शोध : समकालीन हिंदी ग़ज़ल में वंचित समाज / दीपक कुमार - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : समकालीन हिंदी ग़ज़ल में वंचित समाज / दीपक कुमार

                                       समकालीन हिंदी ग़ज़ल में वंचित समाज / दीपक कुमार

 

शोध-सार 

ग़ज़ल अब केवल प्रेम और विरह जनित पीड़ा को व्यक्त करने का माध्यम भर नहीं रह गई है। ग़ज़ल में अब समकालीन जीवन की विसंगतियों से उत्पन्न विकारों और समस्याओं पर खुलकर अभिव्यक्ति होने लगी है। समकालीन हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत के प्रादुर्भाव से ग़ज़ल को जो राजनीतिक तेवर मिला है उससे आगे बढ़कर हिंदी ग़ज़ल अब समाज के वंचित तबके से जुड़े हर पहलू को पूरी सामर्थ्य से व्यक्त कर रही है। समकालीन हिंदी ग़ज़ल पूँजीवाद, भूमंडलीकरण और सामाजिक-राजनीतिक कुचक्र के शिकार किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, वृद्धजन, युवा और बच्चे आदि सभी की आशा-आकांक्षा और पीड़ाओं को न सिर्फ रेखांकित कर रही है अपितु समकालीन कविता के संस्कारों से पोषित होकर वह अन्याय के खिलाफ एक जुट होने का सन्देश दे रही है। प्रस्तुत शोध पत्र का प्रमुख उद्देश्य वंचित समाज की दुश्वारियों को व्यक्त करने में हिंदी ग़ज़ल की भूमिका को चिह्नित करने पर केन्द्रित है।

 

बीज-शब्द : समकालीन हिंदी ग़ज़ल, किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, आदिवासी, वृद्धजन, अल्पसंख्यक, वंचित समाज।

 

मूल आलेख 

कविता हृदय में निहित संवेदनाओं की अभिव्यक्ति की दुर्निवार विवशता से उत्पन्न होती है। इसी विवशता से आदिकवि वाल्मीकि का रामायण काव्य निःसृत हुआ और इसी से निराला की रचना सरोज स्मृति की सृष्टि हुई।साहित्य की इसी विशिष्टता को चिह्नित करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- “मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदु:खकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।”[1]आधुनिककाल में जब साहित्य ने रीतिकालीन दरबारी संस्कृति से मुक्ति की घोषणा की तब उसका सामना भारतीय जनजीवन के विद्रूप यथार्थ से हुआ। आगे चलकर एक ऐसा समय आया जब नई कविता के बौद्धिक आतंक ने हिन्दी कविता से संप्रेषणीयता की आवश्यकता के सारे विमर्श को गायब कर दिया था और कवि को अपनी कविता के उन लोगों तक न पहुँच पाने की पीड़ा भीतर तक सालने लगी थी जिनके लिए वह लिख रहा था, तब हिन्दी में ग़ज़ल के अंदाज़े-बयाँ, मारक प्रभाव, संप्रेषणीयता और स्मृतिजन्य क्षिप्रता की विशेषताओं को पहचानते हुए ग़ज़ल में समकालीन जीवन की विडम्बनाओं की प्रभावशाली अभिव्यक्ति होने लगी। ऐसे में अरबी से फ़ारसी और फिर फ़ारसी से उर्दू में अभिव्यक्ति का सशक्त और लोकप्रिय माध्यम बन चुकी ग़ज़लों के रूप में हिन्दी को एक नया शैल्पिक विकल्प मिला।दुष्यंत कुमार के साथ हिन्दी ग़ज़ल में व्यापक सामाजिक-राजनैतिक चेतना का प्रादुर्भाव दिखाई पड़ता है। उन्होंने ग़ज़ल को प्रेम और श्रृंगार के रूमानी परदे से बाहर निकालकर घोषणा की-

 

“वे  कर  रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू

मै क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है”[2]

 

दुष्यंत कुमार अपनी ग़ज़लों के साथ साहित्य के रात्रिकालीन नभ पर धूमकेतु की तरह प्रकट हुए और ग़ज़ल को हर प्रकार के शोषण के विरुद्ध एक विश्वस्त हथियार की तरह प्रयोग किया। डॉ. हरीतिमा कुमार का कथन है- “ग़ज़ल को श्रृंगार की परिधि से निकालकर दुष्यंत ने उसे आम आदमी की ज़िन्दगी से जोड़ दिया...उन्होंने ग़ज़ल को ‘दरबार’ से बाहर निकालकर ‘घरबार’ से जोड़ दिया।”[3]

 

आज़ादी के बाद जब भूमंडलीकरण और पूँजीवाद ने आदमी को बाज़ार की वस्तु बना दिया और धीरे-धीरे किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी, विस्थापित, बेरोज़गार आदि राजनीतिक षड्यंत्र और पूंजीवादी शोषण के शिकार होकर हाशिए पर चले गए, तबसमकालीन हिन्दी ग़ज़लकारों ने उर्दू ग़ज़ल की मूल संवेदना ‘प्रेम और विरह-व्यथा का वर्णन’ विषय का त्याग करते हुए समाज के हाशिए पर पड़े इन वंचित वर्गों के लोगों के भावों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की है। हिंदी ग़ज़ल के महत्वपूर्ण आलोचक नचिकेता ग़ज़ल को आधुनिक दबावों में हाशिये पर पड़े वंचित वर्ग की पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाले सशक्त माध्यम की तरह देखते हुए लिखते हैं- “इसका जन्म तो खूँखार और अमानवीय राजसत्ता के खिलाफ़ व्यापक जन-साधारण के असंतोष, असहमति, आक्रोश और प्रतिरोध की सार्थक अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।”[4]

 

दुष्यंत कुमार से समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की जो नई परम्परा विकसित हुई उसमें अदम गोंडवी, बल्ली सिंह चीमा, ज्ञान प्रकाश विवेक, गिरिराजशरण अग्रवाल, रामकुमार कृषक, राम मेश्राम, ज़हीर कुरेशी, कमलकिशोर श्रमिक, माधव कौशिक, देवेन्द्र आर्य, मधुवेश, महेश अग्रवाल, हरेराम समीप, इंदुश्रीवास्तव, विनय मिश्र, राजेश रेड्डी, किशन तिवारी, शिवओम अम्बर, डी.एम. मिश्र आदि हिन्दी ग़ज़लकारों ने समकालीन परिस्थितियों में वंचित समाज के कष्टों को केन्द्र में रखकर उनकी समस्याओं के लिए कहीं राजनीतिक व्यवस्थाओं तो कहीं सामाजिक जड़ताओं को उत्तरदायी ठहराया है। इन ग़ज़लकारों ने केवल राजनीति के विरोध के नारे नहीं गढ़े हैं अपितु इनकी ग़ज़लों में वंचित समाज की दयनीय दशा के प्रति अनुभूत जीवन परिस्थितियों की गहनता के दर्शन होते हैं। प्रभा दीक्षित अपने एक आलेख में लिखती हैं- “ग़ज़ल आधुनिक युग में सामंती युग की बेज़ुबान दरबारी रखैल नर्तकी नहीं है, बल्कि आधुनिक आज़ाद औरत की तरह अदब की अन्य विधाओं की अग्रिम कतार में जन-जन की मुक्ति का परचम उठाए इंकलाब की घोषणा कर रही है।”[5]

 

समकालीन हिंदी ग़ज़लकारों की गज़लों में स्त्री जीवन को न सिर्फ सच्चाई के साथ अभिव्यक्त किया गया है, बल्कि आधुनिक युग में परम्परागत रूढ़िवादी विचार को अपनाने वाले भारतीय समाज में नारी की दयनीय दशा और उसके प्रति सर्वव्याप्त भोगवादी दृष्टि को रेखांकित किया गया है। स्त्री के साथ घर और बाहर होने वाले दुराचार के कारण नारी की सामाजिक स्थिति तथा फैशनपरस्ती के कारण बाजारवादी ताकतों के दुष्चक्र में पड़कर स्त्रियों का स्वयं ही उसका हिस्सा बनते चले जाने की विसंगतियों पर समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में आक्रोश व्यक्त हुआ है। आलोचक व गज़लकार वशिष्ठ अनूप लिखते हैं- “समकालीन हिन्दी ग़ज़लों में स्त्री समुदाय की यथास्थिति, शोषण, दमन और वर्जनाओं के साथ ही उनकी परिवर्तनकामी आकांक्षाओं और प्रतिरोधी विचारों को भी बेहतर अभिव्यक्ति मिल रही है।”[6]

 

आधुनिक साहित्य में जब से स्त्री विमर्श अस्तित्व में आया है लगभग तभी से समाज-राजनीति-अर्थव्यवस्था सभी क्षेत्रों में स्त्री के अधिकारों की पुरजोर माँग की जा रही है।संसद ने भी गाँव-गाँव में स्थानीय शासन में आरक्षण के नाम पर महिलाओं को अधिक अवसर देकर नारी-सशक्तीकरण की दिशा में क़ानून बनाकर जो खानापूर्ति की है, हिंदी के गज़लकार डी. एम. मिश्र ने अपनी इन पंक्तियों में उसकी वास्तविकता से कुछ इस तरह रू-ब-रू करवाया है-

 

“लछमिनिया थी चुनी गयी परधान मगर

उसका  पति - प्रधान  देखकर  आया  हूँ” [7]

     

गरीब परिवार में बेटी का विवाह एक बड़ी चिंता का सबब हुआ करता है। ऐसे समय में बेटी का पिता अक्सर अपनी पूरी जमा-पूँजी विवाह में खर्च करके भी जहाँ एक ओर समाज के ठेकेदारों की आँखों में निरन्तर खटकता रहता है, वहीं दूसरी ओर ससुराल पक्ष के लालच के कुएँ को भर पाना भी उसके लिए असंभव होता है। समाज के इस विद्रूप को मधुवेश ने बहुत सटीक शब्दों में व्यक्त किया है-

 

“हाथ पीले कर गया घनश्याम बेटी के मगर

बाद उसके क्या हुआ अंजाम पैसे के बिना” [8]

 

भारतीय संस्कृति में स्त्री को देवी मानकर पूजने की बातें उस दौर में भी लगातार की जा रही हैं जब देश की सरकार को ‘बेटी-बचाओ, बेटी-पढ़ाओ’ जैसा देशव्यापी अभियान शुरू करने की आवश्यकता अनुभव हो रही है। भारतीय जन-मानस की संकुचित मानसिकता के चलते बेटियों को गर्भ में ही समाप्त कर देने का घृणित व्यापार हमारे इर्द-गिर्द पनपने लगा है, जिसके कारण देश की हजारों बेटियाँ माँ की कोख में ही मार डी जाती हैं। अनेक बार परिस्थितिवश इस कुकर्म में अजन्मी बेटियों की माँ भी भागीदार बन जाती हैं। देवेन्द्र आर्य के इस शेर में इस पीड़ा की गहनता को अनुभव किया जा सकता है-

 

“अब तो कोख में ही क़ब्रें भी होती हैं

एक माँ थी, अब धरती पर भगवान नहीं” [9]

 

सदियों से गाँव की भोली-भाली युवतियों के देह शोषण का एक बड़ा तंत्र हमारे देश में चल रहा है। ऐसे लोग जो समाज में मर्यादा के प्रतिमान समझे जाते हैं, अनेक बार बंद किवाड़ों के पीछे वही लोग नारी अस्मिता को तार-तार करते पाए जाते हैं। डी. एम. मिश्र ने समाज में पुरुषों के इस विद्रूप चेहरे को सामने लाते हुए लिखा है-

 

“गाँव की ताज़ी चिड़िया भून के प्लेट में रखी जाती है,

फिर  गिद्धों  की  दावत चलती पुरुषोत्तम के कमरे में” [10]

 

स्त्री को अपनी अस्मिता के लिए समाज के साथ-साथ पारिवारिक मोर्चे पर भी संघर्ष करना पड़ता है। जब कभी वह अपने सपनो को पूरा करने और अपने जीवन को आकार देने के लिए घर की देहरी से बाहर कदम रखती है तो पूरी व्यवस्था उसके विरोध में खड़ी हो जाती है। ऐसी स्त्री को विभिन्न घृणास्पद उपमाओं से विभूषित किया जाता है, वहीं परिवार में भी उसे अकेले ही सबकी प्रश्नवाचक निगाहों से जूझना पड़ता है। ग़ज़लकार राजेश रेड्डी ने पौराणिक व मिथकीय चेतना का आश्रय लेते हुए इस समस्या पर विचार किया है-

 

“रावण के ज़ुल्म सहके अदालत में राम की

सीताखड़ी हुई है गुनहगार की तरह” [11]

 

भारतीय समाज में दलित जातियों के साथ हुए अत्याचार और अन्याय का एक लंबा इतिहास है, जिसे झुठलाया जाना संभव नहीं है। अब भी यदा-कदा देश के लगभग हर हिस्से से दलित-शोषण की अमानवीय घटनाएँ सामने आती रहती हैं। समकालीन ग़ज़ल में यद्यपि दलित-विमर्श की तरह कोई स्वतन्त्र साहित्यिक धारा तो अस्तित्व में नहीं है लेकिन एक आत्मचेतस ग़ज़लकारों ने समाज के इस विद्रूप यथार्थ को भी अपनी ग़ज़लों में व्यक्त करते हुए हर प्रकार के शोषण और विभेदकारी मानसिकता के प्रति अपना विरोध जताया है। रामनारायण स्वामी ‘अंका’का कथन है- “समकालीन ग़ज़ल लेखन में कोई संकुचित दलित दृष्टिकोण नहीं दिखाई पड़ता, बल्कि ग़ज़लकार दलितों के पक्ष में कलम चलाते हुए उनका शोषण करने वाली शक्तियों को ज्यादा से ज्यादा रेखांकित करने की कोशिश करते हैं।”[12]गज़लकार किशन तिवारी ने जाति-मज़हब-रंग आदि सभी आधारों पर किए जाने वाले भेदभाव को नकारते हुए लिखा है-

 

“आपको मुझसे शिकायत है या मेरी जात से

नाम, मज़हब, रंग से तुमने चुना चेहरा मेरा” [13]

 

बहुत बड़ी विडंबना है कि जिन लोगों पर ये दायित्व है कि वे समाज में सभी के हितों की समान रूप से रक्षा करें और अवसरों की समानता उपलब्ध कराएँ, ऐसे लोग ही जब जातिवाद के सींखचों में कैद होकर पक्षपातपूर्ण आचरण करते हैं तो संविधान की समतामूलक अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। अपनी क्रांतिकारी ग़ज़लों के लिए प्रख्यात गज़लकार बल्ली सिंह चीमा लिखते हैं-

 

“यहाँ पर सब बराबर हैं ये दावा करने वाला ही

उसे ऊपर उठाता है मुझे नीचे गिराता है” [14]

 

यद्यपि पूरा देश ही जातिवादी मानसिकता की जंजीरों से बंधा हुआ है तथापि भारत के गाँवों में लोगों के अचेतन मन में ऊँच-नीच की भावना बहुत गहराई से पैंठी हुई है। कथासम्राट प्रेमचंद ने अपने गोदान में भारतीय ग्रामीण जीवन की समस्याओं को व्यक्त करते हुए दलित शोषण की समस्या को जिस रूप में प्रस्तुत किया था, उसी कथाबिम्ब को प्रयुक्त करते हुए बल्ली सिंह चीमा ने इस विद्रूप पर प्रहार किया है-

 

“अब भी पंडित रात में सिलिया चमारन को छलें

दिन में  ऊँची-जातियों के गीत गायें गाँव में” [15]

 

समकालीन हिंदी ग़ज़ल में अदम गोंडवी अपने विध्वंसकारी तेवर और आक्रामक अभिव्यक्ति के लिए अपना एक अलग स्थान रखते हैं। अदम ने राजनीति और समाज की तमाम बुराइयों पर कठोर प्रहार करते हुए पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आकांक्षा व्यक्त की है तथा सदियों से वंचना का दंश सहने वाली जातियों की करुण कहानी को बयाँ करने की आवश्यकता पर बल दिया है-

 

“सदियों से जो रहे उपेक्षित, श्रीमंतों के हरम सजाकर

उन दलितों की करुण कहानी मुद्रा से रैदास लिखेंगे” [16]

 

      जाति के आधार पर जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में किए जाने वाले भेदभाव और शोषण को नकारा नहीं जा सकता। ग़ज़लकारा इंदु श्रीवास्तव की ग़ज़लों में दलित जातियों की उपेक्षा के प्रति गहरी वितृष्णा का भाव दिखाई देता है, इसलिए हज़ारों-हज़ार शोषित दलितों की पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए, वे लिखती हैं-

 

“हमे मालूम है क्यों रोज़ झुठलाते हो हमको

हमारी जात को लेकर ही ठुकराते हो हमको” [17]

     

समकालीन हिंदी ग़ज़ल हिंदी और उर्दू की मिली-जुली सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि है। अपनी इसी विशेषता से हिंदी ग़ज़ल को समन्वय और परदु:खकातरता की अपार क्षमता प्राप्त हुई है।जियाउर रहमान जाफरी का कथन है- “हिन्दी ग़ज़ल मनुष्य को प्रेम, उल्लास और सुकून से जीने की हिमायत करती है, वह हर उस बँटवारे के खिलाफ है जो मनुष्य को जालिम, कठोर भीड़तंत्र का हिस्सा बना देती है।”[18]यही कारण है कि वरिष्ठ गज़लकार गिरिराजशरण अग्रवाल ने समाज में व्याप्त हर प्रकार के वैमनस्य और भेदभाव को नकारते हुए मानव को पेड़ की शाख पर हिल-मिल कर बैठने वाले पक्षियों के जीवन से प्रेरणा लेने का सन्देश दिया है-

 

“नफ़रत किसी के साथ, किसी से न भेदभाव

शाखों कोहर मिज़ाज का पंछी समान है”[19]

 

      भारत एक कृषि प्रधान देश है लेकिन भारत का किसान कभी भी अपने लिए बेहतर जीवन नहीं गढ़ पाया है। किसान कमोबेश आज भी उसी स्थिति में हैं जैसी स्थिति में वे आज़ादी से पहले थे। किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए देश में जो-जो योजनाएँ बनी हैं उनसे चाहे किसी का भला हुआ हो लेकिन किसान के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन उपस्थित नहीं हुआ है। हिंदी ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर विनय मिश्र किसान जीवन की विडंबना को व्यक्त करते हुए कहते हैं-

 

“उड़ी पुरखों की वो पगड़ी हवा में खानदानी भी

था खाली पेट पहले ही गई खेती किसानी भी”[20]

 

किसान जीवन की एक त्रासदी यह भी है कि वह अपनी फ़सल को सींचने के लिए महाजनों और बैंकों से कर्ज लेता है, लेकिन मौसम की मार से अनेक बार उसकी फ़सल नष्ट हो जाती है। इन परिस्थितियों में किसान को सुरक्षा देने वाली कोई भी योजना कारगर सिद्ध नहीं हुई है। आज भी देश के हज़ारों किसान कर्ज न चुका सकने की स्थिति में आत्महत्या कर लेते हैं। गज़लकार देवेन्द्र आर्य ने इस समस्या को अत्यंत मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है-

 

“नहीं करते थे खेतिहर आत्महत्या

उपज बेशक थी कम सौ साल पहले”[21]

 

      हर किसान की आकांक्षा होती है कि वो अपने खेत में बोये गये बीजों से लहलहाने वाली फ़सल को काटकर घर लाए और उसके परिवार के लोग सम्मानपूर्वक अपना जीवन यापन करें, लेकिन जब किसान कर्ज न चुका पाने या फसल के नष्ट हो जाने पर अवसादग्रस्त होकर खुदकशी कर लेता है तब आलोचक-गज़लकार रामकुमार कृषक उसके परिवार की करुण स्थिति को आत्मसात करते हुए लिखते हैं-

 

“बीज बोए थे खुशी के ख़ुदकुशी बोई न थी

चार कंधों पर फ़सल ऐसी कभी ढोई न थी” [22]

 

      समकालीन हिंदी ग़ज़ल में मजदूर जीवन की समस्याओं और संघर्षों को भी प्रामाणिक अभिव्यक्ति प्रदान की गई है। पूंजीपतियों के कारखानों में अपना जीवन खपा देने वाले मजदूर को अपने जीवन में एक अदद छुट्टी का दिन भी नसीब नहीं होता। जहीर कुरेशी ने मजदूर जीवन की दुश्वारियों पर लिखा है-

 

“कुछमजदूरोंके जीवन में,

जीवन भर ‘इतवार’ न पहुँचे”[23]

 

अपने खून-पसीने से मालिकों को हर सुविधा उपलब्ध करवाने वाले मजदूर आधारभूत सुविधा के नाम पर जीवन भर रोटी, कपड़ा और मकान के लिए भी संघर्षरत रहता है। अनेक बार उसे अपने हक़ के लिए लड़ाई लड़नी पड़ती है, जिसका खामियाजा उसे अपनी जान देकर भी चुकाना पड़ता है। कमल किशोर श्रमिक ने अपने जीवन में मजदूर यूनियनों से जुड़कर इस समस्या को बहुत करीब से देखा है, इसलिए वे कहते हैं-

 

“मेहनतकशों के पाक़ पसीने के एवज़ में

लाठी भी चली है यहाँ गोली भी चली है”[24]

 

समकालीन गज़लकारों ने मजदूर जीवन की बुनियादी समस्याओं को बारीकी से उकेरा है, वहीं हिंदी ग़ज़ल में श्रम के प्रति अपार श्रद्धा का भाव व्यक्त हुआ है। वरिष्ठ गज़लकार महेश अग्रवाल ने मजदूर के श्रम की तुलना वेदों की पवित्रता से करते हुए उसके प्रति सम्मान का भाव व्यक्त किया है-

 

“वह ज़मीं पर लिख रहा अपने पसीने से

पढ़ इसे ये वेदकी पावन ऋचाएँ हैं”[25]

 

आज भारत की अनेक समस्याओं में नक्सलवाद भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या है। नक्सलवाद की समस्या का सम्बन्ध भारत के वन्य क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदाय से जोड़ा जाता है। अपने जल, जंगल और ज़मीन से अटूट लगाव रखने वाला शांतिप्रिय आदिवासी समुदाय ने राजनीतिक-पूंजीवादी कुचक्रों में पड़कर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हथियार उठाकर नक्सलवाद का रास्ता अपना लिया यहाँ अत्यंत चिंता का विषय है। देवेन्द्र आर्य ने नक्सलवादी समस्या के पीछे संवैधानिक व्यवस्था की अवहेलना के सूत्र खोजे हैं-

 

“आदिवासी  नक्सली और संविधान

यूँ समझ लो इस भँवर से उस भँवर”[26]

 

कभी-कभी जब शोषण के तंत्र से मुक्ति के लिए आदिवासी समुदाय आवाज़ उठाता है और शहर की सड़कों पर उतारकर आन्दोलन की राह पकड़ता है तो राजनीतिक नेतृत्व उस पर सहानुभूतिपूर्वक चिंतन करने के बजाय उसके पीछे राजनीतिक षड्यंत्र के सूत्र खोजने लगता है। बल्ली सिंह चीमा ने अपने इस शेर में इस मानसिकता पर गहरा कटाक्ष किया है-

 

“जंगल को साथ लेकर ये घेरेंगेशहर को,

इन आदिवासियों की सियासत तो देखिए”[27]

 

वंचित वर्गों में देश के अल्पसंख्यक समुदाय को भी शामिल किया जाता है। यूँ तो देश में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा और उनकी उन्नति के लिए अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की गई है लेकिन फिर भी देश के अनेक हिस्सों से राजनीति प्रेरित दंगों और शोषण की ख़बरें निरन्तर प्रकाश में आती रहती हैं, जिनमें अनेक बार मासूमों को अपनी जान गँवानी पड़ती है। अपने अक्खड़ और सपाटबयानी के लिए विख्यात गज़लकार राम मेश्राम ने गुजरात दंगों में हुई बर्बरता के सम्बन्ध में लिखा है-

 

“बेशक शहीद हो गया अहसान ज़ाफरी

रोईख़ुदा के नाम पर इंसानियत नहीं”[28]

 

देश की आज़ादी के महायज्ञ में सभी कौमों ने मिलकर आहुति दी थी लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए इतिहास को खोदकर एक दूसरे से घृणा और द्वेष रखने के कारण उपस्थित किए जाते हैं। भोली-भाली जनता इतिहास के नाम पर दंगों में शरीक हो जाती है। वरिष्ठ गज़लकार रामकुमार कृषक कहते हैं-

 

बाबर बर्बर ही था लेकिन हम भीउससे घाट नहीं

वह खाता था कसम ख़ुदा की हम खा जाएँ मस्जिद को”[29]

 

इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि भारत की उन्नति के लिए सभी समुदायों को एक दूसरे पर विश्वास रखते हुए सौहार्द्रपूर्ण वातावरण का निर्माण कर एक दूजे के सुख-दुःख को अपनाना होगा। प्रसिद्ध गज़लकार हस्तीमल ‘हस्ती’ मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानते हुए मंदिर और मस्ज़िद में अंतर नहीं करते-

 

“मेरे घर केरस्ते में हैमस्जिद भीबुतख़ाना भी

सजदा भी है मुझको प्यारा, प्यारा शंख बजाना भी”[30]

 

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में भूख से दम तोड़ते, बाज़ारों में मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते, दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली का दंश झेलते बच्चों की पीड़ा को प्रभावी स्वर मिले हैं। हिंदी ग़ज़ल में भौतिकवादी जगत में यथार्थ की चक्की में पिसते हुए मासूम बचपन को विषय बनाकर भी अनेक शेर लिखे गये हैं। समकालीन हिंदी ग़ज़लकारों को प्रकाश में लाने की दिशा में महत्वपूर्ण शोधकार्य करने वाले गज़लकार हरेराम समीप ने ढाबे पर काम करने वाले बालश्रमिक की पीड़ा को व्यक्त करते हुए बोनज़ाई का प्रतीक ग्रहण किया है-

 

“बोनज़ाई गमले में है

ज्योंछोटू ढाबे में है”[31]

 

निम्न आय वर्ग के परिवार के बच्चे जहाँ-तहाँ मजदूरी करते दिखाई देते हैं। एक सभ्य समाज के लिए यह अत्यंत चिंता और शर्मिंदगी का विषय है। जिस उम्र में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए उस उम्र में अनेक बच्चे अमीरों की हवेलियों पर ईंट-गारा ढोते हुए देखे जा सकते हैं। गज़लकार शिवओम अम्बर को यह दृश्य भीतर तक कचोट जाता है-

 

“फूल जैसे सुबह गये घर से, राख हो शाम आ गये बच्चे

बन गया एक और शीशमहल, नींव में काम आ गये बच्चे”[32]

 

      अस्मितामूलक विमर्शों में अब भारतीय परिवारों के वृद्धजनों की उपेक्षा से उत्पन्न समस्याओं को केंद्र में रखकर साहित्य लिखा जा रहा । भारतीय पारम्परिक मूल्यों के निरंतर ह्रास और बाज़ारवाद से पनपी आधुनिक जीवन शैली ने हमारे बुजुर्गों को हाशिये पर डाल दिया है। समकालीन हिंदी ग़ज़लकारों ने इस विसंगति के खतरों की पहचान करते हुए अनेक ग़ज़लों में वृद्धजनों की आशा-आकांक्षाओं और उनकी पीड़ाओं की प्रामाणिक अभिव्यक्ति की है। माधव कौशिक ने समय के इस बदलाव को रेखांकित करते हुए लिखा है-

 

“वक्त के साथ ये बदलाव चलो आ ही गया

बच्चे माँ-बापको दीवार समझ लेते हैं”[33]

 

भारतीय संस्कारों और पारंपरिक मूल्यों के विघटन के साथ ही घर के मुखिया की मृत्यु पर बच्चों में जायदाद को लेकर होने वाले झगड़े अब आम हो चले हैं। वृद्ध माता-पिता की अंतिम समय में सेवा-शुश्रूषा करने वाली पीढ़ी अंतर्धान हो चुकी है। हरेराम समीप ने वर्तमान पीढ़ी की इस निर्दयतापूर्ण स्वार्थवृत्ति की भर्त्सना करते हुए कटाक्ष किया है-

 

“तेरहवीं के दिन बेटों के बीच बहस बस इतनी थी

किसने कितने ख़र्च किए हैं अम्मा की बीमारी में”[34]

 

बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या, कौशल आधारित शिक्षा के अभाव, राजनीतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी ने युवाओं में एक नया ‘बेरोज़गार’ वर्ग खड़ा कर दिया है। इस वर्ग के युवा शिक्षा ग्रहण करने के बाद या तो रोज़गार दफ़्तर की लाइनों में खड़े दिखाई देते हैं या सरकारों से अपने लिए रोज़गार की माँग करते हुए आये दिन देश-भर में आन्दोलन करते हुए दिखाई देते हैं। गज़लकार रामकुमार कृषक ने युवाओं के असंतोष को वाणी देते हुए लिखा है-

 

“लाइन में जाम हो जा यह रोज़गार दफ़्तर

रोज़ीकेनामरोज़ायह रोज़गार दफ़्तर” [35]

 

      जवान होते युवकों से पूरा परिवार बड़ी आशा रखता है, लेकिन जब वही युवा रोज़गार के लिए दर-दर की ठोकरें खाता है तो वह पूरे घर के लिए ही समस्या का कारण बन जाता है। ऐसी स्थिति में हमारे देश के युवाओं में अवसादग्रस्तता की समस्या निरन्तर बढ़ती चली जा रही है। जहीर कुरेशी ने बेरोज़गार युवाओं और उनके परिवार की मनःस्थिति को आत्मसात करते हुए लिखा है-

 

खूब पढ़-लिखकर भी जिनको काम मिल पाए नहीं

सबसे पहलेवे युवा, घर में समस्या बनगए”[36]

 

हिन्दी में आकर ग़ज़ल को जो नया संस्कार तेवर मिला उसे साहित्य संसार में अब प्रमुखता से अनुभव किया जा रहा है। ग़ज़लें अब सामाजिक परिवर्तन में क्रांतिकारी भूमिका निभाने का सशक्त माध्यम बन गई हैं। रामकुमार कृषक लिखते हैं- “रीतिवादी विश्रृंखलित भावधारा और खंडित सौंदर्यबोध के बजाय अब वह अपनी उद्देश्यपरकता से पहचानी जाती है।”[37] यही कारण है कि समकालीन हिंदी ग़ज़लों में अब वंचित समाज की आशा-आकांक्षा, दुःख-दर्द, तनाव-हताशा आदि का प्रामाणिक रूप से चित्रण किया जा रहा है।

 

सन्दर्भ -



[1]हजारी प्रसाद द्विवेदी : मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है, नया ज्ञानोदय (सं. लीलाधर मंडलोई), अंक 180, फरवरी 2018, पृ. 7

[2]दुष्यंत कुमार : साये में धूप, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, चौंसठवाँ संस्करण, 2016, पृ. 59

[3]हरीतिमा कुमार : ‘दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में आमजन की पीड़ा की अभिव्यक्ति’, हिन्दी ग़ज़ल का परिदृश्य  (सं. मधु खराटे), विद्या प्रकाशन, कानपुर, 2018, पृ. 127

[4]नचिकेता : अष्टछाप, फ़ोनीम पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली, तृतीय संस्करण, 2017, पृ. 7

[5]प्रभा दीक्षित : ‘हिन्दी ग़ज़ल : जन-पक्षधर जीवनानुभवों का ताप’, हिन्दी ग़ज़ल का परिदृश्य  (सं. मधु खराटे), विद्या प्रकाशन, कानपुर, 2018, पृ. 118

[6]वशिष्ठ अनूप, ‘समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में स्त्री विमर्श’ देशबंधु (ई पेपर), 15-07-2012, http://www.deshbandhu.co.in/vichar/

[7]डी. एम. मिश्र : आईना दर आईना, नई दिल्ली, 2016, पृ. 29

[8]मधुवेश : कदम कदम पर चौराहे, शब्दालोक, दिल्ली, 2014, पृ. 27

[9]देवेन्द्र आर्य : मोती मानुष चून, अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, पृ. 57

[10]डी. एम. मिश्र : आईना दर आईना, नई दिल्ली, 2016, पृ. 26

[11]राजेश रेड्डी: आसमान से आगे, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2009, पृ. 21

[12]रामनारायण स्वामी ‘अन्का’ : समकालीनता और हिन्दी ग़ज़ल, नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली, 2005, पृ. 108

[13]किशन तिवारी : धूप का रास्ता, पहले पहल प्रकाशन, भोपाल, 2019, पृ. 27

[14]बल्ली सिंह चीमा : उजालों को खबर कर दो, सेतु प्रकाशन, दिल्ली, 2019, पृ. 11

[15]बल्ली सिंह चीमा : जमीन से उठती आवाज़, फ़ोनीम पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली, 2012, पृ. 47

[16]अदम गोंडवी : समय से मुठभेड़, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2020, पृ. 27

[17]इंदु श्रीवास्तव : उड़ना बेआवाज़ परिंदे, अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ. 91

[18]जियाउर रहमान जाफरी : ‘हिन्दी के समकालीन ग़ज़लकारों की मूल संवेदना’, अक्षरवार्ता इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल, मई 2008, https://aksharwartajournal.page/article/hindee-ke-samakaaleen-gazalakaaron-kee-mool-sanvedana-/Trth8Q.html

[19]गिरिराजशरण अग्रवाल : आदमी है कहाँ, हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर, 2010, पृ. 113

[20]विनय मिश्र : सच और है, मेधा बुक्स, दिल्ली, 2012, पृ. 20

[21]देवेन्द्र आर्य : मोती मानुष चून, अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, पृ. 27

[22]रामकुमार कृषक : अपजस अपने नाम, परमेश्वरी प्रकाशन, दिल्ली, 2012, पृ. 110

[23]जहीर कुरेशी : बोलता है बीज भी, प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता, 2014, पृ. 59

[24]कमल किशोर श्रमिक : श्रमिक की ग़ज़लें, (सं. प्रभा दीक्षित), युगप्रभा प्रकाशन, कानपुर, 2001, पृ. 33

[25]महेश अग्रवाल : जो कहूँगा सच कहूँगा, उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ, 2009, पृ. 17

[26]देवेन्द्र आर्य : मोती मानुष चून, अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, पृ. 81

[27]बल्ली सिंह चीमा : उजालों को खबर कर दो, सेतु प्रकाशन, दिल्ली, 2019, पृ. 47

[28]राम मेश्राम : शोलों के फूल, मेधा बुक्स, दिल्ली, 2006, पृ. 27

[29]रामकुमार कृषक : अपजस अपने नाम, परमेश्वरी प्रकाशन, दिल्ली, 2012, पृ. 14

[30]हस्तीमल हस्ती : कुछ और तरह से भी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2005, पृ. 17

[31]हरेराम समीप : इस समय हम, शब्दालोक, दिल्ली, 2011, पृ. 55

[32]शिवओम अम्बर : विष पीना विस्मय मत करना, पांचाल प्रकाशन, फर्रूखाबाद, 2018, पृ. 36

[33]माधव कौशिक : नयी उम्मीद की दुनिया, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2019, पृ. 44

[34]हरेराम समीप : इस समय हम, शब्दालोक, दिल्ली, 2011, पृ. 25

[35]रामकुमार कृषक : नीम की पत्तियाँ, शिल्पायन, दिल्ली, 2018, पृ. 53

[36]जहीर कुरेशी : बोलता है बीज भी, प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता, 2014, पृ. 74

[37]रामकुमार कृषक : ‘जुड़ाव की साहित्यिक संस्कृति’, अलाव (अंक-45), मई-अगस्त, 2015, पृ. 7

  

दीपक कुमार
शोधार्थी
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान
एवं
सहायक आचार्य, राजकीय महाविद्यालय गोविन्दगढ़, अलवर, राजस्थान
9950885242, deep.alw82@gmail.com

  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021, चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue 

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