आलेख : 'अपने अपने राम' उपन्यास में अभिव्यक्त समकालीन संदर्भ / अनिरुध्द कुमार यादव - अपनी माटी

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आलेख : 'अपने अपने राम' उपन्यास में अभिव्यक्त समकालीन संदर्भ / अनिरुध्द कुमार यादव

        अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-34, अक्टूबर-दिसम्बर 2020, चित्रांकन : Dr. Sonam Sikarwar

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

आलेख : 'अपने अपने राम' उपन्यास में अभिव्यक्त समकालीन संदर्भ / अनिरुध्द कुमार यादव


भगवान सिंह का उपन्यास 'अपने अपने राम' मिथकीय पात्रों पर आधारित एक समसामयिक उपन्यास है। जिसके केंद्र में राम हैं। यह कथा उस समय से प्रारंभ होती है जब राम लंका विजय के पश्चात अयोध्या आ गए हैं और महाराज के रूप में सिंहासन ग्रहण कर चुके हैं। प्रजा में सीता को लेकर एक शंका और उद्देग व्याप्त है। राम के सामने सीता की अग्नि परीक्षा का प्रश्न था। सीता की अग्नि परीक्षा के उपरांत भी प्रजा में व्याप्त असंतोष कम नहीं हो रहा जिसे लेकर राम बहुत चिंतित हैं और इस समस्या के समाधान के लिए गुरू विश्वामित्र को याद किया है। विश्वामित्र इस समस्या के समाधान के रूप में सीता का निर्वासन बताया है। लोक के दबाव और मर्यादा की रक्षा के लिए राम को न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ता है। सीता वाल्मीकि आश्रम में पहुँचकर माता मंगला को अपनी और राम की बीती जिंदगी के बारे में बताती है जिससे कथा फ़्लैशबैक में चलती है। यहीं से मुख्यरूप से कथा प्रारम्भ होती है। हालांकि उपन्यास के कथा का कैनवास बहुत विस्तृत है फ़िर भी मुख्य कथा का निर्वाह बामुश्किल उपन्यासकार द्वारा किया गया है। यह कथा भगवान सिंह की कल्पना और वैचारिकता पर अधिक टिका हुआ है। भगवान सिंह के राम कोई अवतारी पुरूष, मर्यादा पुरूषोत्तम राम नहीं हैं जो क्षत्रिय धर्म से चालित हो बल्कि वे एक आधुनिक मानव का प्रतिनिधित्व करते हैं जो हर विषय पर तर्क-वितर्क और वैज्ञानिक ढंग से विचार करता है। राम की जो कथा लोक में प्रचलित है भगवान सिंह ने उसको आधार अवश्य बनाया है लेकिन अपनी कल्पना से एक नया गल्प भी सृजित किया है। इसलिए ही नाम 'अपने अपने राम' दिया गया है। जैसे दशरथ के राम अलग थे कौसल्या के राम अलग थे शबरी के राम अलग थे सीता के राम अलग थे हनुमान के राम अलग थे वैसे ही भगवान सिंह के राम भी अलग ही हैं।

 

उपन्यास की कथा में लोगों को विश्वास हो इसके इसके लिए चरित्रों का नाम लोकप्रिय राम कथा के आधार पर ही किया गया है। वहाँ पर आपको विश्वामित्र, वशिष्ठ, अहल्या, मंगला,सीता, लक्ष्मण, वाल्मीकि, कौशल्या, कैकेयी, भरत आदि सभी चरित्र उपस्थित मिलेंगे लेकिन ये सब कोई अलग रूप लिए हुए हैं। राम का जो किरदार गढ़ा गया है उसको पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि वह खुद उपन्यासकार की जुबान बोलता है। राम और विश्वामित्र बात कर रहें हैं वाल्मीकि का प्रसंग चल रहा है जिसमें बात सामाजिक व्यवस्था पर आती है। राम कहते हैं" मेरा अपना विचार तो यह है गुरुदेव कि अपने को सभ्य कहने वाला हमारा समाज जितना रुग्ण, अनैतिक और मानवीय गुणों से शून्य है, उतना तो कोई नरभक्षी गण भी न होगा।"आप सहज समझ सकते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम जो वर्णव्यवस्था को बनाए रखने वाले क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले हैं वे यह कथन भला कैसे बोल सकते हैं। इसी तरह लेखक अलग अलग समय में अलग अलग चरित्रों से अपनी बात बलात कहलाता नज़र आता है। जैसे विश्वामित्र महाराज राम से कहते हैं-"अपने निर्वासन काल में महाराज ने यह देख ही लिया होगा कि जिन राक्षसों की क्रूरता की कहानियां नागर जन अतिरंजना के साथ सुनाया करते हैं वे राक्षस नहीं, अपने वनवासी कोल-किरात आदि ही हैं।" यह कथन आजके आदिवासी विमर्श की देन भले ही हो लेकिन उस समय ये कथन गुरू विश्वामित्र कह सकते हैं क्या? क्या विश्वामित्र उस समय परिवेश में ऐसी बात करेंगे? इस उपन्यास में ऐसे प्रसंगों की भरमार है जिस पर विश्वास कर पाना मुश्किल है इसका कारण लेखक का वैचारिक हस्तक्षेप है। भगवान सिंह ने जो कथा गढ़ी है वह समाज के किसी वर्ग में प्रचलित नहीं है। कथा को अपने वैचारिक मानस के अनुरूप सर्वथा नए रूप में गढ़ा गया है। ये गढ़ना सही है या गलत ये नहीं कहा जा सकता क्योंकि पहले की कथाएँ भी कल्पना पर ही गढ़ी गई होंगी। ए. के. रामानुजन ने 'थ्री हंड्रेड रामयनाज' में यह बात स्पष्ट ही कर दी है कि राम कथा के बहुप्रचलित रूप समाज में व्याप्त हैं। उत्तर भारत की कथा और दक्षिण भारत की कथा में बहुत अन्तर है। इस उपन्यास की कथा भी बिल्कुल अलग ही है। लेकिन उपन्यास की  समस्या यह है कि यह पाठक से कनेक्ट नहीं हो पाता बल्कि विचारधारा के बोझ तले दम तोड़ देता है। किसी प्रचलित कथा के समानांतर नैरेटिव गढ़ना एक साहस का कार्य हो सकता है जिसे लोकप्रिय होने में हजारों साल लग सकते हैं या फिर लोकप्रिय नहीं भी हो सकता है। इस साहस के कार्य में कथा के अन्य कार्य व्यापारों पर भी समुचित ध्यान देना आवश्यक होता है जो उपन्यासकार द्वारा नहीं निभाया जा सका है।

 

           जहां तक कथा और अवान्तर कथा की बात है लेखक बहुत ही सतर्कता से कथा को बुनता है। उपन्यास में सीता के प्रश्न आधुनिक नारी के प्रश्न है वह उस सीता के प्रश्न नहीं है जो पतिव्रता है जो लोक लाज और मर्यादा के भय से सब कुछ सहने को प्रस्तुत है। वह अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं कर सकती वेशक अपना प्राण तज सकती है। सीता लक्ष्मण से कहती है-"मुझे अपने प्राणों का भय नहीं है, लक्ष्मण। ग्लानि केवल यह है कि महाराज ने मुझे इतना भी गौरव नहीं दिया कि वह अपना धर्मसंकट बता कर मुझे अपनी कीर्ति को उज्जवल रखने के लिए प्राणत्याग करने का अवसर देते।...और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि महाराज ने स्वयं भी मुझसे छल किया। उन्होंने भी विश्वासघात किया।" सीता अपने पति श्रीराम को भी कटघरे में खड़ा कर देती है जो आज के समाज में भी कम ही देखने को मिलता है। सीता के ये चुभते प्रश्न आज की नारी की चुनैतियों को रेखांकित करते हैं। जो आज के पुरूष प्रधान समाज में अपने अधिकारों, अपनी इयत्ता और स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत है। उपन्यास के पूरे कलेवर में सीता के किरदार में व्यवस्था के प्रति असंतोष देखा जा सकता है। वह कदम-कदम पर सामाजिक जड़ता को चैलेंज करती है। अपनी बात को पूरे तर्क के साथ रखती है। जो पुरुष प्रधान समाज स्त्रियों को अपनी निजी संपत्ति मानते हुए उन पर नाना प्रकार की वर्जनाएँ थोपता है। उनका आर्थिक और शारीरिक शोषण करता है और वे ऐसे शोषणयुक्त समाज में रहने को अभिशप्त हैं। ऐसी सभी वर्जनाओं से मुक्ति का स्वर सीता के इस कथन में देखा जा सकता है। ऐसे तथाकथित सभ्य समाज पर कटाक्ष करते हुए सीता कहती है- "सभ्य समाज के आधे अपराध स्त्री को सम्पति बना कर रखने के कारण होते हैं और आधे संपत्ति की चोरी के अनगिनत रूपों के कारण होते हैं। जो सम्पत्ति के वास्तविक अधिकारी हैं उनसे तो लगभग सब कुछ छीन लिया जाता है। वे अधमारों की तरह मौत के दिन तक सांस लेते हैं जिसे ही उनका आदर्श जीवन माना जाता है। वह एक स्वार्थी समाज है, स्वार्थ से अंधा समाज।'' इस कथन में समाज को बदलने की भी इच्छा देखी जा सकती है। स्त्रियों की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की बात भी उपन्यास में की गई है।

सीता वाल्मीकि आश्रम में रहते हुए पूर्णतः आत्मनिर्भर है। वह स्वयं खाने-पीने और रहने का प्रबंध करती है। सामाजिक रूप से भी वह स्वतंत्र दिखलाई पड़ती है जब वह चरितगान सुनने से मना कर देती है। मंगला को वह मां सिर्फ कहती ही नहीं बल्कि मानती भी है वहाँ पर कहीं कोई भी प्रतिबंध नहीं है। इसी प्रकार कैकेयी द्वारा राजा दशरथ को अपने वश में करके अयोध्या की राजनीतिक बागड़ोर खुद संभालना स्त्रियों की राजनीतिक अधिकार की तरफ इशारा करता है। लेखक यहीं नहीं रुकता बल्कि स्रियों की यौनिक स्वतंत्रता के प्रश्न को भी कैकेयी की माँ के माध्यम से व्यक्त करता है। सभी सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद उसकी माँ वृद्ध दशरथ से कैकेयी का विवाह करने का विरोध करती है। वह कहती है-"एक बूढ़े कालग्रास से विवाह करके कौन सा सुख मिलेगा, मेरी बेटी को? आशु वैधव्य और सौतेले पुत्र के शासन में मृत्युपर्यन्त यातना। उसे कोई सुख न मिलेगा। नहीं चाहिए मुझे ऐसा संबंध।" स्त्रियों के सभी रूपों को इस उपन्यास में टटोला गया है वह मां, पत्नी, पुत्री, दासी आदि रूपों में नज़र आती है।

        भगवान सिंह ने उपन्यास में धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड का विरोध किया है। उन्होंने इसके पीछे छिपी धनलोलुपता, शोषण की व्यवस्था और भेदभाव को विस्तृत रूप में विश्लेषित किया है। इसके पीछे के न सिर्फ कारणों को उद्घाटित किया गया बल्कि पात्रों द्वारा इसका ज़ोरदार खंडन भी किया गया है। अश्वमेध यज्ञ पर राम और लक्ष्मण बात कर रहे हैं। राम यज्ञ की हिंसा पर प्रश्न लगाते हुए कहते हैं-"यज्ञ का बहुत कुछ इतना गर्हित और घृणित है कि उसके लिए शिष्ट व्यक्ति की भाषा में शब्द नहीं मिल सकते। जब मैं सोचता हूँ कि झूठी प्रशस्ति का लोभ मनुष्य को कितने नीचे गिरा सकता है, उसे कितना विवेकशून्य बना सकता है तो आश्चर्य होता है।" यज्ञीय कर्मकांड का इतना कठोर खंडन दलित विमर्श आने के बाद ही शुरू हुआ उसके पहले न था। जिसकी स्पष्ट ध्वनि इस उपन्यास में देखी जा सकती है। इसी तरह पुरोहितवाद की भी आलोचना की गई है। किस प्रकार एक पुरोहित एक ही बात को बार-बार बांच कर समाज का एक विधान बना देता है जो कि वास्तव में एक झूठ पर टिका होता है। वाल्मीकि आश्रम में सीता का सुरक्षित प्रसव हो इसके लिए चिंतित शत्रुघ्न वाल्मीकि से समाज के विधि-विधानों पर संवाद कर रहें हैं। वाल्मीकि पुरोहितवाद पर प्रहार करते हुए कहते हैं-" आपके पुरोहितों ने बार-बार दुहराकर आपको समझा रखा है यह संसार पापियों से भरा है। इसमें पुण्यात्मा या तो वे स्वयं हैं या, उनकी सेवा में अपना धन-मान-विवेक सब कुछ अर्पित करने वाले श्रीमंत, जिनके कारण यह संसार टिका हुआ है। इनके न रहने से यह संसार रसातल को चला जाएगा।" पुरोहित और राजगुरुओं(ब्राह्मण) की स्वार्थपूर्ति तथा दान की निरर्थकता को रेखांकित करते हुए सीता कहती हैं-" ये पुरोहित अपने लोभ में कितने अमानुषिक हो जाते हैं, मां। इसी की याद आ गई थी।...जहाँ दूसरे सभी करुण हो कर हमें देख रहे थे, कुलगुरु हमारे अलंकारों को निहार रहे थे। उन्हें हठात याद आया था, वन में सुनहले अलंकारों की क्या आवश्यकता। इन्हें तो ब्राह्मणों को दान दिया जाना चाहिए।"

     

 धर्म और संस्कार जो ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए हैं जिससे मनुष्य परिचालित होता है। क्या सचमुच ईश्वर है? ये जो संस्कार या सभ्य समाज है वह कितना सभ्य है इन सभी बातों पर उपन्याकर ने अपने मत प्रगट किए हैं। ईश्वर और संस्कार पर राम लक्ष्मण को समझते हुए कहते हैं-"हम किसी बाहरी देवता या ईश्वर के सामने नहीं झुकते, लक्ष्मण। हम अपने भीतर कूट-कूट कर भरे गए विश्वासों और संस्कारों के आगे झुकते हैं, जो हमारे ज्ञान पर नहीं अपितु हमारे गुरुजनों और पूर्वजों द्वारा बार-बार दुहराए गए और हठपूर्वक सिखाये गए विचारों और व्यवहारों पर निर्भर करता है।" यहाँ पर लेखक के अतिशय वैचारिक हठधर्मिता को देखा और महसूस किया जा सकता है जिससे उपन्यास की सहज गति बाधित होती है। ब्राह्मणवाद का इस उपन्यास में तीव्र खंडन किया गया है। उनके विधि-विधानों, उनके आत्मा-परमात्मा, जीव-जगत, ईश्वर विधान, यज्ञ कर्मकांड आदि के प्रसंग और उनका प्रसंगगत खंडन खूब दिखाई पड़ता है। जैसे-"देवता और ईश्वर पैदा करते रहना तो कुछ लोगों का धन्धा है। जो जौ और बाजरा तक पैदा नहीं कर सकते और इनके लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाते हैं, वे ईश्वर और देवता पैदा करते रहते हैं।" इसके बरख़्स लेखक जहाँ भी आदिवासी और दलित की चर्चा करता है वहाँ उनकी परम्परा और रीति-रिवाजों की प्रशंसा करता नजर आता है। जैसे जब राम वनवास के क्रम में  गीध और कोल जनजाति के संपर्क में आते हैं तो कोल की गौरवगाथा तथा गीधों के स्वाभिमान और ईमानदारी का बखान करते हैं।" गीध देखने में जितने डरावने क्यों न लगते हो, व्यवहार में इतने सरल थे कि सोच कर आश्चर्य होता था।...टोली के सामूहिक हित के अतिरिक्त उनकी कोई अन्य नैतिकता नहीं थी।" इसी प्रकार जब निषाद का वर्णन करते हैं तो उनकी वीरता की भी प्रशंसा करते हैं। "निषादगण एक शक्तिशाली गणराज्य है। 


    गणराज्यों में से कोई अपरचित व्यक्ति वहाँ किसी प्रकार का अपराध करके गणराज्य की सीमा से बाहर जीवित नहीं जा सकता।...श्रृंगवेरपुर पहुँचने पर निषादराज ने हमारी पूरी कथा सुन कर जिस उदारता का परिचय दिया उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।...निषादराज को चतुर व्यापारियों से मोलभाव करते रहने के कारण जिस प्रकार की वाकपटुता प्राप्त हो चुकी थी वह किसी सभासद को भी चकित कर सकती थी।" इसी तरह जो तथाकथित सभ्य समाज है और ये जो पिछड़े हुए दलित समाज है दोनों की तुलना करते हुए लेखक सीता के माध्यम से कहता है-"तुम ठीक कहती हो मां कि सभ्य जगत कुछ दृष्टियों से इतना निर्मम और संवेदन शून्य हो जाता है कि वह अपनी व्यवस्था में हो रहे अमानवीय व्यवहारों और प्रथाओं की भयावहता तक को अनुभव करने की शक्ति खो देता है, जबकि असभ्य और वनचर कहे जानेवाले लोग इनकी चर्चा सुनकर भी इन पर विश्वास नहीं कर पाते।" इस तरह के प्रसंगों में लेखक के आधुनिक विचारों और विमर्शों की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है।

 

      अब उपन्यास की भाषा-शैली पर भी कुछ बात कर लेते हैं। भाषा की दृष्टि से लेखक ने परिमार्जित संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का उपयोग किया है। जिसके माध्यम से वह उस समय के वातावरण को निर्मित करता है। राजप्रासाद की अपनी एक शब्दावली होती है जिसका निर्वाह किया गया है। इसी प्रकार ऋषि गुरू, दासी, वनवासी आदि के लिए अलग स्तर की भाषा देखने को मिलती है जो निश्चित रूप से लेखक के चातुर्य का परिचायक है।जैसे-"हाँ, बलाबल और देश-काल का ज्ञान। आवश्यक तो ये सभी के लिए हैं, पर कोई राजा तो इसके विषय में प्रमाद कर ही नहीं सकता।...राम को आत्मवान, नियतात्मा, देश-कालविद और सर्वशास्त्रार्थतत्वज्ञ कहनेवाले मात्रा चाटुकारिता में ऐसा नहीं कहते।" जहाँ तक शैली की बात है तो ज्यादातर वर्णन शैली का उपयोग किया गया है हालांकि चित्रण शैली का भी प्रयोग उपन्यासकार ने किया है। कथा फ्लैशबैक में चलती है पुनः वर्तमान में चलने लगती है। ये दोनों कथाएं समानांतर चलती रहती हैं इसलिए अवधान पाठ की मांग यह उपन्यास करता है। जहाँ तक उपन्यास विन्यास की बात है मुख्य कथा के साथ अन्य कथाओं को बहुत सी सुन्दर तरीके से पिरोया गया है। हालांकि पात्रों की अधिकता के कारण कहीं कहीं समस्या भी उत्पन्न होती है। विचारों की अतिशयता के कारण उपन्यास की सहजता, सरलता और गति नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। उपन्यास की कथा में रोचकता मौजूद है फिर भी बीच बीच में उपन्यास बोझिल जान पड़ता है। संवाद बेहतरीन बन पड़े हैं। उपन्यासकार जैसे राम कथा में कुछ तलाश रहा हो इसलिए इसमें "डिटेक्टिव"(नामवर सिंह का शब्द) का भाव नज़र आता है।

      कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि उपन्यास की कथा को बहुत ही बारीकी से बुना गया है। उपन्यासकार अपनी विचारधारा को स्पष्ट रूप से कथा में अंतर्निहित कर देता है बावजूद इसके वैचारिक दबाव में कथा का स्वरूप उपन्यास से थोड़ा हटकर आलोचना की तरफ झुक जाता है। भाषा-शैली और उपन्यास विन्यास की दृष्टि से उपन्यास ठीक ठिकाने का कहा जा सकता है।

 अनिरुध्द कुमार यादव

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