समीक्षा: कासों कहूँ सुने को मोरी : तीसरी दुनिया का दर्द/ डॉ. निरंजन कुमार यादव - अपनी माटी

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सोमवार, जुलाई 06, 2020

समीक्षा: कासों कहूँ सुने को मोरी : तीसरी दुनिया का दर्द/ डॉ. निरंजन कुमार यादव

 'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-32, जुलाई-2020
         कासों कहूँ सुने को मोरी : तीसरी दुनिया का दर्द- डॉ. निरंजन कुमार यादव                                                                          
चित्रांकन: कुसुम पाण्डेय, नैनीताल
साहित्य वह है जिसमें सबकुछ समाहित है। इसे लेकर विद्वानों ने बहुत सारी स्थापनाएं दी है। जैसे 'साहित्य समाज का दर्पण है ',यह संचित ज्ञान राशि का  कोष  है’, ‘यह जनसमूह के हृदय का विकास हैएवं यह आगे चलने वाली मशाल है' इत्यादि। सचमुच में किसी भी समाज को सम्यक रूप से जानने के लिए साहित्य एक महत्वपूर्ण साधन है। हम अन्य विषयों से सिर्फ उस समाज के किसी एक खास चीज को ही जान सकते हैं। जैसे -इतिहास से हम उस समाज का इतिहास जान सकते हैं, भूगोल से वहां की भौगोलिक स्थिति को जान सकते हैं, अर्थशास्त्र से उसकी आर्थिक व्यवस्था को हम जान सकते हैं और इसी प्रकार राजनीति से हम वहां की शासन व्यवस्था एवं राजनीति को जान सकते हैं, लेकिन यदि समाज को उसके समग्र रूप में समझना और जानना है तो उसका सम्यक माध्यम केवल साहित्य हो सकता है। यह सिर्फ समाज की व्यवस्था को ही नहीं अपितु उसके पीछे काम करने वाली मानसिक वृत्ति को भी चित्रित करता है, इसीलिए इसका सरोकार बृहत है।

साहित्य में साहित्यकारों की कसौटी सामाजिक सरोकार की प्रतिबद्धता है। समाज का हर बदलाव चाहे वह अच्छा हो या बुरा  साहित्य में देखा व महसूस किया जा सकता है। इससे समाज का कोई भी पहलू अछूता नहीं रहता,इसीलिए आचार्य रामचंन्द्र शुक्ल ने कहा है कि साहित्य जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब होता है।”1 इन्ही वृत्तियों का परिणाम है- विविध एवं विमर्श साहित्य। विमर्श साहित्य वह है- जहां समाज के दबे कुचले शोषित वर्ग की आवाज प्रति ध्वनित होती है। जिसके माध्यम से हाशिए के समाज की तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट होता है। उनकी दुख एवं पीड़ा को हम महसूस करते हैं। एक प्रतिबद्ध लेखक अपनी लेखनी के माध्यम से इस वर्ग के शोषण का विरोध करता है।उसे अपने अधिकारों के प्रति सचेत करता है तथा समाज में जागरूकता लाने का प्रयास करता है। हमारे समाज में स्त्री, दलित, आदिवासी एवं किसान आदि इसी तरह के वर्ग हैं। जिन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है,परंतु अब इस हाशिए के समाज पर पर्याप्त विचार - विमर्श किया जा रहा। उनके अधिकारों एवं उनकी सुरक्षा पर लगातार बहसें हो रही हैं। अब धीरे - धीरे समाज की सहानुभूति उनसे जुड़ रही है लेकिन इन सबके अलावा भी इन सबके बीच में एक ऐसा वर्ग अभी है जिसे हाशिए के विमर्श में भी स्थान नहीं मिल पाया है। वह वर्ग है- किन्नर समुदाय। 

अब इधर के लेखकों का ध्यान भी उस समुदाय की तरफ जाने लगा है किन्तु वह अब भी एक विमर्श के रूप में उभर कर सामने नहीं आ पाया है। लेखकों की उदासीनता इस वर्ग से अब धीरे-धीरे हट रही है अब यह भी धीरे-धीरे लेखन के केंद्र में आ रहे हैं। इसकी भी शुरुआत अन्य विमर्शों की तरह स्वानुभूती एवं सहानुभूति  दोनों स्तरों पर हुई है। जो स्वागत योग्य है। इधर कुछ बरसों में प्रकाशित इस विमर्श से जुड़े ग्रंथ प्रचुर मात्रा में देखने को मिले हैं। जैसे अनुसूया त्यागी कि- मैं भी औरत हूं’ ,महेंद्र भीष्म की –‘किन्नर कथाएवं मैं पायल’, चित्रा मुद्गल की- पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नालासोपारा’, भगवंत अनमोल की –‘जिंदगी50-50’, नीरज माधव की –‘यमदीप’, प्रदीप सौरभ की –‘तीसरी ताली’, निर्मला भूरिया की- गुलाम मंडी’ , विवेक मिश्र की –‘डामनिक की वापसी’, एवं मनोज चोपड़ा की – ‘प्रति संसार  आदि आश्वस्तिदायक संकेत है। 
 
 मनुष्य सिर्फ उन्हीं से सरोकार रखता है जिससे उसका स्वार्थ सधता है। हमारे जीवन में, हमारे रोजमर्रा के जीवन में न जाने कितने लोग मिलते हैं और बिछड़ते हैं ,लेकिन हमारे पास उनका कोई हिसाब -किताब नहीं होता है ।हम उन्हें बहुत जोर देने पर याद कर पाते हैं ।मनुष्य एक भुलक्कड़ कौम है। यह भुलक्कड होना भी कभी - कभी उसके जीवन के लिए एक अभिशाप एवं वरदान सिद्ध होता हैं।

हर चीज के दो पहलू होते हैं -- एक अच्छा और दूसरा बुरा । हम जिसको देखते हैं हमें वही नजर आता है। हमारी नजर स्वयं में स्वतंत्र नहीं होती। इसके साथ समाज की मान्यताएं, स्थापनाएँ एवं अपने आसपास के लोगों के विचार भी शामिल होते हैं।कभी -कभी यह इतने प्रबल होते हैं कि हम स्वयं के मस्तिष्क को अपाहिज बनाकर उनकी मान्यताओं, स्थापनाओं एवं  फिजूल के विचारों से अपने जीवन को चलाने लगते हैं। इस बात का हमें भान भी नहीं होता कि हमारा मस्तिष्क कुंद पड़ा हुआ है। सिर्फ हम बेचैन रहते हैं ,और जब वक्त निकल जाता है तो सिर्फ पछतावा हमारे हाथ लगता है। कहते हैं कि जीवन और समय एक बार हाथ से निकल गया तो वह दुबारा नहीं आता है,लेकिन सचमुच में जीवन इतना क्रूर नहीं होता है, वह अपनी हर गलती को सुधारने का एक मौका अवश्य देता है। जो सुधार लिया उसका जीवन सार्थक हो जाता है और जो चूक जाता है वह अपनी गलती पर जीवन भर पछताने के लिए अभिशप्त रहता है।ऐसे ही मौके के ताने बाने पर “" जिन्दगी50-50" उपन्यास लिखा गया है।जिसे पढ़कर किन्नर समुदाय के लोगों एवं उनके जीवन के प्रति जानने की मुझे जिज्ञासा बढ़ी।
                             
जिंदगी 50-50 भगवंत अनमोल का एक ऐसा उपन्यास है,जिसमें किन्नर समुदाय की नारकीय एवं  यंत्रणापूर्ण जीवन को पूरी संवेदना के साथ चित्रित  किया गया है। हमारे समाज में जिस प्रकार शूद्र हमेशा प्रताड़ित एवं उपेक्षित रहे हैं ठीक उसी प्रकार से किन्नर समुदाय भी उपेक्षित एवं उपहास के पात्र बने हुए हैं। दलित समुदाय को सामाजिक उपेक्षा और तिरस्कार जरूर मिलता है लेकिन कम से कम पारिवारिक प्रेम एवं सौहार्द का संबल उनके जीवन में बना रहता है, किन्तु किन्नर समुदाय का जीवन इन मामलों में दलितों से भी बदतर है। किन्नर समुदाय समाज के परिहास एवं तिरस्कार को तो झेलता ही झेलता है इसके साथ ही साथ व परिवार में भी घृणित एवं तिरस्कृत होता है। उसकी स्थिति एक पेंडुलम की भांति होती है। जिसका कहीं ठिकाना नहीं होता। ना समाज में ना घर में। वह अपने द्वारा बनाए हुए समाज के अलावा कहीं सम्मान नहीं पाता। न तो हमारे सभ्य समाज में और ना ही अपने परिवार में। यह एक विडंबना ही है कि हम जब भी मानवीय मूल्य एवं संवेदना की बात करते हैं तो उसमें जाति एवं धर्म आड़े आते हैं। हम सदैव एक जाति एवं धर्म निरपेक्ष समाज एवं राष्ट्र की आदर्शवादी कल्पना करते हैं। हम देश एवं समाज की बहुत सारी समस्याओं की जड़ में जाति एवं धर्म को ही पाते हैं। किन्नर समुदाय इनसे बिल्कुल मुक्त है। वह एकमात्र ऐसा समुदाय है जिसे धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है जहां पर किसी जाति या धर्म का कोई महत्व नहीं होता।किन्नर समुदाय अथवा बस्ती में किसी भी जाति या धर्म में पैदा हुए किन्नर व्यक्ति आकर रह सकते हैं और अपना जीवन बसर कर सकते हैं।  

जिंदगी फिफ्टी फिफ्टीउपन्यास में किन्नर के आदर्श एवं यथार्थ दोनों रूपों का एक साथ चित्रण किया गया है । हर्षा के माध्यम से किन्नर जीवन के यथार्थ एवं सूर्या के माध्यम से किन्नर जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। हर्षा उपन्यास नायक का भाई है ।जिसकी भावनाएं, जरूरतें , महत्त्वाकांक्षाएं एक स्त्री की है लेकिन शरीर पुरुष का है। किसी भी इंसान के लिए ऐसी परिस्थिति बेहद दर्दनाक होती है ।जिसमें जिंदगी जिंदगी नहीं, समझौता बनकर रह जाती है। ऐसा इंसान अपना दुख किससे कहें और कहे भी तो कौन सुनेगा ? ऐसे इंसान और उसके घरवालों को हर मुकाम पर समाज के दुर्व्यवहार, उपहास एवं जिल्लत का सामना करना पड़ता है ।उपन्यास का प्रमुख पात्र अनमोल इस बात को अच्छी तरह समझता है, क्योंकि उसका छोटा भाई हर्षा और उसकी एकमात्र संतान सूर्या दोनों किन्नर हैं ।भाई को पल-पल घुटते एवं घर और बाहर से लगातार प्रताड़ित और अपमानित होते हुए देख अनमोल यह निश्चित करता है कि वह अपने बेटे को हर तरह से सक्षम बनाएगा । इसलिए आदर्श परक रूख अपनाते हुए उसने अपने बेटे सूर्या को जीवन में पूरी तरह छूट दी। उसे एक प्राइवेट डिटेक्टिव बनाकर भरपूर जिंदगी जीने के काबिल बनाया। उसने अपने भाई हर्षा पर हुए अन्याय की छाया कभी सूर्या पर नहीं पड़ने दी।
               
सचमुच में सामान्य सी लगने वाली बात ,जिसकी कभी मैंने नोटिस नहीं ली थी आज वह मेरे अंतर्मन को इतने भीतर तक कुरेद देगी ,कभी सोचा ही नहीं था ।"थर्ड जेण्डर "(जिसको आम चलन भाषा में छक्का, हिजड़ा, नपुंशक ,गे आदि नामों से पुकारा जाता है )से किसकी मुलाकात नहीं होगी!लेकिन कभी किसी ने उनके जीवन एवं तकलीफों को जानने की जहमत उठाई हो ? वह हमेशा मनोरंजन और भीखमंगे के तौर पर देखे व समझे जाते हैं। इस बात से कोई इंनकार नहीं कर सकता कि हमारी इस बड़ी दुनिया के वह भी एक हिस्सा हैं।समाज में अपनी सम्मान जनक भागीदारी तो बहुत दूर की बात है यह आज भी संवेदना से ज्यादा तिरस्कार एवं उपहास के पात्र बनते हैं। यह सर्वथा उपेक्षित, तिरस्कृत एवं उपहास के विषय समझे जाते हैं ।ऐसे में इनकी पीड़ा कौन समझने वाला है ।यह अपना दुःख दर्द कहें तो किससे कहें ? जो वाकई इनकी पीडा को समझे।
                        
सामान्य मनुष्य हमेशा उनसे कतराते रहते हैं।समाज में किन्नर सहज स्वीकार्य नहीं हैं।यह सच्चाई है; इसको झूठलाया नहीं जा सकता कि यह समाज  से एक तरह से वहिष्कृत समुदाय है।इनकी अपनी दुनिया है ,अपने लोग हैं ,अपना समाज हैं।जो इस दिखावाटी एवं मतलबी दुनिया से ज्यादा संवेदनशील हैं।वहाँ सचमुच का भाईचारा है ।एक दूसरे का ख्याल  है ।एक दूसरे के लिए कुर्बान होने का जज्बा है ।एक दूसरे के रक्षार्थ उनका पूरा गैंग(संगठन)काम करता है ।इस संदर्भ मे हर्षा और कस्तूरी के संवाद को देखा जा सकता है-"सुख है।यहाँ हमारा गैंग है,किसी के मजाल नहीं है कौनो कुछ कह जाये।...अगर तुम्हें कबहु लागे,वहां तुम चैन से नहीं जी पा रहे हो तो हम तुम्हारी बहनें ही हैं।यह घर हमेशा तुम्हारे लिए खुला है।हम तुम्हें वैसे ही रखेंगे जैसे ये सब लोग रहती हैं।"2
                                    
समाज में उनकी सम्मानजनक स्थिति ना होने के कारण है ।उन्होंने अपना एक अलग समाज बना लिया है जो इस समाज से कहीं ज्यादा उनको प्रीतकर एवं सुखद लगता है ।जहां वे खुलकर जीते हैं ।यह उनकी जरूरत और विवशता दोनों ही होती है , क्योंकि हमारा तथाकथित सभ्य समाज उन्हें समझने की कभी कोशिश ही नहीं करता उन्हें जिस संवेदना की जरूरत होती है, जिस अपनेपन की जरूरत होती है ,उसे समाज कभी नहीं दे पाता ।वह हमेशा इस सभ्य समाज में घुटते और पिसते  रहते हैं ,इसीलिए वह एक दिन इस तथाकथित सभ्य समाज से मुक्त हो जाते हैं और अपनी जिंदगी जीना शुरू कर देते हैं ।"जिंदगी फिफ्टी फिफ्टी " उपन्यास में भगवंत अनमोल ने उस दर्द को बखूबी चित्रित किया है जो प्रत्येक किन्नर के हृदय में बसा हुआ है ।वह यह जीवन जीने के लिए अभिशप्त है ।वह  इस जीवन का चुनाव खुशी -खुशी नहीं करता अपितु वह मजबूर है ।उसके अंदर समाज छोड़ने की पीड़ा है, दर्द है लेकिन एक खुशी भी है की वह रोज-रोज के तानों  उपहासों एवं सामाजिक बहिष्कारों  से मुक्त हो जाता है ।हर्षा खुशी -खुशी अपने पिता का घर नहीं छोड़ता वह मजबूर हो गया अपने समाज से ,अपने परिवार से और उस परिवार में जो उसकी स्थिति है उन सब से। वह मुक्त होना चाहता था और इस मुक्ति का एकमात्र जरिया इस तथाकथित सभ्य समाज को छोड़ने में ही था ।वह समझ चुका था कि उसे प्यार करना तो दूर उसे कोई समझने का भी प्रयास नहीं करता है ।वह अब यह समझ चुका है कि इस तथाकथित सभ्य समाज को छोड़कर ही वह अपने मन के अनुसार हर्षा से हर्षिता बन सकता है और अपने अनुसार जी सकता है इसीलिए वह इस पुरुषवादी , वर्चस्वशाली समाज को लात मारकर उन्हें मुंह चिढाता हुआ अलग होने का निर्णय ले लेता है। सचमुच में जो समाज हमारी परवाह नहीं करता हम उसकी परवाह कब तक करेंगे ?हर्षा से बनी हर्षिता की पीड़ा को जानकर किसकी संवेदना उससे नहीं जुड़ जाती हैं " इतने वर्षों में मैं यह समझ गई थी कि यह समाज मुझे प्यार तो छोड़ो मुझे समझने की भी कोशिश नहीं कर सकता। आखिर मेरी गलती क्या है ?मेरा एक अंग अविकसित है। बस इतनी सी !शायद इस तथाकथित समाज में सारा फसाद सिर्फ इसी अंग को लेकर होता है ।लड़ाई -झगड़ा ,प्रेम ,मारपीट सब इसी अंग के कारण तो होती है ।मेरे शरीर का हर अंग आहत था चोट थी ,मेरा शरीर टूट रहा था, हाथ पैर से लेकर गुदा तक। मैं बिलख रही थी। मेरे आंखों के सामने अपने भविष्य का अंधकार मंडरा रहा था। मैं ऐसी कठपुतली बन गई थी ,स्कूल से लेकर घर ,बाहर हर कोई मेरा मजाक उड़ाता ।गाहे बगाहे मुझे हिजड़ा कहने से नहीं चूकता। खेलने कूदने यहां तक कि लिखते पढ़ते वक्त मुझ जैसों के लिए एक अलग ही कॉलम होता है। पुरुष ,महिला या अन्य ।हर वक्त मुझे यह एहसास दिलाया जाता है कि मैं हर किसी से अलग हूं। रही सही कसर अगर बच जाती तो बाबूजी अपनी भड़ास निकाल कर पूरी कर लेते ।जब मैं इतनी ही अलग हूं तो इस सभ्य समाज ने मुझ जैसे अलग व्यक्ति को जन्म क्यों दिया ?आखिर इनकी ही गलती  का परिणाम हूं मैं !अपनी गलती मुझ पर क्यों थोपते हैं ।...अब मुझे समझ आ रहा था की कस्तूरी जैसे लोग समाज से बाहर अपने समुदाय में क्यों रहते हैं। मैंने भी ठान लिया कब तक इस समाज में मर मर के जीती रहूंगी ।भले ही अलग रहूं लेकिन पल-पल मरते हुए जीना मुझे मंजूर नहीं"3

सचमुच में कभी भी हमारा ध्यान इस तरफ जाता ही नहीं कि यह लोग रहते कहां है ?कहां से आते हैं? और कहां चले जाते हैं? सचमुच में बिना परिवार का जीवन कितना दर्द भरा होता है यह वही व्यक्ति जान सकता है जिसका अपना कोई परिवार ना हो ।इससे भी ज्यादा विकट एवं दुखदाई स्थिति वह होती है जब परिवार रहते हुए भी परिवार का प्यार आपको ना मिले ।वहां सिर्फ आपको तिरस्कार मिले और हद तो तब है जब आपको परिवार से निष्कासित कर दिया जाए एक तरफ से आपको कुल - खानदान के लिए अशुभ एवं कलंक मानकर निष्कासित कर  दिया जाए। किन्नर समुदाय इस दंश को न जाने कितने सदियों से झेल रहा है ।समाज तो उन्हें दुत्कारता ही दुत्कारता   है उससे पहले उनका अपना परिवार उन्हें दुत्कार चुका होता है। आदमी पूरे समाज से जब लड़ता है तो परिवार उसके साथ रहता है और वह इस उम्मीद से अपने जीवन में हर लोहा लेता है किस का परिवार उसके साथ है परिवार का भरोसा परिवार का प्यार परिवार का सहयोग आदमी को हर असंभव कार्य को संभव बनाने के लिए पर्याप्त होता है। इस मामले में भारत देश की जितनी तारीफ की जाए कम है कि यहाँ के समाज में परिवार की अवधारणा बहुत मजबूत है। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि अब यह परिवार सिर्फ बेटा बेटी तक है सीमित है। तृतीय लिंग के लिए उसमें कहीं  कोई जगह नहीं हैं। शायद यही वजह है कि इनका एक अलग समुदाय है जो सचमुच में हम सबसे अलग ,यह उनके प्रतिशोध का प्रतिफल है लेकिन धीरे-धीरे यह स्वरूप  समाज में व्याप्त हो गया है ।इस संदर्भ में मुझे कुंवर बेचैन साहब की वो पंक्तियाँ याद आ रही है जो हर मनुष्य के लिए एक संबल प्रदान करती हैं कि-

                                          पूरी धरा साथ दें और बात है ,
                                          तू जरा साथ दे तो और बात है ।
                                          चलने को तो एक पाव से भी चल लेते हैं लोग,
                                          दूसरा साथ दें और बात है ।।

हर्षा उर्फ हर्षिता पूरे समाज से लड़ सकते थे और शायद वह सूर्या की भाँति अपने को स्थापित भी कर सकते थे लेकिन सबसे पहले उसके परिवार ने उसको तिरस्कृत किया, वह सबसे ज्यादा आहत अपने परिवार से हुई। अपने पिता से हुई। समाज में जो भी छेड़छाड़ की घटनाएं उसके साथ होती थी उसका सारा का सारा दोष हर्षिता पर ही मढ दिया जाता था। जबकि वह बेबस और लाचार थी। जहां पर परिवार के सहयोग और संवेदना की जरूरत होती है वहां पर उसे उपेक्षित और तिरस्कृत किया गया।उसे दंडित किया गया। ऐसे में उसका जीवन धीरे धीरे नारकीय होता चला गया। कोई भी परिवार अगर अपने बच्चे को समय नहीं देता ,उसको समझने की कोशिश नहीं करता ,उसके मनोभावों  को समझने की कोशिश नहीं करता तो वह बच्चा धीरे धीरे चिड़चिड़ा हो जाता है। वह पहले खुद से फिर परिवार से और एक न एक दिन समाज से बगावत कर बैठता  है ।ठीक यही स्थिति किन्नर समाज की भी है उनको यही लगता है कि यह समाज यह परिवार उनको नहीं समझता तो इस समाज के तौर-तरीकों से अलग अपने तौर-तरीकों का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं ।कभी कभी तो आपको उनका व्यवहार जातीय  एवं  अति लगेगा लेकिन यह जातीयता एवं अति भी उनका एक प्रतिशोध है। वह आपसे पहले खुशी खुशी पैसे मांगते हैं और जब आप नहीं देते हैं तो आप से वह जातीयता भी करते हैं  लेकिन इसका एक मुकम्मल कारण  है वह भी हमारी तरह जीना चाहते हैं ,वह भी हमारी तरह रहना चाहते हैं,  लेकिन हम उन्हें अपने जैसा मानते ही नहीं इसीलिए वह हमसे भी सौतेला व्यवहार करते हैं वह अपने जीवन के लिए हमें ही दोषी मानते हैं और जिसको हम दोषी मानते हैं उसके साथ हम कैसा व्यवहार करते हैं यह सर्वविदित है ।उस तुलना में वह हमसे ज्यादा सह़िष्णु एवं संवेदनशील हैं ।हर्षा उर्फ हर्षिता जब लोगों से पैसे मांगती है तो उसे इस बात की पीड़ा हमेशा रहती है कि उसकी जो यह दुर्दशा है इस सभ्य समाज के चलते ही है। उसकी बातों से इस बात की पीड़ा एवं पश्चाताप महसूस होता है "कोई कहता है हम बहुत गलत करते हैं आखिर तुमने अपने समाज से हमें निकाला है तो खाने का इंतजाम तुम ही करोगे ना ।इसमें बताइए हम क्या गलत करते हैं ?अच्छा खासा पढ़ रही थी । पढ लिखकर नौकरी करती ।अब निकाल दिया अपने समाज से तो हमें खाने के लिए तो देना पड़ेगा ना। हम मुफ्त में थोड़ी ना कुछ लेते हैं आपको दुआएं भी देते हैं"4

 सचमुच में "जिंदगी फिफ्टी फिफ्टी "को पढ़ते हुए वह बहुत सारे दृश्य सामने प्रकट हो गए जब लोगों को मैंने बहाने बनाते हुए, उनसे मुंह छुपाते हुए, उनसे बचते हुए प्रत्यक्ष देखा है कि वह लोगों से पैसे ना मांग ले ।सचमुच में जो समाज उन्हें पढ़ने एवं आजीविका के लिए काम न करने की आजादी ना देता हो तो ऐसे में यह समुदाय करें भी तो क्या करें ?सभ्य समाज की आड़ में छिपे हुए दरिंदे उन्हें रौदने के लिए हमेशा आतुर रहते हैं ।उन पर अपनी वासना भरी निगाहें गड़ाए रहते हैं।हर्षा उर्फ हर्सिता इसकी शिकार बचपन में ही हो जाती है ,लेकिन वह अपने पिता  की इज्जत बचाने के लिए इस दंश को झेलती है ।किन्तु क्रूर पिता अपनी संतान की उस पीड़ा को न समझ कर अपनी इज्जत पर बट्टा लगा समझ कर उल्टे उसकी निर्ममता पूर्वक पिटाई करना शुरू कर देता है ।हर्षिता को जहां संवेदना मिलनी चाहिए वहां तिरस्कार मिलती है ,मार पड़ती है ।ऐसे में घर -परिवार और समाज को न  छोड़े तो क्या करें? बहुत पहले मैंने एक पाकिस्तानी फिल्म "बोल "देखी थी ।जिसमें तीन बहनों के बीच में एक किन्नर बच्चा पैदा होता है। बहने बहुत लाड प्यार के साथ उसकी परवरिश करती हैं ।लेकिन उसकी भी दुर्दशा हर्षा जैसी ही होती है ।वह भी पिता द्वारा लगातार प्रताड़ित होता रहता है। पीटता रहता है ,लेकिन बहनों के प्यार से वह लगातार ऊर्जा प्राप्त करता रहता है ।धीरे धीरे वह समाज के सामान्य लोगों की तरह घर से बाहर निकलता है और कुछ काम सीखना शुरू करता है ,लेकिन समाज में बैठे भेड़िए अपनी वासना की भूख उस बच्चे से मिटाते में नहीं चूकते हैं ।अंततः वह बच्चा जीवन संग्राम में हार जाता है ।क्या 21वीं सदी में भी हम इतने सभ्य नहीं हो पाए की अपने से  भिन्न लोगों को अपने साथ रखकर अपने जैसा व्यवहार कर पाए। पशुओं का अपना एक खास समुदाय होता है ।एक झूण्ड होता है। उनकी एक खास जाति होती है और वह अपने समुदाय और  जाति से अलग नहीं रह सकते। वह जैसे ही दूसरे समुदाय और जाति  को देखते हैं  तो गुर्रा ने लगते हैं। मनुष्य तो पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है फिर ऐसा क्यों करता है ? किन्नर भी तो मनुष्य जाति का ही एक हिस्सा है। यह अपने को तथाकथित सभ्य समाज मानने वाले लोगों ने एक तरफ दिखावे के लिए बड़ी बड़ी बातें ,बहुत सारे आदर्श ,बहुत सारे नियम ,बहुत सारे कायदे कानून ,धर्म, प्रवचन इत्यादि का जखीरा खड़ा कर दिए हैं वहीं दूसरी तरफ इतने घृणित कर्म करता है कि दूसरे  को सुनकर ही शर्म आ जाए। बड़े -बड़े बंगलों एवं महँगी- महँगी गाड़ियों में चलने वालों की सच्चाई हर्षिता अपने डायरी के माध्यम से हम सबके सामने प्रस्तुत करती है। आर्थिक रूप से जो जितना सम्पन्न होता है वह नैतिक और चारित्रिक रूप से उतना ही दरिद्र हुआ करता है। सेक्स वर्कर बनना या धंधा करना किसी को अच्छा नहीं लगता। कोई इसे शौकिया नहीं करता। चाहे वह स्त्री हो या किन्नर।

किन्नरों के शारीरिक एवं मानसिक स्थिति विरोधी होते हैं।पुरुष शरीर में स्त्री मन होता हैं ।उनकी चाल एवं बोली भाषा के पिछे एक मनोवैज्ञानिक कारण होता है। स्त्री मन के चलते ही उन्हें सजना सवरना एवं स्त्री परिधान पहनना अच्छा लगता है।जिसको हम जाने बिना ही उन पर हंसते रहते हैं ।दरअसल सच में हम अपनी अज्ञानता पर हंसते हैं।वह इसी को हमारे समक्ष मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत करते हैं।यह उनकी एक कला है।जिसके सहारे वह अपना जीवन यापन चलाया करते हैं।

 सचमुच में इनके साथ सदियों से कितना अन्याय हुआ है। यह उस जूर्म की सजा भूगत रहे हैं जो इन्होंने किया ही नहीं ।हासिए के समाज के लोगो की जब भी चर्चा परिचर्चा होती है उसमें दलित ,स्त्री, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक की तो खूब बात होती है लेकिन थर्ड जेण्डर की कोई सूध तक नहीं लेता। सचमुच में अगर कोई असल हासिए पर है तो यह किन्नर समुदाय ही है।दलित ,स्त्री ,आदिवासी आदि की समस्याएँ कुछ अलग तरह की हैं। इनकी समस्या कुछ अलग तरह की है।वह समाज के हिस्से रहे हैं सिर्फ उन्हें वह अधिकार नहीं मिला था जिसके वह हकदार हैं।किन्तु किन्नरों को तो अभी समाज के साथ रहने के लिए संघर्ष करना है।बराबरी ,अधिकार एवं हिस्सेदारी तो बहुत दूर की चीज है।लोग इनसे दिन के उजाले में बात करने में अपनी इज्जत या तौहीनी समझते है लेकिन रात के अँधेरे में अपनी शान समझते हैं।ऐसा सौतेला व्यवहार सहकर भी यह घूम घूम कर लोगो को दुआएं देते रहते हैं। किन्नर विमर्श को साहित्य के केन्द्र मे लाऩे के लिए कुछ कथाकारो ने पहल किया है।कुछ पत्रिकाओं ने विशेषांक भी निकाला पर अभी वह धार नहीं बन पायी है जो दलित और स्त्री विमर्श की बन गई है।यह मामला रूचि का भी है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि अभी भी हमारा मन सहज रूप से इन्हें स्वीकार्य नहीं कर पाता है।
         
     "जिन्दगी 50-50 " उपन्यास ने एक नई उम्मीद जगाया है।जो किन्नर समुदाय को समझने में काफी मदद करता है।हमे उनके प्रति संवेदनशील बनने की अपील करता हैं।उनकी भावनाएँ,उनकी जरूरत, पारिवारिक स्थिति,समाज का प्रभाव ,संघर्ष और संभावनाएँ सब एक साथ इस उपन्यास में कड़ी दर कड़ी जुडते गए हैं।सचमुच में कितना कठिन है भावनाएँ , जरूरतें, महत्वाकांक्षाएं ये सब एक स्त्री की लेकिन शरीर पुरुष का।एक बेहद दर्दनाक परिस्थिति जिसमें जिंदगी ,जिंदगी नहीं समझौता बनकर रह जाती है। वह अपना दर्द किससे कहें और उनके दर्द को सच में सुनेगा कौन?ऐसे इंसान और उसके घरवाले को हर मकाम पर समाज के दुर्व्यवहार और जिल्लत का सामना करना पड़ता है।कथा नायक अनमोल इस बात को समझता है।इस बात को पूरे समाज को समझने की जरूरत है।अनमोल की एक मात्र संतान सूर्या एवं छोटा भाई हर्षा दोनों किन्नर हैं।अपने छोटे भाई हर्षा को पल पल पिसते ,घर और बाहर प्रताड़ित और अपमानित होते हुए देख अनमोल यह दृढ़ निश्चय करता है कि वह अपने बेटे को अधूरी नहीं बल्कि पूरी जिंदगी जीने के लिए हर तरह से सक्षम बनायेगा,और अंतत:वह ऐसा कर दिखाता है।किसी भी समाज में परिवर्तन की शुरुआत एक व्यक्ति से एक परिवार से होती है।किन्नर समुदाय के जीवन एवं स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है।यह बदलाव भगवंत अनमोल द्वारा अपने अपने उपन्यास जिंदगी 50-50” में बताए गए रास्ते से ही बेहतर हो सकता है।
संदर्भ:
1-शुक्ल,रामचंद्र, हिंन्दी साहित्य का इतिहास ,(2009), प्रकाशन संस्थान , नई दिल्ली,पृष्ठ-05
2-अनमोल,भगवंत,"जिंदगी5050",(2008),राजपाल एण्ड संस प्रकाशन ,नई दिल्ली,पृष्ठ-139
3-वही,पृष्ठ—162
4-वही,पृष्ठ-164
डॉ. निरंजन कुमार यादव
राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय ,गाजीपुर। उत्तर प्रदेश 233001
सम्पर्क 8726374017 

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