शोध : प्रवासी भारतीयों का सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष / घनश्याम कुशवाहा - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : प्रवासी भारतीयों का सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष / घनश्याम कुशवाहा


प्रवासी भारतीयों का सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष / घनश्याम कुशवाहा


शोध-सार :

भारत में जाति व्यवस्था और गरीबी हमेशा से विद्यमान रही है। गरीबी और शोषण के कारण ही ब्रिटिश शासन के दौरान बड़ी मात्रा में मजदूर गिरमिटिया के रूप में अपने देश से दूसरे अन्य देशों में जाने को विवश हुए। यह कहा जाता है कि गरीबों का कोई देश नहीं होता उन्हें मात्र एक औपनिवेशिक श्रम के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। भारत के गिरमिटिया मजदूरों को भी श्रम के बदले अच्छी सुविधा का लालच देकर उन्हें एक संविदात्मक लेकिन वैधानिक अनुबंध के तहत ब्रिटिश देशों में श्रमिक के रूप में भेजा गया। जहाँ पर उन्हें बहुत सी यातनाओं के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक तनाव भी झेलने पड़े। जब श्रमिकों का पलायन होता है तो उसके साथ उनकी संस्कृति भी पलायित होती है। उस संस्कृति में उनकी जाति व्यवस्था भी सम्मिलित रहती है। यह लेख उस तथ्य को उजागर करता है जिसमें प्रवासी देशों में भी भारतीयों के बीच की जाति व्यवस्था के तत्व और गुण विद्यमान हैं। यह लेख इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि जाति व्यवस्था किस प्रकार बदलते समय के अनुरूप अपने को ढाल लेती है। 


बीज-शब्द : प्रवासी भारतीय, गिरमिटिया मजदूर, जाति व्यवस्था, सांस्कृतिक संघर्ष। 


प्रस्तावना :

सन् 1800 ई. में इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत होती है। फैक्टरियों और बागानों में काम करने के लिए बड़ी मात्रा में मजदूरों की जरुरत थी। 1807 ई. में ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामों के व्यापार पर पाबन्दी लग गई।[i] दास प्रथा की समाप्ति ने बड़े पैमाने पर दास के रूप में काम करने वाले मजदूरों की संख्या में कमी कर दी। दूसरा एक बड़ा कारण यह भी था कि भारत की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही थी।[ii] ऐसे में ब्रिटेन के उपनिवेश वाले देशों में कामगारों की संख्या में भारी कमी आने लगी। एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में बड़ी संख्या में मज़दूरों की ज़रूरत महसूस की जाने लगी। इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए ब्रिटिश शासक अविभाजित भारत से मेहनती व ईमानदार मज़दूरों को ले जाते थे। भारत पहले से ही अंग्रेजी शोषण को झेल रहा था। यहाँ के लोग गरीबी और भुखमरी के कारण कोई भी समझौता करने को तैयार थे जो उन्हें मेहनत के बदले बेहतर जीवन जीने की आस दिला सके। देखा जाये तो आजादी की लड़ाई भारतीयों ने न सिर्फ भारत में बल्कि उन देशों में भी लड़ी जहाँ-जहाँ उन्हें मजदूर बनाकर ले जाया गया था। गिरमिटिया वे लोग हैं जो यहाँ से ‘इंडेंचर्ड लेबर’ के तौर पर एक अग्रीमेंट के तहत गए थे। इन्हें ऐसे कागजों पर अंगूठा / हस्ताक्षर करवाकर एग्रीमेंट अर्थात गिरमिट कराया जाता था, जिन्हें ये लोग न पढ़ सकते थे और न ही समझ सकते थे। जिसने ‘गिरमिट पर हस्ताक्षर किया, गिरमिटिया कहलाया।[iii] जहाँ भारतीय मजदूरों को समझ नहीं थी, एग्रीमेंट ज्यों-के-त्यों रह जाते, चीनी (चीन देश के) चालाक थे। वह एग्रीमेंट में मोल-भाव करते और हर चीनी मजदूर के एग्रीमेंट अलग-अलग होते, उनकी शर्तों पर। यह एक ही वर्ग के दो देशों के लोगों की अलग मानसिकता को दर्शाता है, वजह जो भी रही हो। चीन के लोग अपनी शर्तों पर जीते और भारतीय मालिक की शर्तों पर।[iv]

 

अंग्रेज गिरमिटिया लोगों से 5 से 9 साल का एग्रीमेण्ट करते थे। बाद में इन्हीं मजदूरों को ही ‘गिरमिटिया मजदूर’ कहा गया। गिरमिटिया असल में अंग्रेजी शब्द ‘एग्रीमेंट’ का अपभ्रंश है। गिरमिटिया मजदूरों ने मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, कैरिबियन द्वीपों, पूर्वी और दक्षिण अफ्रीका के देशों में अपने अस्तित्व के लिए निरंतर संघर्ष किये। अनगिनत अत्याचार सहे और फिर आजादी और अधिकारों की आवाज बुलंद की। आज इन्हें प्रवासी भारतीय की संज्ञा प्रदान की जाती है। देखा जाय तो औपबंधिक श्रम प्रणाली (इंडेंचर्ड लेबर सिस्टम) का स्वरुप संविदात्मक होने के साथ ही वैधानिक भी था। इस व्यवस्था के अनुसार मालिकों और कामगारों के बीच का सम्बन्ध अधिनियमों के तहत संचालित होता था। इस प्रकार के अधिनियम कमोवेश सभी उपनिवेशों में लागू थे। अनपढ़ भारतीय अनुबंधित श्रमिकों के लिए यह एक अबूझ पहेली की तरह था जिसमें वे आरकाटीयों (रिक्रूटर्स)के संपर्क में आकर उनके बहलावे-फुसलावे में फँस जाते थे। विकास निरंतर चलने वाली एक गतिशील प्रक्रिया है तथा प्रवास विकास की भित्ति के रूप में कार्य करती है। औपबंधिक श्रम प्रणाली ने अनुबंधित श्रमिकों के लिए एक बेहतर जीवन जीने के अवसर के रूप में उनके पलायन को आवश्यक बना दिया। यह भी कहा जा सकता है कि कोई दूसरा विकल्प नहीं होने के कारण भी उन्हें इस तरीके के अनुबंधों पर भरोसा कर अपना घर-बार और देश छोड़ना पड़ा। अपनी मिट्टी से दूर एक अनजान जगह पर जहाँ कुछ भी अपना कहने को नहीं था, यह उनके लिए एक बड़ी त्रासदी थी।

 

सांस्कृतिक तनाव और संघर्ष :

भारत से इन देशों में पलायन करने वाले मजदूरों को अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। यह तनाव उनके अपने ही देश से पलायन के साथ ही शुरू हो जाता था। भारत से पलायित जातियों में कमोबेश हर जाति के लोग प्रवास करते थे। चूँकि भारत में जाति व्यवस्था के तहत बनाये गए पैमाने उनके सामान्य व्यवहार में परिलक्षित होते थे। अत: जाति की पहचान और जाति व्यवस्था के तहत उच्च तथा निम्न जातियों के बीच सामाजिक दूरी का प्रावधान जैसे  छुआ-छूत, साथ-साथ खाने-पीने तथा उठने-बैठने इत्यादि पर प्रतिबंध के विपरीत व्यवहार उनके  बीच तनाव का भी एक कारण था। “ब्राह्मण दलित के साथ खाना नहीं खाना चाहते, उन्हें जबरदस्ती खिलाया जाता। ब्राह्मण इसलिए भी गिरमिटिया के तौर पर कम लिए जाते, पर जो फँस गये उन्हें छोड़ा भी नहीं जाता। इन जातियों की पहचान छुपाने का जिम्मा भी अरकाटी लोगों का था। उन्हें कमीशन के पैसे चाहिए थे और गरीब ब्राह्मणों को नौकरी। वो जनेऊ उतार फेंकते, और गुनगुने पानी में नमक डाल कर उसमें घन्टों हाथ रखवाते कि वो खुरदरे हो सकें। यह प्रतीत हो कि वो ब्राह्मण के कोमल हाथ नहीं, बल्कि मेहनतिया मजदूरों के हाथ हैं।”[v]

 

एक सामान्य सी मजदूर की शब्दावली को कार्ल मार्क्स के शब्दों में परिभाषित किया जाय तो एक वर्ग जो सामान्य उत्पादन प्रणाली में संलग्न हो तथा उनके उद्देश्य और साधारण हित एक जैसे हों। भारत से भी पलायित मजदूरों की श्रेणी लगभग ऐसी ही थी। इस प्रकार पलायित भारतीय मजदूर आतंरिक एवं बाह्य संघर्ष से जूझ रहे थे। प्रवीण कुमार झा के शब्दों में कहें तो “पलायन के बाद जब भारतीय मजदूर इन देशों में गये तो उन्हें तमाम तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ा। जब भी कोई नयी संस्कृति आती है, तो शुरुआती दौर शंकाओं से भरा होता है। वो भी इतनी अधिक संख्या में आयें तो स्थानीय लोगों में एक स्वाभाविक भय आ जाता है। इसलिए नहीं कि वो उनसे नफरत करते हैं, बल्कि इसलिए कि वो डरते हैं कि उनकी नौकरियाँ न चली जायें।[vi] दूसरी तरफ वहाँ उनके लिए कोई सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान नहीं था। उन्हें एक नई संस्कृति से सम्पर्क का संघर्ष भी झेलना पड़ा। किसी भी व्यक्ति को अपने मूल स्थान को छोड़कर नई जगह पर जाने के लिए उसे अपनी संस्कृति को भूलना / त्यागना पड़ता है और नयी जगह की प्रभावी संस्कृति को अपनाना पड़ता है जो कि एक दुरूह कार्य है। अपनी परंपरा और संस्कृति को त्यागने की पीड़ा तथा दूसरी संस्कृति को अपनाने की मजबूरी उसे जीवन जीने की जिजीविषा और जीवटता को बनाये रखने में मददगार साबित होती है। ‘हम’ और ‘वे’ की भावना उन्हें एक पृथक पहचान के रूप में ‘सामाजिक दूरी’ का पैमाना बनाती है। बोली, भाषा, रहन-सहन, वेष-भूषा, बात-चीत और खान-पान के तरीकों में भिन्नता लिए भारतीय मजदूर स्थानीय रूप से पूरी तरह उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त थे। उनके समक्ष केवल दुश्वारियाँ ही व्याप्त थीं और वे तमाम चुनौतियाँ जिनका सामना करते हुए उन्हें अपने अस्तित्व और गरिमा को बचाए रखना था।

 

अधिकतर गिरमिटिया मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों से निकले थे। ये अधिकतर पूर्वी उत्तर-प्रदेश और पश्चिमी बिहार के थे। जिनकी भाषा भोजपुरी थी। ये रेलगाड़ी से कलकत्ता पहुँचे थे। फिर कलकत्ता से महीनों की कष्टकारी यात्रा करके फिजी, मारीशस, सूरीनाम और त्रिनीदाद पहुँचे थे। इन गिरमिटिया लोगों से गन्ने के खेतों में काम कराया जाता था। असल में ये लोग बहुत मेहनती और गन्ने की खेती में पारंगत थे। स्थानीय लोग आलसी और कामचोर थे।स्थानीय लोग शिकार कर अपनी जीविका चलाते थे। मेहनत मजदूरी पर जीने वाले भारतीय मजदूर शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक शोषणकारी जीवन जीने को अभिशप्त थे। इनमें भी पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की स्थिति दयनीय थी। जो स्त्रियाँ भारतवर्षमें कभी अपने गाँव से बाहर नहीं गयी थीं, तथा उन्हें इतना तक नहीं पता था कि उनके जिले से बाहर भी कोई देश है भी या नहीं, वे आज हजारों कोस दूर फिजी, जमैका, क्यूबा, होंडुरस, गुयाना इत्यादि में जाकर रोजाना दस-दस घंटे कठिन परिश्रम करती थीं। स्त्रियों का जीवन जो भारतीय पितृसत्ता में पहले से ही उपेक्षित थीं वहाँ पहुंचकर उनके कष्ट का दायरा और बड़ा हो गया। भारतीय लोगों के प्रति गोरे लोगों के अमानुषिक अत्याचारों के विषय में अपनी पुस्तक ‘द फिजी ऑफ़ –टू-डे’ में बर्टन ने लिखा है कि, “असभ्य और जवान ओवरसियर जो कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के होते हैं, खुबसूरत हिंदुस्तानी स्त्रियों पर मनमानी अत्याचार करते हैं और अगर ये स्त्रियाँ मना करती हैं तो उनको और उनके पति को अत्यंत दुःख देते हैं”।[vii]  इस प्रकार समस्त प्रवासियों का दर्द यहीं तक सीमित नहीं था। उनका अपने देश भारतवर्ष लौटने पर भी वे उस घिनौनी जाति व्यवस्था की क्रूरता के शिकार होते थे। देश लौटने में जाति का भय भी इस कदर व्याप्त था कि कितने ही स्त्री और पुरुष अपने गिरमिट अनुबंध को पूरा करके अपनी मातृभूमि को लौटना चाहते थे लेकिन इस विचार से नहीं लौटे कि वहाँ पहुँच कर कोई हमें अपनी जाति में तो मिलायेगा नहीं, जाति–अपमान वहाँ और सहना पड़ेगा और यह कष्ट उन्हें मृत्युपर्यंत उठाने पड़ेंगें।

 

जीविका के लिए संघर्ष :

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और जीविका को लेकर जेहन में रोटी, कपड़ा और मकान की इच्छा रहती है, इन गिरमिटिया लोगों को भी इन्हीं आधारभूत सुविधाओं की लालसा थी। ये भारत से अपनी गरीबी और भूखमरी से तंग आकर यहाँ पहुँचे थे। वे चाहते थे कि इन एग्रीमेंट वाले 5 से 9 वर्षों में ही इतना कमा लें कि उनके भारत स्थित परिजनों की सारी समस्याएँ दूर हो जाएँ। लेकिन जैसा सोचा था वैसा हो न सका। इन्हें जी-तोड़ मेहनत के बदले सिर्फ उतना ही मिलता, जिससे कि इनका भरण पोषण हो सके। उनको ‘हैण्ड टू माउथ’ अर्थात हाथ से उठाओ और मुँह में डालोजितनी ही तनख्वाह मिलती थी। अंग्रेज इन्हें जरा भी आराम नहीं करने देते थे। बात-बात पर कोड़े बरसाते। इतना ही नहीं उस दौर में गिरमिटिया मजदूर बेचे और खरीदे भी जाते थे।

 

जागरण ई- अख़बार (05 जून 2021) लिखता है, ‘अभिलेखों में दर्ज दस्तावेजों के अनुसार 2 नवंबर, 1834 को भारतीय मजदूरों का पहला जत्था गन्ने की खेती के लिए कलकत्ता से एमवी एटलस जहाज पर सवार होकर मारीशस पहुँचा था’।[viii] आज भी वहाँ हर साल दो नवंबर को 'आप्रवासी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। 1815 में ब्रिटेन ने मारीशस पर कब्जा कर लिया तथा ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को यहाँ लाना जारी रखा। सन 1855 तक करीब डेढ़ लाख भारतीय मॉरिशस पहुँचा दिए गए थे। सामान्य संस्कृति और संख्यात्मक बल के चलते मजदूर संगठित होने लगे, और पंचायत बना ली, जिसे बैठकाकहा जाने लगा। लोगों ने अपनी कालोनियां बसाईं अपने बाजार विकसित किये, शिक्षा के महत्व पर जोर देने लगे तथा अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया। सन 1910 में जब गिरमिटिया युग का अंत हुआ तब तक मॉरिशस में साढ़े चार लाख से ज्यादा भारतीय आ चुके थे। विकिपीडिया के अनुसार, ‘विश्व के लगभग 48 देशों में रह रहे भारतीय प्रवासियों की जनसंख्या करीब 2 करोड़ है। इनमें से 11 देशों में 5 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीय वहाँ की औसत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं और वहाँ की आर्थिक व राजनीतिक दशा व दिशा को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ उनकी आर्थिक, शैक्षणिक व व्यावसायिक दक्षता का आधार काफी मजबूत है’।[ix]


 जाति और नृजातीयता :

      गिरमिटिया जहाज पर चढ़ने वाले सभी भारतीयों की स्थिति एक जैसी थी परन्तु जाति की पहचान होते ही वे एक दूसरे से दूरी बनाने लगते। सवर्ण और दलित का भेद कभी-कभार जहाज पर ही नज़र आ जाता। 1887 ई. के फ़ॉयल जहाज में पोदरथ सिंह के नेतृत्व में कुछ क्षत्रियों ने बस इसलिए जहाज से कूद कर अपनी जान दे दी, क्योंकि उन्हें किसी दलित ने छू दिया था।[x] राजीव रंजन राय ‘हिंदी समय’ में छपे अपने लेख ‘गिरमिटिया अनुभव एवं सांस्कृतिक लोकमानस’ में लिखते है- “बहुसांस्कृतिक समाजों में रहने और विशिष्ट नृजातीय पहचान निर्मित होने के कारण विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदायों को अलग – अलग प्रकार की नृजातीयता (एथनिसिटी) से जुड़ी समस्याओं से समझौता करना पड़ा। यहाँ तक कि इन्हें हिंसात्मक नृजातीय संघर्ष और प्रबल राजनीतिक आंदोलनों के विपरीत स्थितियों को भी झेलना पड़ा।”[xi]

 

भारतीय समाज विविधता के समेटे हुए है जिसमें प्रत्येक धर्म, जाति और नृजाती के लोग एक साथ अपनी पहचान बनाने हेतु संघर्षरत है। लेकिन देखा जाय तो इस मुद्दे पर अभी तक बहुत कम चर्चा हुई है। विवेक कुमार (2004, 2009) लिखते हैं कि “भारतीय डायस्पोरा में जाति बोध के विश्लेषण की काफी कमी है।” इनके अनुसार “समाज वैज्ञानिक भारतीय डायस्पोरा में जाति व्यवस्था के अस्तित्व से इंकार करते हैं। विवेक कुमार के अनुसार इसके उत्तर के लिए बहुत दूर जाने की जरुरत नहीं है।”[xii]

 

भारतीय समाज वैज्ञानिक विचारों में प्रगतिशीलता का परिचय तो देते हैं लेकिन जाति व्यवस्था की वास्तविकता पर चर्चा करने से कतराते हैं। इस संबंध में विवेक कुमार (2021) transcience’ मैगजीन में छपे अपने लेख में लिखते हैं कि जब भी लोग पलायन करते हैं तो वे महज एक जैविक व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि अपनी सामाजिक- सांस्कृतिक लक्षणों को भी साथ ले जाते हैं। जाति व्यवस्था भी उसी संस्कृति का हिस्सा होती है जो पलायित मजदूरों के साथ जाती है। यह भी तथ्य है कि डायस्पोरा के अंतर्गत जाति व्यवस्था अनुष्ठान पदानुक्रम और संस्तरण की संस्था के रूप में नहीं पायी जाती। लेकिन, जाति पूरी तरह से अनुपस्थित भी नहीं है। डायस्पोरा के अंतर्गत जाति व्यवस्था को अमेरिका, इंग्लैंड, सूरीनाम, मालदीव, फिजी इत्यादि में देखा जा सकता है। इसे इन रूपों में भी देख सकते हैं- प्रथम- यहाँ पर जाति एक जन्म के आधार पर अंतर्विवाही समुदाय के रूप में पाया जाता है। यह अंतर्विवाही समुदाय विभिन्न देशों में रहने वाले लोगों को उनके ही समुदाय के नेटवर्क के रूप में सम्बन्ध प्रदान करता है। दूसरा- जाति, विभेदीकरण की संस्था के रूप में पाया जाता है। जो उस समुदाय या जाति के लिए ‘जीवन-अवसर’ और ‘संसाधनों’ पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए प्रयास करती है। तीसरा- अमेरिका में डायस्पोरा के अंतर्गत विभिन्न जातियाँ अपने क्षेत्रीय और धार्मिक सीमाओं से हटकर अपने समुदाय की मुक्ति और दावे के लिए एकजुट होने का प्रयास करती हैं जैसे अमेरिका में भारतीय दलित जाति।[xiii]

 

भारत में जाति व्यवस्था की सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। प्रवासी भारतीयों में प्रायः सवर्ण जातियों में वर्गीय चेतना अधिक पायी जाती है चाहे वे विश्व के किसी भी देश में हों। इस संबंध में विवेक कुमार (2021) लिखते हैं कि “उत्तरी-अमेरिका के ब्राह्मण समाज’ (BSNA) एक सबसे बड़ा ब्राह्मण समाज का संगठन है जिसका मुख्य उद्देश्य ब्राह्मण समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए उन्हें एक साथ इकठ्ठा करना है। विवाह विज्ञापन (Matrimony) विश्व के किसी भी समाज और समुदाय की एक साझी विरासत होती है अतः ब्राह्मण समाज भी वह तमाम जरुरी नंबर उपलब्ध कराता है जो अपनी जाति में विवाह करना चाहते हैं।”[xiv] 2005 का उद्धरण देते हुए प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं कि “टेक्सास स्थित ‘वैदिक संस्था’ और ‘अमेरिकन हिन्दू एजुकेशन फाउंडेशन (HFF) ने कैलिफ़ोर्निया कर्रिकुलम कमीशन को एक शिकायत दर्ज कराई जिसमें कहा गया कि छठी कक्षा में पढ़ाये जाने वाले इतिहास विषय के ‘भारतीय इतिहास और हिन्दुइज्म’ में हिन्दुइज्म के खिलाफ पक्षपात रूप से कोर्स का संचालन किया जा रहा है। इस संगठन ने इसमें संशोधन की मांग करते हुये अपनी बात कही कि हिन्दू सामाजिक व्यवस्था की उत्पत्ति में भारत में जाति और छुआछूत को कोई धार्मिक संस्तुति प्राप्त नहीं है।”[xv]

 

देखा जाय तो अनेक शोध इस तथ्य को उजागर करते हैं। जुर्गंसमेयर[xvi] (1982) और परमजीत एस. जज[xvii] (2010) अपने अध्ययन में पाते हैं कि भारतीय डायस्पोरा में जाति विभिन्न धार्मिक समूहों में भी पायी जाती है। उन्होंने जाति आधारित विभेद को भारतीय डायस्पोरा के अंतर्गत सिक्खों और ईसाईयों में भी पाया है। यूनाइटेड किंगडम में बहुत सारे रविदासी गुरुद्वारे (दलित सिक्ख) सिक्खों में जाति विभाजन की गवाही देते हैं। मैक्डरमाँट (2009) ने ‘न्यू यॉर्क’ और ‘न्यू जेर्सी’ में डायस्पोरा में “भारतीय दलित इसाई’ विषय पर अपने शोध में पातीं हैं कि यहाँ के प्रकाशित वैवाहिक विज्ञापनों में भारतीय अपनी जातीय प्राथमिकता को अधिक महत्व देते हैं...यहाँ तक कि मिश्रित मंडली में अगर दलित होस्ट है तो भी लोग पारस्परिक क्रिया में भाग नहीं लेते।”[xviii]

 

अरुंधति रॉय ‘कारवां मैगज़ीन’ को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहती हैं कि गुलामी का इतिहास, जातिवाद, नागरिक-अधिकार आंदोलन की सफलता और असफलता की गहन पड़ताल जरुरी है। आगे यह भी लिखती हैं कि उत्तरी अमेरिका में अफ्रीकी अमरीकियों को "लोकतंत्र" के ढांचे के भीतर आखिर इतनी क्रूरता, असंगतता और असंतोष का सामना क्यों करना पड़ता है? यह जानने के लिए हमें अमेरिका में भारतीय समुदाय के अधिकांश लोगों की इसमें क्या भूमिका है तथापारंपरिक रूप से भारतीय समुदाय किसके साथ जुड़ा रहा है, इसको समझना होगा। अगर हम ईमानदारी से अपने स्वयं के मूल्यों और कार्यों का आकलन करें तो पातें हैं कि हम खुद एक ऐसे बीमार समाज में रहते हैं, जिसमें भाईचारे और एकजुटता की भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। अरुंधति रॉय का मानना है कि हम एक नस्लवादी संस्कृति हैंऔर भारतीय लोग गोरों से ज्यादा नस्लवादी हैं। वे कहती हैं, यदि आप बॉलीवुड फिल्में देखते हैं तो आपको लगेगा जैसे भारत गोरे लोगों का देश हो। काले लोगों के प्रति भारतीयों का नस्लवाद गोरों के नस्लवाद से कहीं ज्यादा बदतर है। यह अविश्वसनीय पर सत्य है। मैंने अपने काले मित्रों के साथ ऐसा घटित होते हुए सड़कों पर देखा है। और कभी-कभी यह प्रवृति ऐसे लोगों में भी दिखाई देती है जिनकी त्वचा का रंग वास्तव में कालों से कुछ ज्यादा अलग नहीं है![xix] कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो यह देखा जा सकता है कि भारतीय समाज में ऐसी कुरीतियों पर कोई बात नहीं होती। यूँ कहा जाय कि इसे ‘न्यू नार्मल’ के रूप में स्वीकार्यता मिल गई है जो कि असामाजिक और नस्लीय विषमता को दर्शाती है।


 निष्कर्ष -

विदेशों में बसा भारतीय समुदाय आज आर्थिक दृष्टिकोण से भले ही संपन्न हो गया हो लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से अभी भी बहुत पीछे है। वह अभी भी अपनी पारंपरिक जातिगत मानसिकता के मोह से दूर नहीं हो पाया है। साथ ही वह कुत्सित सांस्कृतिक रुढियों और मान्यताओं से भी बाहर नहीं निकल पाया है। भारतीय समाज में एकता की बात सिर्फ बाहरी तौर पर दिखाई पड़ती है लेकिन आतंरिक रूप से देखा जाये तोउच्च वर्ग आज भी अपने लोगों को सामाजिक रूप से अपनाने में हिचकता है। ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ के मुहावरों से सामाजिक सम्बन्धों का सही तरीके से बोध नहीं हो पाता।यह बात आज भी तथ्यात्मक रूप में विद्यमान है कि भारतदेश में भ्रष्टाचार के साथ लिंग, जाति, भाषा और रंग के आधार पर भेदभाव जारी है। विश्व में कहीं पर भी भारत की सांस्कृतिक विविधता को बनाये रखने के लिए विविधता के प्रत्येक तत्व को समान महत्व दिए बिना हम एक सभ्य राष्ट्र की कल्पना नहीं कर सकते।

 

सन्दर्भ :


[i]प्रवीन कुमार झा, 2020, कुली लाइन्स, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली. पेज संख्या 25

[ii]वही पेज संख्या 28

[iii]वही पेज संख्या 24

[iv]वही पेज संख्या 31

[v]वही पेज संख्या 38-39

[vi]वही पेज संख्या 171-172

[vii]Burton J. W. The Fiji of to-day. 1910.

[viii]https://www.jagran.com/uttar-pradesh/varanasi-city-ancestors-of-former-prime-minister-of-mauritius-were-traced-in-athilapura-ballia-went-as-indentured-in1873-21710034.html

[ix]प्रवासी भारतीय: विकिपीडिया: एक मुक्त ज्ञानकोश

[x]प्रवीन कुमार झा, 2020, कुली लाइन्स, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली. पेज संख्या 45

[xi]राजीव रंजन राय, गिरमिटिया अनुभव एवं सांस्कृतिक लोकमानस, हिंदी समय: महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का अभिक्रम, यू.जी.सी. जर्नल संख्या: 41485.

[xii]Kumar Vivek. 2009. “Dalit Diaspora: Invisible Existence.”पेज संख्या 37

[xiii]Kumar Vivek. 2021. Different shades of Caste among the Indian Diaspora in the US. Transcience. Vol.12, Issue 1. 1-12

[xiv] Ibid. 2

[xv] Ibid. 2

[xvi]Juergensmeyer, Mark. 1982. “Ravi Das in Wolverhampton.” University of California Press, Barkley, USA.

[xvii]Judge S Paramjit. 2010. “Punjabis in England: The Ad-Dharmi Experience.” Rawat Publication, Delhi.

[xviii] McDermott (Fell), Rachel. 2009. “From Hindustan to Christianity, From India to New York: Bondage and Exodus Experiences in the Lives of Indian Dalit Christians in the American Diaspora.” In South Asian Christian Diaspora: Invisible Diaspora in Europe and North America, edited by Knut Axel Jacobsen and Selva J. Raj, 235-236. Hampshire, UK: Ashgate Press.

[xix]भारतीय हैं गोरों से ज्यादा नस्लवादी : अरुंधति रॉय, 13 जून 2020.

https://caravanmagazine.in/society/we-live-in-a-castesist-hindu-nationalist-state-arundhati-roy-on-racism-and-casteism-hindi.

 


घनश्याम कुशवाहा

सहायक प्रोफेसर- समाजशास्त्र

पं. दी. द. उ. राजकीय बालिका महाविद्यालय सेवापुरी, वाराणसी

ghanshyamjnu@gmail.com9984671213

           अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

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