आगामी विशेषांक / Special Issue

आगामी विशेषांक 


(विशेषांक हेतु रचनाएं स्वीकार करने की अंतिम तिथि निकल चुकी है)
भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
( यह अंक 1 March, 2024 में प्रकाशित किया जाएगा )

        भक्ति आंदोलन जैसी सांस्कृतिक प्रक्रिया भारत के इतिहास की एक विशिष्ट उपलब्धि है। अपने प्रसिद्ध निबंध ‘भारतवर्ष में इतिहास की धारा’ के अंतर्गत रविन्द्रनाथ ठाकुर ने रेखांकित किया था कि “भारत के इतिहास में प्राचीन काल से ही देखा गया है कि उसके चित्त ने जड़त्व के विरुद्ध लगातार युद्ध किया है। भारत की समस्त श्रेष्ठ सम्पदा - उसके उपनिषद, उसकी गीता, उसका विश्व प्रेममूलक बौद्ध धर्म - इसी महायुद्ध की जयलब्ध सामग्री है। उसके श्रीकृष्ण और रामचंद्र इसी महायुद्ध के अधिनायक हैं। ऐसा मुक्तिप्रिय भारतवर्ष दीर्घकाल के जड़त्व का बोझ सिर पर लेकर एक ही स्थान पर शताब्दियों तक निश्चल पड़ा रहेगा, यह बात प्रकृतिगत नहीं है। जड़त्व का यह बोझ उसके जीवन का आनंद नहीं है - यह एक बाह्य वस्तु है।” गुरुदेव ने इसी क्रम में भारत के मध्य युग में इस बात के भी दृष्टान्त देखे थे कि, “नानक, कबीर प्रभृत्ति उपदेशकों ने इसी चेष्टा को रूप दिया है। कबीर की जीवनी और रचनाओं में यह स्पष्ट देखा जा सकता कि उन्होंने भारत की समस्त बाह्य आवर्जना का अतिक्रमण करते हुए उसके अन्तःकरण की श्रेष्ठ सामग्री को ही सत्य साधना समझकर उपलब्ध किया था। इसीलिए कबीर के अनुयायियों को विशेष रूप से भारतपंथी कहा गया है। उन्होंने ध्यान योग से स्पष्ट देखा था कि बिखराव और असंग्लगता के बीच भारत किसी निभृत सत्य पर प्रतिष्ठित है। मध्ययुग में एक के बाद एक कबीर जैसे आचार्यों का अभ्युदय हुआ जो बोझ भारी हो उठा था उसे हल्का करना ही उनका एकमात्र प्रयास था। लोकाचार, शास्त्र-विधि और अभ्यास के रुद्ध द्वार पर आघात करके उन्होंने भारत को जगाने का प्रयत्न किया।”

        भारत के सांस्कृतिक इतिहास में यदि अन्धकार युग नहीं है और न ही दूसरों को सताने और गुलाम बनाने वाली मानसिकता तो इसके कारण भक्ति आन्दोलन की हमारी गौरवशाली विरासत में मौजूद है। हमारा देश संतों की महान आत्माओं के प्रकाश से इस तरह दीप्त रहा कि दुर्दांत लुटेरों की एक के बाद एक लगातार सुनामी के बावजूद अपनी अस्मिता को बचा लेने में कामयाब रहा।  प्रेमचन्द को इस बात का गर्व था कि हमारे देश के ईश्वर भी हमारे कवियों की देन हैं। संत कवियों ने ईश्वर बनाया, ऐसा ईश्वर जिसके सर्वाधिक प्रिय सबसे ज्यादा ‘खिन्न’ लोग थे। तुलसी के राम गरीब नेवाज हैं तो इकबाल के इमामे हिन्द। लोहिया जी ने बताया है कि हमारे संत कवियों ने ऐसा राम बनाया जो उत्तर से दक्षिण तक भारत को एक सूत्र में जोड़ते हैं, वहीं दूसरे युग में कृष्ण पूरब से लेकर पश्चिम तक भारत को एक सूत्र में जोड़ते हैं। संतों ने आजीवन यात्राएँ कीं। उनके ईश्वर भी राजभवन तक सीमित नहीं रहे। राजतंत्र के विरुद्ध लोकतंत्र की चिंगारी रामचरितमानस में मौजूद है।

        दिनकर जी ने भक्ति आन्दोलन की सांस्कृतिक परिधि पर विचार करते हुए कहा था कि यह कितने विस्मय की बात है कि, “विद्यापति जितने हिंदी के हैं, उतने ही बांगला के और मीरा बाई जितनी गुजराती की हैं, उतनी ही हिंदी की”। हिंदी की यह सांस्कृतिक परिधि असम के शंकर देव और मराठी के अनेक नामचीन संतों तक विस्तृत है। गाँधी जी सहित भारतीय नवजागरण के तमाम अहिन्दी अग्रदूत यदि स्वाधीनता आन्दोलन के दौर में हिंदी पर भरोसा प्रकट करते हैं तो उसके सूत्र भी भक्ति आन्दोलन में छिपे हुए हैं। गाँधी जी पर नरसी सहित तुलसी, कबीर और मीरा का प्रभाव जगजाहिर है। स्वयं भगत सिंह की चिंता थी कि तुलसी और कबीर की कविता भारत के जन-जन तक जानी चाहिए। बाबा रामचंद्र तुलसी की कविता के जरिये अवध का किसान आन्दोलन संभव कर पाए। आकस्मिक नहीं कि रामविलास शर्मा नवजागरण की अपनी अवधारणा के देशी आधारों की तलाश में ही भक्ति आन्दोलन को लोकजागरण नाम से प्रस्तावित करते हैं।

 चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका

अपनी स्थापना के 11वें वर्ष में प्रवेश

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि

अतिथि संपादक
गजेन्द्र पाठक
प्रोफेसर, हिंदी विभाग / Professor, Department of Hindi
मानविकी संकाय /School of Humanities
हैदराबाद विश्वविद्यालय/University of Hyderabad 
हैदराबाद Hyderabad -500046
दूरभाष : 04066793468, मो. : 8374701410
UGC Care Listed
( Under List 'Multi Disciplinary' Sr. Nu. 03 )
(ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-49, दिसम्बर, 2023
सम्पादक-द्वय : डॉ. माणिक व डॉ. जितेन्द्र यादव

स्वीकृत रचनाएं

संपादकीय

  • अतिथि संपादक - गजेन्द्र पाठक
  • सह-संपादक- अजीत आर्या, गौरव सिंह, श्वेता यादव 

  1. राधावल्लभ त्रिपाठी - श्रीलंका में संस्कृत और पालि का संवर्द्धन
  2. अवधेश प्रधान - ‘बानि बिमल रैदास की’
  3. माधव हाड़ा - भक्ति कविता की पहचान पर पुनर्विचार
  4. शशि मुदीराज - ट्रैजिक विज़न की संकल्‍पना और ‘पद्मावत’
  5. नंदकिशोर पाण्डेय - ‘दादू दिल दरियाव, हंस हरिजन तहिं झूले’
  6. सुमन जैन - मध्यकाल और संत रैदास
  7. कृष्णकुमार सिंह - कबीर की कविता का देश : जाति बरन कुल नाहिं
  8. कमलानंद झा - शैवभक्ति - विलोपन : कारण एवं निहितार्थ
  9. अधीर कुमार - तुलसी का मानुष सत्य और हमारा समय और समाज
  10. बजरंग बिहारी तिवारी - मर्मी आलोचना से साक्षात्कार
  11. निरंजन सहाय - कृष्णकाव्य के अद्वितीय रचनाकार रसखान.
  12. सुनील तिवारी - दरिया साहब
  13. मुदिता तिवारी - मन के परिष्करण और उन्नयन में संत रैदास का योगदान
  14. प्रभाकर सिंह - उत्तर औपनिवैशिक विमर्श और भक्ति कविता-पुनर्पाठ
  15. प्रदीप के. शर्मा - असम में वैष्णव भक्ति कविता
  16. नीलम राठी - भक्ति कविता की सांस्कृतिक परिधि और स्त्री दृष्टि
  17. अन्नपूर्णा सी. – भक्ति काव्य की पूर्वपीठिका-दार्शनिक विचार
  18. भुवन कुमार झा - महामना मालवीय : धर्म और भक्ति पर चिंतन
  19. भीमसिंह - भक्तिकाव्य और भक्ति-आन्दोलन के अध्ययन की दिशाएँ
  20. जितेंद्र थदानी एवं प्रिया आडवानी - मीरा के पदों में नवधा भक्ति की भवभूमि
  21. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत - चेरुश्शेरी - एष़ुत्तच्छन-पूंतानम (केरल के भक्ति आंदोलन के पुरोधा)
  22. अंजू लता - शंकरदेव के काव्य का स्त्रीपक्ष
  23. प्रवीण कुमार - रामचरितमानस में प्रेम और मर्यादा
  24. प्रभात मिश्र - विद्यापति की पदावली में मिथिला का समाज
  25. ओम प्रकाश सैनी - जाम्भाणी दर्शन : जीव पर्यावरण एवं प्रकृति
  26. जे.आत्माराम - 'वाल्मीकि रामायण के पाश्चात्य आलोचक और फ़ादर कामिल बुल्के'
  27. रेखा पाण्डेय - ‘हेरी म्हा दरद दिवानौ, म्हारा दरद ना जाण्या कोय’
  28. प्रदीप त्रिपाठी - भक्ति आंदोलन का क्षितिज : अंतर्दृष्टि और विमर्श
  29. अखिल मिश्र - स्वाधीनता आंदोलन पर भक्तिकाव्य का प्रभाव
  30. मृदुला पण्डित - 'दक्षिण भारत की भक्ति परपरा और दर्शन'
  31.  अमरेन्द्र त्रिपाठी - ‘दरिया अगम गंभीर है’
  32. सुजीत कुमार सिंह - कबीर-मेला के बहाने अस्पृश्यता और साम्प्रदायिकता से जंग
  33. धनंजय सिंह - द्रविड़ मंदिरों में नंगे पाँव
  34. घनश्याम कुशवाहा - भारतीय सामाजिक संरचना और मीराबाई का काव्य
  35. निरंजन कुमार यादव - मानुष सत्य की प्रतिष्ठा करती संत रविदास की कविता
  36. संगीता मौर्या - संत कवियों का श्रम-सौन्दर्य
  37. पूजा गुप्ता - भक्ति आंदोलन में आलवार संतों का योगदान
  38. शशिकला जायसवाल - भक्ति आंदोलन के वैचारिक-सांस्कृतिक संघर्ष के आलोक में समकालीन धार्मिक खतरों की पड़ताल
  39. प्रियंका सोनकर – मध्यकालीन दलित संत कवयित्रियाँ
  40. आराधना चौधरी - मैनेजर पाण्डेय की इतिहास-दृष्टि और भक्ति आंदोलन
  41. दिवाकर दिव्यांशु - हिंदी में क्रांतिकारी कविता की परंपरा और कबीर
  42. पीयूष कुमार द्विवेदी - मानवता का विनम्र स्वर ‘गुरु नानकदेव’
  43. पंकज यादव - मध्यकालीन आत्मकथात्मक स्त्री अभिव्यक्तियाँ और बहिणाबाई का काव्य
  44. कुमुद रंजन मिश्र - पुष्टिमार्ग के भक्त-कवि, वार्ता साहित्य और इतिहास
  45. सुरेश कुमार जिनागल - प्रतिरोध की परंपरा और भक्ति आंदोलन का स्वरूप
  46.  वर्षा कुमारी - कबीर की कविता का सरोकार
  47. मनीष कुमार - स्वाधीनता आन्दोलन पर भक्ति काव्य का प्रभाव
  48.  संगीता कुमारी - दर्शन और जीवन के मर्म को तलाशता मध्यकालीन भक्ति-आंदोलन
  49.  गुड्डू कुमार - रीतिकालीन कवियों की भक्ति-भावना
  50.  प्रशांत कुमार - मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन में दक्षिण भारतीय संतों की भूमिका
  51. अंकित कुमार - विद्यापति का समय और समाज
  52. अजीत आर्या - कबीर : पाश्चात्य हिंदी साहित्येतिहासों में
  53. प्रज्ञा शाकल्य – मराठी संतों का हिन्दी काव्य
  54. राखी – ‘जन - जन के राम’ और विद्यानिवास मिश्र
  55. निधिलता तिवारी - लोकजागरण और नवजागरण
  56. विनीत कुमार पाण्डेय - गुजराती भक्ति आंदोलन
  57. पुष्कर बंधु - सतनामी पंथ का दार्शनिक विवेचन और गुरु घासीदास
  58. नवनीत कुमार - मध्ययुगीन दक्खिनी हिंदी काव्य और किताबे-नौरस.
  59. विकास शुक्ल - ‘पौराणिक साहित्य’ के ‘आत्मसातीकरण’ के रूप में ‘कृष्णकाव्य’ का अनुशीलन.
  60. शेषांक चौधरी - पं. राधेश्याम कथावाचक कृत ‘राधेश्याम रामायण’ : एक अनुशीलन
  61. रंजना पाण्डेय - भक्ति कविता में महिलाएँ
  62. आशुतोष - जायसी की ‘कन्हावत’
  63. उमंग वाहाल - भक्तिकाल : देवदासी प्रथा का अंधकार युग
  64. दिगंत बोरा - शंकरदेव तथा उनके समकालीन कवियों का हिंदी साहित्य.
  65. नीतेश यादव - मध्यकालीन काव्यभाषा विमर्श
  66. बिभूति बिक्रम नाथ - श्रीमंत शंकरदेव कृत बरगीत और भटिमा .
  67. निम्मी सलोमी किंडो - स्त्री - चेतना की अलख जगाती मध्यकालीन स्त्रियाँ
  68. रजनीश कुमार - कबीर की विरासत और शैलेंद्र
  69. रुचि झा - ब्रज संस्कृति का माधुर्य एवं श्रीकृष्ण
  70. निरंजन सहाय एवं मनीष कुमार यादव - भक्तिकाल का लोकवृत्त और रहीम
  71. विजय नाथ जायसवाल - भक्ति आंदोलन : सतत सामजिक प्रतिरोध
  72. विनोद मिश्र - मध्यकालीन स्त्री-कविता के आईने में रानी रूपमती और उनका काव्य
  73. समीक्षा सिंह - हिन्दी आलोचकों की निगाह में जायसी
  74. मंजना कुमारी - बुल्लेशाह की कविता में वैचारिक एवं सांस्कृतिक संश्लेषण
  75. चारुचंद्र मिश्र - ब्रजभाषा के कृष्ण भक्त मुसलमान कवि
  76. संत कीनाराम त्रिपाठी - भारतीय संस्कृति की चिंता-धारा और संत रज्जब का काव्य
  77. प्रेम कुमार साव - श्रीमंत शंकरदेव का भक्तिकालीन काव्य में योगदान
  78. सूरज रंजन - आधी आबादी के प्रथम नवजागरण की अग्रदूत
  79. आदित्य रंजन यादव - निर्गुण काव्य में जीवन एवं मृत्यु की दार्शनिक अवधारणा
  80. प्रियंका प्रियदर्शनी - मध्यकालीन साहित्येतिहास लेखन की परंपरा और इतिहासबोध
  81. राहुल वर्मा - तमिल वैष्णव कवियों की भक्ति का स्वरुप और आंदाल
  82. दीपांशु पाठक - लोकमानस में राम और रामकथावाचक
  83. अमित कुमार - भक्ति आंदोलन और ‘चाँद’
  84. कैलाश पधान - ओड़िया लोकगीतों में धर्म का प्रभाव
  85. विवेक कुमार तिवारी - लोकजागरण और नवजागरण
  86. रामजीवन भील - भील आदिवासी समुदाय में भक्ति, पर्व और मेले
  87. धनंजय कुमार - संत कबीर और भगताही पंथ
  88. योगेंद्र प्रताप सिंह - लोक मानस और भक्ति

       साक्षात्कारगोपेश्वर सिंह


जिनका शोध आलेख स्वीकृत हुआ है उनके लिए 
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