शोध : ओड़िया दलित उपन्यासों की छवि / ज़िनित सबा - अपनी माटी

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रविवार, अगस्त 01, 2021

शोध : ओड़िया दलित उपन्यासों की छवि / ज़िनित सबा

ओड़िया दलित उपन्यासों की छवि / ज़िनित सबा

 

शोध-सार :

    भारतीय साहित्य में दलित साहित्य का एक प्रमुख स्थान है। यह साहित्य तथाकथित सभ्य लोगों की उस दृष्टि का परिचायक है, जिसमें दलित वर्ग को सदैव उपेक्षित किया गया है। कई वर्षों के संघर्ष के बाद आज दलित साहित्य अपने स्वरूप को प्रकट कर पाया है। जहां पूरे देश में ‘दलित’ शब्द का प्रचलन है, वहीं आज भी ओड़िशा में दलित के लिए ‘हरिजन’ शब्द का ही प्रयोग है। आज भी आम ओड़िशा भाषी दलित शब्द से परिचित नहीं है। कुछ एक ओड़िया रचनाकार साहित्य में ‘दलित’ शब्द को प्रचलन में लाने का प्रयास कर रहे हैं। ओड़िया में दलित विमर्श नया है। जिसमें कविताओं और कहानियों की तो भरमार रही है किन्तु ओड़िया उपन्यासों की संख्या बहुत कम है। उपन्यास में यथार्थपरक दृष्टि मनुष्य के जीवन को सूक्ष्मता से दिखाने में ज्यादा सहायक सिद्ध है। इसलिए ओड़िया साहित्य अत्यधिक दलित उपन्यासों की मांग करता है। साथ ही यहाँ यह कहने में बहुत दुःख हो रहा है कि ओड़िया दलित साहित्य पर गंभीर आलोचना की आवश्यकता रही है। ओड़िया उपन्यासों के अध्ययन के क्रम में मुझे ऐसा कोई आलेख नहीं मिला जो ओड़िया उपन्यासों के विकासक्रम और उसका मूल्यांकन प्रस्तुत करता हो। इस आलेख में ओड़िया दलित समाज की छवि को प्रस्तुत करने के साथ ओड़िया साहित्य में दलित साहित्य का विकास, ओड़िया दलित साहित्य को देखने की कसौटी, ओड़िया उपन्यासों में दलितों के समक्ष समस्याएं और चुनौतियाँ, दलित साहित्य के विकास की संभावनाएं, ओड़िया दलित विमर्श की अनुगूँज आदि को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यह आलेख भारतीय दलित साहित्य में ओड़िया दलित साहित्य के योगदान को प्रस्तुत करता है।  


बीज-शब्द : समाज, दलित, दलित अस्मिता, आंदोलन, दलित विमर्श, ओड़िया दलित साहित्य, ओड़िया दलित उपन्यास। 


मूल-आलेख 

    भारतीय साहित्य में दलित साहित्य का एक प्रमुख स्थान है। यह साहित्य तथाकथित सभ्य लोगों की उस दृष्टि का परिचायक है, जिसमें दलित वर्ग को सदैव उपेक्षित किया गया है। कई वर्षों के संघर्ष के बाद आज दलित साहित्य अपने स्वरूप को प्रकट कर पाया है। अनुसंधान करने पर यह स्पष्ट हुआ कि अस्मिता की लड़ाई ने दलित वर्ग में अदम्य साहस भरा है, जिसके परिणाम स्वरूप हमारे पास ऐसा दलित साहित्य आया जिसे ओझल करने की बरबस कोशिश की गई है। भारतीय साहित्य में दलित साहित्य के विकास के बीज मराठी साहित्य में ढूँढे जा सकते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि मराठी साहित्य से विकसित दलित साहित्य से पूरा भारतीय साहित्य प्रभावित हुआ है। साथ ही यह कहते हुए हम यह नहीं भूल रहे हैं कि दलित आंदोलनों की इसमें बहुत बड़ी भूमिका रही है।


    ओड़िया साहित्य भी दलित चेतना से अछूता नहीं रहा। ओड़िया साहित्य में दलित साहित्य का विकास 21वीं शताब्दी से हुआ। भले ही इसका विकास अन्य भाषाओं के दलित साहित्य से काफी बाद में हुआ। किन्तु वर्तमान के संदर्भ में ओड़िया दलित साहित्य में विभिन्न विधाओं में प्रचुर मात्रा में लेखन जारी है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अन्य दलित साहित्य की भांति ओड़िया दलित साहित्य का विकास भी कविता से ही होता है। वासुदेव सुनानी का ‘अस्पृश्य’ कविता से ओड़िया दलित कविता की शुरुआत होती है। यह कविता संग्रह 2001 में प्रकाशित हुआ। साथ ही यहीं से दलित साहित्य का सही मायने में विकास माना जा सकता है। ऐसा नहीं है कि दलित जीवन से सम्बन्धित साहित्य ओड़िया में इससे पूर्व नहीं लिखा गया किन्तु दलित आलोचना में स्वानुभूति और सहानुभूति के सवाल खड़ा होने पर यह सिद्ध किया गया कि दलितों के द्वारा लिखित साहित्य ही दलित साहित्य है। इसलिए इसका प्रस्थान यही से मानना न्यायोचित होगा। 

 

    किसी भी साहित्य में कोई भी स्वर अचानक उपस्थित नहीं हो जाता, इसके पीछे विकास की एक  परंपरा अवश्य होती है। ओड़िया साहित्य में इसी परम्परा को तलाश करते हुए पाया गया कि ब्राह्मणवाद के विरोध में चर्या कवि सरहपा, लुइपा, डोम्भिपा, शबरपा, भुशुकपाद आदि ने काव्य लिखा। मध्य युग में शूद्रमुनि सारला दासब (15वीं शताब्दी), बलराम दास (15वीं शताब्दी) से होते हुए संत कवि भीमभोई (1850-1855) तक ब्राह्मणवाद का विरोध किया गया है। इस काल तक ओड़िया में शूद्रों के द्वारा लिखित साहित्य को महत्त्व प्राप्त था। ओड़िया साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रारंभिक चरण में शूद्रों के द्वारा लिखित साहित्य को केवल स्वीकार नहीं किया बल्कि उनके द्वारा लिखित साहित्य को सराहा भी गया। लेकिन उतरोत्तर दलितों के द्वारा लिखित साहित्य का महत्त्व कम होने लगा तथा सही मायने में उनकी रचनाओं की आलोचना तक नहीं की गयी। जिसके कारण लोक सामान्य के पास उनका साहित्य नहीं आ पाया। भले ही ओड़िया साहित्य में समय-समय पर ब्राह्मणवाद के विरोध में स्वर बुलंद किये गए। किन्तु  ओड़िया दलित साहित्य के बीज को संत कवि भीमभोई से ही ढूंढा जा सकता है। जिस प्रकार हिंदी में दलित साहित्य में रैदास और कबीर का स्थान है उसी प्रकार ओड़िया दलित साहित्य में भीमभोई का स्थान है।

       

    बहरहाल प्रारंभिक रचनाओं को देखते हुए ओड़िया भाषा के सवर्ण आलोचकों ने ‘दलित साहित्य’ के सम्बन्ध में कहा कि यहाँ दलित कौन है? ओड़िशा में दलित जैसा कोई प्रसंग है ही नहीं तब इस तरह के साहित्य को शामिल करके विवाद क्यों किया जा रहा है। साथ ही यह भी कहा गया कि साहित्य किसी जाति विशेष का नहीं है, इसलिए साहित्य को दलित साहित्य कह कर भाग-भाग न किया जाए। दलित साहित्य के आगमन के साथ सवर्ण विचारकों ने दलित साहित्य के विरोध में कई आलोचना की। किन्तु समय के परिवर्तन के साथ ओड़िशा के लोग भी ब्राह्मणवादी दृष्टि के शिकार होते गए। ओड़िशा में दलितों के प्रति शोषण बढ़ता गया तथा उनके प्रति उपेक्षा के भाव ने ओड़िया में दलित साहित्य को जन्म दिया। जिसका शोषण होगा वह अपनी अभिव्यक्ति तो करेगा ही। यह बड़ी दुःख की बात है कि ओड़िशा के ‘दलित साहित्य’ लेखन पर एक तरह से विरोध प्रकट किया गया। यहाँ तक की अख़बार और पत्र-पत्रिकाओं में इसके विरोध में कई लेख भी लिखे गए। इस तरह ओड़िया दलित साहित्य को कई विवादों को सामना करना पड़ा।


    दलित साहित्य के अन्य विधाओं की तरह दलित उपन्यासों का लेखन प्रारंभ हुआ। किन्तु ये बड़ी दुःख की बात है कि ओड़िया में दलित उपन्यास बहुत कम लिखे गए। दलित सम्बंधित उपन्यास कुछ सवर्ण उपन्यासकारों ने भी लिखे हैं। लेकिन इसे दलित साहित्य के अंतर्गत रखा जाना चाहिए या नहीं, यह एक बहुत बड़ा सवाल है। इस सम्बन्ध में सुप्रिया मलिक ‘दलित साहित्य : एक आलोचना’ लेख में लिखती हैं- “आधुनिक युग में गैर दलित साहित्यकारों की रचना, जिसमें दलित चरित्र, चित्र, परंपरा और संस्कृति को विकृत और वीभत्स करने का प्रयास जारी रहा है ऐसे में इन सभी को दलित साहित्य के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता।”[i] अतः इससे स्पष्ट है कि ओड़िया में भी दलित साहित्य में स्वानुभूति और सहानुभूति जैसे सवाल केंद्र में हैं। आलोचक सुप्रिया मुख्यतः दलितों के द्वारा लिखित दलित साहित्य के पक्षधर हैं। आगे वह लिखती हैं- “वर्तमान ओड़िशा में खड़ा हुआ नया विवाद है- गैर दलित साहित्यकारों के द्वारा लिखित दलित सम्बन्धी रचनाओं को ‘दलित साहित्य’ के रूप में विवेचना करना, ये एक असम्भव विचार है। जैसा कि पहले ही स्पष्ट है कि दलितों की अनुभूति, स्मृति और आत्मपरिचय ही दलित साहित्य का उत्स है। गैर दलितों की रचना केवल कल्पना आधारित है। उसमें अनुभूति, प्राण, ह्रदय की भाषा नहीं है केवल मस्तिष्क की भाषा का प्रयोग करके रचित रचनाएँ भाषा और शैली की दृष्टि से सुंदर और सुखात्मक हो सकते हैं किन्तु भाव और चेतना की दृष्टि से सही नहीं हैं, इसमें ब्राह्मणवादी साहित्यकार गोपीनाथ मोहंती के ‘परजा’ और ‘हरिजन’ का उदाहरण लिया जा सकता है।”[ii]   


    ओड़िया के दलित उपन्यासों के अध्ययन के क्रम में ये देखा गया कि ओड़िया साहित्य के उपन्यासों में पहले पहल साहित्य में दलित पात्र गौण रूप से आये। उसमें लेखक मूलतः सवर्ण होने के कारण दलितों के प्रति उनकी दृष्टि अच्छी नहीं रही। बाद में ‘हरिजन’ (1948) (गोपीनाथ मोहंती) उपन्यास दलितों को आधार बनाकर लिखा गया। किन्तु यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि दलित जीवन पर लिखित साहित्य दलित साहित्य के श्रेणी में नहीं आ सकता। स्वानुभूतिपूर्ण साहित्य को अगर महत्त्व दिया जाए तो इस उपन्यास को दलित उपन्यास नहीं माना जा सकता क्योंकि लेखक सवर्ण हैं और उन्होंने सहानुभूतिपूर्ण साहित्य लिखा है। साथ ही इस उपन्यास को दलित उपन्यास क्यों नहीं माना जा सकता इसका चित्रण सुप्रिया मलिक भी करती हैं– “ ‘हरिजन’ उपन्यास में दलित पुरुष चोर, शराबी, डाकू जैसे खल-चरित्र/खलनायक  के रूप तक ही सीमित हैं। दलित नारी यौनिकता का प्रतीक है। वह मर्यादा और अमर्यादा के अन्दर फर्क नहीं कर पाती है। वह केवल एक देह तृष्णा है। वह मन और विवेकहीन यौनमूर्ति मात्र है। पुनी, जेमा, टभा, रंग, कजलमति जैसे मेहतरानी से आरम्भ हो कर यशोदा तक सभी अज्ञानता वश पुरुष के यौन क्षुधा को परितृप्त करती हैं। परिमाणतः यशोदा नौकरानी बनती है और जेमा जन्म देती है अविनाश की पुत्री पुनी को। जिसके पीछे सामाजिक स्वीकृति नहीं है। पुनी भी स्वेच्छा से सवर्ण अघोर के साथ सम्बन्ध बनाती है। ...ऐसा की अविनाश के संपत्ति लालच ने मेहतर समुदाय के बस्ती को भी आग लगा देने के बावजूद पुनी अघोर की अपेक्षा करती है। ...परजा और हरिजन उपन्यास साहित्यिक मानसिकता से ही लिखा गया है। इसमें दलित चेतना का प्रश्न ही नहीं है।”[iii] इस प्रकार देख सकते हैं ‘हरिजन’ उपन्यास में भले ही दलितों के लेकर उपन्यास लिखा गया है लेकिन इसमें दलित चेतना और अस्मिता का अभाव रहा है। इसमें दलित पात्र आक्रोश व्यक्त नहीं करता, बल्कि परिस्थिति और पीड़ा से ही उभर नहीं पाता है। इसी परम्परा में विभूति पट्टनायक का ‘असवर्ण’ उपन्यास 1982 में प्रकाशित होता है।


    इसके बाद दलित उपन्यासों की शुरुआत दलित लेखकों के द्वारा होती है। अभी तक ऐसे तीन उपन्यास ही उपलब्ध हो पाए हैं, जिसके लेखक दलित हैं। अखिल नायक (भेद), वासुदेव सुनानी (पोड़ापोड़ी), सत्यप्रिय महालिक (कवर स्टोरी), (दलित बच्ची का बलात्कार से सम्बंधित)। ये उपन्यास मूलतः दलित चेतना पर आधारित है, जिनमें दलितों का आक्रोश और अम्बेडकरवादी विचारधारा प्रस्तुत है।


    ओड़िशा में ही नहीं बल्कि भारत में आये दिन दलितों पर शोषण की खबरें छपती रहती है। आधुनिक समाज में बढ़ती सजगता ने जैसे दलितों के प्रति बढ़ते शोषण को और बढ़ावा दिया है। भले ही दलितों के प्रति हो रहे शोषण का विरोध किया जा रहा है, लेकिन उनके प्रति हो रहे शोषण में शायद ही कमी आई हो। कभी-कभी उन्हें दलित होने के कारण सवर्ण बस्ती से बाहर कर दिया जाता है तो कभी उनके घरों में आग लगा दी जाती है, कभी-कभी उन्हें बेदम पीटा जाता है, आये दिन इसकी चर्चा अख़बारों में मिलती है। 2012 में ओड़िशा के बलांगीर में स्थित लाठोर में दलितों का दुर्गापूजा में शामिल होने के कारण 38 दलित परिवारों के घर में आग लगा दिया गया। इसी यथार्थ घटना पर ‘पोड़ापोड़ी’ उपन्यास आधारित है। इसमें हिन्दू समाज में स्थित जाति-प्रथा के नाम पर कट्टरता और बर्बरता को प्रस्तुत किया गया है। उपन्यासकार इस उपन्यास में पश्चिम ओड़िशा में दलितों के घर जलाने के पीछे कारणों की भी पड़ताल करते हैं। आगे वह स्पष्ट करते हैं कि घर जलाने के पीछे यही कारण रहा कि- दलित, वर्तमान में सवर्ण समाज के उच्च जातियों की परंपरा को अपनाने लगे थे। सवर्ण समाज को यह शंका होने लगी है कि कहीं दलित उनकी बराबरी करने न लगें। इस उपन्यास में कुछ दलित पात्र गणेश, विकास, मानस, सुरेश सवर्णों की तरह दुर्गा पूजा और देवी देवताओं को पूजने लगते हैं। अपने लिए मंदिर का निर्माण करते हैं। क्योंकि सवर्ण मंदिरों में उनका प्रवेश निषेध है। सत्ता में स्थित सरकार भले ही अपना उल्लू सीधा करने के लिए ‘गणा’ दलितों के मंदिर की मांग को पूरा करते हुए हनुमान मंदिर का निर्माण करवाते हैं किन्तु स्वर्ण समाज इसका विरोध करता है बाद में उस मंदिर में भी उनका प्रवेश वर्जित हो जाता है। दलितों में शिक्षा की बढ़ोतरी से भी सवर्ण समाज खुश नहीं है क्योंकि दलित हर उस चीज़ पर प्रश्न खड़ा करता है, जिससे वह वंचित रहता आया है। सवर्ण अपनी वर्चस्ववादी शक्ति को खोता देख परेशान थे जिसका हल उन्होंने दलितों का घर जला कर किया था। इससे एक बात यह स्पष्ट हो गयी कि दलितों में आये अस्तित्वबोध और अपने प्रति हो रहे शोषण के प्रति विरोधात्मक स्वर ने सवर्णों को और ज्यादा क्रूर और जातिवादी बना दिया है। वे दलितों की प्रगति से खुद को हीन भावना से ग्रस्त मानने लगे हैं। इसलिए दलितों को अनेक तरह से प्रताड़ित करते हैं। समय की गतिशीलता के कारण दलितों के समक्ष नयी चुनौती आ रही है सबसे बड़ी चुनौती खुद को सुरक्षित रखने के साथ-साथ आत्मविश्वास और अस्तित्वबोध को बचाए रखने की रही है। अतः यही कहना होगा कि समकालीन परिदृश्य में दलितों के शोषण के पैमाने बदल रहे हैं, इसलिए जरूरत है इस राजनीति को समझने की। 


    सवर्ण मूल रूप से दलितों का शोषण उसी रूप में करने के आकांक्षी हैं जिस तरह वे करते आये हैं। दलितों में आये बदलाव ने सवर्ण मानसिकता को गहरी चोट पहुंचाई है जैसे- “वास्तव में जो गणा लोग उसके सामने खड़ा नहीं हो पाते थे, एक घाट में नहा नहीं पाते थे, रास्ते में साथ नहीं चल पाते थे, छींक आने पर छींक नहीं पाते थे, थूक आने पर उसे पी जाते थे, केस या मुक़दमा होने पर उनके परामर्श के बिना कुछ नहीं कर पाते थे। रास्ते में चलते समय झुक कर प्रणाम करते थे। वे फिर ऐसा दंड विधान कर सकते हैं? उनके (दलित) निर्देश पर कान पकड़ कर एक पैर पर खड़ा होना पड़ेगा?....इस तरह दयनीय एवं दंड विधान करने के बाद गणा लोग उन्हें और न खातिर करेंगे और न सम्मान पूर्वक उनसे बातें कर सकेंगे।”[iv] इस उपन्यास में एक तरह से भूमंडलीकरण के दौर में दलितों पर पड़ने वाले जातिवाद के प्रभाव को दिखाया गया। साथ ही ऐसे समय में कैसे प्रशासन भी दलितों का साथ नहीं दे रहा है इसका भी चित्रण किया गया है-चित्र कहता है– “अरे ये बातें मुझे भी नहीं मालूम थी कि गलती हमारी ही है। इस बूढ़े उम्र में यह समझ पा रहा हूँ कि ये सारी गलती हमारी ही है। देख! दिल्ली से अनुसूचित जनजाति के अध्यक्ष आये थे। हमारे सभी के जले घरों को देखा, प्रायः अनेक लोगों के साथ बातचीत की। राज्य सरकार की तरफ से भी  अनेक अधिकारी आये थे। उन्होंने कहा कि हम गणा (दलित) हो कर नहीं रह पाए, हर वक्त उच्च जाति का होने के लिए कोशिश करते रहे।”[v] एक तरह से कह सकते हैं कि लोगों की पूर्वाग्रह तथा धार्मिक कट्टरता और प्रशासन की ढील के कारण ही दलितों पर हो रहे शारीरिक शोषण बढ़े हैं।       

     

    प्रवासन की विकराल समस्या दलितों के समक्ष नयी चुनौती है, जिसके मूल में उनका शोषण और भेदभाव की समस्या रही है। वे अपनी जीवन और अस्तित्व रक्षा के लिए एक जगह से दूसरी जगह प्रवासित हो रहे हैं। इस उपन्यास में मकारू इस प्रवासन के दंश को झेलता है। मकरू इसी शोषण से प्रताड़ित हो कर अपना गाँव छोड़ कर शहर जाता है। उपन्यासकार इसके जरिये ये स्पष्ट करते हैं कि इस भेदभाव या शोषण को मिटाने के लिए प्रवासन ही एक मात्र उपाय नहीं है। क्योंकि चाहे गाँव हो या शहर दलितों की स्थिति कहीं अच्छी नहीं है। एक समय था अम्बेडकर ने दलितों को शहरों की ओर लौटने का इशारा किया था लेकिन आज शहर भी दलितों के शोषण के मामले में पीछे नहीं है। किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि गाँव की अपेक्षा शहरों में दलितों के शोषण के पैमाने बदले हैं। यहाँ उपन्यासकार ये भी स्पष्ट करते हैं कि दलितों के प्रति गैर दलितों की दृष्टि में कोई इजाफा नहीं हुआ है।

       

     ‘भेद’ उपन्यास ओड़िशा में स्थित भेद-भाव की स्थिति को प्रस्तुत करता है। ये भेद-भाव दलितों के लिए कितना पीड़ा दायक है इसका चित्रण इस उपन्यास में किया गया है। साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारतीय समाज में व्यक्ति विशेष से अधिक जाति का महत्त्व है। जाति भेद ही दलितों के शोषण का कारण है। जिसकी वजह से दलित प्रताड़ित होता रहा है। दलितों का मानसिक और शारीरिक शोषण तो होता ही रहता है लेकिन ‘भेद’ उपन्यास में दलितों के आर्थिक शोषण की पोल खोली गयी है। ‘भेद’ उपन्यास में कथा की शुरुआत दो सवर्ण और दलित बच्चों की लड़ाई से होती है। उपन्यासकार इन दोनों के जरिये सवर्ण समाज के दकियानूसी नियम-कानून की पोल खोलते हैं। सवर्ण समाज दलितों को अछूत तो मानता है ही  साथ ही शुद्धिकरण जैसे दकियानूसी नियमों का भी अनुपालन करता है। दलितों से शुद्धिकरण के नाम पर पैसे ऐंठे जाते हैं जो उनके लिए सबसे बड़ी समस्या होती है। लाल्टू के पिता दीनबंधु दुरिया से गाँव के पंच कहते हैं– “युवराज (सवर्ण) की जो जाति चली गयी है उसे फिर से जाति में लाने के लिए जो खर्च होगा वह कौन देगा? खर्च भी कितना? जातिभाइयों (सवर्णों के लिए) के भोज के लिए पंद्रह माण चावल, दो माण दाल, सब्जी, तेल-मशाला – कम से कम दो सौ रुपए।”[vi] यह यहाँ स्पष्ट है कि धर्म के नाम पर तो उनका शोषण होता ही है लेकिन सवर्ण समाज आर्थिक रूप से भी उनका शोषण करता है।


    वर्त्तमान में दलितों के समक्ष चुनौती शिक्षा सम्बंधित भी है। पहले दलितों को शिक्षा का अधिकार नहीं था अब शिक्षा मिली है तो उनके मानसिक शोषण बढ़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती भेदभाव के कारण आज भी कुछ दलित बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। उनमें से कुछ शिक्षा अर्जन कर भी लेते हैं तो उनको अनेक प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ता है। दलितों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण सवर्ण समाज उनकी शिक्षा पर कटाक्ष करता है, उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करता है। वाया वकील कहता है– “जो भी हो सेठ, घर गन्दा होने पर डोम लोग जिस तरह से चीड़ जाते हैं वह कहा नहीं जा सकता! और दो अक्षर क्या सीख लिया मानों वेद उपनिषद उनकी  मुँह जुबानी है! मानो जो जहाँ रहना चाहिए वह वहां न रह कर ऊपर उठ गया, वे और इंद्रचन्द्र (देवी-देवता) को मानेंगे? ....दो अक्षर क्या पढ़ लिया इससे क्या तुम ब्राह्मण बन जाओगे?...सात जन्म छोड़ कर सौ जन्म तपस्या करने पर भी क्या सूअर, गाय बन सकता है? त्रेता युग में तुम्हारी बिरादरी के शम्बूक को ब्राह्मण बनने की तपस्या करने के कारण उसकी हत्या की गयी। स्वयं प्रभु श्रीरामचन्द्र ने उसका धड़ और सिर अलग कर दिया था।”[vii] इसलिए दलित धार्मिक ग्रंथों का विरोध करते आये हैं। वे ‘मनुस्मृति’ का भी विरोध करते हैं क्योंकि ये ग्रन्थ ही उनके शोषण के प्रमुख कारक हैं। इसलिए इस उपन्यास में दलितों का आक्रोश भी उपस्थित है। “कौन से शास्त्र में लिखा है कि डोम जाति के लोग मंदिर नहीं जा सकते? वह शास्त्र तुमने लिखा या तुम्हारे बाप दादाओं ने या तुम्हारे चौदह पुरुषों ने। जले मुंह तेरा शास्त्र का रौव दिखाता है। हम क्या शास्त्र नहीं पढ़े हैं! बड़े ठाकुर जगन्नाथ चंडालनी की निंदा करने के कारण बारह घरों में भिक्षा मांगे थे। यह क्या शास्त्र में नहीं लिखा है?[viii]


निष्कर्ष :

    कह सकते हैं कि वैश्वीकरण के दौर में ओड़िशा के दलितों के समक्ष नयी चुनौतियां आ रही है। देश में दलितों के मध्य जाति-भेद की समस्या और एकता की कमी इस समय की सबसे बड़ी चुनौती है। उनके समक्ष समस्याएँ तो पहले भी थीं लेकिन शोषण के पैमाने बदले हैं। दलितों को दिए जाने आरक्षण को लेकर सवाल इस समय की दूसरी चुनौती है जिससे सवर्ण वर्ग आतंकित और आसक्त दोनों है। इसलिए आरक्षण के नियम अभी अन्य वर्गों को भी दिए जा रहे हैं, अब तो सवर्ण वर्ग भी इससे वंचित नहीं है। ऐसे में सरकार दलितों के उन्नयन के लिए कौन से कार्य कर रही है, यह स्पष्ट है। यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि समाज आधुनिक नहीं उत्तर आधुनिक हो गया है लेकिन क्या सही मायने में आधुनिकता आई है? आज भी ऐसे मध्यकालीन लोगों की कमी नहीं है जिनकी सोच में रत्ती भर फर्क पड़ा हो। आज भले ही शिक्षित वर्ग भेदभाव जैसी चीजों को नकारता है लेकिन क्या सचमुच में ये कम हुआ है। क्या आज भी सवर्णों के रसोई में दलितों का प्रवेश हो पाया है? क्या उनको मंदिर में प्रवेश मिल पाया है? इस रूप में देखा जाए तो दलित साहित्य के समक्ष कई मुद्दे उपस्थित हो पाए हैं और उपरोक्त ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर लेखन अपेक्षित है।


संदर्भ


[i] ओड़िया दलित साहित्य, वासुदेव सुनानी, पृ.सं.-263

[ii] ओड़िया दलित साहित्य, वासुदेव सुनानी, पृ.सं.-260

[iii]ओड़िया दलित साहित्य, वासुदेव सुनानी, पृ.सं.-263

[iv] पोड़ापोड़ी, वासुदेव सुनानी, पृ.सं.-162

[v] पोड़ापोड़ी, वासुदेव सुनानी, पृ.सं.- 196

[vi] भेद, अखिल नायक, पृ.सं.-29

[vii] भेद, अखिल नायक, पृ.सं.- 52

[viii] भेद, अखिल नायक, पृ.सं.-65


ज़िनित सबा

अध्यापिका

हिन्दी विभाग, आसिका विज्ञान महाविद्यालय, गंजाम, ओड़िशा, 761111

zinitsaba33@gmail.com, 9492263706

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue

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