथाओं, लोकगीतों में देखने को मिलता है।

          कुर्मांचली  समाज में ब्राह्मणों द्वारा अपने नाम के पीछे सम्मान सूचक राम शब्द का प्रयोग किया जाता था। जैसे-   गोविंद राम सुंदरियाल। किन्तु वर्तमान समय में शिल्पकार  वर्ग  द्वारा भी अपने नाम के पीछे जाति की जगह 'राम' शब्द का प्रयोग किया जाता है। महात्मा गांधी के प्रभाव स्वरूप शिल्पकार वर्ग अभिवादन के लिए 'राम - राम' शब्द का प्रयोग करता है।

      कूर्मांचली समाज में आकर राम केवल तुलसी के राम न होकर  सबके राम बन जाते हैं। वर्ण और संप्रदाय से परे हो जाते हैं। यहां रामलीला के पात्रों को मुसलमान भाई तैयार करते हैं। अल्मोड़ा  शहर में तो रामलीला हेतु पुतले निर्माण का काम मुसलमान भाइयों द्वारा ही किया जाता है। यही नहीं बल्कि कई रामलीला के पात्रों का अभिनय भी यही करते हैं। हिंदू धर्म के चारों वर्णों, सभी जातियों के लोग मिल-जुलकर  चैत्र या कार्तिक मास की नवरात्रियों में रामलीला का आयोजन  करते हैं।  यहाँ तुलसी की रामचरितमानस का कुमांउनी संस्करण कर कुमांउनी रामलीला का मंचन किया जाता है। किंतु बीच में दोहे- चौपाइयाँ तुलसीदास की ही चलती हैं।कूर्मांचली समाज में तुलसी के प्रति प्रेम और आदर को देखते हुए यहां की माध्यमिक उच्चतर माध्यमिक एवं विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में तुलसीदास को पर्याप्त स्थान दिया गया है इनकी रामचरितमानस, कवितावली, विनय पत्रिका को यहाँ पढ़ाया जाता है।

         तुलसी यहां एक कवि मात्र नहीं बल्कि  भक्तों  और भगवान को जोड़ने के लिए एक पुल का काम करते हैं। और उनकी रचनाएं उस सुख सरिता का काम करती है। जिस में स्नान करके भक्त तुलसी रूपी पुल के सहारे ईश्वर तक पहुंचता है।

सदर्भ:

1• शर्मा डी0डी0, शर्मा मनीषा, उत्तराखंड का सामाजिक एवं सांप्रदायिक इतिहास, भाग 1,संस्करण 2015, अंकित प्रकाशन हल्द्वानी, पृष्ठ संख्या 10, 41
2• 
पाण्डेय विश्वंभर, भारतीय लोक साहित्य एवं संस्कृति, प्रथम संस्करण, विश्वभारती पब्लिकेशन नई दिल्ली, वर्ष 2017, पृष्ठ संख्या 160, 164
3•
शर्मा डी0डी0, शर्मा मनीषा  , उत्तराखंड का सामाजिक एवं सांप्रदायिक इतिहास, भाग 2, संस्करण 2015, अंकित प्रकाशन हल्द्वानी, पृष्ठ संख्या 260, 262,265,269
4•
गौतम सुरेश, लोक साहित्य, ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया, प्रथम संस्करण, दिव्यम प्रकाशन नई दिल्ली, वर्ष 2017, पृष्ठ संख्या 395,439
5•
चातक गोविंद, भारतीय लोक संस्कृति का संदर्भ मध्य हिमालय, द्वितीय संस्करण, तक्षशिला प्रकाशन दरियागंज नई दिल्ली, वर्ष 2014, पृष्ठ  संख्या 79 88,105
6•
शर्मा डी0डी0, उत्तराखंड के लोक साहित्य का आयामी परिदृश्य, संस्करण 2014, अंकित प्रकाशन हल्द्वानी, पृष्ठ  संख्या 155,157,
7• बलोदी राजेंद्र , उत्तराखंड समग्र ज्ञानकोश, द्वितीय संस्करण, बिनसर पब्लिकेशन देहरादून, वर्ष 2010, पृष्ठ संख्या 221, 284
8•
नवानी लोकेश, उत्तराखंड ईयर बुक 2012, बिनसर पब्लिशिंग कंपनी,  पृष्ठ  संख्या 512

(कृष्ण चन्द्रशोध छात्र हिन्दी,राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर)
अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-4,अंक-27 तुलसीदास विशेषांक (अप्रैल-जून,2018)  चित्रांकन: श्रद्धा सोलंकी

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