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रविवार, अगस्त 01, 2021

समीक्षा : 'फिरोजी आँधियाँ' के मार्फ़त व्यवस्था-बोध के प्रश्न/ डॉ. भावना मासीवाल

'फिरोजी आँधियाँ' के मार्फ़त व्यवस्था-बोध के प्रश्न / डॉभावना मासीवाल 


    ‘फिरोजी आँधियाँ’ उपन्यास ‘हुस्न तबस्सुम निहाँ’ का पहला उपन्यास है। हुस्न तबस्सुम निहाँ नवोदित लेखिकाओं में उभरता हुआ नाम है। उपन्यास से पूर्व कहानी और कविताओं के माध्यम से साहित्य में इनकी अपनी एक पहचान है। हाल ही में इनका पहला उपन्यास ‘फिरोजी आँधियाँ’ प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास नेपाल में माओवाद की पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। उपन्यास का नेपाल की पृष्ठभूमि से जुड़ना दरअसल लेखिका का नेपाल से आत्मीय संबंध का ही रूप है। लेखिका मूल रूप से बहराइच की है। भौगोलिक रूप से बहराइच नेपाल का समीपवर्ती क्षेत्र है। यह केवल भौगोलिक रूप से ही नहीं जुड़ा है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी जुड़ा है। यह संबंध इतना गहरा है कि भारत और नेपाल को अलग करके नहीं देखता है। “सीमा से लगे भारतीय क्षेत्रों को कभी ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि भारत कोई अलग राष्ट्र है”। नेपाल में 1996 ई. में माओवाद की शुरूआत होती है। माओवाद का उद्देश्य गरीबी, असमानता, भ्रष्टाचार को समाप्त कर अपने अधिकार और हक को प्राप्त करना था। माओवाद का नेपाल पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि यह जन आंदोलन, गृहयुद्ध में तब्दील हो गया। नेपाल की वर्ग विभेदी व्यवस्था ने नेपाल में माओवाद को बढ़ावा दिया। माओवादी लूटमार और चंदे के माध्यम से खुद को सशक्त बना रहे थे। नेपाल में माओवाद और राजशाही में आपसी वैमनस्य के कारण 2001ई. में नेपाल के युवराज दीपेन्द्र ने नेपाल के राजा और उनके परिवार की सामूहिक हत्या कर दी और उसके बाद आत्महत्या कर ली। सता में आई इस भीषण उथल-पुथल के बीच 2005ई. में नेपाल का शासन राजा ज्ञानेंद्र संभालते हैं। माओवादियों से शांतिपूर्ण वार्ता का प्रयास किया जाता है किन्तु विभिन्न मांगो के कारण असफल हो जाता है।माओवाद से प्रभावित देश में सत्ता और माओवाद के मध्य हिंसक आंदोलन आरंभ होता है। माओवाद अधिक प्रभावी होकर उभरता है और 2007 ई. में नेपाल में संवैधानिक संशोधन के माध्यम से राजतंत्र को समाप्त किया जाता है और लोकतंत्र बहाल किया जाता है।

 लोकतंत्र की बहाली के बाद नेपाल एक नए नेपाल का सपना संजोता है। इस बीच पूंजीपति वर्ग, हर वर्ग पर हावी होना चाहता है जिसमें पूंजीपति वर्ग पुन: लोभ, लालच और सत्ता लोलुपता के कारण सभी तरह की सरकारी व निजी संपतियों पर अपना एक मात्र हक़ जमाने लगता है जिससे निम्न वर्ग को उपेक्षा और वंचना झेलनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में नेपाल में एक बार पुनः गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न होती है। यह गृहयुद्ध पूंजीवाद के विरुद्ध गरीब, शोषित, उपेक्षित वर्ग का अपने अधिकार और हक़ की लड़ाई थी जिसे माओवाद की संज्ञा देकर दमन का दुष्चक्र रचा जाता है। जो सत्ता और पूंजीवादी शक्तियों से पोषित होता है। ऐसे में वर्चस्व एवं हक की यह लड़ाई हिंसा का रूप ग्रहण कर लेता है। जिसकी ज़िम्मेदार व्यवस्था थी।नेपाल के इसी घटनाक्रम को लेखिका ने उपन्यास का हिस्सा बनाया है।


 ‘फिरोजी आँधियाँ’ उपन्यास में लेखिका ने नेपाल में माओवाद और उसके प्रभाव से उत्पन्न स्थितियों की गहनता से पड़ताल करते हुए उपन्यास की कथा का केंद्र बनाया है।इस उपन्यास को माओवाद, मार्क्सवाद और लेनिनवादी विचारधाराओं से ऊपर उठकर देखें तो इस उपन्यास का केंद्रीय तत्व अशिक्षा, गरीबी, असमानताएवं आर्थिक विपन्नता है। यही नेपाल में माओवाद के जन्म का मुख्य आधार भी है। व्यवस्था के प्रति आक्रोश व व्यवस्था का जनता का पक्षधर होने की अपेक्षा उसका शोषण करने वाली मानसिकता से उत्पन्न द्वंद्व ‘माओवाद’ को जन्म देता है। मजदूर, किसान के श्रमजनित हाथों में बंदूक और बम देनेवाली यही व्यवस्था है। यह व्यवस्था किसी एक राजनीति का चेहरा नहीं है बल्कि पूरी राजनीति ही इस व्यवस्था की जन्मदात्री है।अगर नेपाल के संदर्भ में कहें तो यह व्यवस्था वहाँ की राजशाही व्यवस्था थी। यहाँ सरकारी तंत्र का एक हिस्सा समाज की बुनियादी जरुरतों के प्रति सजग है वह शिक्षा और उससे संबंधित व्यवस्था पर जोर देता है। परंतु इस तंत्र के माध्यम से अपना हित साधने वाला एक विशेष वर्ग, जिसे अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की कोई चिंता नहीं है। अपनी लोलुपता व निजी स्वार्थ के कारण वह सरकारी संसाधनों को आम आदमी तक पहुँचने नहीं देता है और यही से अराजकता का आरंभ भी होता है। इंसाफ व हक़ के लिए दर्ज किया गया प्रतिरोध बाद में विद्रोह में बदल जाता है।यह विद्रोह हिंसक होकर बंदूक उठा लेता है और उन्हें माओवादी बना देता है। इन माओवादियो की प्रतिक्रिया के स्वरूप व्यवस्था और तंत्र दमनकारी हो जाती है और माओवाद के इस आतंक से निज़ात पाने के लिए एक पूरा तंत्र खड़ा हो जाता है।इस पूरी व्यवस्था में उसे किसी को भी मारने व कुछ भी करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। सत्ता या व्यस्था के इस दमन चक्र में सबसे अधिक स्त्री ही दमित होती है।

 

‘फिरोजी आँधियाँ’ उपन्यास ललित और उसके दोस्तों के माध्यम से माओवाद पर प्रश्न खड़ा करता है। माओवाद का एक चेहरा जो अपने अधिकार के लिए बंदूक उठाने पर मजबूर होता है तो वहीं दूसरा चेहरा अराजकता का रूप धारण करके लूटपाट को अपना हिस्सा बनाता है। उपन्यास नेपाल में माओवाद की इन्हीं दोनों भूमिकाओं के माध्यम से पाठक से सवाल करता है कि क्या ललित माओवादी था? उसे माओवादी किसने बनाया? व्यवस्था या समाज ने? उपन्यास का पात्र ‘ललित’ जिसे माओवाद का अर्थ तक नहीं पता। व्यवस्था व बिचौलियों के शोषण से गाँव के बच्चों को मुक्त रखने व उन्हें शिक्षित करने के लक्ष्य के लिए वह विरोध दर्ज करता है।ललित का विद्यालय से आरंभ हुआ संघर्ष राष्ट्र के स्तर तक पहुँचता है। शिक्षा की उपेक्षा ही माओवाद व उससे जुड़ी समस्याओं को बढ़ावा देती है।व्यवस्था के प्रति अपना विरोध दर्ज करने मात्र के कारण ही ललित को माओवादी घोषित कर दिया जाता है।लोगों द्वारा ललित को माओवादी घोषित करना लोगों के लिए सामान्य घटना हो सकती है परंतु इससे ललित का जीवन विछिन्न हो जाता है। यहाँ एक प्रश्न और उभरता है कि क्या व्यवस्था के प्रति असहमति, माओवादी होना है? उपन्यास में लेखिका शिक्षा के इस संघर्ष को उपन्यास का केंद्र बनाती है। शिक्षा ही वह हथियार है जिसके माध्यम से आम आदमी अपने अधिकारों को समझ सकता है। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति अधिक शोषित होता है।वह  सरकार द्वारा नियोजित योजनाओं को नहीं जान पाता है। ऐसे में लेखिका ने बुनियादी शिक्षा के सवाल व उसकी उपयोगिता को मुख्य प्रश्न के रूप में उपन्यास में उकेरा है।

 

माओवाद और नक्सलवाद समस्या के रूप में वर्तमान समय में भी मौजूद है। इसका मुख्य कारण व्यवस्था द्वारा इन आंदोलनों के पीछे के मुख्य कारणों को समझे बिना, उसका निराकरण व समाधान करने की बजाय उसके ख़िलाफ़ दमन की नीतियों का अपनाना है। माओवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप व्यवस्था द्वारा आम नागरिक की हत्या के प्रश्न को ‘फिरोजी आँधियाँ’ उपन्यास की लेखिका हुस्न तबस्सुम निहाँ मुखर रूप से उठाती है।उपन्यास ‘फिरोजी आँधियाँ’राष्ट्र व सत्ता के मध्य मौजूद मौकापरस्त बिचौलियों की स्वार्थपरकता व सत्ता से उसके संबंधों को खोलता है। जहाँ आम आदमी इसका शिकार होता है और व्यवस्था के हाथों मारा जाता है। वह आम आदमी ललित है जिसे व्यवस्था मजबूर करती है और वह सामाजिक बदलाव के लिए बंदूक उठा कर व्यवस्था का विरोधी व माओवादी बना दिया जाता है।


 उपन्यास इसके साथ ही मधेसी बनाम पहाड़ी लोगो के संघर्ष को उपन्यास का केंद्र बनाता है।राजशाही की समाप्ति के बाद संविधान निर्माण की प्रक्रिया में मधेसी वर्ग की उपेक्षा के कारण उत्पन्न राजनीतिक संकट गहरा हो जाता है। दूसरी ओरसंपन्न मधेसी लोग शासन में खुद को काबिज करने के लिए माओवाद का साथ देते है।वह नेपाल में माओवाद के जरिए आर्थिक व राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास करते हैं। यही लाभ उन्हें मधेसियों का नेता बना देता है।मधेसी मूलत: भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार में बोली जाने वाली मैथिली, थारू, अवधी, भोजपुरी भाषा बोलते हैं। संस्कृति और रीति-रिवाज बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगों जैसे ही है केवल यह मधेसी नेपाली है जो सीमा के उस पार रहते हैं। राजशाही के समाप्त होने के साथ ही लोकतंत्र की बहाली और संविधान की निर्मिति के दौरान मधेसियों के अधिकारों में कटौती होने लगती है। यहीं से मधेसियों में असंतोष पनपने लगता है। “नेपाल सरकार हम मधेसिन भाईन का उ दर्जा नाय दई रही जउनै कय हम हकदार हन। इ हमार जन्म भूमि, करम भूमि तब्बौ हम अजनबीक अस हिंया रहित हय। हमार भाषा उपेक्षित, हमार संस्कृति उपेक्षित। इकै सबका नेपाल राष्ट्र माँ जगह दियावै खत्ती हम सबका एकजुट होय कय  संघर्ष करकै पड़ी...नेपाल में करीब 50 फीसदी मधेसियों का भारत के साथ रोटी बेटी का संबंध है। नेपाल सरकार का ये दुष्प्रयास इन सबंधों को समाप्त कर देने का दुष्कृत्य है”। नेपाल में मधेसियों ने सरकार से अपनी मांगों के लिए संघर्ष आरंभ कर दिया।इस तरह एक ओर मधेसियों का असंतोष तो दूसरी ओर थारू जनजाति का अपने अस्तित्व की रक्षा में मुखर होकर उभरना नेपाल में गृहयुद्ध को जन्म देता है।नेपाल में आंदोलन की आड़ में जो असामाजिकता उभरी उसने भी सामाजिक स्तर पर अराजकता को बढ़ावा दिया।नेपाल का यह गृहयुद्ध भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों को प्रभावित करता है।यहीं से नेपाल के इतिहास में माओवाद के आने के बाद से भारत और नेपाल के आत्मीय संबंधों में गिरावट आई।उपन्यास में लेखिका मधेसी आंदोलन के सम्मेलन में भारत और नेपाल के इस संबंध को उजागर करती है। इसके साथ ही उपन्यास नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों से अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों जैसे बंगाल में हथियार अवैध रूप से सप्लाई किए जाने के संदर्भ को उठाता है। हथियारों के बेचे जाने का यह संबंध व्यापार और उससे आर्थिक लाभ कमाना था। उपन्यास का पात्र कौशल आनंद जो बहुत ही गरीब परिवार से था और उस जैसे ही कुछ लोग नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों से पश्चिम बंगाल में हथियार का व्यापार करते थे।बाद में यही कौशल आनंद अवैध रूप से हथियारों की सप्लाई के माध्यम से मधेसियों का नेता बनता है और सत्ता में काबिज होने प्रयास करता हैं।“हालाँकि खरीदते नक्सली ही थे इन नक्सलियों के तार पूरे उत्तर भारत में फैले हुए थे।..चीन तक उन्होंने इसका विस्तार किया।..अपने इन कामों में वह प्राय: गरीब, शोषित और उत्पीड़ित मधेसियों को हथियार बनाते थे।” पश्चिम बंगाल में यह समय नक्सलवाद और उग्रवादी आंदोलन की सक्रियता का था।

 

 उपन्यास नेपाल में लोकतंत्र बहाल होने के बाद की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिकपरिस्थितियों को उजागर करने के साथ ही समाज में बलात्कार पीड़ित महिलाओं के प्रति सामाजिक व मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी उजागर करता है। उपन्यास में सेना द्वारा माओवादियों का साथ देने के संदेह मात्र पर गाँव की महिलाओं का बलात्कार किया जाना और इस हिंसक बलात्कार की घटना के बाद महिलाओं के पति द्वारा उन्हें जूठा बताकर उनका बहिष्कार कर देना और उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देता है।सुभान अपनी पत्नी को तलाक दे देता है। लखैया की विधवा भाभी आत्महत्या कर लेती है। रमेश अपनी पत्नी को जूठा कहकर घर से निकाल देता है।उपन्यास में समाज में स्त्री देह और उसकी यौन शुचिता के प्रति पुरुष की परम्परावादी मानसिकता वआम आदमी और सत्ता की इस लड़ाई में दोनों ओर से स्त्री देह को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की मानसिकता उभरती है। वहीं दूसरी ओर उसी समाज का एक पुरुष वर्ग जगजीत है जो बलात्कार को स्त्री शुचिता से जोड़कर नहीं देखता हैं। वह बलात्कार पीड़िता और उसके गर्भस्थ शिशु को सकारात्मक मानसिकता के साथ ‘बरकत’ के रूप में अपनाता है और कहता है “पत्नी को क्या चाहिए। बीज कहीं का भी हो, फूल तो उसकी गोद में ही खिलेगा। वह भी खुशी से मदमस्त”।

 

 यह उपन्यास साहित्यिक कृति मात्र नहीं,एक शोधपरक उपन्यास है। यह राजशाही के समाप्त होने बाद लोकतंत्र की बहाली और संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान माओवाद से प्रभावित नेपाल की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीति एवं आर्थिक स्थितियों का दस्तावेज है। कथ्य की प्रमाणिकता के लिए लेखिका ने नेपाल के लोगों से बातचीत, संबंधित मंचों से पढ़े गए पर्चों, मानवाधिकार कार्यक्रम की रिपोर्ट, शांति विकास अभियान कार्यक्रम और उसकी रिपोर्ट्स को उपन्यास का हिस्सा बनाया है।जमीनी स्तर पर आम आदमी पर माओवाद का सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव उनके पात्रों और उनके देशज संवादों में देखने को मिलता है।उपन्यास हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय बोली अवधी और नेपालीमें लिखा गया है।उपन्यास में अवधी और नेपाली का प्रयोग उसके पात्रों और समय-परिवेश के अनुकूल है।नेपाली भाषा के प्रयोग में लेखिका थोड़ी सतर्कता बरतती देखी जाती है। उपन्यास के प्रवाह में नेपाली भाषा बाधा न बने इसके लिए लेखिका ने नेपाली भाषा का हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत किया है। ‘फिरोजी आँधियाँ’ उपन्यास आम आदमी की संवेदनाओं पर केंद्रित व्यवस्था और सत्ता की लोलुपता में माओवादी बनाए जाने के आम आदमी के संघर्ष को उजागर करता है। इसके साथ ही व्यवस्था और आम आदमी के मध्य मौजूद स्वार्थपरक और भ्रष्टाचार में लिप्त व्यवस्था को भी उजागर करती है जो सरकारी तंत्र और आम आदमी के मध्य बिचौलिए की भूमिका निभाता है और आम आदमी का शोषण करता है। उपन्यास का नायक ‘ललित’ सत्ता से तो लड़ लेता है परंतु इन्हीं मध्यस्थता करने वाले पैरोकारों से मारा जाता है।जहाँ ललित व्यवस्था को बदलने के लिए हथियार उठा लेता है वहीं उपन्यास की दूसरी पात्र मधुश्री व्यवस्था में रहते हुए, व्यवस्था से संघर्ष कर, व्यवस्था के माध्यम से बदलाव लाने का प्रयास करती है।वह विधवा होने पर भी पुन: विवाह की अपेक्षा अपना पूरा जीवन लोगों के प्रति समर्पित कर देती है। ललित जहाँ अपने अधिकारों के लिए हथियार उठाता है वहीं मधुश्री का चरित्र बिना किसी अधिकार के मोह में अपना सर्वस्व धैर्य और समर्पण के साथ समाज व व्यवस्था में परिवर्तन के लिए लगा देती है। उसका संघर्ष समाज, व्यवस्था और सत्ता तीनों से था। ऐसे में लेखिका यह भी बताने का प्रयास करती है कि व्यवस्था बदलनेके लिए सिर्फ़ हथियार उठा लेना एक मात्र विकल्प नहीं है। व्यवस्था में रहकर बदलाव लाने की आवश्यकता है और यह प्रक्रिया बहुत ही धैर्य की मांग करती है। यह धैर्य मौजूदा युवाओं में नहीं है वह शीघ्र ही आक्रोशित होकर बंदूक उठा लेता है और स्वयं भी उसी बंदूक का शिकार हो जाता है। ऐसी स्थितियों में उपन्यास में ललित की तुलना में मधुश्री का व्यक्तित्व ज्यादा प्रभावी होकर उभरता है। इसीलिए उपन्यास की पात्र मधुश्री बुनियादी शिक्षा और उसकी आवश्यकता पर जोर देती है। नेपाल में शिक्षा ही वह रोशनी थी जिसके माध्यम से दमित व वंचित वर्ग अपने अधिकारों तक पहुँच बढ़ा सकता था। यह उपन्यास जीवन की विकास यात्रा के साथ-साथ मधुश्री के रूप में लेखिका की विचार यात्रा भी है।जो अपने साथ अपने समय समाज, राजनीति, इतिहास और उसमें आम आदमी के संघर्षको लेकर आगे बढ़ती है।यह उपन्यास नेपाल के एक क्षेत्र विशेष की ही नहीं बल्कि माओवादी आंदोलन से उत्पन्न संपूर्ण नेपाल के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करता है।

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फिरोजी आँधियाँ (उपन्यास):  हुस्न तबस्सुम ‘निहाँ’

मनीष पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण-2018, पृ.-112, मूल्य-300

 

डॉभावना मासीवाल

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय

कुणीधार(मानिला), उत्तराखण्ड

bhawnasakura@gmail.com, 8447105405

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021, चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue 

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