आलेख: गंगा जमुनी तहजीब का सशक्त दस्तावेज : ‘पारिजात’/ ममता नारायण बलाई - अपनी माटी

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रविवार, अगस्त 04, 2019

आलेख: गंगा जमुनी तहजीब का सशक्त दस्तावेज : ‘पारिजात’/ ममता नारायण बलाई

       गंगा जमुनी तहजीब का सशक्त दस्तावेज : पारिजात

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह जिस समाज में रहता है, उसका खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार, बोलने का तरीका, कला-साहित्य सभी उसके संस्कृति के अंतर्गत आते हैं। संस्कृति का सामान्य अर्थ परिष्कृत करने से लिया जाता है। वह मानव को परिष्कृत करती हैं, उसके सोचने, समझने की शक्ति का विस्तार करती हैं। संस्कृति के माध्यम से हम संबंधित समाज के ज्ञान, चिंतन, रीति-रिवाज और परंपराओं को जान सकते हैं। मानव व उसके पर्यावरण में अंतर्संबंध स्थापित करने का कार्य संस्कृति करती है। हिंदी साहित्य कोश में संस्कृति को इस रूप में परिभाषित किया गया है, “संस्कृति का अर्थ चिंतन तथा कलात्मक सर्जन की वे क्रियाएँ समझनी चाहिए, जो मानव व्यक्तित्व और जीवन के लिए साक्षात उपयोगी न होते हुए उसे समृद्ध बनाने वाली हैं।”1  जैसे-जैसे मानव समाज में परिवर्तन आता गया वैसे-वैसे संस्कृति भी बदलती गई। सर्वप्रथम जब मानव ने आग और पहिये का आविष्कार किया तब उसे आदिम संस्कृति के नाम से जाना गया फिर यह संस्कृति आगे चलकर अलग- अलग प्रदेशों के नाम से जानी जाने लगी जैसे अरब संस्कृति, भारत - ईरानी संस्कृति, यूरोपियन संस्कृति, चीनी संस्कृति आदि। कालांतर में जब राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रसार हुआ तो संकीर्ण मानसिकता वालो ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नारा दिया जिसके परिणाम स्वरूप प्रादेशिक विविधता पर आधारित संस्कृति धर्मों में बंट गई। 

भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि वह उदार व आदर भाव से सबको अपने भीतर समाहित कर लेती हैं। भारत में विविध तरीकों और उद्देश्य से कई विदेशी जातियां  आई। वे भारत में इस प्रकार रच-बस गई कि अब यह तय करना मुश्किल है कि कौन मूल निवासी है? और कौन विदेशी ? इस बात की ओर संकेत करते हुए महात्मा गांधी कहते है,“मेरा दृढ़ मत है कि जो बहुमूल्य रत्न हमारी संस्कृति के पास है, वह किसी अन्य संस्कृति के पास नहीं है।”2

  यह विदेशी संस्कृतियां अपने मूल स्थान (अरब, मिश्र, तुर्की, यूरोप आदि) व भारत में  एक जैसी नहीं है। ये भारत में आने के पश्चात भारतीय परिस्थिति से प्रभावित होकर पानी में नमक की तरह घुल मिल गई है। यहां की संस्कृति को किसी एक धर्म का नाम नहीं दिया जा सकता है। यहां की संस्कृति सभी धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले सभ्यताओं का संगम है, “अतः भारतीय संस्कृति भारतीय हैं। यह पूरी तरह न हिंदू है, न इस्लामी और न कोई अन्य।”3  कोई भी संस्कृति हमें यह शिक्षा नहीं देती है कि हम किसी अन्य समाज की निंदा करें और अपने समाज को श्रेष्ठ बताएं, बल्कि वह हमें सिखाती है कि हम अपने समाज के साथ-साथ बाकी अन्य का आदर करें। उन्हें भी अपने भीतर आत्मसात करें, उनसे संबंधित ज्ञान को प्राप्त करें। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने भारतीय साँझा संस्कृति के बीज सल्लतनत काल में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल को माना है जहाँ नायक के पद पर अमीर खुसरो को बिठाया।

 भारतीय संस्कृति के भारत में कई रूप है जिनमें मुख्य रूप से गंगा-जमुनी संस्कृति का नाम आता है। इस भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्त करने का सफल प्रयास नासिरा शर्मा ने अपने उपन्यास पारिजात में किया है जिसे जिसे वर्ष 2016 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसमें हिंदू परिवार व मुस्लिम परिवार की मिली - जुली दास्तां को बयां किया गया है। पूरा उपन्यास ऐसी विधवाओं के दर्द का दस्तावेज है जो अलग अलग धर्मों की होते हुए एक सा दर्द झेल रही हैं।

 वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस एकता पर संकीर्ण लोग द्वारा सबसे ज्यादा सवाल उठाए जाते हैं। इसका एक प्रमुख कारण इस्लाम से हिंदुओं की अनभिज्ञता को भी माना जा सकता है। इसी संदर्भ में स्वर्गीय मानवेंद्र नाथ रॉय लिखते है संसार की कोई भी सभ्य जाति  इस्लाम के इतिहास से उतनी अपरिचित नहीं है जितनी हिंदू हैं और संसार की कोई भी जाति इस्लाम को इतनी घृणा से भी नहीं देखती जितनी घृणा से हिंदू देखते हैं।”4  ऐसी घृणा और अनभिज्ञता भारतीय मुसलमानों में भारत की पुरा संस्कृति के प्रति विद्यमान है। इस घृणा का खंडन करना आवश्यक है जो हमारे देश की एकता व अखंडता के लिए घातक है।

 प्रस्तुत उपन्यास तीन मित्रों प्रहलाद दत्त, बसारत और जुल्फिकार की कहानी है जिनमे घनिष्ठ मित्रता है। यह मित्रता धर्म की संकीर्णता से ऊपर है। एक साथ खाना बनाना, खाना खाना, मिलकर सभी त्यौहार मनाना चाहे वह मोहर्रम हो या जन्माष्टमी। मोहर्रम में भी ऐसे कई दृश्य देखे जा सकते हैं जो साझी संस्कृति के रूप में पहचाने जाते हैं। उपन्यास में रोहन दत्त नामक पात्र मोहर्रम के इतिहास के प्रति जिज्ञासु है, रोहन के साथ-साथ पाठक में भी जिज्ञासा बराबर बनी रहती है जब तक कि वह पूरा वाक़या नहीं जान लेता है। क्योंकि रोहन हुसैनी ब्राह्मण के वंश में पैदा हुआ है।  ये वो ब्राह्मण थे जिन्होंने कर्बला की जंग में धर्म को पीछे छोड़ मानवता के लिए  इमाम हुसैन का  साथ दिया इसलिए उसके लिए यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है।
   
राहिबसिद्ध दत्त ने हजरत इमाम हुसैन की दुआ से सात संताने प्राप्त की थी और वही सातों संतानें कर्बला की जंग के समय इमाम हुसैन का सर वापस लाने के उद्देश्य में शहीद हो जाते हैं। तब से वह हुसैनी ब्राह्मणों के रूप में जाने जाने लगते हैं। इमाम हुसैन की शहादत मानवता और इंसाफ के लिए दी गई है इसलिए यह  शहादत किसी एक धर्म की न होकर साझी शहादत है। मोहर्रम  में जो ताजिये का रूप है वह भारतीय परिवेश के कारण मंदिरनुमा हैं। कर्बला की जंग पर आंसू हिंदू और मुस्लिम बराबर बहाते हैं। शहादत पर गाए जाने वाले प्रसिद्ध मर्सिया हिंदुओं द्वारा लिखे गए हैं जिनको गा कर मुस्लिम अपना शोक मनाते हैं। जैसा कि दिलावर नामक पात्र कहते है,“यही है मर्सिया जो मजहब से नहीं, इंसानी जज्बे से ताल्लुक रखता है।”5 इस तरह मोहर्रम पर पढ़े जाने वाले मर्सिया को इंसानी जज्बातों का नाम दिया गया है कई जगह जो ताजिए निकाले जाते हैं उनके आगे हिंदू पानी डालते जाते है क्योंकि हजरत इमाम हुसैन प्यासे ही शहीद हुए थे।

  साझी संस्कृति का एक उदाहरण यह भी दिखाई देता है। लखनऊ के एक स्थान में इमाम बाड़े में जाते समय ताजियों के रास्ते में एक बुढ़िया की झोपड़ी आ रही थी, तब तय हुआ कि ताजिए का रास्ता बदल दिया जाए, इस पर बुढ़िया ने विरोध किया कि ताजिए का रास्ता नहीं बदला जाएगा बल्कि उस की झोपड़ी ही हटा दी जाएगी। मानवता के लिए दी गई कुर्बानी के लिए एक ताजिया का नाम बुढ़िया का ताजियारखा गया था। इस प्रकार ताजिये मे हिंदू-मुस्लिम एकता का दृश्य दिखाई देता है। यह एकता का सवाल पहले नहीं था क्योंकि उस समय  सब एक थे। इसीलिए लेखिका ने अपने उपन्यास में बीते समय की बात को याद करते हुए कहा  है,“बीसवीं सदी के शुरू में हिंदू - मुसलमानों के ताजिये की शक्ल और बनावट में कोई फर्क नहीं था।”6  उपन्यास में बताया गया है कि लखनऊ में एक ताजिया कदीमी था और दूसरा हिंदू हरकारे ने रखा था। कालांतर में उसे कहार, गोमती उठाते थे फिर मुंशी सूरज प्रसाद निगम उठाते थे। वे स्वयं भी मर्सिया पढ़ते थे और शोक मनाते थे।

लखनऊ का जो चित्रण उपन्यास में हुआ है उससे स्पष्ट होता है कि लखनऊ में हिंदू - मुस्लिम संस्कृति में कोई फर्क नहीं किया जाता हैं यहां होली - दीवाली के त्योहार हो या ईद-मुहर्रम के सब मिलकर मनाते हैं। मोहर्रम के मातम में सभी हिंदू शामिल होते है तो होली व बसंत के रंग में सभी मुसलमान रंग जाते हैं। होली का एक दृश्य प्रहलाद दत्त के घर में भी दिखाई देता है जहां सभी मित्र होली खेल रहे हैं सब होली खेलने में व्यस्त हैं। कोई पहचाना नहीं जा रहा है, सबके मुंह पर रंग होता है और कपड़े पिचकारी से निकले रंगों से सरोबार हैं।”7 यहां इन इंसानों को कोई अलग नहीं कर सकता कि कौन किस मज़हब को मानाने वाला हैं, होली के रंग में सब एक रंग के हो गए। ये तीनों मित्र एक ही परिवार की तरह सभी त्योहार आपस में मिल - जुल कर मनाते हैं। होली जैसा ही दृश्य हमें जन्माष्टमी पर भी देखने को मिलता है,“प्रभा बड़े चाव से मोनिस, रोहन और काजि़म को कृष्ण, राधा, बलराम की तरह सजा रही हैं। तीनों के बदन नीले- सफ़ेद पुते हैं, पीली धोती और माथे पर रखे सुंदर ताज पर मोर पंख लगा है।”8 आगे इसी तरह सुमित्रा और फिरदौस जहां एक साथ दीवाली मनाती और दिए जलाती हुई दिखाई देती है। इस प्रकार चूड़ी, टीका, मेहंदी जो हिंदुओं मे सुहाग की निशानी माने जाते हैं वह मुसलमानों में भी सुहाग का प्रतीक मानते हैं। जब इमाम हुसैन की शहादत हो जाती है तब उनकी स्त्रियां कुछ इस तरह अपना शोक प्रकट करती है,
  
 “रोये-रोये उतारी अपनी मांग का संदल, सारी उमरिया मटियार भई,
 रोयेरोये उतारी अपने हाथ की चूड़ियां, सारी उमरिया मटियार भई।”9
  
हिंदुओं की तरह मुसलमानों में भी शादी के समय बन्ना बन्नी के गीत प्रचलन में है जो इसे एक संस्कृति घोषित करने में सहायक है।

मोहर्रम का त्योहार दस दिन तक मनाया जाता है जिसमें अलग- अलग दिन अलग- अलग लोग मातम मनाते हैं। आठवीं मोहर्रम से पायकों का झुंड गांव से चलकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में फैल जाते हैं जिनमें हलवाहे, चरवाहे, जुलाहे, दस्तकार और मजदूर होते थे, जो हरा कुर्ता, सफेद धोती और हरी पगड़ी पहने थे, कमर में छोटी-छोटी घंटियाँ बांधे उछल-उछल कर चलते थे। वह मुसलमान भाइयों की तरह मातम या नौहा नहीं पढ़ते थे, बल्कि ऊंची आवाज में या हुसैन! या हुसैन!के नारे लगाते थे।

मोहर्रम का सांस्कृतिक चेहरा जिस तरह भारतीय गांव की परंपरा व रीति रिवाज में रचा बसा है, वह सुखद आश्चर्य पैदा करता है। यह किसी विशेष  कौम, धर्म की पहचान होने के बावजूद वह केवल उसी की धरोहर नहीं रह जाती है, बल्कि वह राष्ट्र व विश्व की विरासत बन जाती है जैसे अजमेर शरीफ में ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह, जहां हर धर्म का बाशिंदा सजदा करता हुआ  देखा जा सकता। श्रद्धा को धर्मों में नहीं बांटा जा सकता है तभी तो अकबर फतेहपुर सीकरी तक बेटे की इच्छा में पैदल चलकर जाते हैं वही राजा बनारस भी वंश वृद्धि के लिए रामनगर स्टेट से छोटे इमामबाड़ा तक मीलों पैदल चलते हैं। यह श्रद्धा और भक्ति एक है। उपन्यास में इसी श्रद्धा को स्पष्ट करते हुए फिरदौस जहां कहती है, “धर्म की बाट से अलग अक़ीदे और अपनाइयत  की है और सब कुछ अपना समझने की है और यही तो हिंदुस्तान है यानी सांवलो और काले लोगों का स्थान जो भारत कहलाता है, जो इंडिया बनकर अंधविश्वास, कट्टरता, जड़ता, संकीर्णता को अपनी विभिन्नता और अनेकता से तोड़कर जाहिलों और तंग नजरों को ठेंगा दिखाता है।”10 कर्बला की घटना हो या महाभारत  या रामायण, वह आम आदमी के काफी नजदीक हैं उस से प्रत्येक व्यक्ति के इंसानी जज्बात जुड़े हुए है, वह हमारे देश के हर आम और खास द्वारा पढ़ी जाती हैं।

मुसलमानों में जैसे दसवीं तारीख को मुहर्रम मनाया जाता है वैसे ही हिंदुओं में दशमी को दशहरा मनाया जाता है। लखनऊ में मोहर्रम की तरह दशहरे में भी हिंदू- मुस्लिम संस्कृति की झलक मिलती है, “नवाबों द्वारा शुरू की गई रामलीला जनमानस में इस तरह बस चुकी थी कि चाहे रमजान पड़े या मोहर्रम, दशहरे की राम लीला में काम करने वाले दुनिया भूल कर उसी में डूब जाते थे।…..मगर जो मजा रहमत उल्लाह के दादा को रावण बनाने में आता था, वह सुख उन्हें अम्मा की बनाई बाजरे की रोटी में भी नहीं मिलता था।”11 ऐसे दृश्य ईरान में भी दिखाई देते हैं जहां कर्बला का पूरा वाक़या भी ठीक रामलीला की शक्ल में खेला जाता है इस प्रकार हिंदुओं के त्योहारों में मुस्लिम और मुसलमानों की त्योहारों में हिंदुओं का जो योगदान है वह काफी प्रशंसनीय है।

 आगे इसी तरह कई हिंदुओं ने उर्दू ग़ज़लें, शायरी व क़व्वालीयाँ गायी और कई मुसलमानों ने हिंदू ग्रंथों का अनुवाद किया। कई हिंदुओं ने अपने ग्रंथों का उर्दू - फारसी में अनुवाद करके इस गंगा जमुनी तहजीब को पुष्पित करने का कार्य किया है। मुंशी जगननाथ अतहरव मुंशी शंकरदयाल फरहतने रामायण का बेहतरीन तर्जुमा किया है। जैसा कि फिरदोस जहां अपनी सखी से कहती है, “इन दोनों बुजुर्गों ने हिंदू धर्म की कई दूसरी अहम किताबों के भी तुर्जमे किए हैं, जो उर्दू में वेशबहा  इजाफे की हैसियत रखते हैं।”12  हिंदू धर्म की कहानियां भी उर्दू के रंग में रंग गई है उसी प्रकार जैसे कव्वाली जो इराकी संगीत के नक़ल थी वह हिंदुस्तान में आकर हिंदुस्तानी रंग में घुल गई हैं।

उपन्यास का मुख्य पात्र रोहन मुस्लिम मोहर्रम की जानकारी इकट्ठा करता है और अपनी उत्पत्ति की खोज भी करता है। जहां उसे पता चलता है कि ब्राह्मणों में सर्वप्रथम हथियार परशुराम ने उठाए थे फिर यह परंपरा द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा के रूप में आगे आती है। अश्वत्थामा पिता के गुरुकुल के छह साथियों को लेकर कश्मीर से काबुल फिर अरेबिया जा बसते है मोहयाल इतिहासकारों का मानना है कि यह छह साथी ही मोहयालों के वंशज बने थे जिन्होंने कर्बला की धरती पर इंसानियत का साथ दिया था और अधर्म के खिलाफ आवाज बुलंद की। इमाम हुसैन का जंगी साथी होने गए हुसैनी ब्राह्मणों को ने हुसैन हिंदुस्तान की अमानत कहा था इसी वार्तालाप में हुसैन कहते है, “आगाह जमीन से मेरे मेरा खुदा, हक की तलब से हिंदू व मुस्लिम में क्या फर्क।”13

 उपन्यास में इस बात की ओर इशारा किया गया है कि पहले धर्म में  सियासत की दखल न के बराबर थी, हक और नैतिक मूल्य सबके लिए एक समान थे, आपस में भाईचारा था, खूनखराबा, युद्ध, बम कुछ न था। इसी बीती हुई शांति की कामना करते हुए प्रकाश नामक पात्र विश्व में हुई अमानवीय घटनाओं के नायकों को कोमल रूप में देखकर कहता है, “वैसा माहौल हम फिर से जी पाते तो यह खून - खराबा न होता। हिटलर मुरली बजा रहा होता और नागासाकी में बंबो की बारिश की जगह गुलाल उड़ाकर नौरोज और होली के गीत गाए जाते हैं और बंदूकों की धाँय धूँ की जगह आसमान आतिशबाजी के तमाशे दिखा लोगों को हँसाता।”14  इस विश्व शांति की कामना उपन्यास का उद्देश्य दिखाई देता है।

उपन्यास का मुख्य उद्देश्य हिंदू - मुस्लिम एकता को मजबूत करना रहा है क्योंकि यह दोनों आपस में जुड़े हुए हैं कितने ही अराजकतावादी ताकतें इन्हें अलग करने की कोशिश करें परंतु यह दोनों मिलकर भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप तैयार करती हैं। भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए इन दोनों संस्कृतियों का आपस में जोड़े रखना जरूरी है जैसा कि महात्मा गांधी के विचारों से भी स्पष्ट होता है, एक भाषण के दौरान वे कहते हैं, “हमारा समान प्रयोजन हो, समान ध्येय हो और समान गम हो। हम एक दूसरे के गमों में साझी हो कर और परस्पर सहिष्णुता की भावना रखकर एक - दूसरे के साथ सहयोग करते हुए अपने सामान्य लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे तो यह हिंदू - मुस्लिम एकता की दिशा में सबसे मजबूत कदम होगा।” 15

भारतीय संस्कृति का मूल आधार गंगा जमुनी तहजीब हैं अगर यह खंडित हुई तो भारतीय संस्कृति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। भारतीय संस्कृति का सुनहरा काल रहा भक्तिकाल और भक्तिकाल के बड़े नायक कबीर माने जाते हैं। कबीर में भी हिंदू - मुस्लिम संस्कृति का समन्वित रूप दिखाई देता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की विशेषता बताते हुए कहा है अगर अल्लाहशब्द मुस्लिम धर्म का प्रतिनिधित्व करता है और रामशब्द हिंदू संस्कृति का, तो वे उन दोनों को सलाम करने को तैयार हैं।”16 

पारिजात उपन्यास यह कहता है कि हम सभी मनुष्य एक ही मिट्टी से बने हुए हैं उसे अलग- अलग धर्म में नहीं बाँटा जाना चाहिए। विश्व में सबसे बड़ा धर्म मानवता का है और इसी का पालन प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए जिससे विश्व में शांति और सद्भाव का विकास हो सके। अंत में उपन्यास के पात्र कामिल खां का यह कथन दृष्टव्य है जिसकी सुगंध पूरे उपन्यास में फैली हुई है, “लुगदी तो मियां वही है, चाहे पतंग उड़ा पेच लड़ाओ या फिर ताजिया बनाकर उसे कंधे पर ढो और दफन करो।”17  कहना गलत न होगा कि देश की साँझा संस्कृति के बिन्दुओं को प्रस्तुत उपन्यास में नासिर शर्मा ने सफलाता पूर्वक उकेरा हैं।


 संदर्भ ग्रन्थ सूची
1.धीरेन्द्र वर्मा : हिंदी साहित्य कोश ( भाग 1) ज्ञानमंडल लिमिटेड वाराणसी, पुनमुद्रित जनवरी, 2015, पृ.712
2. आर.के. प्रभू तथा यू आर राव : महात्मा गांधी के विचार, नेशनल बुक ट्रस्ट     इंडिया, नई दिल्ली,नौवी आवृत्ती 2012, पृ.415
3.वही पृ. 416
4.रामधारी सिंह दिनकर:संस्कृति के चार अध्याय, लोकभारती  प्रकाशन, इलाहाबाद, दूसरा पेपर बैक संस्करण, 2017, पृ. 255
5.नासिरा शर्मा:पारिजात, किताबघर प्रकाशन, तृतीय पेपर बैकसंस्करण, 2017, पृ. 103
6.वही पृ. 264
7..वही पृ. 443
8.वही पृ. 443
9.वही पृ.414
10.वही पृ. 422
11.वही पृ.226
12.वही पृ. 446
13.वही पृ. 236
14.वही पृ. 163
15.आर.के. प्रभू तथा यू आर राव : महात्मा गांधी के विचार, नेशनल बुक ट्रस्ट  इंडिया, नई दिल्ली, नौवी आवृत्ती 2012,  पृ.382
 16.हजारी प्रसाद द्विवेदी : कबीर, राजकमल प्रकाशननई दिल्ली,.उन्नीसवीं आवृत्ति, 2014,पृ.146
17.नासिरा शर्मा : पारिजातकिताबघर प्रकाशन, तृतीय पेपर बैकसंस्करण, 2017, पृ.267


ममता नारायण बलाई
शोधार्थी,मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर

           अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-5, अंक 30(अप्रैल-जून 2019) चित्रांकन वंदना कुमारी 

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