आत्मकथ्य: कक्षा कक्ष में बच्चों से बातचीत है जरूरी/ राम विनय मौर्य - अपनी माटी

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मंगलवार, मार्च 17, 2020

आत्मकथ्य: कक्षा कक्ष में बच्चों से बातचीत है जरूरी/ राम विनय मौर्य

                               कक्षा कक्ष में बच्चों से बातचीत है जरूरी

बच्चों के विकास में बातचीत का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। कक्षा कक्ष में बच्चों से बातचीत करना बहुत जरूरी है। बच्चों के भाषाई कौशलों के विकास के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि कक्षा कक्ष में शिक्षक द्वारा बच्चों से सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण तरीके से बातचीत की जाए। बच्चों को बातचीत करना बहुत ही अच्छा लगता है। बच्चों के पास बातचीत करने के लिए कई विषय मौजूद होते हैं। बच्चों के पास बहुत सारी बातें होती हैं और वह बताने के लिए बहुत ही उत्सुक होते हैं। अब सवाल यह उठता है कि बच्चों के भाषाई कौशल के विकास के लिए यह बातचीत कितनी जरूरी है?

जिस कक्षा में बच्चों को बातचीत करने का जितना ज्यादा अवसर मिलता है,  वे बच्चे भाषाई कौशल की दृष्टि से उतने ही समृद्ध होते हैं। अब यह एक शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह विभिन्न विषयों पर कक्षा कक्ष में बातचीत के लिए कैसे वातावरण का निर्माण कर पाता है ? एवं  बच्चों को अपनी बात कक्षा कक्ष में रखने के लिए प्रेरित कर पाता है। बच्चों के पास लगभग हर विषय पर अपने अनुभव होते हैंअपनी धारणाएं होती हैं और बच्चे हर विषय पर अपनी बात बता पाने के लिए बहुत उत्सुक भी होते हैं। अब जरूरी यह हो जाता है कि शिक्षक उस विषय वस्तु को समझते हुए बच्चों को सही दिशा दे एवं उन्हें अपनी बात कहने के लिए प्रेरित करे।

हम यह कह सकते हैं कि विभिन्न विषयों पर बच्चों से बातचीत की जा सकती है। बच्चों को अपनी बात कहने के अवसर दिए जा सकते हैं। इन सभी प्रक्रियाओं में शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब बच्चों से कक्षा कक्ष में किसी विषय पर बातचीत की जाती है तो वह अन्य विषयों से इसका अंत:संबंध बनाते हुए समग्रता में अपनी बात रख पाते हैं। हिंदी भाषा को पढ़ते हुए बच्चे विभिन्न विधाओं का अध्ययन करते हैं उसमें वह मुख्य रूप से कविता, कहानी, नाटक, संस्मरण और यात्रा वृतांत पढ़ रहे होते हैं। पाठों पर बच्चों से बहुत ही व्यापक रूप में बातचीत की जा सकती है। बच्चे जब किसी कहानी या कविता को पढ़ते हैं तो उसके शीर्षक और चित्रों से उन्हें क्या समझ में आ रहा है इस पर बारी-बारी से प्रत्येक बच्चे की राय जानी जा सकती है। उस पाठ के अलग-अलग और क्या शीर्षक हो सकते हैं इस पर प्रत्येक बच्चे को बारी-बारी से बहुत ही तसल्ली के साथ सुना जा सकता है। उस कविता या कहानी से संबंधित बच्चों के अपने जीवन के अनुभव सुने जा सकते हैं। हर कहानी पर, कविता पर, यात्रा वृतांत पर, संस्मरण पर बच्चों के अपने अनुभव होते हैं। बच्चों के अनुभवों को कक्षा कक्ष में स्थान देने से कक्षा जीवंत हो उठती है। इस प्रक्रिया में बच्चों में सोचने ,कल्पना करने, तर्क करने, अपनी बात को अभिव्यक्त करने जैसे कई कौशलों का विकास हो पाता है । भाषा शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बच्चों में उपरोक्त कौशलों का विकास करना ही है। इसके लिए हम माध्यम कुछ भी ले सकते हैं। किताबें, मुद्दे, घटनाएं, समाचार इसमें से कोई भी माध्यम हो सकता है, जिसके द्वारा हम बच्चों में उपरोक्त कौशलों का निर्माण कर सकते हैं। माध्यम महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण है बच्चों में कौशलों का विकास कर पाना।

 हिंदी भाषा को पढ़ते हुए जिन कौशलों के विकास की अपेक्षा की जाती है उन कौशलों के विकास के लिए बहुत जरूरी है कि कक्षा कक्ष में बच्चों के साथ कुछ सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण गतिविधियों का होना। हिंदी भाषा को पढ़ते हुए बच्चों से यह अपेक्षित है कि वह सोचनेकल्पना करने, तर्क करनेअभिव्यक्ति कर पाने (सुनना, बोलना, लिखना, पढ़ना) जैसे कई कौशलों का विकास कर पाएं। संवेदनशील होना, सहायता की भावना का विकास होना, एक दूसरे की बातों एवं भावनाओं का सम्मान करना, एक दूसरे को सुनना और समझना जैसे कई मूल्यों का विकास बच्चों में अपेक्षित है। बच्चों में इन मूल्यों का विकास तभी हो सकता है जब इसके लिए बच्चों के साथ कक्षा कक्ष में  शिक्षक के द्वारा कुछ गतिविधियां कराई जाएं। बच्चों के साथ बातचीत की गतिविधि इन कौशलों को विकसित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।बच्चे जब भाषा की कक्षा में किसी विषय पर, कविता या कहानी पर अपनी बात रखते हैं तो वह कई सारे कौशल व मूल्यों को भी आत्मसात कर रहे होते हैं। अब इसके लिए जरूरी हो जाता है कि  शिक्षक कक्षा कक्ष में हर बच्चे की भागीदारी सुनिश्चित करें , अगर बच्चा एक विषय पर अपनी बात रखना सीख जाता है तो अन्य  विषयों पर भी  उसे अपनी बात रखने में आसानी हो जाती है।

 कई बार ऐसा होता है कि बच्चों को अपनी बात रखने में आत्मविश्वास नहीं हो पाता है। बच्चों के विकास के लिए उसके आत्मविश्वास का होना बहुत जरूरी है। मैं यहां पर अपने कक्षा कक्ष का एक अनुभव बताना चाहूंगा, एक बार, जब मैं कक्षा चार के बच्चों के साथ हिंदी भाषा पर काम कर रहा था तो मैंने पाया कि एक बच्चा जिसका नाम साहिल था, वह कक्षा में बहुत ही शांत बैठा रहता था, परंतु जब मैं उसे कक्षा कक्ष के बाहर देखता तो वह  और गतिविधियों में बहुत ही सक्रिय रहता था। अपने दोस्तों के साथ खेलना, बातचीत करना, खेल के नियम बताना इन सब में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती थी, जबकि कक्षा कक्ष में उसकी रुचि और जिज्ञासा कम दिखती थी, सवालों के जवाब देने, बातचीत करने में वह बिल्कुल रुचि नहीं लेता था। कक्षा कक्ष के बच्चे उसके बारे में यही कहते कि सर इसे कुछ नहीं आता है।

 मैंने साहिल का आत्मविश्वास बढ़ाया और कहा कौन कहता है कि इसे कुछ नहीं आता है, इसे सब कुछ आता है। हां...  साहिल बताओ इस विषय के बारे में आप क्या जानते हो? इस तरह धीरे  धीरे उससे बातचीत होना  शुरू हुई ।शुरू शुरू में वह हिचकिचाता लेकिन धीरे-धीरे उसका विश्वास बढ़ना शुरू हो गया। वह भी स्पष्ट रूप से अपनी बात रखना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया में उसे 20 से 25 दिन लगे। बातचीत की प्रक्रिया एवं इस तरह की गतिविधि के दौरान ही साहिल का आत्मविश्वास बढ़ सका। यानी बच्चों के विकास के लिए, आत्मविश्वास के लिए कुछ सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण गतिविधियां कक्षा कक्ष में जरूरी होती हैं। कक्षा में यह जरूरी हो जाता है कि बच्चे को विश्वास दिलाया जाए कि वह कर सकता है, वह सीख सकता है।

बच्चों के विकास के लिए आत्मविश्वास का होना बहुत जरूरी है। आत्मविश्वास बच्चों की क्षमताओं को विकसित करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर बच्चों में आत्मविश्वास का कौशल विकसित हो जाए तो यह एक शिक्षक के लिए बहुत ही गर्व की बात है। आत्मविश्वास बच्चों में यूं ही विकसित नहीं होता है, इसके लिए कक्षा कक्ष में कुछ गतिविधियां करनी ही होती हैं जो बच्चों में आत्मविश्वास का कौशल विकसित करती हैं। बातचीत उन्हीं गतिविधियों में से एक है इसलिए हर विषय पर प्रत्येक बच्चे की बात सुनना, उसकी आत्मछवि का सम्मान करना, कक्षा कक्ष के सभी बच्चों को समान रूप से अवसर देना, बहुत जरूरी हो जाता है।

मुझे लगता है कि बच्चों में आत्मविश्वास और भाषाई कौशलों के साथ-साथ मूल्यों के निर्माण में उनसे सार्थक एवं उद्देश्य पूर्ण  बातचीत करनाचर्चा परिचर्चा करना ,कक्षा कक्ष में बहुत ही जरूरी है। हर शिक्षक को अपनी भाषा की कक्षा में, एक स्वस्थ बातचीत , चर्चा परिचर्चा एवं  बहस के लिए  हमेशा ही जगह रखनी चाहिए। यह बच्चे के व्यक्तित्व एवं उसके विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। बच्चों में अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास होना भाषाई कौशल की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है।  बच्चे अगर आत्मविश्वास के साथ अपनी बात कक्षा कक्ष में रख पाते हैं, प्रश्न पूछ पाते हैं, उस विषय के बारे में तार्किक ढंग से सोच पाते हैं, उस  पर बातचीत कर पाते हैं तो इसे भाषाई दृष्टि एवं शिक्षा के उद्देश्य की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण एवं बहुत ही जरूरी समझा जाना चाहिए।

       कक्षा कक्ष का वातावरण सहज एवं सरल होना चाहिए जहां पर बच्चों को अपनी बात रखने में बिल्कुल भी झिझक महसूस ना हो। कक्षा कक्ष का वातावरण ऐसा हो जहां बच्चे बेहिचक अपनी बात रख पा रहे हों, बहस कर पा रहे हों और इसके आधार पर अपने ज्ञान का निर्माण  कर पा रहे हों। कक्षा कक्ष में सभी बच्चों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना बहुत जरूरी है। हर विषय पर बच्चों के अपने मत होते हैं, जरूरी  होता है बच्चों को यह आत्मविश्वास दिलाना कि उनके मत सही हैं और वह गलत सही की चिंता किए बगैर कक्षा कक्ष में अपनी बात रखें। शुरुआती समय में  बच्चों को यह आत्मविश्वास दिलाने में थोड़ा समय लग सकता है परंतु कुछ समय बाद वह आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखना सीख जाते हैं। बच्चों को यह विश्वास दिलाना जरूरी होता है कि वे जो बात कह रहे हैं उसे कक्षा कक्ष में बहुत ध्यान से सुना जाता हैउनकी बातों पर कोई हंसी नहीं बनाता है, उनकी बातों एवं भावनाओं का लोग कक्षा कक्ष में सम्मान करते हैं। ऐसा करने पर कुछ ही समय में कक्षा कक्ष के सभी बच्चे अपनी बात आत्मविश्वास से रख पाते हैं। किसी विषय पर बहस कर पाते हैं। बच्चे व्यवस्थित ढंग से चर्चा परिचर्चा करना, अपनी बात रखना , सीख पाते हैं। अपनी बारी का इंतजार करना, अपनी बारी आने पर ही अपनी बात रखना , दूसरों की बातों को सुनना एवं सम्मान करना बातचीत करते हुए कक्षा कक्ष में बच्चे सीखते हैं। बच्चे कक्षा कक्ष में व्यवस्थित ढंग से किसी विषय पर बारी-बारी से अपनी बात रखें यह बहुत जरूरी है। उस विषय पर सही क्या है? गलत क्या है? कक्षा कक्ष में बच्चों के साथ इस पर चर्चा परिचर्चा करते हुए एक सही बिंदु पर पहुंचा जा सकता है। कक्षा कक्ष में सार्थक ढंग से बातचीत, चर्चा परिचर्चा बच्चों में कई कौशलों को विकसित करती है। कक्षा कक्ष में बातचीत, शिक्षा के उद्देश्य के एक बड़े हिस्से को पूरा करती है, इसलिए भाषा के कक्षा कक्ष में , बच्चों से सार्थक ढंग से बातचीत करना एक शिक्षक के लिए बहुत जरूरी हो जाता है।


राम विनय मौर्य
छात्र अध्यापक, क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान (एन.सी.ई.आर.टी) अजमेर, राजस्थान

              अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) शिक्षा विशेषांक, मार्च-2020, सम्पादन:विजय मीरचंदानी, चित्रांकन:मनीष के. भट्ट            

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