समीक्षा: गिलिगडु उपन्यास में चित्रित वृद्ध जीवन की त्रासदी/ पार्वतीबाई चौगुले - अपनी माटी

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सोमवार, जुलाई 06, 2020

समीक्षा: गिलिगडु उपन्यास में चित्रित वृद्ध जीवन की त्रासदी/ पार्वतीबाई चौगुले

          'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-32, जुलाई-2020

   गिलिगडु उपन्यास में चित्रित वृद्ध जीवन की त्रासदी- पार्वतीबाई चौगुले
चित्रांकन: कुसुम पाण्डेय, नैनीताल
भारतीय संस्कृति में सम्बन्धों का बड़ा महत्व रहा है यह संस्कृति धर्म एवं अध्यात्म परक होने के साथ-साथ हमें संस्कारित भी करती है। परिवार इसी संस्कृति और संस्कारों का निर्वाह करते है। भारतीय संस्कृति सामूहिकता की संस्कृति रही है। त्याग, प्रेम, सदाचार आदि इसके विधायक तत्व रहे हैं। जिन्हें भारतीय मनुष्य अपने जीवन में पूरी तन्मयता के साथ निभाता रहा है। परिवार में बच्चे-आनंद, स्त्रियाँ - प्रेम और वृद्ध - शांति की अनुभूति कराते थे। निरंतर आधुनिक होते जा रहे समाज में उपर्युक्त मूल्य गौण हो गए और सुख, सुविधाएं, अर्थ, भौतिकता आदि प्रमुख हो गए है। ऐसे में सम्बन्धों के लिए जगह नहीं बची। हमने सम्बन्धों का निर्वाह तब तक किया जब तक संबंध हमारे लिए लाभदायक थे। अनुपयोगी होने के बाद हमने उन्हें ढोना जरूरी नहीं समझा।

गिलिगडु उपन्यास चित्रा मुद्गल द्वारा लिखा गया है। इस उपन्यास में उन्होंने वृद्धों की समस्याओं को बहुत ही मार्मिकता के साथ चित्रित किया है। लेखिका ने अपने उपन्यास में तेरह दिनों के वृद्धों के जीवन को केन्द्र में रखा है। जिसे उन्होंने गैर मौजूदगी का नाम दिया है। यह उपन्यास हमारे तथाकथित सभ्य जीवन की पोल खोलता है जो बुजुर्गों की समस्या की जड़ में है। सुखी परिवार उसे कहा जाता था जहाँ परिवार के बुजुर्गों को आदर, सम्मान एवं सुख देने के साथ-साथ उन्हें खुश रखना भी उनके संतानों का परम कर्तव्य था। लेकिन वर्तमान समय में इसका अभाव सर्वत्र अनुभव किया जा सकता है। डॉ॰ अर्चना मिश्रा का कथन है गिलिगडु उपन्यास में चित्रा जी ने वृद्धों की बेचारगी संवेदनशीलता और जीवन शैली को विस्तार दिया है। पुस्तक के फ्लैप पर लिखी इबारत भी इस उपन्यास की आधारभूमि की ओर संकेत किया गया है। गिलिगडुचित्रा जी का आकार में छोटा परंतु संवेदनशीलता में कहीं गहरा उपन्यास है। इस उपन्यास में सेवानिवृत्त बुजुर्ग की एक रेखीय कहानी नहीं, जीवन के रंग बहुआयामी रूपों में उभर कर आये है।”1

उपन्यास में जो वृद्ध दिखाई देते हैं उसे ही या उनकी समस्याओं को ही चित्रा मुद्गल जी ने पाठक के सामने नहीं रखा अपितु उपन्यास के दो नायक बाबू जशवंत सिंह और कर्नल स्वामी के बहाने चित्रा मुद्गल जी ने देश के वृद्धों के प्रश्नों को उठाया है। उन कारणों की तलाश की है जो उनकी दयनीय दशा के कारण हैं। भूमंडलीकरण, पश्चिम सभ्यता का अंधानुकरण, टूटते परिवार, भौतिकता के प्रति बढ़ता प्रभाव और त्याग एवं प्रेम का अभाव जैसे कुछ कारण है जो मनुष्य को मनुष्यता की सीमा से बाहर कर देते है। इस प्रक्रिया में कमजोर लोग पिसते हैं जिनमें बाल, वृद्ध, स्त्री और दलित लोग प्रमुख हैं। अन्य वर्ग तो शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के कारण विरोध भी करते हैं,किन्तु वृद्ध शारीरिक रूप से अक्षम होने के कारण विरोध में बोल भी नहीं पाते, और उसी परिस्थिति में जीने के लिए विवश हो जाते है।

आज के परिवेश में यदि हम वृद्धों की समस्या को देखे तो ज्ञात होता है कि उनकी समस्याओं के लिए जिम्मेदार उनके अपने परिवार वाले ही होते हैं। परिवार द्वारा मिलनेवाला दुख, उनके द्वारा की जाने वाली उपेक्षा, एकांकीपन और उनकी अपनी शारीरीक दुर्बलता के चलते वृद्ध धीरे-धीरे हाशिये पर चला जाता है। आधुनिक शैली ने आज के मनुष्य को स्वार्थ केन्द्रित बनाया है जहाँ उसे अब किसी की जरूरत नहीं रहीं। भूमंडलीकरण ने मूल्यों की दीवार में सेत लगाई है। फलतः मूल्य खंडित हुये है। आज सम्बन्धों का निर्वाह करने के लिए युवा पीढ़ी तैयार नहीं है। उनकी आधुनिक जीवन शैली में अथवा फेशन परिस्थिति में जिस ओर से बाधा उत्पन्न होती है उसे वे बड़ी बेदर्दी के साथ निकाल बाहर करते हैं। चाहे वह उसका पिता ही क्यूँ न हो।

यह कहानी केवल दो वृद्धों की कहानी नहीं है बल्कि व्यापक स्तर पर यह वैश्विक भी है। यह उपन्यास तेरह दिन की कहानी में प्रातः कालीन भ्रमण के दौरान मित्र बने दो बुजुर्गों के जीवन को ही प्रस्तुत नहीं करता बल्कि आज के जीवन मूल्यों को भी परिभाषित करता है कि किस प्रकार सूचना क्रांति के दौर में तथाकथित समझदार युवा पीढ़ि अपनी बुजुर्गों को सम्मान न देते हुये उन्हें अकेला जीने के लिए छोड़ देती है। इस युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व जशवंत सिंह का बेटा नरेंद्र करता है। इस पीढ़ि को वृद्ध की संपत्ति तो चाहिए होती है किन्तु उसके सेवा के लिए उसके पास कोई जगह नहीं होती है। जशवंत सिंह को कानपुर से बेटे और बहू के द्वारा दिल्ली बुला दिया जाता है। वहा पर वे कदम-कदम पर खुद को अपमानित महसूस करते है। बात-बात पर उन्हें टोका जाता है। रहने के लिए भी बालकनी को रूम में तब्दील किया जाता है जो कही न कहीं वृद्धों को हाशिये की ओर धकेलने का भी प्रतीक है।अपने बेटे की अपने प्रति उपेक्षा को देखकर ही जशवंत सिंह विवश होकर नरेंद्र से पूछते हैं, “तुम कभी बूढ़े नहीं होगे नरेंद्र?”2 इतना ही नहीं उन्हें वृद्धाश्रम आनंद निकेतनमें भेजने की योजना भी बनाई जाती है। अपनी स्थिति को देखकर वह सोचते भी है इस घर में एक नहीं दो कुत्ते हैं एक टॉमी, दूसरा अवकाश प्राप्त सिविल इंजीनियर जसवंत सिंह! टॉमी की स्थिति निसंदेह उनकी बनिसबत मजबूत है।”3

जबकि दूसरे वृद्ध कर्नल स्वामी की स्थिति और भी भयावह है जिसे चित्रा मुद्गलजी ने बड़ी कुशलता के साथ उपन्यास के अंत में प्रकट किया है।कर्नल स्वामी एक ऐसा व्यक्तित्व है जो परिवार द्वारा अकेले रहने के लिए विवश कर दिया है। लेकिन वह अकेलेपन में प्रसन्न रहने की कोशिश करता है। जशवंत सिंह से मिलने के बाद वह उनके समक्ष स्वयं को बहुत सुखी और आनंदित प्रस्तुत करता है। जबकि असल स्थितियाँ कुछ और ही होती है। उनका परिवार बेटे-बहू अलग रहते है, और वे अकेले कई दिनों तक प्रातःकालीन भ्रमण पर न आने के बाद जशवंत सिंह उनके घर पहुँचते हैं तब जिन स्थितियों से उनका सामना होता है जिससे उनके पैरो तले की जमीन खिसक जाती है। कर्नल स्वामी की पड़ोसी मिसेज श्रीवास्तव जशवंत सिंह को कर्नल की स्थिति से अवगत कराती है और कहती है- ऐसी कसाई औलादों से आदमी निपूता भला। हमें इस बात का कोई गम नहीं कि हमारी कोई अपनी औलाद नहीं....”4

कर्नल स्वामी अपने घर में अकेले ही रह रहे थे किन्तु अब उनकी मृत्यु हो चुकी थी। बाबू जशवंत सिंह को जिस बहू बेटों और पोतियों की बात बताते थे वह सब काल्पनिक था। जशवंत सिंह उपहार के रूप में जो कुछ लेके गए थे वह पड़ोसी को देकर लौट आते है। चित्रा मुद्गल इस कहानी को बड़ी संजीदगी के साथ पेश करती है। रचना इस विश्वास को और भी गहरा करती है कि साहित्यिक मूल्यों में सामाजिक सार्थकता का महत्व निरंतर बना रहेगा।

गिलिगड़ु उपन्यास में चित्रा मुद्गल ने पात्रों के माध्यम से सामाजिक मूल्यों के क्षरण को बड़ी कुशलता के साथ रूपांतरित करती है। तेरह दिनों की मित्रता में जशवंत सिंह और कर्नल स्वामी की जो स्थिति प्रकट होती है वह वस्तुतः मूल्यों के क्षरण का परिणाम है। संयुक्त परिवार भारतीय संस्कृति का प्रमुख वैशिष्ट रहा है जहाँ सम्बन्धों को महत्व दिया जाता था। किन्तु आज न तो संबंध की जरूरत रही न ही मूल्यों की। इस उपन्यास में चित्रा जी ने यह भी दिखाने की कोशिश की है कि जड़ों से कटने पर व्यक्ति का जड़ों के प्रति कितना लगाव होता है। जशवंत सिंह कानपुर से सबकुछ छोड़कर बेटे नरेंद्र के पास दिल्ली आते है किन्तु अपनापन कहीं न कहीं कानपुर में ही छूट जाता है। बेटे और बहू के साथ वे अपनेपन को महसूस नहीं कर पाते। कदम-कदम पर वे स्वयं को अपमानित महसूस करते है। बेटा और बेटी दोनों ही जशवंत सिंह की जमीन, जायदाद, बैंक बलान्स को लेकर लालायित है।जशवंत सिंह की बेटी उनसे कहती है,“लॉकर में अभी है तो बहुत कुछ बाबूजी! अम्मा के अपने कई सेट ,पाच तोले के आजीवाली नाथ, चांदी का ढेरों सामान। अम्मा हमेशा कहती रही- अपनी पचलड़ और कुन्दन का सेट वे अन्वीता को देंगी और विक्रम की बहू के लिए....”5 अपनी बेटी से यह बाते सुनकर गहरा आघात पहुँचता है और उनके हाथों से फोन का रिसीवर छूट जाता है।

वह अपने एकांत को दूर करने कानपुर से दिल्ली आए थे ताकि वे अपने बेटे, बहू और पोतों के साथ खुश रह सके। लेकिन उनका एकांत दूर नहीं होता। जशवंत सिंह की बहू नी भी अपने बच्चों को आत्मकेंद्रित बना दिया है, “बुद्धि विकास आड़ में बड़ी खूबसूरती से बच्चों को संवेदनाच्युत किया जा रहा इतना कि बच्चे कभी परिवार में न लौट सके, न कभी अपना कोई परिवार गढ़ सकें।”6

जशवंत सिंह जब कर्नल स्वामी कि स्थिति से रूबरू होते है तब परिवार के प्रति उनका रहा सहा मोह भी भंग हो जाता है। यही कारण है कि उनका प्रेम बेटा बहू और बेटी कि अपेक्षा कानपुर के घर में रहने वाली नौकरनी सुनगुनियाँ और उसके बच्चों के प्रति अधिक उमड़ता है। इतना ही नहीं अपने शव को मुखाग्नि देने की ज़िम्मेदारी भी उसे ही सौंपते है। वस्तुतः इस उपन्यास में मूल्यों के टूटन से उपजी भयावहता का बेबाग चित्रण किया है। जहाँ न आपसी प्रेम है और न ही लगाव है।

आज मनुष्यता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। उपभोक्तावाद, भूमंडलीकरण के चलते मनुष्य सिर्फ अपनी तरक्की, सुख-सुविधा से भरा जीवन व्यतीत करना चाहता है लेकिन इसी होड के चलते वह अपनों को ही भूल जाता है। इसका उत्तम उदाहरण हमे इस उपन्यास में नरेंद्र के माध्यम देखने को मिलता है। आज देश में वृद्धाश्रम कुकुरमुत्ते की भाँति बढ़ रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी के लिए अपने ही माता- पिता को संभालना उनके लिए बोझ के समान हो गया हैं। चित्रा जी ने इसे अपने उपन्यास में बखूबी दर्शाया है और युवा पीढ़ी को वर्तमान स्थिति से साक्षात्कार कराना भी उनका उद्देश्य रहा है।

संदर्भ सूची
1)‘चित्रा मुद्गल के कथा साहित्य में युग चिंतन’- डॉ॰ अर्चना मिश्रा, पृ॰ 36
2) ‘गिलिगडु’ - चित्रा मुद्गल,सामयिक प्रकाशन, 2007,पृ॰ 80
3)वहीं, पृ॰ 96
4) वहीं, पृ॰ 138
5) वहीं,  पृ॰ 95
6) वहीं, पृ॰ 34

पार्वतीबाई चौगुले
स्नातकोत्तर छात्रा, कला एवं विज्ञान महाविद्यालय ,गोवा

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