कविता: अमित कुमार चौबे - अपनी माटी

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सोमवार, जुलाई 06, 2020

कविता: अमित कुमार चौबे

         'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-32, जुलाई-2020

 

अमित कुमार चौबे की कविताएं

 

चित्रांकन: कुसुम पाण्डेय, नैनीताल


वतन


किसी ने कहा हम एक वतन के बाशिन्दे हैं,

मग़र कहाँ? धर्म और जाति में बँटे फासिन्दे हैं,

उड़ानों से देखो तो सब एक वतन के हैं,

हक़ीक़त में देखो तो सब अपने जतन में हैं।

देश, समाज,नैतिकता, बंधुत्व सब छलावे से हैं,

रोज़गार, रोटी, पंचवर्षीय योजना के भुलावे से हैं।

इंडिया से भारत तक की दूरी बहुत है,

भूख और पैरों के छालों में, मजबूरी बहुत है।

 

 

यादें

 

कविता लिखने

जब भी बैठता हूँ

उसकी यादें

अपनी तरफ़ खींच लेती हैं

कसकर बोसा देती हैं

और फिर अनगिनत भावनाओं का दरिया

फूट पड़ता है

हृदय में तरंगें उठने लगती हैं

और कहती हैं

फ़िर तुम कब आओगे??

 


हवा का रुख

 

रात का अंतिम पहर

मैं अपने कमरे में हूँ,

सोचकर...सहम गया हूँ,

बाहर के मंजर को,

मेरी आत्मा दहल उठी है।

बाहर तेज हवा का झोंका है,

जो सब कुछ अपने वेग से लील जाना चाहती है।

मैं निःसंदेह सुन रहा हूँ

इनके चीखने की आवाज

और दूसरी ओर शतरंज के कुछ पैदल सिपाही

भटक रहें किसी महफ़ूज जगह की तलाश में

अपनी उजाले की उम्मीदों की गठरी सर पर उठाये,

उनकी रूह सुकून को पाना चाहती है,

वह अपने घर जाना चाहते हैं

मग़र हवा का रुख कातिलाना है,

प्रकृति का यह रूप विकराल

हर बार कहर बन के झोपड़ियों पर बरपा है

हर बार मजलूमों को बेबस किया है

मन में कौतूहल है,

कमरे की खिड़कियां लड़ रही हैं हवा से,

हवा उन्हें तोड़ना चाहती है

मग़र सम्पूर्ण वेग से वह अड़िग हैं

अपनी अपार जिजीविषा के साथ

उस टकराहट के साथ

दो-दो हाथ करने के लिए

वह आज भी तैयार है...

 

 

अमित कुमार चौबे

शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा

सम्पर्क 6263808894, amit93678@gmail.com

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