सम्पादकीय : जनाब! किसान के लिए पूस की रात कभी खत्म नहीं होती / जितेंद्र यादव - अपनी माटी

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सोमवार, अगस्त 02, 2021

सम्पादकीय : जनाब! किसान के लिए पूस की रात कभी खत्म नहीं होती / जितेंद्र यादव

              जनाब! किसान के लिए पूस की रात कभी खत्म नहीं होती / जितेंद्र यादव 


    यह आज भी सच है कि भारतीय किसान कर्ज में ही पैदा होता है, कर्ज में ही जीता है और कर्ज में ही मर जाता है। यदि गांधी जी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती हैतो जरूर उनके ध्यान में किसानों की सादगी और संघर्ष रहा होगा। क्योंकि गाँव का बड़ा हिस्सा किसान से ही मिलकर बनता है इसलिए किसान के बगैर गाँव की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक समय था कि किसान गाँव का केंद्र बिन्दु था। बढ़ई, नाई, धोबी, कुम्हार जैसे तमाम जातियाँ आजीविका के लिए किसानों की मुहताज होती थी। इसके अलावा खेतिहर मजूदूरों की आजीविका भी खेती -किसानी पर टिकी हुई थी। ग्राम अपने आप में एक आत्मनिर्भर इकाई था। जहां जरूरत की चीजें एक-दूसरे से पूर्ण कर ली जाती थी। हमारे विद्यालय, हमारी पुलिस और फौज, हमारी अदालतें सब किसानों की कमाई के बल पर ही चलती थी। सरकार और जमींदार उन्हीं से लगान वसूलकर अपनी जरूरतें पूरी करते थे। लेकिन किसान की तब भी दयनीय स्थिति थी जैसे- फूंस के छप्पर से छाई हुई मिट्टी की एक झोपड़ी, मिट्टी के घड़े, कुठले, पत्थर की एक कठौती, पीतल की दो-एक थालियाँ और लोटे, एकाध टूटी खाट, खुरपी और हल यही उनकी सर्वस्व संपत्ति थी। ऐसी स्थिति में प्रेमचंद की कहानी पूस की रातका मुख्य चरित्र हल्कू कोशिश करने के बावजूद भी पूस की रात की हाड़ कपकपाने वाली ठंड से बचने के लिए एक महज कंबल का जुगाड़ नहीं कर पाता है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात हो सकती है। 

 

    ‘पूस की रातकिसान जीवन की त्रासदी का एक रुपक है। वह एक ऐसी त्रासदी है जो आज भी बदस्तूर जारी है। हल्कू अब फसल बर्बादी की बचाव नीलगाय से नहीं बल्कि लावारिस गाय और आवारा सांड़ से कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना ही हुआ है। आज भी वह पूस की रात में  जगकर अपने फसलों की रखवाली कर रहा है। आप यदि उत्तर प्रदेश के गांवों से संबंध रखते हैं तो यह नजारा सरेआम दिख जाएगा कि लावारिस छोड़ दी गई गायें और बछड़े झुंड के झुंड दिखाई देंगे। किसान के इन परेशानियों के केंद्र में राज्य सरकार की वह नीतियाँ हैं जहां किसान की फसल और उसकी जान की कीमत जानवर के आगे नगण्य है। सरकारें कोई भी हो वह जीतती किसानों के वोट से हैं लेकिन जीतने के बाद बड़े-बड़े पाँच सितारा होटलों में उद्योगपतियों और पूँजीपतियों को बुलाकर निवेश लाने का ढ़ोल पीटते हैं। लेकिन उस निवेश का अता-पता नहीं चलता है। काश इतना ही ध्यान किसानों के पानी, बिजली, डीजल, बीज, मंडी और उचित दाम पर उनकी फसल की ख़रीदारी सुनिश्चित किया जाता तो भारत के आधे से ज्यादा किसान ऐसे ही खुशहाल रहता। फिर न किसान को कर्ज लेना पड़ता, न आत्महत्या करना पड़ता और न ही चुनाव के समय किसानों की कर्जमाफ़ी का नाटक करना पड़ता। किसान बार-बार कहता है कि उसे खैरात की जरूरत नहीं है बल्कि फसल के उचित दाम की जरूरत है। सच्चाई यह है कि दिन-प्रतिदिन खेती की लागत बढ़ती जा रही है लेकिन उस फसल का उचित दाम नहीं मिल पा रहा है इसी कारण आज किसान भी अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता है। वह खेती किस काम की जिससे उसकी न्यूनतम जरूरत भी पूरी नहीं हो पा रही हो। चौधरी चरण सिंह के बाद केंद्र में किसी भी किसान नेता को किसान की समस्याओं और उसके समाधानों की चिंता नहीं रही है। किसानों के प्रति हमदर्दी का घड़ियाली आँसू तो सभी नेता बहा लेते हैं लेकिन उनकी ईमानदारी और प्रतिबद्धता हमेशा संदिग्ध दिखाई देती हैं। किसान हमेशा से सरकारों के लिए एक नरम चारा की तरह रहा है। भारतीय किसान की समस्या यह है कि वह जैसे ही एक किसान के रूप में संगठित होना चाहता है राजनेता उसे जतियों की खांचे में बांटकर अपनी चुनावी फसल काट लेते हैं। फिर पाँच साल के लिए बेसहारा छोड़ देते हैं।  

  

     विकसित देश अपने किसानों को अधिक से अधिक सब्सिडी मुहैया करा रहे हैं। जबकि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएं तीसरी दुनिया के देशों को उनकी सरकारों द्वारा किसानों को दी जा रही सब्सिडी कम करने का दबाव बनाती हैं। अमेरिका अपने किसानों को 32 डालर प्रति हेक्टेयर की दर से सब्सिडी दे रहा है, जापान 35 डालर, चीन 30 डालर जबकि भारत अपने किसानों को 14 डालर प्रति हेक्टेयर सब्सिडी दे रहा है यानी विकसित देश अपने किसानों को भारत की तुलना में दुगुना से भी ज्यादा सब्सिडी दे रहे हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि भारतीय कृषि इन विकसित देशों की तुलना में पहले से ही पिछड़ी हुई है और ऊपर से सब्सिडी भी कम मिल रही तो विश्व बाजार में भारतीय किसान इन देशों के किसानों से कैसे बराबरी कर पाएंगे।  साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति अन्न के रूप में भारत को आत्मनिर्भर तो बना दिया किन्तु बाद के वर्षों में उसकी चमक फीकी पड़ गई। ज़मीनें भी अपनी उर्वरता खोने लगी, भूजल के स्तर में भयंकर गिरावट आई। जल और जमीन जहरीली हो गई, जिसके कारण खाद्यान्नों की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा। जिस पंजाब और हरियाणा में हरित क्रांति सबसे ज्यादा सफल रही, उसी जगह कैंसर से लोग पीड़ित हो रहे हैं। इसके पीछे का कारण अत्यधिक कीटनाशक दवाइयाँ और रासायनिकों के प्रयोग हैं। नि:संदेह हरित क्रांति से कुछ वर्षों के लिए खाद्यान्नों की पैदावार बहुत बढ़ गई थी, लेकिन इसने हमारी सदियों से आजमाई परंपरागत कृषि प्रणाली पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव भी छोड़ा है। यह हमारे लिए आयातित नयी कृषि प्रणाली थी। इसने कृषि रसायनों के अविवेकपूर्ण उपयोग और सिंचाई की अनिवार्यता से हमारी कृषि संस्कृति में आमूल-चूल परिवर्तन किया। संकर बीजों के प्रवेश ने सदियों से किसानों द्वारा विकसित स्थानीय बीजों का स्थान ले लिया।

 

     आज किसानों की आत्महत्या भारत की एक बड़ी समस्या बनी हुई है। सबसे ज्यादा आत्महत्याएँ उन राज्यों में हो रही हैं जहां किसान नकदी अथवा व्यावसायिक फसल उपजा रहे हैं। इसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु राज्य अग्रणी हैं। 1995 से लेकर 2010 तक, 2.5 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। उदारीकरण के बाद किसानों की आत्महत्या का एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया है, जो रुकने के नाम नहीं ले रही है। खेती एक घाटे का सौदा बन चुकी है क्योंकि महंगे होते बीज, खाद, कीटनाशक दवाएं, डीजल और जुताई की वजह से लागत मूल्य बढ़ गया है लेकिन आमदनी घट गई है। किसान अच्छी फसल और अच्छी आमदनी की चाहत में बैंक या स्थानीय साहूकार से कर्ज लेकर खेती कर रहा है, लेकिन घाटे की सौदा हो चुकी खेती उसे इतना मुनाफा नहीं दे पा रही है कि वह लिया हुआ कर्ज चुका सके। इस वजह से मजबूरन उसे आत्महत्या करनी पड़ रही है। ज़्यादातर जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं वे छोटे और सीमांत किसान हैं, जो कपास, सोयाबीन और मूँगफली जैसी नकदी फसल की खेती कर रहे हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन’ (एनएसएसओ) 59वें दौर के आकलन के अनुसार, देश में सबसे ज्यादा 81 प्रतिशत कर्जदार किसान आंध्र प्रदेश राज्य में थे, दूसरे स्थान पर तमिलनाडु 74.5 प्रतिशत, पंजाब 65.4 प्रतिशत, केरल 64.4 प्रतिशत, कर्नाटक 61.6 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 54 प्रतिशत किसान परिवार कर्जदार थे। और यदि पूरे भारत के कर्जदार किसानों का आंकड़ा देखें तो “(एनएसएसओ) 2005 मई की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 48.6 किसान ऋणग्रस्त हैं। यह कर्ज ही उनके गले का फंदा बन रहा है। यदि सामाजिक वर्गीकरण के हिसाब से किसानों को देखा जाए तो ज़्यादातर आत्महत्या दलित और पिछड़े समुदायों के किसानों ने किया है, जिनके पास खेती के सिवाय आमदनी का कोई और स्रोत नहीं है। 

 

     उदारीकरण का फायदा पूँजीपतियों तथा बीज और कीटनाशक बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हुआ है, किसानों के लिए यह मृगमरीचिका साबित हुआ। शहरी वर्ग भले लाभान्वित हुआ हो लेकिन भारत के किसान, मजदूर और आदिवासियों के लिए इसका उल्टा प्रभाव पड़ा। भारत में तेजी से विषमता की खाई बढ़ी है। भारत में भी दो भारत की तस्वीर साफ दिखाई दे रही है। एक भारत में बेशुमार समृद्धि है, उनके पास असीमित पैसा है, पावर है, महंगेमहंगे स्कूल और अस्पताल हैं, मॉल संस्कृति है। वहीं दूसरे भारत में गांवों की गरीबी, दरिद्रता, लाचारी और भूखमरी हैं। बेहतर इलाज के अभाव में दम तोड़ती जिंदगियाँ हैं और खराब स्कूली व्यवस्था के कारण पिछड़ते ग्रामीण युवाओं की कहानियाँ हैं। किसान अपनी उपज का सही दाम नहीं ले पा रहा है, कभी उसे सूखा, ओला और बाढ़ मार रही है यदि उससे बच जाए तो बिचौलिये और दलाल उसकी फसल का कई गुना फायदा उठा ले रहे हैं। यदि ज्यादा पैदावार हो गया तो यह भी नौबत आ जाती है कि सड़क पर उत्पादन को फेंकना पड़ता है। इसीलिए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान के सर्वे के मुताबिक 40 प्रतिशत किसानों का मानना है कि खेतीकिसानी का कोई विकल्प उनके पास हो तो वे खेती छोड़ देंगे।

 

     आजादी के बाद किसानों को उम्मीद थी कि उनकी खुशहाली आएगी, देश तरक्की करेगा तो उनकी समृद्धि बढ़ेगी लेकिन यह क्या, किसानों को फांसी का फंदा मिल रहा है। मैनेजर पाण्डेय ने ठीक ही लिखा है कि अँग्रेजी राज के जमाने की महाजनी सभ्यता से आज की महाजनी सभ्यता अधिक चालाक और अधिक खूंखार है। इसलिए आज की महाजनी सभ्यता के शिकंजे में फंसे जितने किसानों ने आत्महत्या की है उतने किसानों ने अंग्रेजी राज के समय भी आत्महत्या नहीं की थी

 

     जब किसान आत्महत्या करता है तो सबसे बड़ी समस्या जो आती है, वह है उसके परिवार की देखभाल की समस्या। घर की महिला पर ज़िम्मेदारी का बोझ बढ़ जाता है। भारत में किसान का अर्थ प्रायः पुरुष किसान ही लगाया जाता है किन्तु पुरुष के साथ सुबह से शाम तक कंधे से कंधा मिलाकर महिलाएँ भी खेतों में काम कर रही हैं। रोजगार की तलाश में पुरुष जब गाँव से पलायन करता है तो खेतीकिसानी पूर्णत: महिलाएं के ही जिम्मे आ जाती हैं। लेकिन जमीन पर उनका मालिकाना हक नहीं होने के कारण सरकारी सहायता मिलने में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। भारत में कृषि पहले से समृद्ध हुई है, उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़े हैं। लेकिन उस दर से किसानों की आय में बढ़ोत्तरी नहीं हो पा रही है। बाजार किसान के पक्ष में नहीं बल्कि बिचौलियों के पक्ष में खड़ा है। 

 

     वर्तमान दौर के सरकार का एकसूत्रीय कार्यक्रम और एजेंडा बन गया है कि हर चीज का निजीकरण करके अपनी जिम्मेदारियों से पिंड छुड़ाओ। एक साल पहले जो तीन कृषि बिल आये थे वह निजीकरण वाली मानसिकता का ही नतीजा है। सरकारी मंडियों के बजाय निजी मंडियों को बढ़ावा देना, फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्यकी गारंटी न देना, व्यापारियों के लिए खाद्यान्न वाली वस्तुओं के असीमित भंडारण की छूट देकर कालाबाजारी को वैधता प्रदान करना। यही सब बुनियादी मुद्दे हैं जिन्हें लेकर किसान एक साल से भी ज्यादा समय तक आंदोलनरत हैं। लेकिन सरकार का निष्ठुर और हठधर्मी रवैया के कारण उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगा। आज प्रेमचंद का हल्कू पूस की रात में सिर्फ गाय और बछड़े से फसल की रखवाली ही नहीं कर रहा है बल्कि उसी पूस की रात में सिंधु बार्डर पर डटकर सरकार से किसान विरोधी नीतियों का मुक़ाबला भी कर रहा है। पहले भी हल्कू के सामने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीति और जानवर से फसल बचाने की समस्या थी वहीं आज भी हल्कू के सामने जानवर से फसल बचाने की समस्या, सरकार और बाजार की विषम आर्थिक नीतियों से खुद को बचाने की समस्या है। आज हल्कू की लड़ाई पहले से भी ज्यादा कठिन दिखाई दे रही है। आज हल्कू को कंबल की नहीं बल्कि सरकारी संबल की जरूरत है। प्रेमचंद के साहित्य में किसान और उसकी खेती की चिंता बहुत गहराई से दिखाई देती है। अतः प्रेमचंद की जयंती पर अपनी माटीपत्रिका का 35-36वां अंक एक साथ जारी हो रहा है इसलिए यह स्वाभाविक था कि अपनी माटीके संपादकीय में प्रेमचंद के किसान को याद किया जाए। यही प्रेमचंद के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।                                                                             

 

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       अपनी माटीपत्रिका का यह अंक हमारी टीम के उत्साहपूर्ण कार्य का नतीजा है। पत्रिका को पहले से ही लेखक, शोधार्थी, शिक्षक और पाठकों का प्रेम और उत्साह बराबर मिलता रहा है। इधर यूजीसी केयर लिस्ट में दुबारा शामिल होने के कारण हमारी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है। ढेर सारे लेखों के बीच से बेहतर से बेहतर लेखों का चयन और संभावित सुधार करके प्रकाशित  किया जाता है। हमारी पत्रिका ऑनलाइन है। एक क्लिक भर से आपका लेख पाठक के सामने उपस्थित हो जाता है। इसलिए हमारी प्रतिबद्धता रही है कि जो भी लेख या शोधपत्र छपे उसमें गुणवत्ता हो। अकादमिक नजरिए से उसकी उपयोगिता हो। क्योंकि कोई विद्यार्थी जब कहता है कि आपकी पत्रिका में एक बहुत अच्छा लेख पढ़ा था तब हमें लगता है कि हमारी मेहनत सार्थक हो रही है। लेख की गुणवत्ता और उसकी सार्थकता हमारी प्राथमिकता में है। अतः जो भी शोधार्थी या शिक्षक यह सोचते हों कि कुछ भी लिखकर भेज दिया जाए वह छप जाएगा फिर हमें माफ करें यह जगह आपके लिए नहीं है।  

 

    इस अंक में हमारे कुछ नए साथी प्रवीण जोशी, प्रशांत कुमार, गुणवंत, अर्जुन, दीपक ने दिन- रात मेहनत करके अंक को अंतिम रूप देने में मदद किया है। हम उन सभी लोगों का आभार व्यक्त करते हैं। इस अंक को चित्र से सुसज्जित करने के लिए सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत जी ने अपना चित्र प्रदान किया हैं हम उनका आभार व्यक्त करते हैं। हमारे मार्गदर्शक मण्डल में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विंध्याचल यादव जी जुड़ें हैं। उनका भी हम आभार व्यक्त करते हैं।

 

      कोरोना महामारी के चलते कई साहित्यकार, कलाविद और जाने-पहचाने लोगों ने अपनी जान गवां दी। अपनी माटीपत्रिका की तरफ से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।    

 

 




जितेंद्र यादव

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग 

सकलडीहा पी. जी. कालेज, चंदौली (उत्तर प्रदेश)
ई मेल : jitendrayadav.bhu@gmail.com,
सम्पर्क : 9001092806

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

UGC Care Listed Issue

'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' 

( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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