आलेख : रेहन पर रग्घू : एक अध्ययन / संध्या वर्मा - अपनी माटी

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आलेख : रेहन पर रग्घू : एक अध्ययन / संध्या वर्मा

        अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-34, अक्टूबर-दिसम्बर 2020, चित्रांकन : Dr. Sonam Sikarwar

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

                          आलेख : रेहन पर रग्घू : एक अध्ययन / संध्या वर्मा          

काशीनाथ सिंह कृत ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास नव धनाढ्य वर्ग की कथा को केंद्र में रख कर लिखा गया है। उपन्यास के नायक रग्घू का जीवन इन बदली हुई परिस्थितियों में किस तरह बनता बिगड़ता है यह उपन्यास इस कथा को पूरे विस्तार के साथ प्रस्तुत करता है। उपन्यास के शीर्षक ‘रेहन पर रग्घू’ में ‘रेहन’ शब्द ही उपन्यास की कथा वस्तु का काफी कुछ आभास दे देता है। ‘रेहन’ अर्थात ‘गिरवी’ शब्द स्वयं में ग्रामीण या देशज शब्द है जो यह संकेत देता है कि उपन्यास में ग्रामीण परिवेश भी[1] है हालाँकि उपन्यास सिर्फ ग्राम कथा नहीं है यह अमेरिका तक फैली हुई एक मनुष्य के अपने घर समाज से निर्वासित होते जाने की कथा है। गाँव और समाज में रहकर गाँव और समाज के न रहने की कथा है।  ‘रेहन’ शब्द भूमि को गिरवी रखने के सन्दर्भ में प्रयोग किया जाता है। उपन्यास में रेहन पर उपन्यास का नायक रग्घू है। जिस तरह से गिरवी रखे गए खेत अपने मूल मालिक के नहीं रह जाते उसी तरह उपन्यास का नायक भी अपने गाँव और समाज का होकर भी उनका नहीं रह जाता। इस तरह यह उपन्यास अपने शीर्षक के साथ पूर्णतः न्याय करता है।

              यह उपन्यास 21वीं सदी के बदलते दौर की कहानी है। इस कथा में गाँव से सटा शहर है जहाँ पर गाँव के नवधनाढ्य वर्ग की पहुँच हो चुकी है। बच्चो की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधायें एवं अन्य जन सुविधाओं की दृष्टि से शहरी जीवन ने इस समुदाय को आकर्षित किया है। उपन्यास के नायक रग्घूनाथ की अगली पीढ़ी यानी उनकी संतानों की महत्वकांक्षाओं, पूँजी आकर्षण, उत्तरोत्तर क्षय होती संवेदनशीलता ने उन्हें अकेला और दयनीय बना दिया है। रग्घूनाथ के विडंबनात्मक जीवन के लिए  सिर्फ उनकी संताने जिम्मेदार नहीं हैं हमारी सामाजिक व्यवस्था भी जिम्मेदार है। रग्घूनाथ की पुत्री सरला  अपने पिता से इसलिए अलग होती है क्योंकि वे उसके दलित व्यक्ति से अंतर्जातीय विवाह के खिलाफ होते हैं और उन्हें यह डर होता है कि उनका मजदूर गनपत जो उनके खेतों में हल चलाता है वह उनका संबंधी हो जायेगा और उनके बराबर बैठेगा। सरला जिस लड़के से प्रेम करती है वह अच्छे पद पर कार्यरत एक सज्जन व्यक्ति है परन्तु उसकी जाति उच्च जाति के रग्घूनाथ और उनके समाज को मंज़ूर नहीं है। सरला द्वारा एस.डी.एम. सुदेश भारती से विवाह करने की बात पर रग्घू नाथ बड़बड़ाते हैं ‘‘यही न होता आरक्षण तो यही भारती किसी न किसी का हल जोत रहा होता या पढ़ने लिखने के बावजूद नगर में रिक्शा खींच रहा होता!’’[i]भारतीय समाज अपनी शैक्षणिक, आर्थिक, तकनीकी स्तर पर काफी प्रगति कर रहा है किन्तु सामाजिक संबंधों के स्तर पर उस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाया है जिसमें जातियों का आपसी भेद खत्म हो गया हो।

         भूमंडलीकरण के युग में जब सारा विश्व एक ‘ग्लोबल विलेज’ बन चुका है ऐसे समय में विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सालाना के पैकेज ने नई पीढ़ी  को काफी आकर्षित किया है। रघूनाथ का बड़ा बेटा संजय, प्रोफ़ेसर सक्सेना की बेटी सोनल से विवाह करने और अमेरिका जाने में अपना भला देखता है जबकि उसके अध्यापक पिता का हित उनके कॉलेज के मैनेजर और विधयाक की बेटी से विवाह करने में है। पिता-पुत्र के हितों के टकराव में पिता का जीवन बिखर जाता है वे बिना किसी गलती के समाज में गुनहगार का जीवन जीने को विवश होते हैं। छोटा बेटा धनंजय अपनी अकर्मण्यता और लालची प्रवृत्ति के वशीभूत होकर माता-पिता को कष्ट देता है। यहाँ पर हित टकराव का कारण क्या है ? यह कारण पिता-पुत्र के अलग-अलग व्यवसायों से जुड़ा हुआ हो सकता है। पहले जब पिता का  व्यवसाय पुत्र संभालता था, पुत्र अपने पिता से पुश्तैनी कार्यकुशलता के गुण सीखता था सीखने-सिखाने के क्रम और व्यवसाय और आमदनी का एक जरिया दोनों के संबंधों को और भी मजबूत कर देता था। बदलते समय में जब पिता और पुत्र के व्यवसाय अलग-अलग हो चुके हैं तब ऐसी परिस्थितियां ज्यादा सामने आयी हैं।

          रग्घूनाथ का टकराव सिर्फ अपने बच्चों से नहीं है अपितु ठाकुरान की नई बेरोजगार पीढ़ी से भी है। रग्घूनाथ और उच्च जाति की नई बेरोजगार पीढ़ी का यह वैचारिक संघर्ष आरक्षण को लेकर है। मंडल आयोग जिसने सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण की सिफारिश की थी उन प्रावधानों का समर्थन करने वाले अगड़े अध्यापकों में रग्घूनाथ हैं। नई पीढ़ी के लड़के आरक्षण को उनकी सफलता में बाधक मानते हैं। उनका कहना है आरक्षण की वजह से ही उन्हें नौकरी नहीं मिल पा  रही है जबकि रग्घूनाथ जानते हैं  कि कोटा या आरक्षण एक कवच है जिसके सहारे वे अपनी अकर्मण्यता छिपाते हैं। चमटोल के हलवाहे जब हड़ताल की धमकी देते हैं तब रघुनाथ ठाकुरान के होकर भी उनका समर्थन करते हैं यही बात सभी को खलती है। और जब लोगों को मौका मिलता है सभी रग्घूनाथ को अलग-थलग कर देते हैं। रग्घूनाथ का समाज से निर्वासन अलग-अलग कारणों से होता है। बेटों और बेटी द्वारा पिता का निर्वासन उस अगड़े ठाकुरान समाज को एक अवसर दे देता है जो रग्घूनाथ की दलितों के प्रति प्रतिबद्धता और परायों में अपनों को ढूंढने की प्रवृत्ति से परेशान है।

          समाज में मूल्यों का क्षरण जिस तीव्रता के साथ हुआ है उसे नरेश द्वारा रग्घूनाथ को पीटने और गाँव-समाज के मूक दर्शक बने रहने में देखा जा सकता है। धनंजय जिस विधवा के साथ रहता है उसके साथ जरुरत का रिश्ता बताता है। समाज में बनते जरुरत के रिश्ते मूल्यों में क्षरण होते जाने का ही परिणाम हैं। बदलते हुए जीवन मूल्यों को अमेरिका के समाज की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है जहाँ डॉलर को छोड़कर किसी और से प्रेम करना पिछड़ापन और गंवारपन है। अमेरिका में बसने की योजना बना रहा संजय अपनी पत्नी सोनल से कहता है- ‘‘मैं तो डियर, परदेस को ही अपना देस बनाने की सोच रहा हूँ। तुम क्यों नहीं ढूँढ लेती एक ब्यायफ्रेंड।’’[ii] ये शब्द मजाक में नहीं कहें गए हैं ये संजय द्वारा रईस एन.आर.आई., इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट कंपनी के मालिक की इकलौती बेटी आरती गुर्जर से विवाह की पृष्ठभूमि में कहे गए हैं। पारंपरिक भारतीय समाज में विवाह संस्था के सामाजिक-पारिवारिक महत्त्व के विपरीत संजय के प्रवासी समाज में महत्वाकांक्षाओं और लालच की पूर्ति का माध्यम भर है। मूल्यों का यह विघटन दोहरे स्तर पर संबंधों को प्रभावित करता है एक, रग्घूनाथ और उनकी पत्नी को दूसरे, सोनल और उसके पिता को। संपत्ति का लालच और राय साहब के बेटे का शारीरिक रूप से असमर्थ होना राय साहब की हत्या का कारण बनता है यह जीवन मूल्यों के क्षरण की अन्य कहानी कहता है। बदलते हुए समय में पिता और पुत्र के कृतज्ञता को लेकर अलग-अलग विचार हैं। पिता का कहना है कोई तुम्हारे लिए कुछ भी करता है उसे भूलो मत याद रखो और समय आने पर उसकी सहायता करो। पुत्र संजय के विचार इस तरह हैं –‘‘पापा, इसका तो मतलब हुआ कि तुम जहाँ हो, वहीं खड़े रह जाओ! बार-बार पलट कर देखोगे तो आगे कब बढ़ोगे ? आप कृतज्ञ होने के लिए कह रहे हैं कि पैरों में बेड़ी पहनने के लिए!...’’[iii]

              दलित समाज में किस तरह से उत्तरोत्तर परिवर्तन आए हैं ठाकुर समाज के छब्बू पहलवान की  हत्या में देखा जा सकता है। प्रेमचंद युग की कहानियों में उच्च जाति के पुरुष और दलित स्त्री के बीच अवैध संबंधों को दिखाया गया था परन्तु दलित समाज द्वारा उच्च जाति के किसी व्यक्ति की हत्या नहीं दिखाई गई थी। उपन्यास में ठाकुर पहलवान की हत्या में दलित समुदाय का शामिल होना उनके संगठित और मजबूत होते जाने की कहानी कहता है। दलित समुदाय को ठाकुर द्वारा दलित झूरी की पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाना पूरे दलित समुदाय का अपमान लगता है। यह अपमान का भाव ही दलितों में आती चेतना और आत्मसम्मान की देन है।  छब्बू पहलवान की हत्या के सन्दर्भ में उपन्यासकार ने लिखा है – ‘‘जो कुछ हुआ था, ‘अचानक’ और ‘संयोगवश’ नहीं हुआ था। इसके पीछे महीनों से चल रही तैयारी थी! इस तैयारी में अकेले पहाड़पुर की चमटोल नहीं, आस-पास के बीस-पच्चीस गाँवों की चमटोलें शामिल थीं। कतल से पहले और बाद खर्चे ही खर्चे हैं – थाने के सी.ओ. को चाहिए, वकील को हर तारीख पर चाहिए, गवाहों  को चाहिए – ढेर सारे खर्चे। यह कहाँ से करेगा झूरी ? सो, सभी चमटोलों के हलवाहों ने चंदे जुटाए थे! दूसरे, उन्हें इंतजार था अपनी जाति के किसी पुलिस अधिकारी का जो धानापुर थाना संभाले और आ गए थे दो महीने पहले भगेलू यानी बी.राम। साथ ही अक्टूबर में चुनाव था विधानसभा का और कोई ऐसी पार्टी नहीं जिसे अनुसूचित जातियों के वोट की दरकार न हो! तीसरे, चमटोलें जानती थीं कि छब्बू के मसले पर ठाकुर बिरादरी बंट जाएगी, कभी एक न होगी!।[iv]’’ दलितों में आर्थिक चेतना भी है जो पुराने ज़माने से से चली आ रही हल जोतने की मजदूरी को समयानुसार बढ़ाने की बात करते हैं और ऐसा न होने पर हड़ताल का सहारा लेते लेते हैं। हड़ताल का सहारा लेना उनकी लोकतान्त्रिक और राजनीतिक चेतना का परिचायक है। इस प्रकार दलित जीवन का यह समसामयिक पक्ष बदलती हुई बयार की कहानी कहता है।

       उपन्यास में ग्रामीण जीवन का अन्य पहलू भी सामने आता है। ग्रामीण समाज में जहाँ एक या दो जाति विशेष के लोग धन-बल में शक्तिशाली हुआ करते थे अब समय बदलने के साथ अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शक्तिशाली हुए हैं इस क्रम में गाँव में शक्ति के केंद्र कई जातियों और समुदायों में विभाजित हो गए हैं। उपन्यास में दलित जाति के लोग छब्बू पहलवान की हत्या होने के बाद साधन संपन्न अहिराने से अपना व्यवहार करने लगते हैं। कृषि के परम्परागत साधनों में होते बदलाव ने जातिगत समीकरणों को बदल दिया है साथ ही कृषि को व्यवसाय का माध्यम बना दिया है। साधन सम्पन्न लोगों द्वारा कृषि पेट के लिए नहीं व्यावसायिक आमदनी का जरिया बन गई है।

          किसान जीवन से संबंधित उपन्यासों में ज्यादातर समस्या कर्ज की होती है। ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास चूँकि ग्रामीण जीवन के साथ-साथ शहरी जीवन और विदेशी भूमि तक फैला हुआ है अतः कई अन्य पहलू भी उपन्यास में उपस्थित हैं। बहुस्तरीय सच्चाईयां, ग्रामीण जीवन का शहरी जीवन में संक्रमण इत्यादि चीज़े उपन्यास को व्यापक बनाती हैं, उसे बहुआयामी बनाती हैं। आज के समय में किसानी को घाटे का सौदा माना जाता है साथ ही खेती के साथ किसी अन्य लघु या सूक्ष्म उद्योग को अपनाने की बात की जाती है जिससे किसानों की आमदनी में वृद्धि हो सके। रग्घूनाथ के किसानी जीवन में न तो कर्ज की समस्या है न ही खेती में लागत और आमदनी के असंतुलन की क्योंकि वह एक किसान होने के साथ ही अध्यापक भी है। रग्घूनाथ के अध्यापक होने के बावजूद उन्हें अपने खेतों और ज़मीन से गोदान के होरी की तरह ही लगाव है। बेटों द्वारा ज़मीन को बेचे जाने की सलाह रग्घूनाथ को बेचैन कर देती है। जिन बेटों से वे कभी बात नहीं करते हैं पुरखों की जमीन के दूसरों के हाथों में जाने का डर उन्हें अपने कृतघ्न बेटों से बात करने को प्रेरित करता है। जमीन की खातिर ही नरेश की मार खाने और मैनेजर से प्रार्थना करने को विवश होते हैं अर्थात अपनी पूरी क्षमता में एक पारंपरिक किसान की तरह अपनी जमीन जायदाद को बचाने की कोशिश करते हैं।

         उपन्यासकार ने नायक रग्घूनाथ को उनकी कमजोरियों के साथ भी चित्रित किया है। जब संजय की ससुराल से सक्सेना पाँच लाख रूपए भेजते हैं तब रघुनाथ रात में उसे गिनने जाते हैं। वे उन पैसों को तुरंत नहीं लौटाते –‘‘रग्घूनाथ ने ब्रीफकेस खोला तो भाव विभोर! बेटे संजय के प्रति सारी नाराजगी जाती रही! रुपयों की इतनी गड्डियां एक साथ एक ब्रीफकेस में अपनी आँखों के सामने पहली बार देख रहे थे और यह कोई फिल्म नहीं, वास्तविकता थी।’’[v]

         सरला, सोनल, मीनू तिवारी, बेला पटेल, विजया आज के समय की आधुनिक स्त्रियाँ हैं। पढ़ी-लिखी आर्थिक रूप से सक्षम। इनका सक्षम होना इनको स्त्री जीवन की विडम्बना से बचा नहीं पाता। सरला माता–पिता की अनुमति के अभाव में जीवन भर अविवाहित रहने का निश्चय करती है। सोनल बिना किसी कारण के संजय द्वारा त्याग दी जाती है। इस प्रकार दोनों का सशक्त होना उन्हें इस जीवन से लड़ने की शक्ति तो देता है किन्तु जीवन की विद्रूप परिस्थितियों से बचा नहीं पाता।

         ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास रग्घूनाथ की व्यवस्थित चल रहे जीवन से शुरू होता है और अंत अपना अपहरण खुद करने की विडम्बनात्मक स्थिति से। जीवन की बदली हुई परिस्थितियां उन्हें अपने समाज और पारिवार से निर्वासित कर देती हैं जिनके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। संवेदनहीनता की कथा कहता यह उपन्यास महत्वाकांक्षा और लालच में विभेद कर नई पीढ़ी के इस निर्मम सच को सामने लता है जिसमें महत्वाकांक्षा के नाम पर उपभोक्तावादी संस्कृति को पोश रहे होते हैं। उपन्यास आरक्षण जैसे मुद्दे को सामने लाता है और आरक्षण की आलोचना करने वालों की अकर्मण्यता को सामने रखकर उपन्यासकार समाज में उसकी जरुरत को रेखांकित करता है। उपन्यासकार ने कथा वस्तु की रोचकता को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण सवालों को इस उपन्यास में उठाया है जिसकी वजह से यह उपन्यास आज के समय में प्रासंगिक बन पड़ा है। विजेत्री विक्रम सिंह ने अपने लेख ‘रेहन, रग्घू और हम’ में पाठक को संबोधित करते हुए लिखा है—‘‘रेहन पर रग्घू एक पुकार है उन सहृदय मनुष्यों की जो अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं। रग्घूनाथ आज भी रेहन पर हैं, इस उम्मीद में कि काश कोई छुड़ा ले। रेहन पर रखी उन्हीं चीजों को छुड़ाया जाता है, जो आपके लिए महत्वपूर्ण होती हैं। देखना है कि रग्घूनाथ आपके लिए महत्वपूर्ण है या नहीं ? निर्णय आपका नियति आपकी।’’[vi] इस प्रकार यह उपन्यास पाठक समुदाय को निरूत्तरित एवं गंभीर प्रश्नों के साथ छोड़ जाता है जिसके जवाब समाज की उत्तरोत्तर बदलती हुई जटिल संरचना को समझने के पश्चात् ही प्राप्त किये जा सकते हैं।

 

सन्दर्भ ग्रंथ

1.  अग्रवाल रोहिणी, समकालीन कथा साहित्य सरहदें और सरोकार, आधार प्रकाशन, पंचकूला हरियाणा, प्रथम संस्करण 2007

2. सिंह पुष्पपाल, 21वीं शती का हिंदी उपन्यास, राधाकृष्ण प्रकाशन, दूसरा संस्करण 2016

3. सिंह पुष्पपाल, भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2012  

4. सिंह ओम प्रकाश (सं), शीतांशु (सं), उपन्यास का वर्तमान, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2018


1.       रेहन पर रग्घू, पृष्ठ संख्या 54

2.रेहन पर रग्घू, पृष्ठ संख्या 110

3. रेहन पर रग्घू, पृष्ठ संख्या 133

4. रेहन पर रग्घू, पृष्ठ संख्या 76

5. रेहन पर रग्घू, पृष्ठ संख्या 26

6. रेहन, रग्घू और हम, विजेत्री विक्रम सिंह, सम्मलेन पत्रिका, जुलाई-सितम्बर 2016

संध्या वर्मा, पीएच डी अंतिम वर्ष, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्द्यालय, नई दिल्ली 110067

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