कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल - अपनी माटी

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कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

        अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-34, अक्टूबर-दिसम्बर 2020, चित्रांकन : Dr. Sonam Sikarwar

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल



१.

उठो वत्स!


भोर से ही

जिंदगी का बोझ ढोना

किसान होने की पहला शर्त है


धान उगा

प्राण उगा

मुस्कान उगी

पहचान उगी


और उग रही

उम्मीद की किरण

सुबह सुबह

हमारे छोटे हो रहे

खेत से....!


२.

गाँव से शहर के गोदाम में गेहूँ? //


गरीबों के पक्ष में बोलने वाला गेहूँ

एक दिन गोदाम से कहा

ऐसा क्यों होता है

कि अक्सर अकेले में अनाज

सम्पन्न से पूछता है

जो तुम खा रहे हो

क्या तुम्हें पता है

कि वह किस जमीन का उपज है

उसमें किसके श्रम की स्वाद है

इतनी ख़ुशबू कहाँ से आई?

तुम हो कि

ठूँसे जा रहे हो रोटी

निःशब्द!


३.

मुसहरिन माँ //


धूप में सूप से

धूल फटकारती मुसहरिन माँ को देखते

महसूस किया है भूख की भयानक पीड़ा

और सूँघा मूसकइल मिट्टी में गेहूँ की गंध

जिसमें जिंदगी का स्वाद है


चूहा बड़ी मशक्कत से चुराया है

(जिसे चुराने के चक्कर में अनेक चूहों को खाना पड़ा जहर)

अपने और अपनों के लिए


आह! न उसका गेह रहा न गेहूँ

अब उसके भूख का क्या होगा?

उस माँ का आँसू पूछ रहा है स्वात्मा से

यह मैंने क्या किया?


मैं कितना निष्ठुर हूँ

दूसरे के भूखे बच्चों का अन्न खा रही हूँ

और खिला रही हूँ अपने चारों बच्चियों को


सर पर सूर्य खड़ा है

सामने कंकाल पड़ा है

उन चूहों का

जो विष युक्त स्वाद चखे हैं

बिल के बाहर

अपने बच्चों से पहले


आज मेरी बारी है साहब!



४.

चिहुँकती चिट्ठी ||


बर्फ़ का कोहरिया साड़ी

ठंड का देह ढंक

लहरा रही है लहरों-सी

स्मृतियों के डार पर


हिमालय की हवा

नदी में चलती नाव का घाव

सहलाती हुई

होंठ चूमती है चुपचाप

क्षितिज

वासना के वैश्विक वृक्ष पर

वसंत का वस्त्र

हटाता हुआ देखता है

बात बात में

चेतन से निकलती है

चेतना की भाप

पत्तियाँ गिरती हैं नीचे

रूह काँपने लगती है


खड़खड़ाहट खत रचती है

सूर्योदयी सरसराहट के नाम

समुद्री तट पर


एक सफेद चिड़िया उड़ान भरी है

संसद की ओर

गिद्ध-चील ऊपर ही

छिनना चाहते हैं

खून का खत


मंत्री बाज का कहना है

गरुड़ का आदेश आकाश में

विष्णु का आदेश है


आकाशीय प्रजा सह रही है

शिकारी पक्षियों का अत्याचार

चिड़िया का गला काट दिया राजा

रक्त के छींटे गिर रहे हैं

रेगिस्तानी धरा पर

अन्य खुश हैं

विष्णु के आदेश सुन कर


मौसम कोई भी हो

कमजोर....

सदैव कराहते हैं

कर्ज के चोट से


इससे मुक्ति का एक ही उपाय है

अपने एक वोट से

बदल दो लोकतंत्र का राजा

शिक्षित शिक्षा से

शर्मनाक व्यवस्था


पर वास्तव में

आकाशीय सत्ता तानाशाही सत्ता है

इसमें वोट और नोट का संबंध धरती-सा नहीं है

चिट्ठी चिहुँक रही है

चहचहाहट के स्वर में सुबह सुबह

मैं क्या करूँ?



५.

ठहराव //


जिंदगी के सफर में

संवेदना को है

अपने पंथ की पहचान


मुसाफिर ठहरो

चौराहा है

पूछ लो सम्भावना से सही दिशा

ले लो थोड़ा ज्ञान


पता तो पता है


चुप्पी और चीख की चिंता है

संवेदनशील सुनो!

चलते चलते चिंतन करो


काँटें बिछे हैं

पैर धीरे धीरे धरो

कछुए के धैर्य-सा


हर यात्रा में होना चाहिए-

ठहराव।


गोलेन्द्र पटेल
जन्म स्थान : ग्राम-खजूरगाँव , पोस्ट-साहुपुरी , जिला-चंदौली , उत्तर प्रदेश , भारत , 221009,शिक्षा : काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक अंतिम वर्ष का छात्र(हिंदी आनर्स),मो.नं. : 8429249326,ईमेल : corojivi@gmail.com

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