आलेख : 'अपनी कथाओं में आखिर कितनी स्त्रियों का वध करेंगे आप' / एच.के. रूपा रानी - अपनी माटी

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मंगलवार, दिसंबर 22, 2020

आलेख : 'अपनी कथाओं में आखिर कितनी स्त्रियों का वध करेंगे आप' / एच.के. रूपा रानी

        अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-34, अक्टूबर-दिसम्बर 2020, चित्रांकन : Dr. Sonam Sikarwar

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

     आलेख : 'अपनी कथाओं में आखिर कितनी स्त्रियों का वध करेंगे आप' / एच.के.रूपा रानी         

हिन्दी कविता में मिथ पर कविता लिखने की एक अच्छी परम्परा रही हैं। लेकिन उसमें ‘मिथ’ को आलोचना के आलोक में नहीं देखा गया है। ‘मिथ’ को आम तोर पर पितृसत्ता  के परिप्रेक्ष्य  में ही परिभाषित किया गया और उसमें स्त्री के दृष्टिकोण पर विचार नहीं किया गया। यही कारण हैं कि स्त्री हमेशा सीता की तरह आदर्श और त्याग की प्रतिमूर्ति रही और जिन स्त्रियों ने विद्रोह का रास्ता अपनाया उनको सामाजिक और संस्कृतिक जीवन में हीन भावना के साथ दर्शाया गया , यानि वह कभी समाज का आदर्श नहीं बन सकी। सीता जैसी स्त्रियाँ हमेशा अपने  पति राम की परछाई ही रही और उनको पूरे भारतीय समाज में आदर्श रूप में स्थापित किया गया लेकिन जिन स्त्रियों ने सामाजिक जीवन का बहिष्कार किया उन स्त्रियों को महाकाव्यों में वह स्थान नहीं दिया जिसकी वह वास्तविक हक़दार थी।वे कुलटा या कलंक का रूपक बना दी गयी। पवन करण का कविता संग्रह स्त्री शतकइतिहास पूर्व के मिथकीय साहित्य के स्त्री पात्रों को केंद्र में रखकर लिखी गयी ‘सौ’ कविताओं का संग्रह हैं जिसमें सारे के सारे स्त्री पात्र हैं और उन सभी स्त्री पात्रों को उनकी खुद की पहचान के आलोक में देखा और परखा गया हैं। पवन करण का यह प्रयोग हिन्दी कविता में अलग पहचान दर्ज करता हैं इसी कारण इनकी कविताओं को समझने के लिए भी नए दृष्टिकोणों की आवश्यकता हैं जो जाहिर हैं पाठक या आलोचक के लिए अनिवार्य हैं अगर वह दृष्टिकोण नहीं होगा तो पाठक या आलोचक पवन करण की कविताओं का मुकम्मल मूल्यांकन नहीं कर पायेगा।

स्त्री शतक वेदों, पुराणों, ग्रंथों में कैद उन स्त्रियों की टीस, तड़प, घुटन, वेदना व आक्रोश  को दर्शाती हैं जो आज के परिप्रेक्ष्य में पुरुष सत्ता से सवाल करती प्रतीत होती हैं। पवन करण की कविताओं के हर एक किरदार उस गाथा को व्यक्त करता हैं जिन्हें  न कभी देखा  और न सुना गया। स्त्री के दबे स्वर को मुक्त कंठ से बयान करने का बेबाक प्रयास पवन के कविता संसार का मूल स्वर है। इनकी स्त्रियाँ रानियाँ, दासियाँ, देवियाँ, बेटियाँ, पत्नियाँ, अप्सराएँ,  वेश्याएँ हैं जो उस दौर के पुरुषों, देवताओं, राजाओं, ऋषियों की वास्तविक छवि उजागर कर  बनाकर उनके द्वारा किये गए शोषण पर सवाल करती हैं, जो पितृसत्ता की आड़ में उनपर अपनी धौंस जमाते रहे और प्रताड़ित करते रहे। इनकी स्त्रियाँ देवता को भी गुनाहों का देवता सिद्ध करती हैं और उसे भी आरोपी कहने से भयभीत नहीं होती। यह कविता संग्रह उन स्त्रियों की कथाओं का पुनर्पाठ हैं जिसे एक नए नज़रियें से देखने की दृष्टि पवन करण ने आज के पुरुष पीढ़ी को प्रदान की हैं।

पवन करण अपनी कविता में कहते हैं कि -

मैं यदि तुमसे कहूँ कि तुम्हारा चेहरा/ चन्द्र की तरह सुन्दर हैं/ तो तुम मेरी उपमा/ अपने चेहरे से नोचकर फेंक देना

यदि तुमने ऐसा नहीं किया/तो तुम्हारी रूपख्याति दुनिया की आँखों में/तारों की तरह बिखर जाएगी[1]

इस कविता में पवन करण कहते हैं कि आम तौर पर पुरुष स्त्री की प्रसंशा करता हैं और उसको  श्रेष्टता बोध में डालकर अपने अनुरूप ढाल लेता हैं। यहाँ पर भी तारा को चन्द्र अपने प्रेम में फासकर भगाकर ले जाता हैं और उसके साथ एक नया जीवन शुरू करता हैं और वह जीवन कुछ हद तक सफल भी रहता हैं। कविता मैं कवि प्रेम की दुनिया के बारे में बताते हुए यह कह रहा हैं कि स्त्री का सुन्दर होना उसके लिए अभिशाप नही होना  चाहिए बल्कि  उसको सहज और स्वाभाविक स्वीकार किया जाना चाहिए।

राजमुकुट  की मणि तुम मुकुट में अपने/मजबूती के जड़े होने को तोड़कर

चुपचाप कहीं गिरकर खो जाना/और मिल जाना उसे जो तुम्हे प्रिय अत्यंत

राजमुकुट में जड़ी जिन मणियों को /खोया हुआ बताया जाता हैं , दरअसल

वे खोती नहीं कहीं , वे वहां से निकलकर /चुपचाप अपना रास्ता ढूँढ लेती हैं[2]

यह कविता रेणुका के बारे में हैं जो जमदग्नि की पत्नी थी जिसने चित्रगुप्त के साथ प्रेम किया था इसी कारण पिता के कहने पर पुत्र ने अपनी माँ की हत्या कर दी थी। कविता में वे कहना यह चाहते हे कि श्रेष्ठी वर्ग हमेशा अपनी महानता को राजमुकुट के साथ जोड़ता हैं और उसका राजमुकुट बाकी सारी चीज़ों को नगण्य कर देता हैं। इसी कारण जब रेणुका अपने आप को इन सब से बाहर निकलकर एक सामान्य जीवन में प्रवेश करती हैं तब वह एक अपराध के रूप में देखा जाता हैं और उस अपराध के कारण उसकी हत्या कर दी जाती हैं। यह असल में एक स्त्री की सहजता और स्वाभाविकता को ख़ारिज कर उसे समाज और वर्ग के नकली आदर्शों  को  तोड़ने के कारण मिली सजा है। जिसकी वह चाहे अनचाहे शिकार हो जाती हैं। रेणुका अपने स्वाभाविक जीवन में जिस सरलता के साथ प्रवेश करती हैं वही उसके लिए अभिशाप बन जाता है और उसको अपने पुत्र के हाथों मरना पड़ता हैं।

पवन करण की कविता स्त्री मन से ही खुलती है। उनके भीतर स्त्री-मन  है। वो अपनी उस स्त्री को कई देश-काल में देखते हैं। उनकी स्त्री जीवन के हर पहलू के साथ आती है। वो अपनी और समाज की पहचान के साथ आती हैं। वो जीवन के आलोक और प्रवाह से अपने को अलग नहीं करतीवो अपने को उसमें अपनी पहचान के साथ देखती है। वो दूसरों की परछाई नहीं, वो अपने होने की स्त्री है। वो अपने और अपने बीच की स्त्री है, वो माँ, बेटी, प्रेमिका, पत्नी, और स्त्री है। किसी की गुलाम नहीं, इसी कारण वो नैतिक मानदंडो को तोड़ती हुई वो मानदंड खुद बनाती है। वो अपने को अपने दम पर रचती है। यहाँ मिथ लोक की औरत , सीता, अहिल्या  है और उनकी तमाम स्त्रियाँ बोलती हैं। एक कवि का कविता में उनको नयी छवि के साथ रचना अपने में अभिनव है।  

धर्म ने स्त्री को अपनी आबरू बनाकर अपना गुलाम बना लिया। फिर वो  बंदी  और उपभोग की वस्तु स्वीकार की जाती रही। असल में उसको वस्तु में बदलना उसको उपभोग मात्र में सिमटाना था, ये अनोखा प्रयोग था, जिसका कोई आर-पार नहीं था। वो कभी-भी अपनी न हो सकी, और यही कारण था कि उसको कुछ नहीं मिला। वो हर बार एक से बढ़कर एक करतब करती रही लेकिन, उसको कुछ भी नहीं मिलना था। वो मान और अपमान दोनों की प्रतीक बना दी गयी लेकिन उसको नगर वधू बना दिया गया। उसको परिवार में ही अपने को खोजना था। वो ज़िंदगी में अपनी और  पराई दोनों थी। विधवा थी तो कुछ न थी अभिशाप थी, वो थी कुछ न पर सब कुछ थी।  यहाँ कवि की स्त्री ही उसकी दुश्मन होकर बीच में आती है। चित्रांगदा रावण की उपपत्नी थी लेकिन उसका क्या हाल था।

वहाँ सब सौतनें थीं एक-दूसरे की/ मयपुत्री राजमहीषी तुम्हारे सिवा

हम चन्द्रमुखी नवयौवानाएँ जिनमें मैं भी /नहीं हिला सकीं तुम्हारा वामासन

नहीं दे सका हमारा तेजोरूप/तुम्हारे रूपगर्व को मात[3]

वो प्रेम के लिए ,वो अपने लिए थी लेकिन उसको कभी कुछ न मिला। प्रेम उसकी ताकत है या कमजोरी यह एक प्रश्न भी है और जिज्ञासा भी। वो अपने को उसमें ही देखती है। राजा तो राजा थे, उनकी रानियाँ थी, लेकिन वो खुद को रनिवास में ही खोजती है, आगे जाए भी तो कहाँयही कारण है कि वो मीरा की तरह नहीं हो सकती, न वो आज की स्त्री की तरह हो सकती। वो होगी तो वही जो उसको बनाया जाता है। संस्कृति का पुंज उसकी ही पीठ पर चमकता  है। वो कुछ भी सोचे, उसको ही उसका भार लेकर चलना होता है। उस दौर की पीड़ा कुछ अधिक है। उसका कोई समाधान नहीं है। कारण समाज में  ज्ञान के रास्ते बंद है। फिर वो रास्ते रुके है इसलिए जब उसको रास्ता मिला तो वो बाहर निकलती है। वो कुछ न कुछ करने लगती है।

स्त्री बंदी बनी। क्यों बनी? वो भरपूर इतिहास में लूटी गयी। मिथ में वो एक चमत्कार थी। उसको क्या-क्या नहीं बनाया।  वो कभी कोठे पर तो कभी रनिवासों में अपने को खोजती रही, लेकिन वो खुद को कभी नहीं खोज पायी। वो सुख का साधन थी इसके आगे कुछ नहीं। वो सर्जक थी लेकिन उसका आनंद उसके पास नहीं था। वो धरती की तरह थी लेकिन धरती पर उसके लिए कुछ नहीं था। वो बदहवास थी। फिर इसको रचा गया। और उसकी ये रचना कुछ और ही थी। वो मानक थी लेकिन कुछ न थी।

कवि का परंपरा में जाना भी इस कारण सही है कि वो वहाँ से सूत्र खोज रहा है। वो देख रहा है कि इसका क्या आविर्भाव हैये कैसे और कहाँ से आया। आया तो फिर समाज का अंग क्या और क्योंकर बना। पुरुष और औरत की नज़र में कितना फर्क होता हैऔर ये फर्क पूरी परंपरा में नज़र आता है। पवन करण के लिए एक चुनौती रही होगी कि वो इसको कैसे रचे। पवन करण अपने सवाल स्त्री की तरह सोचते हुए प्रतीत होते है जो आज के स्त्रीवादी  कवियों की तुलना में पृथक सोच रखते हैं। और असल में यह सवाल एक क्रिटिक पैदा करता हैं। यही कविता बनकर आपको कुछ न कुछ देता है। यही कारण है कि पवन करण के काव्य में सवाल करती स्त्री है। वो प्रेम करती है, उसके लिए कुछ भी करने की हिम्मत रखती है, ठोस और तरल है।  

ये आपने क्या किया गौरी/ आपने तो करोड़ो स्त्रियों के मन में/कुंठा घोल कर रख दी

आश्चर्य कि शंभू के सामने/शक्तिहीना होकर रह गई शक्ति

गौरवर्ण प्राप्त करने को उद्यत/आपने एक बार भी उन स्त्रियों  के बारे में नहीं सोचा

जिनकी त्वचा का रंग/काले सर्प सा डसता रहा उन्हें [4]

रंग के कारण कैसे आप हीन भावना के शिकार होते है। रंग कैसे आपको श्रेष्ठ बनाता है। शिव ने अपनी प्रेमिका को काली होने के कारण कितना क्या कहा था जिसपर पार्वती ने अपना रंग ही उतार फेंका। ये उनका अपमान है जो काली स्त्री  है, ये काले रंग का अपमान है, ये भेद - भाव का बीज है। ऐसे कितने ही सवाल है, जो परंपरा के साथ, संस्कृति के साथ जोड़े  गये। कविता अपने प्रभाव में कुछ ऐसा ही रचती है। जिसका प्रभाव दूरगामी होता है। काला रंग अपमान का सूचक कैसे बन गया? इसका जवाब कविता नहीं देतीइसका जवाब आपको अपनी ही परंपरा में खोजना होगा।

अपनी कथाओं में आखिर/कितनी स्त्रियों का वध करेंगे आप

कथाओं में वधित स्त्रियाँ/जिस दिन खुद को बांचना/शुरू कर देंगी/कथाए बांचना

छोड़ देंगी तुम्हारी

यह कथाओं से भरे देश में मैं भी एक कथा हूँकेदारनाथ सिंह की कविता है। ये कथा और उसका पाठ और उसको रचना सबका एक ही दौर है। सबका एक ही रंग है। उसमें स्त्री रोती ही है, या फिर धोखा खाती रहती हैं। अब वो अपनी ही कहानी पढ़ रही है, वो अपनी ही रच रही है। फिर उसको दूसरों की कथाओं को पढ़ने की क्या जरूरत है। स्त्री शतक में वो स्त्रियाँ यही कर रही हैं। उनको ये सब करने का हक हैं। वे यही करना चाहती हैं। यही करना होगा उनको, अपनी कथा खुद कहनी होगी और बोलना भी होगा। हिरणों को अपना इतिहास खुद लिखना होगा। शिकारियों के इतिहास को खारिज कर ही वो अपना इतिहास लिख सकती हैं।

  

सन्दर्भ


[1] स्त्री शतक, तारा, पृ.17

2 स्त्री शतक, रेणुका, पृ. 21 

[3] स्त्री शतक, चित्रांगदा, पृ. 124  

[4] स्त्री शतक, कौशिकी, पृ. 55

 पुस्तक : ‘स्त्री शतक’ (कविता संग्रह): पवन करण,भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, २०१८.   

इतिहास , स्त्री एवं पवन करण का ‘स्त्री शतक’- प्रभात रंजन – जानकीपुल, अगस्त ४, २०१८.

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एच. के. रूपा रानी

शोधार्थी :  जैन विश्वविद्यालय, लेक्चरर , ज्योति निवास कॉलेज, बेंगलूरू

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