शोध : दलितों के संघर्ष का जीवंत दस्तावेज ‘सलाम’ / डॉ.आलोक कुमार - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : दलितों के संघर्ष का जीवंत दस्तावेज ‘सलाम’ / डॉ.आलोक कुमार

दलितों के संघर्ष का जीवंत दस्तावेज ‘सलाम’ / डॉ.आलोक कुमार

 

शोध-सार :

समकालीन हिन्दी साहित्य में दलित साहित्य ने अपनी मजबूत स्थिति दर्ज की है वर्तमान में दलित साहित्य का महत्त्व दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। कुछ आलोचक कहते हैं कि दलित साहित्य वाकई में अच्छा साहित्य और जीवंत साहित्य है। वर्तमान का दलित साहित्य मनुष्यता के लिए संघर्ष कर रहा है। दलित साहित्य का विकास अपने समाज, संस्कृति और साहित्य के वर्चस्व के लिए जरूरी है। दलित साहित्य संकीर्णता का साहित्य नहीं है और न ही वह नया वर्णवाद गढ़ रहा है। इसका मुख्य आदर्श विखंडन की जगह सामंजस्य और संपूर्णता को लेकर है। यह साहित्य मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देने की वकालत करता है। विश्व के जिन राष्ट्रों ने औपनिवेशिक दासता की गुलामी झेली है और जिन सामाजिक समूहों को सामंती-वर्णवादी पीड़ा झेलनी पड़ी है, उन समूहों ने सामाजिक, राजनीतिक अंतर्संबंधों की ज्यादा मानवीय व्याख्या प्रस्तुत की है। आज के समकालीन दौर में मनुष्य अपनी चाह और रुचि के अनुसार व्यवस्था (वस्तु) को नकारता और अपनाता है। दलित साहित्य इसी नकार और प्रतिरोध का साहित्य है।  हिन्दी दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाश वाल्मीकि सशक्त हस्ताक्षर हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने कहानी संग्रहों में दलित जीवन की विभिन्न समस्याओं, यातनाओं एवं शोषण को अभिव्यक्ति किया है, जिसमें दलित समाज के जीवन और जिजीविषा की यथार्थ झलक दिखाई पड़ती है। उनकी कहानियों के पात्र तथा घटनाएं समय से संवाद करती हैं। इसी संवाद में दलित चिन्तन पुरानी जड़ता को खत्म करने की कवायद करता हैं। वर्ण और जाति समाज की सबसे बड़ी जड़ता रही है। वर्ण और जाति आधारित व्यवस्था को नकारकर समता आधारित व्यवस्था की निर्मिति दलित साहित्य का मुखर स्वर है।


बीज-शब्द : दलित साहित्य, जीवन मूल्य, वर्णव्यवस्था, शोषण, समतामूलक समाज, चेतना, संघर्ष, अमानवीयता, संताप, स्वतंत्रता।


मूल-आलेख :

स्वतंत्र भारत में दो शताब्दियों तक दलित आन्दोलन लगभग निष्क्रिय रहे, 1970 ई. के दशक के प्रारंभिक वर्षों में फिर उठ खड़े हुए। 1970 ई. में ही दलित पैंथरस्थापित कर लिया गया। मार्क्सवादी सिद्धांतशास्त्री इमानुल वैलेन्सटीन ने कहा- “दलित और गैर-ब्राह्मण जाति विरोधी आन्दोलनों को व्यवस्था विरोधी आन्दोलनों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि प्रकार्यात्मक समाजशास्त्री की भाषा में कहें, तो बजाय इसके कि इन्हें मानक संबंधी आन्दोलन कहें, इन्हें मूल्य संबंधी आंदोलन कहना उचित होगा।”[1] इन आन्दोलनों का प्रयास था कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था की मूल संरचना को रुपान्तरित किया जाय, जिससे जाति और उसके साथ जुड़े सामाजिक दमन, आर्थिक शोषण तथा राजनीतिक प्रभुत्व को समाप्त कर उसके स्थान पर एक समतावादी समाज स्थापित किया जा सके। महाराष्ट्र के एक पत्रकार जो जाति विरोधी सत्यशोधक समाज के मुख्य लोगों में एक थे, ने लिखा- “हिन्दुस्तान एक अजीब जगह है। जिसमें हर प्रकार के सामाजिक समूह हैं जो विभिन्न धर्म, विचारों, प्रचलनों तथा तरह-तरह की सूझ-बूझ से विभाजित है। लेकिन मोटे तौर पर यदि कहें तो इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला भाग नीची जातियों के बहुमत का है जो शताब्दियों से अपमानित होते रहें हैं। दूसरा थोड़े से मुट्ठीभर लोग जो सारा आनन्द प्राप्त करते हैं, अपने आप को श्रेष्ठ कहते हैं और बहुमत की कीमत पर जीते हैं। एक का कल्याण दूसरे की आपदा है और यही इसका पारस्परिक संबंध है।”[2]

 

यह बात गौर करने लायक है कि दलित आन्दोलन भारत में राष्ट्रवाद और मार्क्सवाद के उभरने साथ-साथ प्रारंभ हुए। इस जाति विरोधी आंदोलन के मुख्य नायक ज्योतिबाफुले, डॉ.अम्बेडकर और ई.वी.रामास्वामी पेरियार थे। भारत में इनके अतिरिक्त (केरल में नारायण स्वामी गुरु, उत्तर प्रदेश में अच्युतानंद, पंजाब में मंगू राम) हर स्तर पर सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से कई लोग शोषण की व्यवस्था पर कर रहे थे। चेतना का सरोकार संवेदना से जुड़ी होती है। डॉ.ममता देवी के अनुसार- “दलित विमर्श का जिस तरह राजनीतिक विकास हुआ, उस तरह साहित्यिक विकास नहीं हुआ। साहित्य में हम तीन धाराएँ या श्रेणियाँ देखते हैं। पहली धारा स्वयं दलित जातियों में जन्में लेखकों की हैं, जिनके पास स्वानुभूतियों का विराट संसार है। दूसरी धारा हिन्दू लेखकों की है, जिनके रचना संसार में दलितों का चित्रण सौन्दर्य सुख की विषय-वस्तु के रूप में होता है। तीसरी धारा प्रगतिशील लेखकों की है, जो दलित को सर्वहारा की स्थिति में देखते हैं।”[3]‘‘ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अस्सी के दशक से लिखना शुरू किया, लेकिन साहित्य के क्षेत्र में वे चर्चित और स्थापित हुए 1997 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा जूठनसे इस आत्मकथा से पता चलता है कि किस तरह वीभत्स उत्पीड़न के बीच एक दलित रचनाकार की चेतना का निर्माण और विकास होता है। किस तरह लम्बे समय से भारतीय समाज-व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर खड़ी चूहड़ाजाति का एक बालक ओमप्रकाश सवर्णों से मिली चोटों-कचोटों के बीच परिस्थितियों से संघर्ष करता हुआ दलित आन्दोलन का क्रान्तिकारी योद्धा ओमप्रकाश वाल्मीकि बनता है। दरअसल यह दलित चेतना के निर्माण का दहकता हुआ दस्तावेज है।’’[4]

 

साहित्य हमेशा समाज से जुड़ा होता है। साहित्य का दायित्व है कि वह विवेक और चेतना की शक्ति का प्रयोग करके समाज को विकास की राह पर ले कर चले। हर विकसित सभ्यता किसी न किसी व्यवस्था से होकर गुजरती है। दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने लेखन रचना प्रक्रिया को भी रेखांकित करने का प्रयास किया है। इस सन्दर्भ में वे कहते है -‘‘मेरी रचना प्रक्रिया में जातीय दंश बहुत गहरें हैं। मुझे यह कहने में या स्वीकार कर लेने में भी कोई गुरेज दिखाई नहीं देता कि मेरे लेखन में, चाहे कविता हो, कहानी या आत्मकथा हो सभी जगह यह स्वर प्रमुख है।’’[5]दलित चेतना, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर विद्रोही चेतना मानी गई है। वह मनुष्य को मनुष्य के रूप में ही देखना पसंद करती है। यह साहित्य आम आदमी के संघर्षों को व्यापकता देता है। इसके केन्द्र में इंसान हैं, जो प्रकृति का एक नन्हा सा रूप है। दलित चेतना की मूलभूत आवश्यकता भी स्वतंत्रता, समानता और बंधुता पर आधारित है। दलित साहित्य का अभिप्राय उस साहित्य से है जिसमें दलितों ने स्वयं अपनी पीड़ा को शब्द दिये हों। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में – “वर्ण व्यवस्था से उपजी घोर अमानवीयता, स्वतंत्रता, समता विरोधी सामाजिक अलगाव की पक्षधर सोच परिवर्तित कर बदलाव की प्रक्रिया तेज करना दलित साहित्य की मूल संवेदना है। डॉ. अम्बेडकर और ज्योतिबा फुले की जीवन दृष्टि दलित साहित्य की ऊर्जा है।”[6] अर्थात अपने संघर्षों के इतिहास में दलितों ने जिस पीड़ादायक यथार्थ को भोगा है, दलित साहित्य उसी की अभिव्यक्ति है। मसलन दलित साहित्य जीवन और जिजीविषा का साहित्य है।

 

समाज की बात को कहने के लिए कहानी एक अच्छी और सशक्त माध्यम है। यह समाज से सीधा संवाद करती है। दलित कहानी का जन्म भी मनुष्य के जन्म के साथ शुरू हुआ। कहानी सुनने और कहने की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी मनुष्य के जीवन के विकास की कथा। कहानी एकाएक फूटा नहीं करती यह तो घटित होती हैं। प्रमुख दलित कहानीकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी संग्रह सलामकी कहानियाँ भी समाज के यथार्थ को उजागर करती हैं तथा सवाल छोड़ती है। इनकी कहानियाँ दलित जीवन की संवेदनशीलता और अनुभवों की कहानियाँ हैं। ये कहानियां हजारों वर्षों की अंधेरे में दुबकी पीड़ा के यथार्थ से साक्षात्कार कराती हैं।

 

सलामकहानी भंगी जाति में प्रचलित शादी के समय अपमानित तथा निंदित करने वाली सलामप्रथा को तोड़ती है। इसमें दो समस्याएँ सामने आती हैं। एक तो समाज में व्याप्त सामंती- रिवाज जिसमें विवाह के बाद नवविवाहित वर-वधू को गैर दलितों के दरवाजे पर जाकर सलाम करना होता है। यह रस्म दूल्हे- दुल्हन दोनों को अपने ससुराल में निभाना पड़ता है। दूसरी कहानी के नायक हरीश के माध्यम से कथाकार ने दलितों को अपमानित तथा उनके आत्मसम्मान का हनन करने वाली इस रीति को तोड़ कर स्वातंत्र्य चेतना का संदेश दिया है। गैर-दलित पात्र बदलू रांघड़ जब ब्राह्मणवादी व्यवस्था टूटते देखता है, तो जुम्मन के घर जाकर पूरे बरातियों के सामने डांटता है।  जुम्मन तेरा जमाई इब तक ‘सलाम’ पर क्यों नहीं आया? तेरी बेटी का ब्याह है तो हमारा भी कुछ हक बनता है। जो नेग दस्तूर होता है, उसे निभाना ही पडे़गा। हमारी बहू-बेटियाँ घर में बैठी इंतजार कर रही हैं। उसे जल्दी लेके आजा।”[7] यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या उनकी बहू-बेटियाँ जुम्मन के घर नहीं आ सकती थीं? क्या जुम्मन के पगड़ी उतारने से ही उसकी इज्ज़त बच सकती है? जब वह कहता है कि- “चौधरी जी, जो सजा दोगे भुगत लूंगा, बेटी की बिदा हो जाणे दो। जमाई पढ़ा-लिखा लड़का है। गांव देहात की रीत ना जाणें है।”[8]

 

जुम्मन यहां जिम्मेदार पिता ही नहीं बल्कि अपने स्वाभिमानी दामाद का जागरूक ससुर भी है। उसने दोहरी जिम्मेदारी निभाई है। राजेन्द्र यादव ने इस कहानी को ब्राह्मणवाद के विरोध की कहानी कहा है।ब्राह्मणवादी व्यवस्था शिक्षा को भी हेय दृष्टि से देखती है तथा नारी शिक्षा को अमान्य मानती है। इस कहानी में अस्पृश्यता की नफरत समाप्त करने के उद्देश्य से नायक हरीश के गैर-दलित पात्र कमल उपाध्याय को दलित जाति के दर्द को बखूबी अहसास कराया गया है। जब चाय वाला कहता है कि- “चुहड़ों -चमारों को हमारी दुकान में चाय नही मिलती।” कमल कमल बार-बार कहता है कि मैं चुहड़ा नहीं हूँ, उपाध्याय हूँ, ब्राह्मण हूँ। लेकिन दुकानदार उसका उपहास करता है और कहता है कि- "शहर में चुतिया बणाना। मैं तो आदमी को देखते ही पिछाड़ लूँ किस जात का है।”[9]कमल द्वारा भाईयों! शब्द कहते ही रामपाल डांटता है और कहता है कि –“ओ शहरी जनखे हम तेरे भाई हैं? साले जबान सिंभाल के बोल, गांड में डंडा डाल के उल्टा कर दूंगा। जा जुम्मन चुहड़े से रिश्ता बणा। इतनी जोरदार लौंडियों को सहर वाले लिए जा रहें हैं, किसी के यहाँ गांव में ब्याह देता तो म्हारे जैसों का भी कुछ भला हो जाता..।”[10] दलित पात्र हरीश सलामकी प्रथा को इन्कार करते है और अपने लोगों को समझाते हुए कहता है कि मैं इस रिवाज को आत्मविश्वास तोड़ने की साजिश मानता हूँ। यह सलाम की रस्म बंद होनी चाहिए। इस प्रकार जाति भेद से उपजी मानसिकता ग्रामीण परिवेश में ज़हर घोलती नजर आ रही है। कहानी में एक प्रश्न सामने आता है कि जब कमल उपाध्याय को क्षणिक दलित समझे जाने पर अस्पृश्यता से उसका ह्रदय आहत हो जाता है। वह वहां एक पल भी ठहर नहीं पाता। तब अनुमान लगाया जा सकता है कि जो दलित सदियों से गैर- दलितों के जातीय उत्पीड़न के अमानवीय व्यवहार को झेल रहा है, उसे कितनी पीड़ा होगी?

 

गोहत्याकहानी हिन्दू समाज की संवेदनहीनता का चित्रण करती है। यह सामंतों द्वारा दलितों के निजी जीवन में अनधिकार हस्तक्षेप के विरोध की कहानी है। इसमें सामंतों के कांईयापन और धूर्तता को दिखाया गया है कि अपना बदला लेने के लिए वह किस हद तक जा सकते है। कहानी का नायक सुक्का ने अपनी पुरखों की रीत के अनुसार मुखिया के घर अपनी पत्नी को न भेजने की हिम्मत की, जिसके बदले उसको गोहत्या के आरोप में फंसाया गया। गाँव में सवर्णों की पंचायत बैठी। जिसमें मुखिया ने योजनाबद्ध तरीके से एक लोटे में पाँच-पाँच पर्चियां डाली। शर्त रखी गई कि जिसका नाम निकलेगा वही गोहत्या का अपराधी माना जाएगा। पर्ची निकाली जाती है और नाम आता है सुक्का का। यहाँ प्रश्न उठता है कि उस लोटे में सिर्फ दलितों के ही नाम क्यों डाले गये? अगर किसी सवर्ण जाति का नाम डाला जाता और उसमें से सुक्का का नाम बाहर आता तब उसे दोषी माना जाता। लेकिन यहाँ तो सजा सिर्फ नीच जाति को ही देनी थी।सजा थी हल के लोहे की फाल को आग में तपाया जाएगा जिसे दोनों हाथों में थामकर सुक्का गऊमाता-गऊमाता कहता दस कदम चलेगा। अगर वह गोहत्या नहीं किया है, तो गर्म लोहे की फाल उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।”[11]यहाँ गर्म लोहे की तुलना सीता के अग्नि परीक्षा से की गयी है। यहाँ सुक्का को पूछना चाहिए कि वह कौन सी वस्तु है जो आग में नहीं जलती। लेकिन उसे समाज ने तर्क करने का अधिकार ही नहीं दिया था। यह सजा सुनकर मुखिया पंडित रामसरन मन ही मन कहता है, “देख लिया बच्चू, हमसे उलझने का अंजाम।”[12] विडंबना यह है कि लोहे को गर्म एक दलित करता है और दलित को ही सजा दी जाती है। जिसके गवाह पंचायत में बैठे दलित ही थे, उन्हें इस अन्याय का एहसास भी है लेकिन वह विरोध नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें डर है कि वह घर से बेघर हो जाएंगे।

 

बैल की खालकहानी दलित हृदय की संवेदनशीलता को दर्शाती है। कहानी के पात्र काले और भूरे चमार हैं। वे पूरे गांव में उपेक्षित और अस्पृश्य हैं। उनकी जीविका का साधन बैलों की खाल है। वे जीवन जीने की सभी आवश्यक साधनों से वंचित है। समाज के बाकी लोगों को भी उनसे कोई मतलब नहीं है। जिस समय पंडित बृजमोहन का बैल मरने के बाद वह अपवित्र हो जाता है, उसी समय सभी को उन चमारों की याद आती है। गाँव में पशु डॉक्टर के आने से काले और भूरे की रोजी-रोटी समाप्त होने लगती है। वही लाला के द्वारा बैलों को जहर देने वाली बात को वे पाप मानते हैं। दलित अभाव में रहते हुए भी अविवेकी, हृदयहीन और स्वार्थी नहीं होते। बाजार जाते समय ट्रक से टक्कर खाकर गिरी बछिया को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए वे परेशान हो जाते हैं। वहां खाल महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण है बछिया का जीवन। वे मुर्दा पशु की खाल उतारते हैं, पशु की मौत नहीं चाहते। बछिया के मरने पर काले और भूरे गम में डूब जाते हैं, बल्कि उन्हें खुश होना चाहिए कि उन्हें एक और खाल मिल जाएगी। अर्थात कहा था जा सकता है कि दलित, जीवन का मूल्य समझते हैं, उनके अंदर भी संवेदना होती है।

 

कवंल भारती के शब्दों में -प्रेमचंद ने कफनकहानी में दलित का उपहास उड़ाया है और यह समझाने का प्रयास किया है कि दलितों की एकमात्र समय गरीबी है। यदि घीसू और माधव गरीब ना होते, तो कफन के पैसे मौजमस्ती में ना उड़ाते। अतः 'बैल की खाल' कफन के लिए बेहतरीन जवाब है। काले और भूरे गरीब हैं। खाल बेचकर ही जीविका चलाते हैं लेकिन उनके अंदर की मानवता मरी नहीं है। वे इतने संवेदनशील हैं कि बछड़ी के प्रति कारुणिक हो उठते हैं। “गरीबी ही यदि उनकी समस्या होती तो लाला का कहना मानते और पुड़िया (ज़हर) खिलाकर गाँव में रोज जानवर मारते। उनकी रोज खालें बिकती और वे चैन से दिन गुजारते।”[13]आज व्यक्ति अर्थतंत्र के शिकंजे में ऐसा जकड़ा हुआ है कि हर समय, हर क्षेत्र में उसे आर्थिक प्रश्न और चिंताएं मथती रहती हैं। दलित विरोधी समाज- व्यवस्था की क्रूरता और अमानवीयता को उजागर करती हुई सशक्त कहानी है –पच्चीस चौका डेढ़ सौ। इस कहानी के नायक सुदीप का पिता गांव के चौधरी के कर्ज, ब्याज और झूठ के भंवर में फंसा हुआ है। वह अपनी पत्नी के इलाज के लिए सौ रुपये उधार लेता है। उधार देते समय चौधरी कहता है –“ईब तू इमानदारी से सारा पैसा चुका देणा। सौ रुपये पर हर महीने पच्चीस रुपये ब्याज के बनते हैं। चार महीने हो गए हैं। ब्याज के हो गए पच्चीस चौका डेढ़ सौ। तू अपणा आदमी है तेरे से ज्यादा क्या लेण। डेढ़ सौ रुपये में से बीस रुपये कम कर दे। बीस रुपये तुझे छोड़ दिए। बचे एक सौ तीस। चार महीने का ब्याज, एक सौ तीस अभी दे दे। बाकी रहा मूल, जिब होगा दे देणा। महीने के महीने देते रहणा।”[14]

 

यह कहानी शोषण की परिस्थितियों को उजागर करती है। गांव के सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्ति जो ठगी, शोषण और दलित उत्पीड़न के बल पर अपना दबदबा बनाए हैं, जो सीधे- सरल और अनपढ़ व्यक्ति को पच्चीस चौका डेढ़ सौ बताते हैं। क्या कभी इन लोगों ने सोचा है कि मजबूरी में ठगे जा रहे दलितों के दिलों दिमाग पर क्या गुजरती होगी? जब नायक सुदीप शहर से नई चेतना लेकर आता है और अपने पिता के सामने पच्चीस-पच्चीस रुपये को चार बार गिनकर बताता है कि पिताजी पच्चीस चौका डेढ़ सौ नहीं सौ होता है। पिताजी की आँखों के सामने वे सारी घटनाएं गुजरने लगती हैं। उनके चेहरे पर पराजय नहीं बल्कि विश्वास में छले जाने की गहन पीड़ा झलकती है। पत्रकार मणिमाला के अनुसार –“पच्चीस चौका डेढ़ सौ” चेतना, संघर्ष और दलितों की भूख को व्यक्त करती है।”[15] संक्षेप में कहा जाए तो यह कहानी दलितों की अशिक्षा के कारण उनके ठगे जाने को दर्शाती है। दूसरी तरफ चौधरी के रूप में उजली छवि के पीछे उनका असली चेहरा दर्शाता है जो एक मक्कार, धोखेबाज और क्रूर आदमी का चेहरा है। डॉ. श्योराज सिंह बेचैन के शब्दों में- “एक पीढ़ी गुलामी के अंधकार में डूब गई और नई पीढ़ी उजाले की ओर है। यूं यह कहानी 'तमसो मा ज्योतिर्गमय की कहानी है।”[16]

 

अम्माएक स्वाभिमानी, परिश्रमी और सच्चरित्र दलित महिला की कहानी है। बकौल कहानीकार के शब्दों में- “यह कहानी अम्मा की है, लेकिन किसी एक अम्मा की नहीं है, ना जाने कितनी अम्मा सुबह- सवेरे हाथ में झाड़ू-कनस्तर थामे हुए गली मोहल्लों में मिल जाएंगी। जिनका जर्जर शरीर वक्त के थपेड़े खाकर पुराने दरख्त की तरह समय के साथ गलने लगा है। उनका हर एक पल एक अनजाने, अदृश्य भविष्य की ओर जा रहा है, जिसके बारे में तमाम भविष्यवाणियाँ, बौद्धिक कलाबाजियां और संकल्पनाएं बिखर जाती हैं या झूठी साबित होती हैं।” (अम्मा कहानी से) यह कहानी स्त्री की पारिवारिक स्थिति का सजीव चित्रण करती है। जिसमें अशिक्षा और धन के अभाव के चलते एक टिन के घर में तनावपूर्ण दांपत्य जीवन व्यतीत होता है। कहानी में नायिका अम्मा अपने परिवार को बचाने के लिए पुश्तैनी काम करने के लिए बाध्य होती है। लेकिन अपने बच्चों को इस कार्य से दूर रखती है और पढ़ाई को महत्त्व देती है। अर्थ का अभाव होने पर भी वह अपने खुद्दारी और इज्जत को बरकरार रखती है। मिसेज चोपड़ा के आशिक विनोद के द्वारा पकड़े जाने पर वह उसका विरोध करती है और झाड़ू से पीटने लगती है। और मिसेज चोपड़ा से कहती है -भैणजी जी इस हरामी के पिल्ले से कह देना कि ....हर औरत छिनाल ना होवे है।”[17]  वह समाज में हो रहे भ्रष्टाचार के प्रति सचेत भी है। उसका बेटा शिवचरण ठेकेदारी के काम में कमीशन खाता है, तब वह एक जिम्मेदार मां की भांति समाज की चिंता करती हुई कहती है -पर बेट्टे ...करके (जरा) उनकी भी तो सोच जो अपने जातकों के मुंह का कौर छीन के अपने मेहनत की कमाई तेरे हाथ में धर देवें हैं। न बेट्टे ....कभी सोचा है उनकी दुरदशा पे.... कैसे जीव हैं वे लोग?” अम्मा का गला भर आया था।.....मैंने ना चाहिए तेरी यो कमाई।”[18]श्योराज सिंह बेचैन के शब्दों में- “ ‘अम्मा’ कहानी के कहानीकार की यथार्थ पहुंच की गहराई का पता चलता है। तीन पीढ़ियों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र नहीं मिलता। अम्मा की खुद्दारी चारित्रिक उत्कृष्टता में कुछ भी अनावश्यक नहीं है। यही दलित संस्कृति है। अभाव सहना, मेहनत की खाना और सद्चरित्र रहना।”[19]

 

निष्कर्ष - आज साहित्य की दुनियां में दलित साहित्य प्रमुख भागीदारी निभा रहा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की संवेदना उन सभी शोषित और दलित जाति समाज से है जो यातना भोगते हैं। ‘सलाम’ कहानी संग्रह दलितों के जीवन- संघर्ष और उनकी बेचैनी का जीवंत दस्तावेज है। इन कहानीयों में दलित जीवन की व्यथा, छटपटाहट साफ-साफ दिखाई पड़ती है। अतः वाल्मीकि जी ने जहाँ साहित्य में वर्चस्व की सत्ता को चुनौती दी है। वहीं दबे-कुचले, शोषित-पीड़ित समूह कोमुखरता देकर इर्द-गिर्द व्याप्त विसंगतियों पर करारा चोट की है, जो दलित विमर्श को सार्थक बनाता है। 

सन्दर्भ 


[1]गेल ओमवेट, अनुवादक नरेश भार्गव : द राइज एंड फ्यूचर डिमाइज ऑफ द कैपिटलिस्ट सिस्टम :कन्सेप्ट फॉर कम्पेरेटिव एनालिसिस’, कम्पेरेटिव स्टडीज इन सोसायटी एंड हिस्ट्री, 16.4 (सितंबर, 1974), दलित और प्रजातान्त्रिक क्रांति, उपनिवेशीय भारत में डॉ. अम्बेडकर एंव दलित आंदोलन, 2009, पृ. 2

[2]वही, पृ. 3

[3] ममता देवी : दलित विमर्श : अवधारणा और इतिहास, International Journal of Information Movement, Vol. 2 Issue XII (April 2018) Page No. 242-247

[4] वहाँ भी तुम पहचानोगे मुझे मेरी जाति से ही!, दलित दस्तक न्यूज, जून 30, 2017

[5] ओमप्रकाश वाल्मीकि : दलित साहित्य : अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020, पृ. 26

[6] ओमप्रकाश वाल्मीकि : ‘अतिथि सम्पादकीय’ - प्रज्ञा साहित्य, (सं.रामकृष्ण राजपूत) 1994,

[7] ओमप्रकाश वाल्मीकि : सलाम, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2014, पृ. 17

[8] वही, पृ. 17

[9] वही, पृ. 12

[10] वही, पृ. 13

[11] वही, पृ. 62

[12] वही, पृ. 62

[13] कंवल भारती : ‘ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियां’, पूर्वदेवा, जून-सितंबर, 1996, पृ. 44

[14] ओमप्रकाश वाल्मीकि : सलाम, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2014, पृ. 81

[15] मणिमाला : हिन्दुस्तान रविवारसीय, 29 अक्टूबर 1995

[16] श्योराज सिंह बेचैन : युद्धरत आम आदमी, अंक-38, पृ. 87

[17] ओमप्रकाश वाल्मीकि : सलाम, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2014, पृ. 116

[18] वही, पृ. 120

[19] श्योराज सिंह बेचैन द्वारा- 20/07/1996 को ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'अम्मा' कहानी पर प्रतिक्रिया                 


डॉ. आलोक कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर
एस.एन.सिन्हा महाविद्यालय वारिसलीगंजनवादा
मगध विश्वविद्यालय, बोधगया kumaralok2012bhu@mail.com 9454160668

           अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

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